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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 199 में से

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पृष्ठ 85

६६ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः
वाक्यं द्विविधम्—वैदिकं लौकिकं च । वैदिकमीश्वरोक्तत्वात्
सर्वमेव प्रमाणम् । लौकिकं त्वाप्तोक्तं प्रमाणम् । अन्यदप्रमाणम् ।
वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानम् । तत्करणं तु शब्दः ।
वाक्य दो प्रकार के होते हैं—वैदिक-वाक्य और लौकिक-वाक्य । वैदिक-वाक्य
ईश्वरोक्त होने के कारण सभी प्रमाण है । किन्तु लौकिक-वाक्य आप्तजनद्वारा कहा
हुआ ही प्रमाण है, शेष ( अनाप्तजनद्वारा कथित ) वाक्य अप्रमाण है ।
वाक्य के अर्थ का बोध शाब्दज्ञान या शाब्दबोध कहाता है । और शाब्दज्ञान
का करण ( असाधारण कारण ) शब्द प्रमाण है ।
॥ इति शब्दपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
ब्दबोधः । सन्निधिं निरूपयति—पदानामिति । असहोच्चारितानि = विल-
म्बोच्चारितानि ।
वैदिकमिति । वेदवाक्यमित्यर्थः । इदमुपलक्षणम् । वेदमूलस्मृत्यादी-
न्यपि ग्राह्याणि । लौकिकं त्विति । वेदवाक्यभिन्नमित्यर्थः । ( आप्तत्वं
च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्वम् ) ।
॥ इति न्यायबोधिन्यां शब्दपरिच्छेदः ॥
हिन्दी-कला
सिञ्चति' यहां पर सेक-करणत्व का अग्नि में बाधनिश्चय है, क्योंकि वह जल का धर्म
है, इसलिये उक्तवाक्य से शाब्दबोध नहीं हो सकेगा ।
प्रमाणभूत आप्तवाक्य दो प्रकार का है—वैदिक और लौकिक । वैदिकवाक्य
का अर्थ है—वेदवाक्य । किन्तु 'वैदिक' यह कहना उपलक्षण मात्र है, इससे वेद-
मूलक स्मृति-पुराणादिवाक्य भी प्रमाण के अन्तर्गत हैं । वेदवाक्य तो ईश्वरोक्त
होने के कारण सब प्रमाण हैं । किन्तु लौकिक वाक्य वे ही प्रमाण हैं, जो आप्तजन
द्वारा उक्त हैं । आप्त वह है, जो शब्दप्रयोग के लिए अपेक्षित यथार्थज्ञान वाला हो ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' शब्दपरिच्छेदः ।
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