स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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रुपये लेना निकलते हैं, परन्तु मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ । इतने अधिक रुपये मैं तुमसे लूँ तो तुम्हारी
क्या दशा हो ? परन्तु राजचन्द्र दूध पी सकता है, खून नहीं !"
वह व्यापारी कृतज्ञ-भावसे श्रीमद्की ओर स्तब्ध होकर देखता ही रहा ।
भविष्यवक्ता, निमित्तज्ञानी
श्रीमद्जीका ज्योतिष-सम्बन्धी ज्ञान भी प्रखर था । वे जन्मकुंडली, वर्षफल एवं अन्य चिह्न देखकर
भविष्यकी सूचना कर देते थे । श्रीजूठाभाई ( एक मुमुक्षु ) के मरणके बारेमें उन्होंने २। मास पूर्व स्पष्ट बता
दिया था ¹। एक बार सं० १९५५ की चैत्र वदी ८ को मोरवीमें दोपहरके ४ बजे पूर्वदिशाके आकाशमें
काले बादल देखे और उन्हें दुष्काल पड़नेका निमित्त जानकर उन्होंने कहा कि 'ऋतुको सन्निपात हुआ है।'
इस वर्ष १९५५ का चौमासा कोरा रहा—वर्षा नहीं हुई और १९५६ में भयंकर दुष्काल पड़ा । वे दूसरेके
मनकी बातको भी सरलतासे जान लेते थे । यह सब उनकी निर्मल आत्मशक्तिका प्रभाव था ।
कवि-लेखक
श्रीमद्जीमें, अपने विचारोंकी अभिव्यक्ति पद्यरूपमें करनेकी सहज क्षमता थी । उन्होंने सामाजिक
रचनाओंमें-'स्त्रीनीतिबोधक', 'सद्बोधशतक' 'आर्य प्रजानी पडती' 'हुन्नरकला वधारवा विषे' 'सद्गुण,
सुनीति, सत्य विषे' आदि अनेक रचनाएं केवल ८ वर्षकी वयमें लिखी थीं, जिनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ
है । ९ वर्षकी आयुमें उन्होंने रामायण और महाभारतकी भी पद्य-रचना की थी जो प्राप्त नहीं हो सकी ।
इसके अतिरिक्त जो उनका मूल विषय आत्मज्ञान था उसमें उनकी अनेक रचनाएं हैं । प्रमुखरूपसे 'आत्म-
सिद्धि' ( १४२ दोहे ) 'अमूल्य तत्त्वविचार' 'भक्तिना वीस दोहरा' 'ज्ञानमीमांसा' 'परमपदप्राप्तिनी भावना'
( अपूर्व अवसर ) 'मूळमार्ग रहस्य' 'जिनवाणीनी स्तुति' 'वारह भावना' और 'तृष्णानी विचित्रता' हैं ।
अन्य भी बहुत-सी रचनाएं हैं, जो भिन्न-भिन्न वर्षोंमें लिखी हैं ।
'आत्मसिद्धि'-शास्त्रकी रचना तो आपने मात्र डेढ़ घंटेमें, श्री सौभाग्यभाई, डूंगरभाई आदि मुमु-
क्षुओंके हितार्थ नडियादमें आश्विन वदी १ ( गुजराती ) गुरुवार सं० १९५२ को २९वें वर्षमें लिखी थी ।
यह एक, निस्संदेह धर्ममार्गकी प्राप्तिमें प्रकाशरूप अद्भुत रचना है । अंग्रेजीमें भी इसके गद्य-पद्यात्मक अनुवाद
प्रगट हो चुके हैं ² ।
गद्य-लेखनमें श्रीमद्जीने 'पुष्पमाला' 'भावनावोध' और 'मोक्षमाला'की रचना की । यह सभी सामग्री
पठनीय-विचारणीय है । 'मोक्षमाला' उनकी अत्यन्त प्रसिद्ध रचना है, जिसे उन्होंने केवल १६ वर्ष ५ मासकी
आयुमें मात्र ३ दिनमें लिखी थी । इसमें १०८ पाठ हैं । कथनका प्रकार विशाल और तत्त्वपूर्ण है ।
उनकी अर्थ करनेकी शक्ति भी बड़ी गहन थी । भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यके 'पंचास्तिकाय'-ग्रन्थकी मूल
गाथाओंका उन्होंने अविकल गुजराती अनुवाद किया है ³ ।
सहिष्णुता
विरोधमें भी सहनशील होना महापुरुषोंका स्वाभाविक गुण है । यह बात यहाँ घटित होती है । जैन
समाजके कुछ लोगोंने उनका प्रवल विरोध किया, निन्दा की, फिर भी वे अटल शांत और मौन रहे । उन्होंने
एक वार कहा था : 'दुनिया तो सदा ऐसी ही है । ज्ञानियोंको, जीवित हों तब कोई पहचानता नहीं, वह यहाँ
१. देखिये-दैनिक नोंधसे लिया गया कथन, पत्र क्र० ११६, ११७ ('श्रीमद्राजचन्द्र' गुजराती)
२. 'आत्मसिद्धि' के अंग्रेजी अनुवादमें Atmasiddhi, Self Realization, और Self Fulfilment
प्रगट हुए हैं । संस्कृत-छाया भी छपी है ।
३. देखिये-'श्रीमद्राजचन्द्र' गुज० पत्रांक ७६६ । उनकी सभी प्रमुख-सामग्रीका संकलन 'श्रीमद्राजचन्द्र'-
ग्रन्थमें किया गया है ।