स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ेंनमः सर्वज्ञाय
श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्रीमल्लिषेणसूरिप्रणीता
स्याद्वादमञ्जरी
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिता
अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकास्तवनटीका
हिन्दीभाषानुवादसहिता ।
टीकाकारस्य मंगलाचरणम्
यस्य ज्ञानमनन्तवस्तुविषयं यः पूज्यते दैवतै-
र्नित्यं यस्य वचो न दुर्नयकृतैः कोलाहलैर्लुप्यते ।
रागद्वेषमुखद्विषां च परिषत् क्षिप्ता क्षणाद्येन सा
स श्रीवीरविभुर्विधूतकलूषां बुद्धिं विधत्तां मम ॥ १ ॥
निस्सीमप्रतिमैकजीवितधरौ निःशेषभूमिस्पृशां
पुण्यौघेन सरस्वतीसुरगुरू स्वाङ्गैकरूपौ दधत् ।
यः स्याद्वादमसाधयन् निजवपुर्दृष्टान्ततः सोऽस्तु मे
सद्बुद्ध्यम्बुनिधिप्रबोधविधये श्रीहेमचन्द्रः प्रभुः ॥ २ ॥
ये हेमचन्द्रं मुनिमेतदुक्तग्रन्थार्थसेवामिषतः श्रयन्ते ।
संप्राप्य ते गौरवमुज्ज्वलानां पदं कलानामुचितं भवन्ति ॥ ३ ॥
टीकाकारका मंगलाचरण
अर्थ—जो अनन्त वस्तुओंको जानते हैं, देवों द्वारा पूजे जाते हैं, जिनके वचन दुर्नयके कोलाहलसे
लुप्त नहीं होते, तथा जिन्होंने रागद्वेष-प्रधान शत्रुओंकी सभाको क्षण-भरमें परास्त कर दिया है, ऐसे वीरप्रभु
मेरी बुद्धि निर्मल करें ॥ १ ॥
समस्त मध्यलोकवर्ती प्राणियोंके पुण्य-प्रतापसे, असीम प्रतिभारूप प्राणोंके धारक, सरस्वती और
बृहस्पतिको अपने शरीररूपमें धारण करते हुए, जिन्होंने अपने शरीरके दृष्टान्तसे ही स्याद्वादके सिद्धान्तको
सिद्ध कर दिखाया है,–जिन्होंने एक ही शरीरमें परस्पर भिन्न सरस्वती और सुरगुरुके धारण करनेसे,
एक ही पदार्थको परस्पर भिन्न अनेक धर्मोंका धारक सूचित किया है—ऐसे हेमचन्द्रप्रभु मेरे सद्बुद्धिरूपी
समुद्रको अभिवृद्धि करें ॥ २ ॥
जो लोग इस ग्रन्थके अध्ययनके बहाने हेमचन्द्रमुनिका आश्रय लेते हैं, वे उज्ज्वल कलाओंके गौरव-
को प्राप्त करने योग्य पदको प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥