स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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तक कि ज्ञानीके सिर पर लाठियोंकी मार पड़े वह भी कम; और ज्ञानीके मरनेके बाद उसके नामके पत्थरको
भी पूजे !'
एकान्तचर्या
मोहमयी ( बम्बई ) नगरीमें व्यापारिक काम करते हुए भी श्रीमद्जी ज्ञानाराधना तो करते ही रहते
थे । यह उनका प्रमुख और अनिवार्य कार्य था । उद्योग-रत जीवनमें शांत और स्वस्थ चित्तसे चुपचाप आत्म-
साधना करना उनके लिये सहज हो चला था; फिर भी बीच-बीचमें विशेष अवकाश लेकर वे एकान्त स्थान,
जंगल या पर्वतोंमें पहुँच जाते थे । वे किसी भी स्थानपर बहुत गुप्तरूपसे जाते थे । वे नहीं चाहते थे कि
किसीके परिचयमें आया जाय, फिर भी उनकी सुगन्धी छिप नहीं पाती थी । अनेक जिज्ञासु-भ्रमर उनका
उपदेश, धर्मवचन सुननेकी इच्छासे पीछे-पीछे कहीं भी पहुँच ही जाते थे और सत्समागमका लाभ प्राप्त कर
लेते थे । गुजरातके चरोतर, ईडर आदि प्रदेशमें तथा सौराष्ट्र क्षेत्रके अनेक शान्तस्थानोंमें उनका गमन हुआ ।
आपके समागमका विशेष लाभ जिन्हें मिला उनमें मुनिश्री लल्लुजी ( श्रीमद्लघुराजस्वामी ), मुनिश्री देव-
करणजी तथा सायलाके श्री सौभाग्यभाई, अम्बालालभाई ( खंभात ), जूठाभाई ( अमदावाद ) एवं डूंगरभाई
मुख्य थे ।
एक बार श्रीमद्जी सं० १९५५ में जब कुछ दिन ईडरमें रहे तब उन्होंने डॉ० प्राणजीवनदास महेता
( जो उस समय ईडर स्टेटके चीफ मेडिकल ऑफिसर थे और सम्बन्धकी दृष्टिसे उनके श्वसुरके भाई होते थे )
से कह दिया था कि उनके आनेकी किसीको खबर न हो । उस समय वे नगरमें केवल भोजन लेने जितने
समयके लिए ही रुकते, शेष समय ईडरके पहाड़ और जंगलोंमें बिताते ।
मुनिश्री लल्लुजी, श्रीमोहनलालजी तथा श्री नरसीरखको उनके वहाँ पहुँचनेके समाचार मिल गये ।
वे शीघ्रतासे ईडर पहुँचे । श्रीमद्जीको उनके आगमनका समाचार मिला । उन्होंने कहलवा दिया कि मुनिश्री
बाहरसे बाहर जंगलमें पहुँचें—यहाँ न आवें । साधुगण जंगलमें चले गये । बादमें श्रीमद्जी भी वहाँ पहुँचे ।
उन्होंने मुनिश्री लल्लुजीसे एकांतमें अचानक ईडर आनेका कारण पूछा । मुनिश्रीने उत्तर में कहा कि 'हम लोग
अमदावाद या खंभात जानेवाले थे, यहाँ निवृत्ति क्षेत्रमें आपके समागममें विशेष लाभकी इच्छासे इस ओर
चले आये । मुनि देवकरणजी भी पीछे आते हैं ।' इस पर श्रीमद्जीने कहा—'आप लोग कल यहाँसे विहार
कर जावें, देवकरणजीको भी हम समाचार भिजवा देते हैं वे भी अन्यत्र विहार कर जावेंगे । हम यहाँ गुप्त-
रूपसे रहते हैं—किसीके परिचयमें आनेकी इच्छा नहीं है ।'
श्री लल्लुजी मुनिने नम्र-निवेदन किया—'आपकी आज्ञानुसार हम चले जावेंगे परन्तु मोहनलालजी
और नरसीरख मुनियोंको आपके दर्शन नहीं हुये हैं, आप आज्ञा करें तो एक दिन रुककर चले जावें ।'
श्रीमद्जीने इसकी स्वीकृति दी । दूसरे दिन मुनियोंने देखा कि जंगलमें आम्रवृक्षके नीचे श्रीमद्जी प्राकृतभाषाकी
*गाथाओंका तन्मय होकर उच्चारण कर रहे हैं । उनके पहुँचनेपर भी आधा घण्टे तक वे गाथायें बोलते ही
रहे और ध्यानस्थ हो गए । यह वातावरण देखकर मुनिगण आत्मविभोर हो उठे । थोड़ी देर बाद श्रीमद्जी
- १. मा मुज्झह मा रज्जह मा दुस्सह इट्ठणिट्ठअत्थेसु ।
थिरमिच्छह जइ चित्तं विचित्तझाणप्पसिद्धीए ॥४८॥
२. जं किंचि वि चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा साहू ।
लद्धूण एयत्तं तदाहु तं णिच्चयं ज्झाणं ॥ ५५ ॥
३. मा चिट्ठह मा जंपह मा चिंतह किं वि जेण होइ थिरो ।
अप्पा अप्पम्मि रओ इणमेव परं हवे ज्झाणं ॥ ५६ ॥
( द्रव्यसंग्रह )
—श्रीमद्जीने यह 'बृहद्द्रव्यसंग्रह'-ग्रन्थ ईडरके दि० जैन शास्त्र भण्डारमेंसे स्वयं निकलवाया था ।