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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७१
न्यायबोधिनी
विशेषणानुपादाने आत्ममनःसंयोगेऽतिव्याप्तिरात्ममनःसंयोगस्य ज्ञानमात्रं
प्रत्यसमवायिकारणत्वेन स्मृतिं प्रत्यपि कारणत्वादतस्तदुपादानम्। आत्ममनः-
संयोगस्यानुभवजन्यत्वाभावान्नातिव्याप्तिः। तावन्मात्रे कृतेऽनुभवध्वंसेऽति-
व्याप्तिः, ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वेनानुभवध्वंसस्याप्यनुभवजन्य-
त्वात्, अतः स्मृतिहेतुत्वोपादानम्। अनुभवध्वंसे स्मृतिहेतुत्वाभावान्नाति-
व्याप्तिः।
ननु विशिष्टबुद्धिं प्रति विशेषणज्ञानस्य कारणता सकलतान्त्रिकमत-
सिद्धा, यथा दण्डविशिष्टबुद्धिं प्रति दण्डज्ञानं कारणम्। दण्डविशिष्टबुद्धि-
र्नाम दण्डप्रकारकबुद्धिः। तथाच दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं प्रति दण्डज्ञा-
नत्वेन कारणत्वमित्यापतितम्। दण्डप्रकारकबुद्धिः दण्डी पुरुष इत्याकारक-
बुद्धिस्तत्र दण्डज्ञानं कारणम्। न हि दण्डमजानानः पुमान् 'दण्डी पुरुषः' इति
प्रत्येति। एवं च यत्रायं दण्ड इति प्रत्यक्षं जातं, तदनन्तरं दण्डी पुरुष इत्या-
कारकप्रत्यक्षमुत्पन्नं, तत्र दण्डी पुरुष इत्याकारकप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः। तद्धि
हिन्दी-कला
सति" ऐसा विशेषण न दिया जाय तो आत्मा-मन के संयोग में भावनालक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि आत्मा-मन का संयोग ज्ञानमात्र के प्रति असमवायि-
कारण होने से स्मृति के प्रति भी हेतु होगा। अतः उक्त विशेषण के उपादान
करने से उक्त अतिव्याप्ति नही हुई, क्योंकि आत्मा मन के संयोग में अनुभवजन्यत्व
नहीं है। एवं यदि अनुभवजन्यत्वमात्र भावना का लक्षण किया जाय तो अनुभव-
ध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि ध्वंस के प्रति प्रतियोगी
कारण होता है, इसलिये अनुभवध्वंस भी अनुभवरूप अपने प्रतियोगी से जन्य है।
अतः भावना के लक्षण में स्मृतिहेतुत्व का भी उपादान किया। अनुभवध्वंस में स्मृति-
हेतुत्व नहीं होने से उक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी।
शङ्का--विशिष्टबुद्धि के प्रति विशेषणज्ञान कारण होता है, यह सर्वमतसिद्ध
है। जैसे, दण्डविशिष्ट बुद्धि (दण्डी-बुद्धि) के प्रति दण्डज्ञान कारण होता है।
दण्डविशिष्ट बुद्धि का मानी है-दण्डप्रकारक बुद्धि। अतः दण्डप्रकारकबुद्धित्वा-
वच्छिन्न के प्रति दण्डज्ञानत्वेन रूपेण कारणता प्राप्त हुई। दण्डप्रकारक बुद्धि "दण्डी
पुरुषः" इत्याकारक बुद्धि है, उसके प्रति दण्डज्ञान कारण है। क्योंकि दण्ड को नहीं
जानने वाला पुरुष "दण्डी पुरुषः" ऐसी प्रतीति नहीं करता है।
अतः जहां "अयं दण्डः" ऐसा प्रत्यक्ष हुआ और उसके बाद 'दण्डी पुरुषः' इत्या-
कारक प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न हुआ, वहां उस 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक प्रत्यक्ष में