तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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न्यायबोधिनी
तानिरूपिता याऽनुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां प्रतियोगित्वमवच्छेदकं तत्त-
द्व्यक्तित्वं च, न त्वनुभवत्वमपीत्यनुभवध्वंसेऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानि-
रूपितकार्यताश्रयत्वरूपानुभवजन्यत्वविरहेणैवातिव्याप्तिवारणसम्भवात् कृतं
स्मृतिहेतुत्वविशेषणेनेति चेत्—
न, स्मृतावतिव्याप्तिवारणायैव तदुपादानात् । तथाहि-स्मृतिं प्रत्यनुभव
एव कारणं न तु स्मृतिरप्यतो घटस्मृतित्वावच्छिन्नं प्रति घटानुभवत्वेनैव
कारणत्वं न तु घटज्ञानत्वेन । तथा च घटस्मृतिनिष्ठकार्यतानिरूपिता या
घटानुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां घटानुभवत्वमवच्छेदकम् । तेनानुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वस्य स्मृतौ विद्यमानत्वादतिव्याप्तिवार-
णाय स्मृतिहेतुत्वमुक्तम् । न हि स्मृतिः स्मृतिहेतुः, अतो न तत्रातिव्याप्ति-
रित्यलं पल्लवतल्लजकल्पानल्पजल्पनेन ।
हिन्दी-कला
ही प्रतियोगी कारण होता है। तथा तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति तत्तद्-
व्यक्तित्वरूप से ही तत्तत्प्रतियोगिव्यक्ति कारण होता है। ऐसा ही कार्यकारण-
भाव ध्वंस और प्रतियोगी में माना गया है। प्रकृत में अनुभवध्वंसनिष्ठकार्यतानिरू-
पिता जो अनुभवनिष्ठां कारणता है, उसमें प्रतियोगित्व या तत्तद्व्यक्तित्व अवच्छेदक
होगा, न कि अनुभवत्व अवच्छेदक होगा । इस प्रकार अनुभवध्वंस में अनुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वरूप परिष्कृत अनुभवजन्यत्व नहीं रहने से
अनुभवध्वंस में अतिव्याप्ति का वारण सुतरां हो जाता है। इसलिये 'स्मृतिहेतुत्व'
विशेषण देना व्यर्थ है।
समाधान--स्मृति में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये ही
'स्मृतिहेतुत्व' विशेषण का उपादान है। क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव ही कारण
होता है, न कि स्मृति भी । अतः घटस्मृतित्वावच्छिन्न ( घटस्मृति ) के प्रति घटानुभव
घटानुभवत्वरूप से ही कारण होता है, घटज्ञानत्वरूप से नहीं। इसलिये घटस्मृति-
निष्ठकार्यतानिरूपिता जो घटानुभवनिष्ठ कारणता है, उसमें घटानुभवत्व ही
अवच्छेदक होगा। इस प्रकार अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व के
स्मृति में भी विद्यमान होने से उसमे प्रसक्त जो भावनालक्षण की अतिव्याप्ति, उसके
वारणार्थ स्मृतिहेतुत्व-विशेषण लक्षण में कहा गया। स्मृति तो अनुभवजन्य होती
हुई भी स्मृति का हेतु नहीं है, अतः उसमें परिष्कृत भावनालक्षण की अति-
व्याप्ति नहीं हुई। इसे अधिक पल्लवित करना अनावश्यक है।