स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ९ ]
ध्यानसे उठे और 'विचारना' इतना कहकर चलते बने । मुनियोंने विचारा कि लघुशंकादि-निवृत्तिके लिए
जाते होंगे परन्तु वे तो निस्पृहरूपसे चले ही गये । थोड़ी देर इधर-उधर ढूंढ़कर मुनिगण उपाश्रयमें आ गये ।
उसी दिन शामको मुनि देवकरणजी भी वहाँ पहुँच गये । सभीको श्रीमद्जीने पहाड़के ऊपर स्थित
दिगम्बर, श्वेताम्बर मन्दिरोंके दर्शन करनेकी आज्ञा दी । वीतराग-जिनप्रतिमाके दर्शनोंसे मुनियोंको परम
उल्लास जाग्रत हुआ । इसके पश्चात् तीन दिन और भी श्रीमद्जीके सत्समागमका लाभ उन्होंने उठाया ।
जिसमें श्रीमद्जीने उन्हें 'द्रव्यसंग्रह' और 'आत्मानुशासन'-ग्रन्थ पूरे पढ़कर स्वाध्यायके रूपमें सुनाये एवं अन्य
भी कल्याणकारी बोध दिया ।
अत्यन्त जाग्रत आत्मा ही परमात्मा बनता है, परम वीतराग-दशाको प्राप्त होता है । इन्हीं अन्तर-
भावोंके साथ आत्मस्वरूपकी ओर लक्ष कराते हुए एक बार श्रीमद्जीने अहमदाबादमें मुनिश्री लल्लुजी (पू०
लघुराजस्वामी ) तथा श्रीदेवकरणजीको कहा था कि 'हममें और वीतरागमें भेद गिनना नहीं' 'हममें और
श्री महावीर भगवानमें कुछ भी अन्तर नहीं, केवल इस कुर्तेका फेर है ।'
मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर
उनका कहना था कि मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर रहने पर ही जीवनमें रागद्वेषसे रहित हुआ जा
सकता है । मतोंके आग्रहसे निजस्वभावरूप आत्मधर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती । किसी भी जाति या वेषके
साथ भी धर्मका सम्बन्ध नहीं :
“जाति वेषनो भेद नहि, कह्यो मार्ग जो होय ।
साधे ते मुक्ति लहे, एमां भेद न कोय ॥”
( आत्मसिद्धि १०७ )
—जो मोक्षका मार्ग कहा गया है वह हो तो किसी भी जाति या वेषसे मोक्ष होवे, इसमें कुछ भेद
नहीं है । जो साधना करे वह मुक्तिपद पावे ।
आपने लिखा है—“मूलतत्त्वमें कहीं भी भेद नहीं है । मात्र दृष्टिका भेद है ऐसा मानकर आशय
समझकर पवित्र धर्ममें प्रवृत्ति करना ।” ( पुष्पमाला १४ पृ० ४ )
“तू चाहे जिस धर्मको मानता हो इसका मुझे पक्षपात नहीं, मात्र कहनेका तात्पर्य यहो कि जिस
मार्गसे संसारमलका नाश हो उस भक्ति, उस धर्म और उस सदाचारकातू सेवन कर¹ ।” (पु०मा० १५ पृ०४)
“दुनिया मतभेदके बंधनसे तत्त्व नहीं पा सकी !” ( पत्र क्र० २७ )
उन्होंने प्रीतम, अखा, छोटम, कबीर, सुन्दरदास, सहजानन्द, मुक्तानन्द, नरसिंह महेता आदि सन्तोंकी
वाणीको जहाँ-तहाँ आदर दिया है और उन्हें मार्गानुसारी जीव (तत्त्वप्राप्तिके योग्य आत्मा ) कहा है । इसलिए
एक जगह उन्होंने अत्यन्त मध्यस्थतापूर्वक आध्यात्मिक-दृष्टि प्रगट की है कि 'मैं किसी गच्छमें नहीं, परन्तु
आत्मामें हूँ ।'
एक पत्रमें आपने दर्शाया है—“जब हम जैनशास्त्रोंको पढ़नेके लिए कहें तब जैनी होनेके लिए नहीं
कहते; जब वेदान्तशास्त्र पढ़नेके लिए कहें तो वेदान्ती होनेके लिए नहीं कहते । इसीप्रकार अन्य शास्त्रोंको वांचनेके
लिए कहें तब अन्य होनेके लिए नहीं कहते । जो कहते हैं वह केवल तुम सब लोगोंको उपदेश-ग्रहणके लिए
ही कहते हैं । जैन और वेदान्ती आदिके भेदका त्याग करो । आत्मा वैसा नहीं है² ।”
१. देखिए इसीप्रकारके विचार—
पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु ।
युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥ ( हरिभद्रसूरि )
२. श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुज० ) पत्र क्र० ३५८