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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
मातर्भारति सन्निधेहि हृदि मे येनेयमाप्तस्तुते-
र्निर्मातुं विवृति प्रसिद्धयति जवादारम्भसम्भावना ।
यद्वा विस्मृतमोष्ठयोः स्फुरति यत् सारस्वतः शाश्वतो
मन्त्रः श्रीउदयप्रभेतरचनारम्यो ममाहर्निशम् ॥ ४ ॥
अवतरणिका
इह हि विषमदुःषमारजनितिमिरतिरस्कारभास्करानुकारिणा वसुधातलावतीर्णसुधा-
सारिणीदेशनावितानपरमार्हीकृतश्रीकुमारपालक्ष्मापालप्रवर्तिताभयदानाभिधानजीवातुसं-
जीवितनानाजीवप्रदत्तार्शीर्वादमाहात्म्यकल्पावधिस्थायिविशदयशःशरीरेण निरवद्यचातुर्विद्य-
निर्माणैकब्रह्मणा श्रीहेमचन्द्रसूरिणा जगतप्रसिद्धश्री सिद्धसेनदिवाकरविरचितद्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिका-
नुसारि श्रीवर्धमानजिनस्तुतिरूपमयोगव्यवच्छेद'दान्ययोगव्यवच्छेद'दाभिधानं द्वात्रिंशिकाद्वितयं
विद्वज्जनमनस्तत्त्वावबोधनिबन्धनं विदधे । तत्र च प्रथमद्वात्रिंशिकायाः सुखोन्नेयत्वाद्
तद्व्याख्यानमुपेक्ष्य द्वितीयस्यास्तस्या निःशेषदुर्वादिपरिषदधिक्षेपदक्षायाः कतिपयपदार्थविव-
रणकरणेन स्वस्मृतिबीजप्रबोधविधिर्विधीयते । तस्याश्चेदमदिकाव्यम्—
हे सरस्वती माता ! तुम मेरे हृदयमें निवास करो, जिससे मैं आप्तस्तुति (द्वात्रिंशिका) की
व्याख्या (स्याद्वादमंजरी) शीघ्र ही प्रारम्भ कर सकूँ । अथवा नहीं; मैं भूल गया, क्योंकि 'श्रीउदयप्रभ'—
रचनासे मनोहर शाश्वत सरस्वतीका मन्त्र तो दिन-रात मेरे होठोंमें स्फुरित हो ही रहा है । ( उदयप्रभ
टीकाकारके गुरुका नाम है । यहां टीकाकार गुरुभक्तिके वश होकर कहते हैं कि गुरुस्मरणके प्रभावसे सरस्वती
माता स्वयं मेरे हृदयमें विराजमान हैं, अतएव सरस्वती मातासे प्रार्थना करनेको आवश्यकता ही नहीं
रहती

अनन्तविज्ञानमतीतदोषमबाध्यसिद्धान्तममर्त्यपूज्यम् ।
श्रीवर्धमानं जिनमाप्तमुख्यं स्वयम्भुवं स्तोतुमहं यतिष्ये ॥ १ ॥
श्रीवर्धमानं जिनमहं स्तोतुं यतिष्य इति क्रियासम्बन्धः । किंविशिष्टम् ? अनन्तम्—
अप्रतिपाति, वि--विशिष्टं सर्वद्रव्यपर्यायविषयत्वेनोत्कृष्टं, ज्ञानं-केवलाख्यं विज्ञानम्, ततोऽनन्तं
विज्ञानं यस्य सोऽनन्तविज्ञानस्तम् । तथा अतीताः—निःसत्ताकीभूतत्वेनातिक्रान्ताः, दोषाः—
रागादयो यस्मात् स तथा तम् । तथा अबाध्यः—परैर्बाधितुमशक्यः, सिद्धान्तः—स्याद्वादश्रुत-
लक्षणो यस्य स तथा तम् । तथा अमर्त्याः—देवाः, तेषामपि पूज्यम्—आराध्यम् ॥
अत्र च श्रीवर्धमानस्वामिनो विशेषणद्वारेण चत्वारो मूलातिशयाः प्रतिपादिताः । तत्रा-
नन्तविज्ञानमित्यनेन भगवतः केवलज्ञानलक्षणविशिष्टज्ञानानन्त्यप्रतिपादनाद् ज्ञानातिशयः ।
अतीतदोषमित्यनेनाष्टादशदोषसंख्याभिधानाद् अपायापगमातिशयः । अबाध्यसिद्धान्तमित्य-
नेन कुतीर्थिकोपन्यस्तकुहेतुसमूहाशक्यबाध्यस्याद्वादरूपसिद्धान्तप्रणयनभणनाद् वचनातिशयः ।
अमर्त्यपूज्यमित्यनेनाकृत्रिमभक्तिभरनिर्भरसुरासुरनिकायनायकनिर्मितमहाप्रातिहार्यसपर्यापरि-
ज्ञानात् पूजातिशयः ॥
अत्राह परः । अनन्तविज्ञानमित्येतावदेवास्तु, नातीतदोषमिति । गतार्थत्वात् । दोषा-
त्ययं विनाऽनन्तविज्ञानत्वस्यानुपपत्तेः ॥ अत्रोच्यते । कुनयमतानुसारिपरिकल्पिताप्तव्यवच्छे-
दार्थमिदम् । तथा चाहुराजीविकनयानुसारिणः—
श्लोकार्थ—अनन्तज्ञानके धारक, दोषोंसे रहित, अबाध्य सिद्धान्तसे युक्त, देवों द्वारा पूजनीय, यथार्थ
वक्ताओं (आप्तों)में प्रधान, और स्वयम्भू, ऐसे श्रीवर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति करनेके लिए मैं प्रयत्न करूँगा ।
व्याख्यार्थ—मैं वर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति करनेका प्रयत्न करूँगा । वर्धमान जिनेन्द्र अनन्त
केवलज्ञानके धारक, रागद्वेष आदि अठारह दोषोंसे रहित, प्रतिवादियों द्वारा अखण्डनीय ऐसे स्याद्वादरूप
सिद्धान्तसे युक्त तथा देवोंसे पूजनीय हैं ।
यहाँ उपर्युक्त चार विशेषणोंसे वर्धमानस्वामीके चार मूल अतिशयोंका प्रतिपादन किया गया है ।
'अनन्तज्ञान' से विशिष्टज्ञान—केवलज्ञानकी अनन्ततारूप ज्ञानातिशय, 'अतीतदोष' से अठारह दोषोंके क्षयरूप
अपायापगम अतिशय, 'अबाध्यसिद्धान्त' से कुतीर्थिकोंके कुहेतुओं-द्वारा अखण्डनीय स्याद्वाद सिद्धान्तकी प्ररूपणा-
रूप वचनातिशय, तथा 'अमर्त्यपूज्य' विशेषणसे सहजभक्तिभावसे परिपूरित देवों और असुरोंके नायक इन्द्र
द्वारा की हुई महाप्रातिहार्य पूजारूप पूजातिशयका सूचन किया गया है ।
उपर्युक्त चार विशेषणोंकी सार्थकता
(क) शंका—वर्धमानस्वामीको 'अनन्तविज्ञान' विशेषण देना ही पर्याप्त है, 'अतीतदोष' विशेषणकी
आवश्यकता नहीं। कारण कि बिना दोषोंके नाश हुए अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ? समाधान—
कुवादियों द्वारा कल्पित आप्तके निराकरण करनेके लिये 'अतीतदोष' विशेषण दिया गया है। आजीविक-
मतके अनुयायी कहते हैं—
१. पण्डा तत्त्वानुगा मोक्षे ज्ञानं विज्ञानमन्यतः । शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा ॥
—इत्यभिधानचिन्तामणौ द्वितीयकाण्डे २२४ श्लोकः ।
२. अन्तराया दानलाभवीर्यभोगोपभोगगाः । हासो रत्यरती भीतिर्जुगुप्सा शोक एव च ॥७२॥
कामो मिथ्यात्वमज्ञानं निद्रा चाविरतिस्तथा । रागो द्वेषश्च नो दोषास्तेषामष्टादशाप्यमी ॥७३॥
—अभिधानचिन्तामणौ प्रथमकाण्डे श्लोकौ ।
३. कंकिल्लि कुसुमवुट्ठि देवज्झुणि चामरासणाइं च । भावलयभेरिछत्तं जयन्ति जिणपाडिहेराई ॥१॥
प्रवचनसारोद्धारे द्वार ३९ (गाथा ४४०) ।
छाया—१ अशोकवृक्षः, २ कुसुमवृष्टिः, ३ दिव्यध्वनिः, ४ चामरे, ५ आसनानि च, ६ भामण्डलं,
७ भेरी, ८ छत्रम् ।

४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
“ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् ।
गत्वाऽगच्छन्ति भूयोऽपि भवं तीर्थनिकारतः ॥”
इति । तन्नूनं न तेऽतीतदोषाः । कथमन्यथा तेषां तीर्थनिकारदर्शनेऽपि भवावतारः ॥
आह । यद्येवमतीतदोषमित्येवास्तु, अनन्तविज्ञानमित्यतिरिच्यते । दोषात्ययेऽवश्यंभा-
वित्त्वादनन्तविज्ञानत्वस्य । न । कैश्चिद्दोषाभावेऽपि तदनभ्युपगमात् । तथा च वैशेषिकवचनम्—
“सर्वं पश्यतु वा मा वा तत्त्वमिष्टं तु पश्यतु ।
कीटसङ्ख्यापरिज्ञानं तस्य नः क्वोपयुज्यते ॥”
तथा— “तस्मादनुष्ठानगतं ज्ञानमस्य विचार्यताम् ।
प्रमाणं दूरदर्शी चेदेते गृध्रानुपास्महे ॥”
तन्मतव्यपोहार्थमनन्तविज्ञानमित्युदुष्टमेव । विज्ञानानन्त्यं विना एकस्याप्यर्थस्य
यथावत् परिज्ञानाभावात् । तथा चार्षम्—
“ जे एगं जाणइ, से सव्वं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ॥१ ”
"धर्मतीर्थके प्रवर्त्तक ज्ञानी मोक्ष प्राप्त करते हैं, तथा अपने तीर्थका तिरस्कार होते देखकर वे फिर
संसारमें चले आते हैं।"
निश्चय ही ये ज्ञानी दोषोंसे रहित नहीं हैं । अन्यथा अपने तीर्थका तिरस्कार देख उन्हें संसारमें
फिरसे आनेकी आवश्यकता न होती । आजीविकमतका निराकरण करनेके लिए यहाँ 'अतीतदोष' विशेषण—
दिया गया है ।
(ख) शंका—यदि ऐसा ही है, तो केवल 'अतीतदोष' विशेषण ही दिया जाय, 'अनन्तविज्ञान' की
क्या आवश्यकता है ? कारण कि दोषोंके नष्ट होनेपर अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति अवश्यंभावी है । समाधान—
कितने ही वादी दोषोंके नाश होनेपर भी अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति नहीं स्वीकार करते, अतएव 'अनन्तविज्ञान'
विशेषण दिया गया है ।
वैशेषिकोंने कहा है—
“ईश्वर सब पदार्थोंको जाने अथवा न जाने, वह इष्ट पदार्थोंको जाने, इतना ही बस है । यदि
ईश्वर कीड़ोंकी संख्या गिनने बैठे तो वह हमारे किस कामका ?”
तथा—“अतएव ईश्वरके उपयोगी ज्ञानकी ही प्रधानता है । क्योंकि यदि दूर तक देखनेवालेको ही
प्रमाण माना जाय, तो फिर हमें गीध पक्षियोंकी पूजा करनी चाहिये ।”
तात्पर्य यह है, कि वैशेषिक लोग ईश्वरको अतीतदोष स्वीकार करके भी उसे सकल पदार्थोंका ज्ञाता
नहीं मानते । इसलिए इस मतका निराकरण करनेके लिए ग्रन्थकारने अनन्तविज्ञान विशेषण दिया है, और
यह विशेषण सार्थक ही है, क्योंकि अनन्तज्ञानके बिना किसी वस्तुका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता ।
आगमका वचन है—
१ आचारांगसूत्रे प्रथमश्रुतस्कंधे तृतीयाध्ययने चतुर्थोद्देशे सूत्रम् १२२ ।
छाया—य एकं जानाति स सर्वं जानाति । यः सर्वं जानाति स एकं जानाति ॥
तुलनीय—जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तिक्कालिगे तिहुवणत्थे ।
णातुं तस्स ण सक्कं सप्पज्जयं दव्वमेगं वा ॥
दव्वं अणंतपज्जयमेगमणंताणि दव्वजादीणि । ण विजाणदि जदि जुगवं किध सो सव्वाणि जाणादि ॥
( प्रवचनसार अ. १ गा. ४८,४९ )
छाया—यो न विजानाति युगपदर्थान् त्रैकालिकान् त्रिभुवनस्थान् ।
ज्ञातुं तस्य न शक्यं सपर्ययं द्रव्यमेकं वा ॥
द्रव्यमनन्तपर्यायमेकमनन्तानि द्रव्यजातीनि । न विजानाति यदि युगपत् कथं स सर्वाणि जानाति ॥

अन्य. यो. व्य. श्लोक १ ] स्याद्वादमञ्जरी ५
तथा- "एको भावः सर्वथा येन दृष्टः सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टा एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥"
ननु तर्ह्यबाध्यसिद्धान्तमित्यपार्थकम् । यथोक्तगुणयुक्तस्यान्यभिचारिवचनत्वेन तदुक्त-
सिद्धान्तस्य बाधाऽयोगात् । न । अभिप्रायाऽपरिज्ञानात् । निर्दोषपुरुषप्रणीत एवाबाध्यः
सिद्धान्तः । नापरेऽपौरुषेयाद्याः असम्भवादिदोषाऽग्रातत्वात् , इति ज्ञापनार्थम् । आत्ममात्र-
तारकमूकान्तकृतकेवल्यद्विरूपमुण्डकेवलिनो² यथोक्तसिद्धान्तप्रणयनाऽसमर्थस्य व्यवच्छेदार्थं
वा विशेषणमेतत् ॥
"जो एकको जानता है, वह सबको जानता है, और जो सबको जानता है, वह एकको जानता है ।"
तथा—"जिसने एक पदार्थको सब प्रकारसे देखा है, उसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे देख लिया
है । तथा जिसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया है, उसने एक पदार्थको सब प्रकारसे जान लिया है।"
(कहनेका भाव यह है कि जबतक हम एक पदार्थका पूर्ण रीतिसे ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, उस
समय तक हमें सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव 'एक' और 'अनेक' सापेक्ष हैं; अर्थात् 'एक'
का ज्ञान प्राप्त करना, 'अनेक' को जानना है । इसलिए अतीतदोष विशेषणके समान अनन्तविज्ञान विशेषण भी
उतना ही आवश्यक है । इसीलिए वैशेषिक मतका निराकरण करनेके लिए अतीतदोषके साथ अनन्तविज्ञान
विशेषण दिया गया है ।)
(ग) शंका—'अबाध्यसिद्धान्त' विशेषण देना व्यर्थ है । कारण कि जो पुरुष 'अनन्तविज्ञान' और
'अतीतदोष' है, उसके वचनोंमें कोई दोष नहीं होता, इसलिए उसका सिद्धान्त अबाध्य होगा ही । समाधान—
अबाध्यसिद्धान्त विशेषणका अभिप्राय है, कि निर्दोष पुरुष द्वारा निर्मित सिद्धान्त ही अबाध्य हैं; असम्भव
आदि दोष युक्त होनेसे अपौरुषेय आदि-पुरुषके बिना निर्मित वेद आदि सिद्धान्त-दोषरहित नहीं हैं ।
अथवा, सिद्धान्तोंके रचनेमें असमर्थ, स्वयं अपना ही उद्धार करनेवाले मूक तथा अन्तकृत मुण्डकेवलियोंके
(देखिए परिशिष्ट [क] ) निराकरण करनेके लिए अबाध्यसिद्धान्त विशेषण दिया गया है । अबाध्य-
सिद्धान्त विशेषणकी सार्थकता यहाँ दो प्रकारसे बतायी गयी है : (अ) निर्दोष पुरुष द्वारा निर्मित सिद्धान्त ही
बाधारहित हो सकता है, पुरुष बिना निर्मित (अपौरुषेय) वेद अबाधित नहीं हो सकता । क्योंकि तालु आदिसे
उत्पन्न वर्णोंके समूहको वेद कहते हैं, तथा तालु आदि स्थान मनुष्यजन्य हैं, अतएव वेदोंका अपौरुषेय मानना
असम्भव दोषसे दूषित है । (आ) मुण्डकेवलियोंका निराकरण उक्त विशेषणकी दूसरी सार्थकता है । बाह्य अति-
शयोंसे रहित, संसारसे वैराग्यभावको प्राप्त होकर जो केवल अपनी ही आत्माके उद्धारका प्रयत्न करते हैं, वे मुण्ड-
केवली कहे जाते हैं । ये केवली अन्तःकृत और मूक दो प्रकारके होते हैं । दोनों ही केवली कर्मोंके नाश करनेवाले
और सम्पूर्ण पदार्थोंके द्रष्टा होते हैं । अन्तर केवल इतना ही है कि अन्तःकृत केवलीके संसारसे मुक्त होनेका
समय बहुत नजदीक रहता है, या कहना चाहिए कि मुक्त होनेके कुछ समय पहले ही अन्तःकृत केवलीको
केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है; तथा मूककेवली किसी शारीरिक दोषके कारण उपदेश देनेमें असमर्थ होते हैं,
इसलिए वे मौन रहते हैं । उक्त दोनों केवली किसी सिद्धान्तकी रचना नहीं कर सकते हैं । यही कारण है,
कि अतीतदोष और अनन्तविज्ञानके धारक होते हुए भी मुण्डकेवलियोंका निराकरण करनेके लिए ग्रन्थकारने
१. ताल्वादिजन्मा ननु वर्णवर्गो वर्णात्मको वेद इति स्फुटं च ।
पुंसश्च ताल्वादि ततः कथं स्यादपौरुषेयोऽयमिति प्रतीतिः ॥
२. (१) द्रव्यभावमुण्डनप्रधानस्तथाविधबाह्यातिशयशून्यः केवली ।
(२) संविग्नो भवनिर्वेदादात्मनिःसरणं तु यः ।
आत्मार्थं संप्रवृत्तोऽसौ सदा स्यान्मण्डकेवली ॥
(३) यः पुनः सम्यक्त्वार्वाप्तो भवनेर्गुण्यदर्शनात्तन्निर्वेदादात्मनिःसररणमेव केवलमभिवाञ्छति तथैव
चेष्टते स मुण्डकेवली भवति इति ।

्णुम् । नन्वतिशयानां परिमिततयैव सिद्धान्ते प्रसिद्धू-Wait,वर्धिष्णुम्: Look at वर्धिष्णुम्in line 8:वर्धिष्णुम्- wait, the letter isर्धि? Yes, वर्धिष्णुम् ।`

Line 9:
त्वात्कथं वर्धमानतोपपत्तिः । इति चेत्, न । यथा निशीथचूर्णौ१ भगवतां श्रीमदर्हतामष्टोत्तर-

Line 10:
सहस्रसङ्ख्याद्वाह्यलक्षणसङ्ख्ययाया उपलक्षणत्वेनान्तरङ्गलक्षणानां सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम् ।
Wait, सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम् vs सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम्: look at सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम्:
सत्त्वा or सत्त्वादीनामानन्त्यमुक्तम्?
Look at सत्त्वादीनाम्:
There is an ी matra on द: सत्त्वादीनामानन्त्यमुक्तम्!
Yes, दी has dirgha-ii matra!

Line 11:
एवमतिशयानामधिकृतपरिगणनायोगेऽप्यपरिमितत्वमविरुद्धम् । ततो नातिशयश्रिया वर्ध-

Line 12:

अन्य. यो. व्य. श्लोक १ ] स्याद्वादमञ्जरी ७
षितरागादिदोष इति । अबाध्यसिद्धान्तता च श्रुतकेवल्य¹दिष्वपि दृश्यतेऽतस्तदपोहायाप्त-
मुख्यमिति विशेषणम् । आप्तिर्हि रागद्वेषमोहानामैकान्तिक आत्यन्तिकश्च² क्षयः, सा येषामस्ति
ते खल्वाप्ताः । अभ्रादित्वाद्³मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः । तेषु मध्ये मुखमिव सर्वाङ्गानां प्रधान-
त्वेन मुख्यम् । “शाखादेर्यः⁴” इति तुल्ये यः । अमर्त्यपूज्यता च तथाविधगुरुपदेशपरिचर्या-
पर्याप्तविद्याचरणसम्पन्नानां सामान्यमुनीनामपि न दुर्घटा । अतस्तन्निराकरणाय स्वयम्भुवमिति
विशेषणम् । स्वयम्-आत्मनैव, परोपदेशनिरपेक्षतयाऽवगततत्त्वो भवतीति स्वयम्भूः-स्वयं
संबुद्धः, तम् । एवंविधं चरमजिनेन्द्रं स्तोतुं-स्तुतिविषयीकर्तुम् अहं यतिष्ये-यत्नं करिष्यामि ।
अत्र चाचार्यो भविष्यत्कालप्रयोगेण योगिनामप्यशक्यमनुष्ठानं भगवद्गुणस्तवनं मन्यमानः
श्रद्धामेव स्तुतिकरणेऽसाधारणं कारणं ज्ञापयन् यत्नकरणमेव मदधीनं पुनर्यथाऽवस्थितभग-
वद्गुणस्तवनसिद्धिरिति सूचितवान् । अहमिति च गतार्थत्वेऽपि परोपदेशान्यानुवृत्त्यादि-
निरपेक्षतया निजश्रद्धयैव स्तुतिप्रारम्भ इति ज्ञापनार्थम् ॥
अथवा । श्रीवर्धमानादिविशेषणचतुष्टयमनन्तविज्ञानादिपदचतुष्टयेन सह हेतुहेतु-
मद्भावेन व्याख्यायते । यत एव श्रीवर्धमानम्, अत एवानन्तविज्ञानम् । श्रिया-कृत्स्नकर्म-
दोषोंको जीतकर उन्हें जड़मूलसे नष्ट कर दिया है, उसे जिन कहते हैं । 'अबाध्यसिद्धान्त' श्रुतकेवली आदिमें
भी पाया जाता है, उसका निराकरण करनेके लिए 'आप्तमुख्य' विशेषण दिया गया है । जिसके राग, द्वेष
और मोहका सर्वथा क्षय हो गया है, उसे आप्त कहते हैं । [ यहाँ अभ्रादिगणमें मत्वर्थमें 'अच्' प्रत्यय हुआ
है; ( 'अभ्रादिभ्यः' हेमशब्दानुशासन ७।२।४६ ) । जिस प्रकार सम्पूर्ण अंगोंमें मुख प्रधान है, इसी तरह
जिनेन्द्रभगवान् आप्तोंमें प्रधान हैं, इसलिए उन्हें आप्तमुख्य कहा गया है । यहाँ 'शाखादेर्यः' ( हेमशब्दानु-
शासन ७।१।११४ ) सूत्रसे तुल्य अर्थमें 'य' प्रत्यय हुआ है ] । सद्गुरुओंके उपदेश और सेवासे पर्याप्त
ज्ञान और चारित्रको प्राप्त करनेवाले सामान्य मुनि भी देवों द्वारा पूजे जाते हैं, इसलिए उनका निराकरण
करनेके लिए 'स्वयम्भू' विशेषण दिया गया है । जिसने दूसरेके उपदेशके बिना स्वयं ही तत्त्वोंको जान लिया
है, वह स्वयम्भू कहलाता है-जो स्वयं सम्बुद्ध हो । इन पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त अन्तिम जिनेन्द्र ( वर्धमान-
स्वामी ) की स्तुति करनेका मैं ( हेमचन्द्र ) प्रयत्न करूँगा । भगवान्के गुणोंका स्तवन योगियों द्वारा भी
अशक्य है, और असाधारण श्रद्धाके वश ही उन गुणोंकी स्तुति की जाती है, यह सूचित करनेके लिए
आचार्यने 'यतिष्ये' भविष्यकालका प्रयोग किया है । अर्थात् प्रयत्न करना ही मेरे अधीन है, यथावस्थित
भगवान्के गुणोंके स्तवनकी सिद्धि नहीं, यही इससे सूचित होता है । यद्यपि 'यतिष्ये' कहनेसे 'अहं' का
स्वयं बोध हो जाता है, फिर भी दूसरोंके उपदेशके बिना; बिना किसीकी आज्ञाके, केवल अपनी ही भक्तिसे
मैं इस स्तवनको आरम्भ करता हूँ, यह बतानेके लिए 'अहं' पद दिया गया है ।
अथवा-(१) श्रीवर्धमानं, (२) जिनं, (३) आप्तमुख्यं, (४) स्वयम्भुवं-ये चारों विशेषण क्रमशः
(१) अनन्तविज्ञानं, (२) अतीतदोषं, (३) अबाध्यसिद्धान्तं, (४) अमर्त्यपूज्यंके साथ कारण और कार्यरूपसे
प्रतिपादित किये जा सकते हैं । भगवान् सम्पूर्ण कर्मोंके नाशसे उत्पन्न होनेवाली अनन्तचतुष्टय लक्ष्मीसे
१. श्रुतेन केवलिनः श्रुतकेवलिनः, चतुर्दशपूर्वधरत्वात् ।
अथ प्रभवः प्रभुः । शय्यम्भवो यशोभद्रः सम्भूतविजयस्ततः ॥३३॥
भद्रबाहुः स्थूलभद्रः श्रुतकेवलिनो हि षट् ॥३४॥
इति अभिधानचिन्तामणौ प्रथमकाण्डे ।
२. निःशेषीकृतेऽपि पुनरुद्भवमाशङ्क्यात्यन्तिकः, अभूयःसम्भवदोषविनाशः ।
३. 'अभ्रादिभ्यः' हैमसूत्रम् ७।२।४६ ।
४. हैमसूत्रम् ७।१।११४ ।

८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
क्षयाविर्भूतानन्तचतुष्क१सम्पद्रूपया वर्धमानम् । यद्यपि श्रीवर्धमानस्य परमेश्वरस्यानन्तचतुष्क-
सम्पत्तेरुत्पत्त्यनन्तरं सर्वकालं तुल्यत्वाच्चयापचयौ न स्तः, तथापि निरपचयत्वेन शाश्वतिकाव-
स्थानयोगाद्वर्धमानत्वमुपचर्यते । यद्यपि च श्रीवर्धमानविशेषणेनानन्तचतुष्कान्तर्भावित्वेनानन्त-
विज्ञानत्वमपि सिद्धम्, तथाप्यनन्तविज्ञानस्यैव परोपकारसाधकतमत्वाद्, भगवत्प्रवृत्तेश्च
परोपकारैकनिबन्धनत्वाद्, अनन्तविज्ञानत्वं शेषानन्तत्रयात् पृथग् निर्धार्याचार्येणोक्तम् ॥
ननु यथा जगन्नाथस्यानन्तविज्ञानं परार्थं, तथाऽनन्तदर्शनस्यापि केवलदर्शनापरपर्यायस्य
परार्थ्यमन्याहतमेव । केवलज्ञानकेवलदर्शनाभ्यामेव हि स्वामी क्रमप्रवृत्तिभ्यामुपलब्धं
सामान्यविशेषात्मकं पदार्थसार्थं परेभ्यः प्ररूपयति । तत्किमर्थं तन्नोपात्तम् ? इति चेत्,
उच्यते । विज्ञानशब्देन तस्यापि संग्रहाददोषः, ज्ञानमात्राया२ उभयत्रापि समानत्वात् । य एव
हि अभ्यन्तरीकृतसमता३ख्यधर्मा विषमताधर्मविशिष्टा ज्ञानेन गम्यन्ते ऽर्थाः, त एव ह्यभ्यन्तरी-
कृतविषमताधर्माः समताधर्मविशिष्टा दर्शनेन गम्यन्ते; जीवस्वाभाव्यात् । सामान्यप्रधान-
मुपसर्जनीकृत४विशेषमर्थग्रहणं दर्शनमुच्यते । तथा प्रधानविशेषमुपसर्जनीकृतसामान्यं च
ज्ञानमिति ॥
तथा यत एव जिनम्, अत एवातीपदोषम् । रागादिजेतृत्वाद्वि जिनः । न चाजिनस्या-
तीतदोषता । तथा यत एवाप्तमुख्यम्, अत एवावाध्यसिद्धान्तम् । आप्तो हि प्रत्ययित
उच्यते । तत आप्तेषु मुख्यं श्रेष्ठमाप्तमुख्यम् । आप्तमुख्यत्वं च प्रभोरविसंवादिवचनतया
विश्वविश्वासभूमित्वात् । अत एवाबाध्यसिद्धान्तम् । न हि यथावज्ज्ञानावलोकितवस्तुवादी
वृद्धिंगत हैं, अतएव अनन्तविज्ञानके धारक हैं। यद्यपि वर्धमानस्वामीके अनन्तचतुष्टय रूप लक्ष्मी सर्वदा एक
समान रहती है, अतएव उसमें घटना-बढ़ना नहीं होता, फिर भी उस लक्ष्मीके सदा एक समान रहनेके
कारण उसमें वर्धमानताका उपचारसे प्रतिपादन किया गया है। तथा, यद्यपि श्रीवर्धमान विशेषणसे अनन्त-
विज्ञान अनन्तचतुष्टयमें गर्भित हो जाता है, फिर भी अनन्तविज्ञानसे ही जीवोंका परोपकार होता है, और
परोपकारके लिए ही भगवान्‌की प्रवृत्ति होती है, इसलिए अनन्तविज्ञानको अनन्तदर्शन, अनन्तचारित्र और
अनन्तवीर्य इन तीनोंसे पृथक् कहा है।
शंका—जिस प्रकार भगवान्‌का अनन्तज्ञान परोपकारके लिए कहा जाता है, उसी तरह अनन्त-
दर्शन—केवलदर्शन—भी परोपकारके लिए ही होता है। क्योंकि क्रमसे होनेवाले केवलज्ञान और केवलदर्शनसे
जाने हुए सामान्य-विशेष पदार्थोंको ही भगवान् दूसरोंको प्रतिपादित करते हैं। फिर, यहाँ अनन्तदर्शनका
उल्लेख क्यों नहीं किया है? समाधान—अनन्तज्ञानमें ज्ञान शब्दसे दर्शनका भी सूचन होता है, क्योंकि
केवलज्ञान और केवलदर्शन दोनोंमें ज्ञानकी मात्रा समान है। कारण कि जो पदार्थ सामान्य धर्मोंको गौण
करके विशेष धर्मों सहित ज्ञानसे जाने जाते हैं, वे ही पदार्थ विशेष धर्मोंकी गौणतापूर्वक सामान्य धर्मों
सहित दर्शनसे जाने जाते हैं; क्योंकि ज्ञान और दर्शन दोनों ही जीवके स्वभाव हैं। सामान्यकी मुख्यतापूर्वक
विशेषको गौण करके पदार्थके जाननेको दर्शन कहते हैं। तथा विशेषकी मुख्यतापूर्वक सामान्यको गौण करके
किसी वस्तुके जाननेको ज्ञान कहते हैं।
अतएव भगवान् जिन हैं, इसी कारण दोषोंसे रहित हैं। रागादि जीतनेके कारण उन्हें जिन कहा
गया है। जो जिन नहीं हैं, वे दोषोंसे रहित नहीं हैं। भगवान् आप्तोंमें मुख्य हैं, इसलिए उनका सिद्धान्त
बाधारहित है। जो प्रतिति (विश्वास) के योग्य है, उसे आप्त कहते हैं। जो आप्तोंमें प्रधान अर्थात् श्रेष्ठ
हो वह आप्तमुख्य है। भगवान् के वचनोंमें कोई विसंवाद न होनेसे तथा सब प्राणियोंकी विश्वासभूमि होनेसे
१. (१) अनन्तज्ञान (२) अनन्तदर्शन (३) अनन्तचारित्र (४) अनन्तवीर्य इति चतुष्कम् ।
२. ज्ञानेयत्तायाः । ३. समता—सामान्याख्यधर्मः । ४. उपसर्जनं—गौणम् ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २ ] स्याद्वादमञ्जरी ९
सिद्धान्तः कुनयैर्बाधितुं शक्यते । यत एव स्वयम्भुवम्, अत एवामर्त्यपूज्यम् । पूज्यते हि
देवदेवो जगत्त्रयविलक्षणलक्षणेन स्वयंसम्बुद्धत्वगुणेन सौधर्मेन्द्रादिभिरमर्त्यैरिति । अत्र च
श्रीवर्धमानमिति विशेषणतया यद् व्याख्यातं तदयोगव्यवच्छेदाभिधानप्रथमद्वात्रिंशिकाप्रथम-
काव्यतृतीयपादवर्तमानं “श्रीवर्धमानाभिधमात्मरूपम्” इति विशेष्यवर्तमानं बुद्धौ सम्प्रधार्य
विज्ञेयम् । तत्र हि आत्मरूपमिति विशेष्यपदम्, प्रकृष्ट आत्मा आत्मरूपस्तं परमात्मानमिति
यावत् । आवृत्त्या वा विशेषणमपि विशेष्यतया व्याख्येयम् ॥ इति प्रथमवृत्तार्थः ॥१॥
अस्यां च स्तुतावन्ययोगव्यवच्छेदोऽधिकृतस्तस्य च तीर्थान्तरीयपरिकल्पि-
ततत्त्वाभासनिरासेन तेषामाप्तत्वव्यवच्छेदः स्वरूपम् । तच्च भगवतो यथावस्थितव-
स्तुतत्त्ववादित्वव्यापनेनैव

१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २
हे नाथ ! अयं-मल्लक्षणो जनः; तव गुणान्तरेभ्यो-यथार्थवादव्यतिरिक्तेभ्योऽनन्य-
साधारणशरीरलक्षणादिभ्यः, स्पृह्यालुरेव - श्रद्धालु रेव । किमर्थम् ? स्तवाय- स्तुतिकरणाय ।
इयं "तादर्थ्ये चतुर्थी"१। पूर्वत्र तु “स्पृहेर्य्याप्यं वा”२ इतिलक्षणा चतुर्थी । तव गुणान्तराण्यपि
स्तोतुं स्पृहावानयं३ जन इति भावः । ननु यदि गुणान्तरस्तुतावपि स्पृहयालुता तत्किं४ तान्यपि
स्तोष्यति स उत नेत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह-किन्त्विति - अभ्युपगमपूर्वक विशेषद्योतने निपातः ।
एकम् - एकमेव । यथार्थवादं - यथावस्थितवस्तुतत्त्वप्रख्यापनाख्यं त्वदीयं गुणम्, अयं
जनो विगाहतां - स्तुतिक्रियया समन्ताद्व्याप्नोतु । तस्मिन्नेकस्मिन्नपि हि गुणे वर्णिते तन्त्रान्त-
रोयदैवतेभ्यो वैशिष्ट्यख्यापनद्वारेण वस्तुतः सर्वगुणस्तवनसिद्धेः ।
अथ प्रस्तुतगुणस्तुतिः सम्यक् परीक्षणाक्षमाणां दिव्यदृशामे५वौचितीं६मञ्चति, नार्वाग्दृशां७
भवादृशामित्याशङ्कां विशेषणद्वारेण निराकरोति । यतोऽयं जनः परीक्षाविधिदुविदग्धः -
अधिकृतगुणविशेषपरीक्षणविधौ दुर्विदग्धः - पण्डितंमन्य इति यावत् । अयमाशयः । यद्यपि
जगद्गुरोर्यथार्थवादित्वगुणपरीक्षा मादृशां मतेरगोचरः, तथापि भक्तिश्रद्धातिशयात् तस्यामह-
मात्मानं विदग्धमिव मन्य इति । विशुद्धश्रद्धाभक्तिव्यक्तिमात्रस्वरूपत्वात् स्तुतेः ॥ इति
वृत्तार्थः ॥२॥
व्याख्यार्थ - हे नाथ ! मैं (हेमचन्द्र ) आपके यथार्थवादके अतिरिक्त दूसरोंमें न पाये जानेवाले
शरीरलक्षण आदि अन्य गुणोंके प्रति भी श्रद्धा रखता हूँ । [ 'स्तवाय' यहाँ 'तादर्थ्ये चतुर्थी' (२।२।५४)
सूत्रसे तादर्थ्यमें चतुर्थी, तथा 'गुणान्तरेभ्यः' पदमें 'स्पृहेर्य्याप्यं वा' (२।२।२६) सूत्रसे स्पृह् धातुके कर्ममें
विकल्पसे चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग हुआ है ] । तात्पर्य यह कि आपके अन्य गुणोंका स्तवन करनेकी भी मेरी
इच्छा है । शंका - यदि अन्य गुणोंके स्तवन करने में भी आपकी श्रद्धा है तो उनकी उपेक्षा क्यों करते हैं ?
समाधान - इसका उत्तर श्लोकके उत्तरार्धमें दिया गया है । 'किन्तु' शब्दका यहाँ स्वीकृतिपूर्वक विशेष
अर्थ में निपात हुआ है । यथार्थवाद नामक एक ही गुणके वर्णनसे अन्यमतों द्वारा मान्य देवताओंसे भगवान्‌की
विशिष्टता सिद्ध होती है इसलिए इस एक गुणके स्तवनसे भगवान्‌के सम्पूर्ण गुणोंका स्तवन हो जाता है ।
शंका - उत्तम रीतिसे परीक्षा करने में समर्थ दिव्य, नेत्रवाले मुनीश्वर ही भगवान्‌के गुणोंकी स्तुति
कर सकते हैं, आप जैसे छद्मस्थोंमें स्तुति करनेकी योग्यता नहीं है । समाधान - प्रस्तुत गुणोंकी परीक्षामें
अपनेको पण्डित मानकर मैं ( हेमचन्द्र ) स्तुति आरम्भ करता हूँ । तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान्‌के
यथार्थवादित्व गुणकी परीक्षा करना मेरी बुद्धिके बाहर है, फिर भी भक्ति और श्रद्धाके वश मैं उस
परीक्षामें अपनेको पण्डित समझता हूँ । क्योंकि विशुद्ध श्रद्धा और भक्ति प्रकट करना ही स्तुति है ।। यह
श्लोकका अर्थ है ॥२॥
भावार्थ-यद्यपि भगवान् अनन्त गुणोंसे भूषित हैं, परन्तु अन्य मतों द्वारा मान्य आप्तोंसे भगवानकी
असाधारणता दिखानेके लिये भगवान्‌के यथार्थवाद गुणका स्तवन करना ही पर्याप्त है। अतएव हेमचन्द्रा-
चार्य दूसरे गुणोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए भी यहाँपर भगवानके यथार्थवाद गुणकी ही स्तुति करते हैं ।
१. हैमसूत्रम् २।२।५४ । २. हैमसूत्रम् २।२।२६ । ३. 'स्पृहावानेवायम्' पाठान्तरम् । ४. 'तत्किमर्थं
तत्रोपेक्षा इत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह' पाठान्तरम् । ५. अतीन्द्रियज्ञानिनां । ६. योग्यतां ।
७. छद्मस्थानां ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक ३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११
अथ ये कुतीर्थ्याः कुशास्त्रवासनावासितस्वान्ततया त्रिभुवनस्वामिनं स्वामित्वेन न
प्रतिपन्नाः, तानपि तत्त्वविचारणां प्रति शिक्षयन्नाह—
गुणेष्वसूर्या दधतः परेऽमी मा शिश्रियनाम भवन्तमीशम् ।
तथापि संमील्य विलोचनानि विचारयन्तां नयवर्त्म सत्यम् ॥३॥
अमी इति—"अदसस्तु विप्रकृष्टे" इति वचनात् तत्त्वात्तत्त्वविमर्शबाह्यतया दूरीकरणा-
र्हत्वाद् विप्रकृष्टाः, परे—कुतीर्थिकाः, भवन्तं—त्वाम्, अनन्यसामान्यसकलगुणनिलयमपि;
मा ईशं शिश्रियन्—मा स्वामित्वेन प्रतिपद्यन्ताम् । यतो गुणेष्वसूर्या दधतः—गुणेषु दोषा-
विष्करणं ह्यसूया। यो हि यत्र मत्सरी भवति स तदाश्रयं नानुरुध्यते, यथा माधुर्यमत्सरी
करभः पुण्ड्रेक्षुकाण्डम् । गुणाश्रयश्च भवान् । एवं परतर्थिकानां भगवदाज्ञाप्रतिपत्तिं प्रतिषिध्य
स्तुतिकारो माध्यस्थ्यमिवास्थाय, तान्प्रति हितशिक्षामुत्तरार्धेनोपदिशति । तथापि—त्वदाज्ञा-
प्रतिपत्तेरभावेऽपि, लोचनानि नेत्राणि, संमील्य—मिलितपुटीकृत्य, सत्यं—युक्तियुक्तं, नयवर्त्म—
न्यायमार्गं, विचारयन्तां—विमर्शविषयीकुर्वन्तु ॥
अत्र च विचारयन्तामित्यात्मनेपदेन फलवत्कर्तृविषयेणैव ज्ञापयत्याचार्यो यद्वितथ-
नयपथविचारणया तेषामेव फलं, वयं केवलमुपदेष्टारः । किं तत्फलम् ? इति चेत्, प्रेक्षावत्तेति
ब्रूमः । संमील्य विलोचनानीति च वदतः प्रायस्तत्त्वविचारणमेकाग्रताहेतुनयननिमीलनपूर्वकं
लोके प्रसिद्धमित्यभिप्रायः । अथवा अयमुपदेशस्तेभ्योऽरोचमान एवाचार्येण वितीर्यते ततो-
ऽस्वदमानोऽप्ययं कटुकौषधपानन्यायेनायतिसुखत्वाद् भवद्भिर्नेत्रे निमील्य पेय एवेत्याकूतम् ॥
मिथ्याशास्त्रोंकी वासनासे दूषित जो कुतीर्थिक तीन लोकके स्वामी जिनभगवान्‌को स्वामी नहीं मानते,
उन्हें उपदेश देनेके लिए कहते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, यद्यपि आपके गुणोंमें ईर्ष्या रखनेवाले तीर्थिक आपको स्वामी नहीं मानते,
परन्तु ये लोग आपके सत्य न्याय मार्गका ज़रा नेत्र बन्द करके विचार तो करें ।
व्याख्यार्थ—'अमी परे भवन्तं मां ईशं शिश्रियन्, यतः गुणेषु असूयां दधतः' तत्त्व और अतत्त्वका
विचार न करनेवाले दूरस्थ परमतावलम्बी असाधारण गुणोंके समूह ऐसे आपको ईश्वर नहीं मानते, क्योंकि
वे आपके गुणोंमें ईर्ष्या करते हैं । गुणोंके रहते हुए भी दोषान्वेषणको असूया ( ईर्ष्या ) कहते हैं । जो
जिन गुणोंमें ईर्ष्या करता है, वह उन गुणोंको गुणरूपसे नहीं स्वीकार करता । जैसे माधुर्य रससे ईर्ष्या
करनेवाला ऊँट पौण्डेको नहीं चाहता । परन्तु गुण आपमें मौजूद हैं। इस प्रकार भगवान्‌की आज्ञाकी
स्वीकारोक्तिका प्रतिषेध करनेवाले तीर्थिकोंके प्रति उदासीन भाव रखते हुए आचार्य उपदेश करते हैं ।
'तथापि'—आपकी आज्ञाको न मानकर भी, तैर्थिक लोग नेत्र बन्द करके आपके युक्तियुक्त न्यायमार्गका
ज़रा विचार तो करें ।
यहाँ 'विचारयन्तां' आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है, इसलिए क्रियाका फल कर्त्ताको ही मिलना
चाहिए । अर्थात् सच्चे न्यायमार्गका विचार करनेसे तैर्थिक लोगोंको ही फल मिलेगा क्योंकि हम तो केवल
उपदेश देनेवाले हैं । वह फल कौन-सा है ? प्रेक्षावान होना ही उस फलकी सार्थकता है । यहाँ किसी
तत्त्वका विचार करते समय एकाग्रता प्राप्त करनेके लिए नेत्रोंको बन्द कर विचार करनेकी लौकिक विधिका
सूचन किया गया है । अथवा उपदेशके रुचिकर नहीं होनेपर भी आचार्य इसका उपदेश देते हैं । अतएव
'कटुक औषध-पान' न्यायसे इस उपदेशके कटु होनेपर भी यह उपदेश आगामी कालमें सुखकर होगा,
इसलिए इस उपदेशका नेत्र निमीलित करके पान करना चाहिए ।
१. इदमस्तु संनिकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम् । अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥ १ ॥
इति सम्पूर्णः श्लोकः ।

१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ३
ननु यदि च पारमेश्वरे वचसि तेषामविवेकातिरेकादरोचकता, तत्किमर्थं तान्
प्रत्युपदेशकलेश इति ? नैवम् । परोपकारसारप्रवृत्तीनां महात्मनां प्रतिपाद्यगतां१ रुचिमरुचिं
वानपेक्ष्य हितोपदेशप्रवृत्तिदर्शनात् । तेषां हि परार्थस्यैव स्वार्थत्वेनाभिमतत्वात् । न च
हितोपदेशादपरः पारमार्थिकः परार्थः । तथा चर्षम्—
“रूसउ वा परो मा वा, विसं वा परियत्तऊ ।
भासियव्वा हिया भासा सपक्खगुणकारिया” ॥२
उवाच च वाचकमुख्यः३—
“न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यैकान्ततो हितश्रवणात् ।
ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति” ॥४
इति वृत्तार्थः ॥३॥
अथ यथावन्नयवर्त्मविचारमेव प्रपञ्चयितुं पराभिप्रेततत्त्वानां प्रामाण्यं निराकुर्वन्ना-
द्वितस्तावत्काव्यषट्केनौलूक्यमताभिमततत्त्वानि दूषयितुकामस्तदन्तःपातिनौ प्रथमतं
सामान्यविशेषौ दूषयन्नाह—
शंका—यदि अविवेककी प्रचुरतासे किसीको जिनेन्द्र भगवान्‌के वचनोंमें रुचि नहीं होती, तो आप
उसे क्यों उपदेश देनेका कष्ट उठाते हैं ? समाधान—यह बात नहीं है । परोपकार स्वभाववाले महात्मा
पुरुष किसी पुरुषको रुचि और अरुचिको न देखकर हितका उपदेश करते हैं । क्योंकि महात्मा लोग दूसरेके
उपकारको ही अपना उपकार समझते हैं। हितका उपदेश देनेके बराबर दूसरा कोई पारमार्थिक उपकार
नहीं है। आर्षवाक्य है—
"उपदेश दिया जानेवाला पुरुष चाहे रोष करे, चाहे वह उपदेशको विषरूप समझे, परन्तु
स्वपक्ष हितरूप वचन अवश्य कहने चाहिए"
उमास्वाति वाचकमुख्यने भी कहा है—
“सभी उपदेश सुननेवालोंको पुण्य नहीं होता है । परन्तु अनुग्रह बुद्धिसे हितका उपदेश देनेवालेको
निश्चय ही पुण्य मिलता है ।”
यह श्लोकका अर्थ है ॥३॥
भावार्थ—एकान्तरूपसे वस्तु तत्त्वको स्वीकार करनेवाले अन्यमतावलम्बी आपके गुणोंमें ईर्ष्याबुद्धि
रखते हुए आपको अपना इष्टदेव नहीं मानते । परन्तु यदि वे लोग एकान्तका आग्रह छोड़कर आप द्वारा
प्रतिपादित न्यायमार्गका विचार करें, तो उन्हें आपकी महत्ता स्वयं ही प्रकट हो जायगी ।
अब यथार्थ नयमार्गका विचार करनेके लिए परमतावलम्बियों द्वारा मान्य तत्त्वोंके प्रामाण्यका
निराकरण करनेके हेतु छह श्लोकोंमें वैशेषिकमतके तत्त्वोंमें दूषण बताते हुए सर्वप्रथम ‘सामान्य-विशेष’में
दोष दिखाते हैं।
१. बोध्यछात्रविषयिणीम् ।
२. छाया—रुषतु वा परो मा वा विषं वा परिवर्तयतु (विषवत् प्रतिभातु वा) ।
भाषितव्या हिता भाषा स्वपक्षगुणकारिका ॥
एतदर्थक एव श्लोको श्रीहेमचन्द्रकृतश्रेणिकचरित्रे द्वितीयसर्गे ३२ उपलभ्यते । तथाहि—
परो रुष्यतु वा मा वा विषवत् प्रतिभातु वा ।
भाषितव्या हिता भाषा स्वपक्षगुणकारिणी ॥३२॥
३. उमास्वातिः । अयमुमास्वामीत्यपि भण्यते । ४. तत्त्वार्थसूत्रसम्बन्धकारिकासु २९ श्लोकः ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक ४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३
स्वतोऽनुवृत्तिव्यत्तिवृत्तिभाजो भावा न भावान्तरनेयरूपाः ।
परात्मतत्त्वादतथात्मतत्त्वाद् द्वयं वदन्तोऽकुशलाः स्खलन्ति ॥४॥
अभवन्, भवन्ति, भविष्यन्ति, चेति भावाः पदार्थाः, आत्मपुद्गलादयस्ते स्वत
इति सर्वं हि वाक्यं सावधारणमामन्वन्ति इति, स्वत एव—आत्मीयस्वरूपादेव । अनुवृत्तिव्य-
त्तिवृत्तिभाजः एकाकारा प्रतीतिरेकशब्दवाच्यता चानुवृत्तिः, व्यतिवृत्तिः- व्यावृत्तिः, सजा-
तीयविजातीयेभ्यः सर्वथा व्यवच्छेदः । ते उभे अपि संवलिते भजन्ते—आश्रयन्तीति अनुवृत्ति-
व्यतिवृत्तिभाजः, सामान्यविशेपोभयात्मका इत्यर्थः ॥
अस्यैवार्थस्य व्यतिरेकमाह । न भावान्तरनेयरूपा इति । नेति निषेधे । भावान्तराभ्यां-
पराभिमताभ्यां द्रव्यगुणकर्मसमवायेभ्यः पदार्थांन्तराभ्यां भावव्यतिरिक्तसामान्यविशेषाभ्यां ।
नेयं प्रतीतिविषयं प्रापणीयं । रूपं-यथासंख्यमनुवृत्तिव्यतिवृत्तिलक्षणं स्वरूपं येषां ते तथोक्ताः।
स्वभाव एव ह्ययं सर्वभावानां यदनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्ययौ स्वत एव जनयन्ति । तथाहि । घट एव
तावत् पृथुबुध्नोदराद्याकारवान् प्रतीतिविषयीभवन् सन्नन्यानपि तदाकृतिभृतः पदार्थान् घट-
रूपतया घटैकशब्दवाच्यतया च प्रत्याययन् सामान्याख्यां लभते । स एव चेतरेभ्यः सजातीय-
विजातीयेभ्यो द्रव्यक्षेत्रकालभावैरात्मानं व्यावर्तयन् विशेषव्यपदेशंमश्रुते । इति न सामान्य-
विशेषयोः पृथक्पदार्थान्तरत्वकल्पनं न्याय्यम् । पदार्थधर्मत्वेनैव तयोः प्रतीयमानत्वात् । न
श्लोकार्थ-पदार्थ स्वभावसे ही सामान्य-विशेपरूप हैं, उनमें सामान्य-विशेषकी प्रतीति करानेके
लिए पदार्थान्तर माननेकी आवश्यकता नहीं । इसलिए जो अकुशलवादी पररूप और मिथ्यारूप सामान्य-
विशेषको पदार्थसे भिन्नरूप कथन करते हैं, वे न्यायमार्गसे भ्रष्ट होते हैं ।
व्याख्यार्थ-आत्मा और पुद्गलादि पदार्थ अपने स्वरूपसे ही अर्थात् सामान्य और विशेष नामक
पृथक् पदार्थोंकी बिना सहायताके ही सामान्य-विशेपरूप होते हैं। एकाकार और एक नामसे कही जानेवाली
प्रतीतिको अनुवृत्ति अथवा सामान्य कहते हैं। सजातीय और विजातीय पदार्थोंसे सर्वथा अलग होनेवाली
प्रतीतिको व्यावृत्ति अथवा विशेष कहते हैं । आत्मा और पुद्गल आदि पदार्थ स्वभावसे ही इन दोनों धर्मोंसे-
सामान्य-विशेषसे-युक्त हैं ।
इसीको व्यतिरेक रूपसे कहते हैं । आत्मा और पुद्गलादि पदार्थ, वैशेषिकों द्वारा मान्य द्रव्य, गुण,
कर्म और समवायसे पृथक्, सामान्य और विशेषसे भिन्न नहीं हैं। क्योंकि स्वयं ही सामान्य और विशेषरूप
ज्ञानको उत्पन्न करना पदार्थोंका स्वभाव है । उदाहरणके लिए, मोटा, तलीयुक्त और उदर आदि आकार-
वाला घड़ा स्वयं ही उसी आकृतिवाले अन्य पदार्थोंको भी घटरूप और घटशब्दरूप जनाता हुआ 'सामान्य'
कहा जाता है। इसलिए घटको छोड़कर घटसामान्य अथवा घटत्व कोई पृथक् वस्तु नहीं है । यही घड़ा
दूसरे सजातीय और विजातीय पदार्थोंसे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावसे अपनी व्यावृत्ति करता हुआ 'विशेष'
कहा जाता है । अतएव सामान्य और विशेषको अलग पदार्थ मानना न्यायसंगत नहीं है। क्योंकि सामान्य-
विशेषका ज्ञान पदार्थके धर्म (गुण) से ही होता है । तथा धर्मी (गुणी) से धर्म (गुण) सर्वथा भिन्न नहीं
होते । क्योंकि धर्म और धर्मीको सर्वथा भिन्न माननेसे विशेषण-विशेष्यसम्बन्ध नहीं बन सकता । उदाहरणके
लिए, ऊँट और गधा दोनों सर्वथा भिन्न हैं, इसलिए इनमें धर्म-धर्मी-सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि धर्मको
धर्मीसे अलग पदार्थ माना जाय, तो एक ही वस्तुमें अनन्त पदार्थ प्रस्तुत हो जायेंगे कारण कि वस्तु अनन्त-
१. अनुवृत्तिः- अन्वयः । व्यतिवृत्तिः- व्यतिरेकः । २. पूरणगलनधर्माणः पुद्गला (दशवैकालिकवृत्ति
प्रथमाध्ययने) । ३. विशेषसंज्ञाम् ।

१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ४
च धर्मा धर्मिणः सकाशादत्यन्तं व्यतिरिक्ताः । एकान्तभेदे विशेषणविशेष्यभावानुपपत्तेः,
करभरासभयोरिव धर्मधर्मिव्यपदेशाभावप्रसङ्गाच्च । धर्माणामपि च पृथक्पदार्थान्तरत्वकल्पने
एकस्मिन्नेव वस्तुनि पदार्थानन्त्यप्रसङ्गः । अनन्तधर्मकत्वाद् वस्तुनः ॥
तदेवं सामान्यविशेषयोः स्वतत्त्वं यथावदनवबुध्यमाना अकुशलाः अतत्त्वाभिनिविष्ट-
दृष्टयः¹ तीर्थान्तरीयाः स्खलन्ति—न्यायमार्गाद् भ्रश्यन्ति निरुत्तरीभवन्तीत्यर्थः । स्खलनेन
चात्र प्रामाणिकजनोपहसनीयता ध्वन्यते । किं कुर्वाणाः, द्वयम्—अनुवृत्तिव्यावृत्तिलक्षणं
प्रत्ययद्वयं वदन्तः । कस्मादेतत्प्रत्ययद्वयं वदन्तः ? इत्याह । परात्मतत्त्वात्—परौ पदार्थेभ्यो
व्यतिरिक्तवादन्यौ परस्परनिरपेक्षौ च यौ सामान्यविशेषौ तयोर्यादात्मतत्त्वं स्वरूपम् अनुवृत्ति-
व्यावृत्तिलक्षणं, तस्मात् तदाश्रित्येत्यर्थः । "गम्यपयः कर्माऽधारे २" इत्यनेन पञ्चमी । कथंभूतात्
परात्मतत्त्वाद् ? इत्याह । अतथात्मतत्त्वात् मा भूत् परात्मतत्त्वस्य सत्यरूपतेति विशेषण-
मिदम् । यथा येनैकान्तभेदलक्षणेन प्रकारेण परैः प्रकल्पितं, न तथा तेन प्रकारेणात्मतत्त्वं
स्वरूपं यस्य तत् तथा । तस्मात् यतः पदार्थेष्वविष्वग्भावेन³ सामान्यविशेषौ वर्तेते । तैश्च तौ
तेभ्यः परत्वेन कल्पितौ । परत्वं चान्यत्वं तच्चैकान्तभेदाविनाभावि ॥
किञ्च, पदार्थेभ्यः सामान्यविशेषयोरेकान्तभिन्नत्वे स्वीक्रियमाणे एकवस्तुविषय-
मनुवृत्तिव्यावृत्तिरूपं प्रत्ययद्वयं नोपपद्येत । एकान्ताभेदे चान्यतरस्यासत्त्वप्रसङ्गः । सामान्य-
विशेषव्यवहाराभावश्च स्यात् । सामान्यविशेषोभयात्मकत्वेनैव वस्तुनः प्रमाणेन प्रतीतेः ।
धर्मात्मक होती है । (भाव यह है कि वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन
छह पदार्थोंको स्वीकार करते हैं । इन छह पदार्थोंमें सामान्य और विशेष नामक पदार्थ द्रव्य, गुण, कर्म
आदिसे भिन्न माने गये हैं । दूसरे शब्दोंमें, वैशेषिक मतके अनुसार, पदार्थोंमें 'सामान्य-विशेष' का ज्ञान
पदार्थोंका गुण (धर्म) नहीं है, बल्कि यह ज्ञान सामान्य और विशेष नामके भिन्न पदार्थोंसे होता है । उदा-
हरणके लिए, घटत्व घटका गुण नहीं है, यह घटमें समवाय-सम्बन्धसे रहता है । इसी प्रकार नील-पीत आदि
भी घटके गुण नहीं हैं, वे भी घटमें समवाय-सम्बन्धसे रहते हैं । जैनदर्शन अनेकान्तात्मक (सामान्यविशेषात्मक)
है, इसलिए वह वैशेषिकोंके इस सिद्धान्तका खण्डन करता है । जैनदर्शनके अनुसार, पदार्थोंमें स्वभावसे ही
सामान्य-विशेषकी प्रतीति होती है । क्योंकि सामान्य-विशेष पदार्थोंके ही गुण हैं, कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं ।
धर्मीसे धर्म भिन्न नहीं हो सकता, अतएव सामान्य-विशेषको भिन्न पदार्थ स्वीकार करना अयुक्तियुक्त है । ) ।
इस प्रकार सामान्य-विशेषके स्वरूपको ठीक-ठीक न समझकर कदाग्रही तैर्थिक लोग न्यायमार्गसे
भ्रष्ट हो जाते हैं—निरुत्तर होनेके कारण प्रामाणिक मनुष्योंके हास्यास्पद होते हैं । कारण कि ये लोग
सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे भिन्न और परस्पर निरपेक्ष स्वीकार करते हैं । परन्तु यह मान्यता सत्य नहीं
है । क्योंकि सामान्य-विशेष पदार्थोंमें अभिन्न रूपसे रहते हैं, और वैशेषिकोंने सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे
एकान्त-भिन्न माना है । परन्तु जैनसिद्धान्तके अनुसार सामान्य-विशेष पदार्थोंके स्वभाव हैं, क्योंकि गुण-
गुणीका एकान्त भेद नहीं बन सकता । जैनदर्शनमें सामान्य-विशेष पदार्थोंसे कथंचित् अभिन्न स्वीकार किये
गये हैं ।
तथा सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न माननेपर एक वस्तुमें सामान्य और विशेष सम्बन्ध
नहीं बन सकते । क्योंकि पदार्थोंके सामान्य-विशेषसे एकान्त-भिन्न होनेके कारण पदार्थ और सामान्य-
विशेषका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता । यदि सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे सर्वथा अभिन्न मानें, तो पदार्थ और
सामान्य-विशेषके एकरूप हो जानेसे दोनोंमेंसे एकका अभाव हो जायेगा । तथा, इस तरह सामान्य-विशेषका
१. कुत्सिताग्रहवन्तः । २. हैमसूत्रम् । २।२।७४ । ३. अपृथग्भावेन ।

परस्परनिरपेक्षपक्षस्तु पुरस्तान्निर्लोठयिष्यते । अत एव तेषां वादिनां स्वलनक्रिययोपहसनी-
यत्वमभिव्यज्यते । यो हि अन्यथास्थितं वस्तुस्वरूपमन्यथैव प्रतिपद्यमानः परेभ्यश्च तथैव
प्रज्ञापयन् स्वयं नष्टः परान्नाशयति न खलु तस्मादन्य उपहासपात्रम् ॥ इति वृत्तार्थः ॥४॥
अथ तदभिमतानेकान्तनित्यपक्षौ दूषयन्नाह—
आदीपमाव्योम समस्वभावं स्याद्वादमुद्रानतिभेदि वस्तु ।
तन्नित्यमेवैकमनित्यमन्यदिति त्वादाज्ञाद्विषतां प्रलापाः ॥५॥
आदीपं-दीपादारभ्य, आव्योम-व्योम मर्यादीकृत्य; सर्ववस्तुपदार्थस्वरूपं। समस्वभावं-
समः तुल्यः, स्वभावः-स्वरूपं यस्य तत्तथा । किञ्च वस्तुनः स्वरूपं द्रव्यपर्यायात्मकत्वमिति
ब्रूमः । तथा च वाचकमुख्यः—"उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्"१ इति । समस्वभावत्वं कुतः।
इति विशेषणद्वारेण हेतुमाह-स्याद्वादमुद्रानतिभेदि—स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकम् । ततः
स्याद्वादः-अनेकान्तवादः, नित्यानित्याद्यनेकधर्मशवलैकवस्त्वभ्युपगम इति यावत् । तस्य
मुद्रा-मर्यादा, तां नातिभिनत्ति-नातिक्रामतीति स्याद्वादमुद्रानतिभेदि । यथा हि न्यायैकनिष्ठे
राजनि राज्यश्रियं शासति सति सर्वाः प्रजास्तन्मुद्रां नातिवर्तितुमीशते, तदतिक्रमे तासां
व्यवहार भी न बन सकेगा, क्योंकि प्रमाणसे सामान्य-विशेष उभय रूप ही वस्तुकी प्रतीति होती है। सामान्य-
विशेषकी परस्पर निरपेक्षताका आगे खण्डन किया जावेगा (देखिये १४ वीं कारिकाकी व्याख्या) । इसीलिए
वादियोंके स्खलनसे यहाँ उनके हास्यास्पद होनेका सूचन किया गया है। जो पुरुष वस्तुके अमुक स्वरूपको
उस रूपसे स्वीकार न करके अन्यथा रूपसे स्वीकार करता है, तथा दूसरोंको भी उसी तरह प्रतिपादन करता
है, वह स्वयं नष्ट होता है, और दूसरोंको नष्ट करता है; ऐसा पुरुष हास्यका पात्र होता ही है ।। यह
श्लोकका अर्थ है ॥४॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिक दर्शनके द्वारा मान्य सामान्य-विशेषका खण्डन किया गया है।
वैशेषिकोंका कहना है कि सामान्य-विशेष पदार्थोंसे भिन्न और एक दूसरेसे निरपेक्ष हैं। उदाहरणके लिए,
वैशेषिक मतके अनुसार घटमें घटत्व समवाय सम्बन्धसे रहता है; तथा नील-पीतादि भी समवाय सम्बन्धसे
रहता है। परन्तु जैनदर्शन अनेकान्तरूप है, इसलिए वह सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे एकान्त-भिन्न स्वीकार
नहीं करता। जैनदर्शनके अनुसार घटमें घटत्व अथवा नील-पीतादि किसी सम्बन्ध-विशेषसे नहीं रहते, ये
स्वयं घटके ही गुण हैं। इसलिए पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न सामान्य और विशेष नामके पदार्थोंको स्वीकार करने-
की आवश्यकता नहीं है।
अब वैशेषिकोंके एकान्त नित्य और एकान्त अनित्य पक्षमें दोष दिखाते हैं—
श्लोकार्थ—दीपकसे लेकर आकाश तक सभी पदार्थ नित्यानित्य स्वभाववाले हैं, क्योंकि कोई भी
वस्तु स्याद्वादकी मर्यादाका उल्लंघन नहीं करती। ऐसी स्थितिमें भी आपके विरोधी लोग दीपक आदिको
सर्वथा अनित्य और आकाश आदिको सर्वथा नित्य स्वीकार करते हैं।
व्याख्यार्थ—दीपसे लेकर आकाशपर्यन्त सब पदार्थोंका स्वरूप

१६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
सर्वार्थहानिभावात् एवं विजयिनि निष्कण्टके स्याद्वादमहानरेन्द्रे, तदीयमुद्रां सर्वेऽपि पदार्था
नातिक्रामन्ति; तदुल्लङ्घने तेषां स्वरूपव्यवस्थाहानिप्रसक्तेः ।
सर्ववस्तूनां समस्वभावत्वकथनं च पराभीष्टस्यैकं वस्तु व्योमादि नित्यमेव, अन्यच्च
प्रदीपादि अनित्यमेव इति वादस्य प्रतिक्षेपबीजम् । सर्वे हि भावा द्रव्यार्थिकनयापेक्षया
नित्याः, पर्यायार्थिकनयादेशात् पुनरनित्याः । तत्रैकान्तानित्यतया परैरङ्गीकृतस्य प्रदीपस्य
तावन्नित्यानित्यत्वव्यवस्थापने दिङ्मात्रमुच्यते ।।
तथाहि । प्रदीपपर्यायापन्नास्तैजसाः परमाणवः स्वरस¹तस्तैलक्षयाद् वाताभिघाताद्वा
ज्योतिष्पर्यायं परित्यज्य तमोरूपं पर्यायान्तरमाश्रयन्तोऽपि नैकान्तेनानित्याः ; पुद्गलद्रव्यरूप-
तयावस्थितत्वात् तेषाम् । नह्येतावत्तैवानित्यत्वं यावता पूर्वपर्यायस्य विनाशः, उत्तरपर्यायस्य
चोत्पादः । न खलु मृद्द्रव्यं स्थास²ककोशकुशूलशिवकघटाद्यवस्थान्तराण्यापद्यमानमप्येकान्ततो
विनष्टम् ; तेषु मृद्द्रव्यानुगमस्याबालगोपालं प्रतीतत्वात् । न च तमसः पौद्गलिकत्वमसिद्धम्;
चाक्षुषत्वान्यथानुपपत्तेः, प्रदीपालोकवत् ॥
कर सकती, क्योंकि उसके उल्लंघन करनेपर प्रजाके सर्वस्वका नाश होता है। उसी प्रकार विजयी निष्कण्टक
स्याद्वाद महाराजाके विद्यमान रहते हुए कोई भी पदार्थ स्याद्वादकी मर्यादाको अतिक्रमण नहीं करता ।
क्योंकि इस मर्यादाके उल्लंघन करनेपर पदार्थोंका स्वरूप नहीं बन सकता ।
यहाँ सब पदार्थोंके द्रव्य और पर्यायरूप कथन करनेसे आकाश आदिके सर्वथा नित्यत्व और प्रदीप
आदिके सर्वथा अनित्यत्वका खण्डन हो जाता है। कारण कि सभी पदार्थ द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे नित्य
और पर्यायार्थिककी अपेक्षासे अनित्य हैं । यहाँ परवादियों द्वारा मान्य दीपककी एकान्त-अनित्यतापर विचार
करते हुए दीपकको नित्य-अनित्य सिद्ध करनेके लिए संक्षेपमें कुछ कहा जाता है ।
दीपककी पर्यायमें परिणत तैजस परमाणु तेलके समाप्त हो जानेसे अथवा हवाका झोंका लगनेसे
प्रकाशरूप पर्याय छोड़कर तमरूप पर्यायको प्राप्त करनेपर भी सर्वथा अनित्य नहीं हैं। क्योंकि तेजके परमाणु
तमरूप पर्यायमें भी पुद्गल द्रव्यरूपसे मौजूद हैं । तथा पूर्व पर्यायके नाश और उत्तर पर्यायके उत्पन्न होने
मात्रसे ही दीपककी अनित्यता सिद्ध नहीं होती । उदाहरणके लिए, मिट्टी द्रव्यके स्थासक, कोश, कुशूल,
शिवक, घट (मिट्टीके पिण्डसे घड़ा बनने तककी उत्तरोत्तर अवस्थाएँ) आदि अवस्थाओंको प्राप्त कर लेनेपर
भी मिट्टीका सर्वथा नाश नहीं होता । क्योंकि स्थासक आदि पर्यायोंमें प्रत्येक पुरुषको मिट्टीका ज्ञान होता
है। अन्धकारको भी पुद्गलकी ही पर्याय मानना चाहिए, क्योंकि दीपकके प्रकाशकी भांति वह भी चक्षुसे
दिखाई देता है । जैनदर्शनके अनुसार संसारके समस्त पदार्थोंमें नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों धर्म विद्यमान
हैं । इसलिए दीपकमें भी नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म पाये जाते हैं । दीपकका अनित्यत्व सर्व साधारणमें
प्रसिद्ध ही है । इसलिए यहाँ दीपकमें केवल नित्यत्व सिद्ध किया जाता है । नैयायिक लोग अन्धकारको
अभावरूप मानते हैं, इसलिए नैयायिकोंके अनुसार अन्धकार कोई स्वतन्त्र पदार्थ न होकर केवल
प्रकाशका अभाव मात्र है। इसलिए तमको अभावरूप माननेसे नैयायिक दीपकको नित्य नहीं मानते । परन्तु
जैनसिद्धान्तके अनुसार तम केवल प्रकाशका अभाव मात्र नहीं है, वह प्रकाशकी भांति ही स्वतन्त्र द्रव्य है ।
जैनदर्शनमें प्रकाशकी भांति अन्धकारको भी पुद्गलकी पर्याय माना है । तेजके परमाणु दीपकके प्रकाशको
पर्यायमें परिणत होते हैं । जब तेल आदि समाप्त हो जाता है, अथवा हवाका झोंका लगता है, उस समय ये
ही परमाणु प्रकाशकी पर्याय छोड़कर तमकी पर्यायमें परिणत हो जाते हैं । जैनदर्शनके अनुसार केवल पर्या-
यान्तरको प्राप्त करना ही अनित्यत्वका लक्षण नहीं है। उदाहरणके लिए, मिट्टीका घड़ा बनाते समय मिट्टी
अनेक पर्यायोंको धारण करती है, परन्तु इन अनेक पर्यायोंमें मिट्टीका नाश नहीं हो जाता, मिट्टी हरेक पर्यायमें
१. स्वभावतः । २. स्थासककोशादयो घटस्योत्पत्तेः प्राक् मृद एवावस्थाः ।

अथ यच्चाक्षुषं तत्सर्वं स्वप्रतिभासे आलोकमपेक्षते । न चैवं तमः । तत्कथं चाक्षुषम् ?
नैवम् । उलूकादीनामालोकमन्तरेणापि तत्प्रतिभासात् । यैस्त्वस्मदादिभिरन्यच्चाक्षुषं घटादि-
कमालोकं विना नोपलभ्यते तैरपि तिमिरमालोकयिष्यते । विचित्रत्वात् भावानाम् । कथ-
मन्यथा पीतश्वेताद्योऽपि स्वर्णमुक्ताफलाद्या आलोकापेक्षदर्शनाः । प्रदीपचन्द्रादयस्तु प्रका-
शान्तरनिरपेक्षाः । इति सिद्धं तमश्चाक्षुषम् ।।
रूपवत्त्वाच्च स्पर्शवत्त्वमपि प्रतीयते; शीतस्पर्शप्रत्ययजनकत्वात् । यानि त्वनतिनिबिडावय-
वत्वमप्रतिघातित्वमनुद्भूतस्पर्शविशेषत्वमप्रतीयमानखण्डावयविद्रव्यप्रविभागत्वमित्यादीनि
तमसः पौद्गलिकत्वनिषेधाय परैः साधनान्युपन्यस्तानि तानि प्रदीपप्रभादृष्टान्तेनैव प्रतिषे-
ध्यानि; तुल्ययोगक्षेमत्वात् ॥
सदा विद्यमान रहती है। इसी तरह दीपकके तेज-परमाणुओंका अन्धकार-परमाणुओंमें परिणमन होनेसे
द्रव्यका नाश ( अनित्यत्व ) नहीं होता । यह केवल परमाणुओंका एक पर्यायसे दूसरी पर्यायमें परिणत हो
जाना मात्र है। इसलिए हमें दीपकको सर्वथा अनित्य ही नहीं कहना चाहिए, क्योंकि तम अभावरूप नहीं
है। पर्यायसे पर्यायान्तर होनेको ही तम कहते हैं। अन्धकारका पौद्गलिक होना असिद्ध नहीं क्योंकि वह
प्रकाशकी तरह चक्षुका विषय है। जो जो चक्षुका विषय होता है, वह पौद्गलिक होता है। प्रकाशकी तरह
अन्धकार भी चक्षुका विषय है, इसलिए वह पौद्गलिक है।
शंका--जो चाक्षुष पदार्थ है, वह प्रतिभासित होनेमें आलोककी अपेक्षा रखता है। परन्तु तमके
प्रतिभासमें प्रकाशकी जरूरत नहीं, इसलिए तम चक्षुका विषय नहीं कहा जा सकता । समाधान--उक्त
व्याप्ति ठीक नहीं है । क्योंकि उल्लू आदि बिना आलोकके भी तमको देखते हैं। यह ठीक है कि अन्य चाक्षुष
घट, पट आदिको बिना प्रकाशके हम नहीं देखते, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि तमके देखनेमें भी हमें
प्रकाशकी आवश्यकता पड़े । संसारमें पदार्थोंके विचित्र स्वभाव होते हैं। पीत सुवर्ण और श्वेत मोती आदि
तैजस होनेपर भी बिना प्रकाशके प्रतिभासित नहीं होते जबकि दीपक, चन्द्र आदि प्रकाशके बिना ही दृष्टि-
गोचर होते हैं। अतएव तम चाक्षुष है, यद्यपि प्रकाशके अभावमें भी उसका ज्ञान होता है।
तथा अन्धकार रूपवान् होनेके कारण स्पर्शवान् भी है। क्योंकि इसमें शीत स्पर्शका ज्ञान होता है ।
वैशेषिक लोग तमका पौद्गलिकत्व निषेध करनेके लिए (१) कठोर अवयवोंका न होना, (२) अप्रतिघाति
होना, (३) अनुद्भूत स्पर्शका न होना, (४) खण्डित अवयवीरूप द्रव्यविभागकी प्रतीति न होना—आदि हेतु
देते हैं। इन हेतुओंको ग्रन्थकार प्रदीपकी प्रभाके दृष्टान्तसे खण्डित करते हैं। क्योंकि अन्धकार और प्रदीपप्रभा
दोनों ही समान हैं। (तात्पर्य यह है कि जैनदर्शनमें प्रकाश और अन्धकारको पुद्गलकी पर्याय माना है,
अतएव प्रकाशकी भाँति अन्धकार भी एक स्वतन्त्र वस्तु है; अन्धकार भी प्रकाशकी भाँति चक्षुका विषय है।
परन्तु वैशेषिकोंके मतमें प्रकाशका अभाव ही तम है, स्वतन्त्र द्रव्य वह नहीं। वैशेषिकोंका कहना है कि जो
घट, पट पदार्थ चक्षुसे जाने जाते हैं, उन सबमें प्रकाशकी आवश्यकता होतो है जबकि तमको जाननेमें
प्रकाशको जरूरत नहीं पड़तो, इसलिए तम चक्षुका विषय नहीं है, और इसलिए उसे पुद्गलको पर्याय भो
नहीं कहा जा सकता। इसके उत्तरमें जैनोंका कथन है कि वैशेषिकोंकी उपर्युक्त व्याप्ति ठीक नहीं कही जा
सकती । कारण कि बिल्ली, उल्लू वगैरह प्रकाशके न रहते हुए भी तमका ज्ञान करते हैं। इसलिए यह
व्याप्ति तर्कसंगत नहीं कि समस्त चाक्षुष पदार्थ आलोककी अपेक्षा रखते हैं। सुवर्ण, मोती आदि चाक्षुष
होनेपर प्रकाशकी सहायतासे प्रतिभासित होते हुए देखे जाते हैं, परन्तु दीपक, चन्द्र आदि नहीं। इसलिए
प्रकाशकी भाँति तमको भी चक्षुका विषय मानना युक्तियुक्त है। अन्धकार चाक्षुष होनेसे जैनदर्शनमें उसे
स्पर्शवान् भो माना गया है। क्योंकि जैनदर्शनके अनुसार किसी पदार्थमें स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णमेंसे
किसी एकके रहनेपर बाकीके तीन गुण उसमें अवश्य रहते हैं। यही पुद्गलका लक्षण भी है। परन्तु
वैशेषिकोंको अन्धकारमें स्पर्शत्व स्वोकार करना अभीष्ट नहीं है। उनका कहना है कि अन्धकारमें कठोरता
३

न च वाच्यं तैजसाः परमाणवः कथं तमस्त्वेन परिणमन्त इति । पुद्गलानां तत्तत्साम-
ग्रीसहकृतानां विसदृशकार्योत्पादकत्वस्यापि दर्शनात् । दृष्टो ह्यार्द्रन्धनसंयोगवशाद् भास्वर-
रूपस्यापि वन्हेग्भास्वररूपधूमरूपकार्योत्पादः । इति सिद्धो नित्यानित्यः प्रदीपः । यद्यपि
निर्वाणादर्वाग्देदीप्यमानो दीपस्तथापि नवनवपर्यायोत्पादविनाशभाक्त्वात् प्रदीपत्वान्वयाच्च
नित्यानित्य एव ।।
एवं व्योमाप्युत्पादव्ययध्रौव्यात्मकत्वाद् नित्यानित्यमेव । तथाहि । अवगाहकानां
जीवपुद्गलानामवगाहदानोपग्रहे^१ एव तल्लक्षणम् । “अवकाशदमाकाशम्^२” इति वचनात् ।
यदा चावगाहका जीवपुद्गलाः प्रयोगतो^३ विस्रसातो^४ वा एकस्मान्नभःप्रदेशात् प्रदेशान्तर-
मुपसर्पन्ति तदा तस्य व्योम्नस्तैरवगाहकैः सममेकस्मिन् प्रदेशे विभागः उत्तरस्मिंश्च प्रदेशे

अन्य. यो. व्य. श्लोक ५ ] स्याद्वादमञ्जरी १९
तथा च यद् “अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपं नित्यम्” इति नित्यलक्षणमाचक्षते ।
तदपास्तम् । एवंविधस्य कस्यचिद्वस्तुनोऽभावात् । “तद्भावाव्ययं नित्यम्” १ इति तु सत्यं
नित्यलक्षणम् । उत्पादविनाशयोः सद्भावेऽपि तद्भावात् अन्वयिरूपात् यन्न व्येति तन्नित्यमिति
तदर्थस्य घटमानत्वात् । यदि हि अप्रच्युतादिलक्षणं नित्यमिष्यते तदोत्पादव्यययोर्निराधा-
रत्वप्रसङ्गः । न च तयोर्योगे नित्यत्वहानिः ।
“द्रव्यं पर्यायवियुतं पर्याया द्रव्यवर्जिताः ।
क्व कदा केन किंरूपा दृष्टा मानेन केन वा' ? ॥”२
उस समय आकाशका जीव-पुद्गलोंके साथ एक प्रदेशमें विभाग और दूसरे प्रदेशमें संयोग होता है ।
ये संयोग और विभाग एक दूसरेके विरुद्ध हैं । इसलिए संयोग-विभागमें भेद होनेसे, संयोग-विभागको धारण
करनेवाले आकाशमें भी भेद होना चाहिए । कहा भी है "विरुद्ध धर्मोंका रहना और भिन्न-भिन्न कारणोंका
होना यही भेद और भेदका कारण है ।" (यहाँपर लक्षण और कारणके भेदसे भेद दो प्रकारका बताया
गया है । जैसे घट जल लाने और पट ठण्डसे बचानेके काममें आता है—यही घट और पटमें लक्षण-भेद है ।
तथा घट मृत्तिकाके पिण्ड और पट तन्तुसे उत्पन्न होता है—यही घट और पटका कारण-भेद है । ) इसलिए
यहाँ पुद्गलके एक प्रदेशमें संयोगके विनाशसे आकाशमें व्यय होता है, और दूसरे प्रदेशमें संयोगके होनेसे
आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उत्पाद और व्यय दोनों अवस्थाओंमें आकाश ही एक अधिकरण है,
इसलिए आकाश ध्रौव्य है । ( भाव यह है कि जैनदर्शनके अनुसार दीपककी तरह आकाश भी नित्यानित्य
है । जैनसिद्धान्तमें आकाश एक अनन्त प्रदेशवाला अखण्ड द्रव्य माना गया है । आकाश द्रव्यका काम जीव
और पुद्गलको अवकाश देना है । जिस समय जीव और पुद्गल द्रव्य आकाशके एक प्रदेशको छोड़कर
दूसरे प्रदेशके साथ संयोग करते हैं, उस समय आकाशका जीव-पुद्गलके साथ विभाग और संयोग होता है ।
अर्थात् जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंको छोड़नेके समय आकाशमें विभाग और जीव-पुद्गलके आकाश-प्रदेशोंके
साथ संयोग करनेके समय आकाशमें संयोग होता है । दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिए कि एक ही आकाशमें
संयोग-विभाग नामके दो विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं । क्योंकि संयोग-विभाग नामके धर्मोंमें भेद होनेसे संयोग-
विभाग धर्मोंको धारण करनेवाले आकाश धर्मीमें भी भेद पाया जाता है । अतएव जीव-पुद्गलके आकाश-
प्रदेशोंको छोड़कर अन्यत्र गमन करनेमें जीव-पुद्गलका आकाशके प्रदेशोंके साथ संयोगका विनाश होता है,
अर्थात् आकाशमें विनाश ( व्यय ) होता है । तथा जीव-पुद्गलका आकाशके दूसरे प्रदेशोंके साथ संयोग
होनेके समय आकाशमें उत्पाद होता है । तथा उक्त उत्पाद ओर व्यय दोनों दशाओंमें आकाश मौजूद रहता
है, इसलिए आकाशमें ध्रौव्य भी है । अतएव आकाशमें उत्पाद-व्यय होनेसे अनित्यत्व और ध्रौव्य होनेसे
नित्यत्वकी सिद्धि होती है । )
इस पूर्वोक्त कथनसे "जो नाश और उत्पन्न न होता हो, और एकरूपसे स्थिर रहे, उसे नित्य कहते
हैं"—इस नित्यत्वके लक्षणका भी खण्डन हो जाता है । क्योंकि ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं, जो उत्पत्ति और
नाशसे रहित हो, और सदा एकसा रहे । "पदार्थके स्वरूपका नाश नहीं होना नित्यत्व है"—जैनदर्शन द्वारा
मान्य नित्यत्वका यही लक्षण ठीक है । क्योंकि उत्पाद और विनाशके रहते हुए भी जो अपने स्वरूपको
नहीं छोड़ता वही नित्य है । यदि अप्रच्युत आदि पूर्वोक्त नित्यका लक्षण माना जाये, तो उत्पाद और व्ययका
कोई भी आधार न रहेगा । जैनसिद्धान्तके अनुसार नित्य पदार्थमें जो उत्पाद और व्यय माना गया है, उससे
पदार्थकी नित्यतामें कोई हानि नहीं आती । कहा भी है—
“पर्यायरहित द्रव्य और द्रव्यरहित पर्याय किसने, किस समय, कहाँपर, किस रूपमें, और कौनसे
प्रमाणसे देखे हैं" ? अर्थात् द्रव्य बिना पर्याय और पर्याय बिना द्रव्य कहीं भी सम्भव नहीं ।
१. तत्त्वार्थसूत्रम् अ. ५ सू. ३० ।
२. एतदर्थिका गाथा सन्मतितर्के प्रथमकाण्डे दृश्यते—
'दव्वं पज्जवविज्जुअं दव्वविउत्ता य पज्जवा नत्थि ॥१२॥

२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ५
इति वचनात् ॥
लौकिकानामपि घटाकाशं पटाकाशमिति व्यवहारप्रसिद्धेराकाशस्य नित्यानित्यत्वम् ।
घटाकाशमपि हि यदा घटापगमे, पटेनाक्रान्तं, तदा पटाकाशमिति व्यवहारः । न चायमौप-
चारिकत्वादप्रमाणमेव । उपचारस्यापि किञ्चित्साधर्म्यद्वारेण मुख्यार्थस्पर्शित्वात् । नभसो हि
यत्किल सर्वव्यापकत्वं मुख्यं परिमाणं तत् तदाधेयघटपटादिसम्बन्धिनियतपरिमाणवशात्
कल्पितभेदं सत् प्रतिनियतदेशव्यापितया व्यवह्रियमाणं घटाकाशपटाकाशादि तत्तद्व्यपदेश-
निबन्धनं भवति । तत्तत्घटादिसम्बन्धे च व्यापकत्वेनावस्थितस्य व्योम्नोऽवस्थान्तरापत्तिः ।
ततश्चावस्थाभेदेऽवस्थावतोऽपि भेदः । तासां ततोऽविष्वग्भावात् । इति सिद्धं नित्या-
नित्यत्वं व्योम्नः ॥
( भाव यह है कि जैनोंको वैशेषिकोंका नित्यत्व लक्षण मान्य नहीं है । वैशेषिकोंके अनुसार, जिसमें
उत्पत्ति और नाश न हो और जो सदा एकसा रहे, वही नित्य है । जैन इस मान्यताको स्वीकार नहीं
करते । उनके अनुसार, उत्पाद और व्ययके होते हुए भी पदार्थके स्वरूपका नाश नहीं होना ही नित्यत्व
है । जैनसिद्धान्तके अनुसार वैशेषिकोंका नित्यत्व लक्षण स्वीकार करनेसे उत्पाद और व्ययको कोई स्थान
नहीं मिलता । क्योंकि कूटस्थ नित्यत्वमें उत्पत्ति और नाशका होना सम्भव नहीं । तथा उत्पाद और
व्ययके अभावसे कोई भी पदार्थ 'सत्' नहीं कहा जा सकता । इसलिए जैन लोग कहते हैं कि नित्यत्वको
सर्वथा नित्य न मानकर उत्पाद-व्यय सहित नित्य अर्थात् आपेक्षिक-नित्य मानना चाहिए । क्योंकि कहीं
भी द्रव्य और पर्याय अलग-अलग नहीं पाये जाते । द्रव्यको छोड़कर पर्यायका और पर्यायको छोड़कर
द्रव्यका अस्तित्व सम्भव नहीं । अतएव द्रव्यकी अपेक्षासे पदार्थ नित्य है और पर्यायकी अपेक्षासे अनित्य;
इस तरह नित्य-अनित्य दोनों साथ रहते हैं । इसीलिए आकाश भी नित्यानित्य है । )
प्रकारान्तरसे भी आकाश नित्यानित्य है, क्योंकि सर्वसाधारणमें भी 'यह घटका आकाश है', 'यह
पटका आकाश है' यह व्यवहार होता है। जिस समय घटका आकाश घटके दूर हो जानेपर पटसे संयुक्त
होता है, उस समय वही घटका आकाश पटका आकाश कहा जाता है। यह 'घटका आकाश', 'पटका
आकाश' का व्यवहार उपचारसे होता है, इसलिए अप्रमाण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि उपचार भी
किसी न किसी साधर्म्यसे ही मुख्य अर्थको द्योतित करनेवाला होता है। आकाशका सर्वव्यापकत्व मुख्य
परिमाण आकाशमें रहनेवाले घट-पटादि सम्बन्धी नियत परिमाणसे भिन्न होकर, प्रतिनियत प्रदेशोंमें व्यापक
होनेसे ही घटाकाश, पटाकाश आदि व्यवहारका कारण होता है। अर्थात् मुख्यरूपसे सर्वव्यापकत्व परिमाण-
वाला आकाश अपने आधेय घट पटादिके सम्बन्धसे प्रतिनियत देशव्यापित्व परिमाणरूप कहा जाता है।
इसीसे यह घटाकाश है, यह पटाकाश है, यह व्यवहार होता है। तथा व्यापक आकाशके अमुक घट पट
आदिके सम्बन्धसे एक अवस्थासे अवस्थान्तरकी उत्पत्ति होती है। अवस्थाभेद होनेपर अवस्थाके धारक
आकाशमें भेद होता है। क्योंकि ये अवस्थायें आकाशसे अभिन्न हैं। (भाव यह है कि जिस समय घट एक
स्थानसे ( आकाशसे ) अलग होता है, और उसकी जगह पट रखा जाता है, तो यह घटका आकाश है,
यह पटका आकाश है, इस प्रकारका व्यवहार होता है। अर्थात् आकाशमें एक ही जगह घटाकाशका नाश
होता है, और पटाकाशकी उत्पत्ति होती है। इसलिए आकाशमें नित्यानित्य दोनों धर्म विद्यमान हैं। यह
घटाकाश और पटाकाशका व्यवहार औपचारिक है अर्थात् वास्तवमें आकाशमें उत्पाद-विनाश नहीं होता,
केवल आकाशके आधेय घट पटादिके परिवर्तनसे ही आकाशमें परिवर्तन होनेका व्यवहार होता है, यह
शंका ठीक नहीं। क्योंकि मुख्य अर्थके सम्बन्धके बिना उपचार नहीं हो सकता । प्रस्तुत प्रसंगमें
आकाशका सर्वव्यापकत्व मुख्य परिमाण है। यही मुख्य परिमाण आकाशके आधेय घट पटादिके सम्बन्धसे
प्रतिनियत देशपरिमाणरूप कहा जाता है। इसीसे घटाकाश, पटाकाश आदि व्यवहार होता है। अतएव

" - wait, no, look at it:
It's two dots: "समःसेदुषां".
Wait, look at "श्रुतामंगिनः":
Is it "श्रुतामंगिनः"?
Let's zoom into "श्रुतामंगिनः":
"सप्त श्रुतामंगिनः" -> wait, is that a 'म' with anusvara or 'ङ्' or 'ञ्'?
Look at the letter: 'म' with an anusvara: 'मं'!
"श्रुतामंगिनः ।।" (or श्रुतामङ्गिनः? No, it looks like म with anusvara: 'मं').
Let's look at the image: "श्रु ता मं गि नः ।।" - yes, clearly श्रुतामंगिनः!

Now let's verify line 2 to line 17:
स्वायंभुवा$^१$ अपि हि नित्यानित्यमेव वस्तु प्रपन्नाः । तथा चाहुस्ते—“त्रिविधः खल्वयं
Wait, is it "स्वायंभुवा" or "स्वायंभुवाः"?
In line 2: "स्वायंभुवा$^१$ अपि" -> स्वायंभुवा with footnote 1: "स्वायंभुवा¹ अपि".
Wait, is there an anusvara on ya: "स्वायंभुवा" or "स्वयंभुवा"?