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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 199 में से

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पृष्ठ 82

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६३
न्यायबोधिनी
तिष्ठयापारः । वाक्यार्थज्ञानं शाब्दबोधः फलम् । वृत्तिर्नाम शक्तिलक्षणान्य-
तररूपा । शक्तिर्नाम घटादिविशेष्यकघटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक
ईश्वरसङ्केतः । ईश्वरसङ्केतो नाम ईश्वरेच्छा. सैव शक्तिरित्यर्थः । शक्ति-
निरूपकत्वमेव पदे शक्तत्वम् । विषयतासम्बन्धेन शक्त्याश्रयत्वमर्थे
शक्यत्वम् ।
शक्यसम्बन्धो लक्षणा । सा द्विविधा गौणी शुद्धा चेति । गौणी नाम
सादृश्यविशिष्टे लक्षणा । यथा सिंहो माणबक इत्यादौ सिंहपदस्य सिंहसा-
दृश्यविशिष्टे लक्षणा । शुद्धा त्रिविधा—जहल्लक्षणा अजहल्लक्षणा जहद-
जहल्लक्षणा चेति । लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यमात्रबोधप्रयोजिका लक्षणा
जहल्लक्षणा । यथा गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गापदवाच्यप्रवाहसम्बन्धस्य
तीरे सत्त्वात्तादृशशक्यसम्बन्धरूपलक्षणाज्ञानाद् गङ्गापदात्तीरोपस्थितिः ।
लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यशक्योभयबोधप्रयोजिका लक्षणा अजहल्लक्षणा ।
हिन्दी-कला
पदज्ञान से जनित जो पदार्थोपस्थिति, वही व्यापार है । और वाक्यार्थज्ञानरूप शाब्द-
बोध इस प्रमाण का फल है । शक्ति-लक्षणा अन्यतर को वृत्ति कहते हैं । साहित्यिकों
की व्यञ्जनावृत्ति न्याय में अमान्य है ।
“अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः” यह ईश्वरीय संकेत ही शक्ति है । उसका
परिष्कृत स्वरूप न्यायबोधिनीकार बताते हैं—शक्तिर्नाम इत्यादि । घटादिरूप अर्थ-
विशेष्यक एवं घटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक जो ईश्वर का संकेत, वह शक्ति है ।
ईश्वरेच्छा ही ईश्वरसंकेत है, और वह पद की अर्थगत शक्ति है । अर्थगत शक्ति का
निरूपक होने के कारण पद को शक्त कहते हैं । एवं विषयतासम्बन्ध से ईश्वरेच्छारूप
शक्ति का आश्रय होने के कारण पदार्थ को शक्य या शक्यार्थ कहते हैं ।
शक्य का सम्बन्ध लक्षणावृत्ति है । वह दो प्रकार की होती है, गौणी लक्षणा
और शुद्धा लक्षणा । सादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है । जैसे, सिंहो माण-
वकः’ इत्यादिस्थल में सिंह पद की सिंहसादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है ।
शुद्धा लक्षणा के तीन भेद हैं—जहल्लक्षणा-अजहल्लक्षणा और जहदजहल्ल-
क्षणा । लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्यमात्र का बोध कराने वाली लक्षणा जहल्लक्षणा
है । जैसे "गङ्गायां घोषः” यहाँ गङ्गपद का वाच्यार्थ जो प्रवाह, उसका सम्बन्ध तीर
में होने से तादृशशक्यसम्बन्धरूप लक्षणा के ज्ञान से गङ्गापद मे तीर की उप-
स्थिति होकर अनन्तर “गङ्गा तीर में घोष है” ऐसा शाब्दबोध हो जायगा । यह जह-
ल्लक्षणा का उदाहरण है
लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्य और शक्य उभय का बोध कराने वाली लक्षणा