स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
१६८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
अथ तत्त्वव्यवस्थापकप्रमाणादिचतुष्टयव्यवहारापलापिनः शून्यवादिनः सौगतजातीयां-
स्तत्कक्षीकृतपक्षसाधकस्य प्रमाणस्याङ्गीकारानङ्गीकारलक्षणपक्षद्वयेऽपि तदभिमतार्थासिद्धि-
प्रदर्शनपूर्वकमुपहसन्नाह—
विना प्रमाणं परवन्न शून्यः स्वपक्षसिद्धेः पदमश्नुवीत ।
कुप्येत्कृतान्तः स्पृशते प्रमाणमहो सुदृष्टं त्वदसूयिदृष्टम् ॥१७॥
शून्यः शून्यवादी प्रमाणं प्रत्यक्षादिकं विना अन्तरेण स्वपक्षसिद्धेः स्वाभ्युपगतशून्यवाद-
निष्पत्तेः पदं प्रतिष्ठां नाश्नुवीत न प्राप्नुयात् । किंवत् ? परवत् इतरप्रामाणिकवत् । वैधर्म्येणायं
दृष्टान्तः । यथा इतरे प्रामाणिकाः प्रमाणेन साधकतमेन स्वपक्षसिद्धिमश्नुवते एवं नायम् ।
अस्य मते प्रमाणप्रमेयादिव्यवहारस्यापारमार्थिकत्वात्, "सर्व एवायमनुमानानुमेयव्यवहारो
बुद्धयारूढेन धर्मधर्मिभावेन न वहिःसदसत्त्वमपेक्षते" इत्यादिवचनात् । अप्रमाणकश्च शून्य-
वादाभ्युपगमः कथमिव प्रेक्षावतामुपादेयो भविष्यति, प्रेक्षावत्त्वव्याहतिप्रसंगात् ॥
अथ चेत् स्वपक्षसंसिद्धये किमपि प्रमाणमयमङ्गीकुरुते, तत्रायमुपालम्भः कुप्येदित्यादि ।
प्रमाणं प्रत्यक्षाद्यन्यतमत् स्पृशते आश्रयमाणाय, प्रकरणादस्मै शून्यवादिने, कृतान्तस्तत्सि-
द्धान्तः कुप्येत्कोपं कुर्यात्, सिद्धान्तबाधः स्यादित्यर्थः । यथा किल सेवकस्य विरुद्धवृत्त्या
कुपितो नृपतिः सर्वस्वमपहरति, एवं तत्सिद्धान्तोऽपि शून्यवादविरुद्धं प्रमाणव्यवहारमङ्गीकुर्वा-
णस्य तस्य सर्वस्वभूतं सम्यग्वादित्वमपहरति ॥
इसके बाद तत्त्वोंके व्यवस्थापक प्रमाण, प्रमिति, प्रमेय और प्रमाताके व्यवहारका लोप करनेवाले
शून्यवादी बौद्धोंके पक्षका खंडन करते हुए उसका उपहास करते हैं—
श्लोकार्थ—दूसरे वादी प्रमाणोंको मानते हैं, इसलिये उनके मतकी सिद्धि हो सकती है। परन्तु
शून्यवादी प्रमाणके बिना अपने पक्षकी सिद्धि नहीं कर सकते । यदि शून्यवादी किसी प्रमाणको मानें, तो
शून्यतारूपी यमके कुपित होनेसे शून्यवादकी सिद्धि नहीं हो सकती । हे भगवन् ! आपके मतसे ईर्ष्या रखनेवाले
लोगोंने जो कुछ कुमतिज्ञान रूपी नेत्रोंसे जाना है, वह मिथ्या होनेके कारण उपहासके योग्य है ॥
व्याख्यार्थ—शून्यवादी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंको बिना माने ही स्वमान्य शून्यवादके सिद्धान्तको
सिद्ध करना चाहते हैं, जो सिद्ध नहीं हो सकता। कैसे ? प्रमाणों को स्वीकार करनेवाले अन्य दार्शनिकोंके
समान । यह वैधर्म्य दृष्टान्त है। जैसे अन्य प्रामाणिक साधकतम ( साध्य की सिद्धि करनेवाले ) प्रमाण के
द्वारा अपने पक्ष की सिद्धि कर सकते हैं, उस प्रकार शून्यवादी ( साधकतम ) प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों को माने
बिना अपने पक्षकी सिद्धि नहीं कर सकते। क्योंकि इनके मतमें प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाणका व्यवहार
अपारमार्थिक—अवास्तविक—माना गया है। कहा भी है, “बुद्धि पर आरूढ़ हुए धर्म-धर्मि संबंधके कारण
समस्त अनुमान-अनुमेय व्यवहार बाह्य पदार्थके कारण सद्भाव और असद्भाव की अपेक्षा नहीं करता" अर्थात्
बाह्य पदार्थ का सद्भाव हो या असद्भाव, वह समस्त अनुमान-अनुमेय व्यवहार काल्पनिक धर्म-धर्मिके संबंधसे
रहता है। शून्यवाद की सिद्धि करनेवाले प्रमाणों का अभाव होनेसे शून्यवाद की मान्यता बुद्धिमानों द्वारा
ग्राह्य नहीं हो सकती, क्योंकि, इससे उनकी बुद्धिमत्ताके आहत होनेका प्रसंग उपस्थित होता है ।
यदि शून्यवादी अपने सिद्धांतको सिद्ध करनेके लिए कोई प्रमाण दें, तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणका आश्रय
लेनेके कारण शून्यवादियोंका सिद्धांत बाधित होता है। जिस प्रकार कोई राजा अपने सेवकके अवांछनीय
आचरणसे कुपित होकर सेवकका सर्वस्व हरण कर लेता है, वैसे ही शून्यवादका सिद्धांत शून्यवादके विरुद्ध
प्रमाण आदि व्यवहारको स्वीकार करनेवाले शून्यवादीका सर्वस्व हरण करता है। अतएव प्रत्यक्ष आदि प्रमा-
णसे शून्यवादकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
with i-matra = 'यि'!
Wait, why did I see 'ययि'? Ah, the stroke of the 'द' and 'सू' and then 'यि' - wait, let me look at:
शी (1) लाः (2) त्व (3) द (4) सू (5) य (6) यि (7) नः (8)?
Wait, look at line 9, character by character from the beginning:
- शी
- ला
- स्त्व
- द
- सू
- य
- यि ?? Wait! Is there a 'य' and a 'यि'?
Look at character 5: सू.
Character 6: य.
Character 7: यि.
Wait, let's compare with line 8:
Line 8: "तुभ्यमसूयन्ति गुणेषु दोषानाविष्कुर्वन्तीत्येवं"
Line 9 starts directly below "तुभ्यम":
"शीलास्त्वदसू..."
Wait! "शीलास्त्वदसूयिनः" - wait, in line 8:
तुक (tu), भ्य (bhya), म (ma), सू (sū), य (ya), न्ति (nti)
Below it in line 9:
शी (śī), ला (lā), स्त्व (stva), द (da), सू (sū), यि (yi), न (na)...
१७० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
वेत्यादौ शरीराश्रयतयाप्युपपत्तेः । किञ्च, यद्ययमहङ्कारप्रत्यय आत्मगोचरः स्यात् तदा न
कादाचित्कः स्यात् । आत्मनः सदा सन्निहितत्वात् । कादाचित्कं हि ज्ञानं, कादाचित्ककारण-
पूर्वकं दृष्टम् । यथा सौदामिनीज्ञानमिति । नाप्यनुमानेन, अव्यभिचारिलिङ्गाग्रहणात् । आग-
मानां च परस्परविरुद्धार्थवादिनां नास्त्येव प्रामाण्यम् । तथाहि । एकेन कथमपि कश्चिदर्थो
व्यवस्थापितः, अभियुक्ततरेणापरेण स एवान्यथा व्यवस्थाप्यते । स्वयमव्यवस्थितप्रामाण्यानां
च तेषां कथमन्यव्यवस्थापने सामर्थ्यम् । इति नास्ति प्रमाता ॥
प्रमेयं च बाह्योऽर्थः, स चानन्तरमेव बाह्यार्थप्रतिक्षेपक्षणे निर्लोठितः । प्रमाणं च
स्वपरावभासि ज्ञानम् । तच्च प्रमेयाभावे कस्य ग्राहकमस्तु, निर्विषयत्वात् । किंच, एतत् अर्थ-
समकालम्, तद्भिन्नकालं वा तद्ग्राहकं कल्प्येत ? आद्यपक्षे, त्रिभुवनवर्तिनोऽपि पदार्थास्तत्राव-
भासेरन्, समकालत्वाविशेषात् । द्वितीये तु, निराकारम् साकारम् वा तत्स्यात् ? प्रथमे, प्रति-
नियतपदार्थपरिच्छेदानुपपत्तिः । द्वितीये तु, किमियमाकारो व्यतिरिक्तो अव्यतिरिक्तो वा
ज्ञानात् ? अव्यतिरेके, ज्ञानमेवायम्, तथा च निराकारपक्षदोषः । व्यतिरेके, यद्ययं चिद्रू-
पस्तदानीमाकारोऽपि वेदकः स्यात् । तथा चायमपि निराकारः साकारो वा तद्वेदको भवेत् ?
'मैं काला हूँ' इस प्रकारका ज्ञान शरीरमें भी होता है। तथा, यदि 'अहं प्रत्यय' से आत्माका ज्ञान
होता है, तो यह 'अहं प्रत्यय' आत्मामें सदा होना चाहिये, कभी-कभी नहीं। क्योंकि आत्मा सदा
विद्यमान है। ज्ञान सदा विद्यमान नहीं रहता, इसलिये वह कभी-कभी उत्पन्न होता है; बिजली-
के ज्ञानकी तरह ज्ञान अनित्य कारणोंसे ही उत्पन्न होता है। अतएव आत्मामें सदा ही 'अहं प्रत्यय'
होना चाहिये। अनुमानसे भी आत्मा सिद्ध नहीं होती। क्योंकि आत्माको ग्रहण करनेवाला कोई निर्दोष
हेतु नहीं है। तथा, आगम परस्पर विरुद्ध अर्थके प्रतिपादन करनेवाले हैं, इसलिये आगमसे भी आत्माका
अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। तथाहि—जिस पदार्थको एक शास्त्र अमुक प्रकारसे प्रतिपादन करता
है, उसी पदार्थको दूसरा दूसरी तरहसे कहता है। अतएव आगमके स्वयं अव्यवस्थित होनेके कारण आगमसे
दूसरे तत्त्वोंकी व्यवस्था नहीं बन सकती। अतएव प्रमाता आत्माका अस्तित्व मानना ठीक नहीं है।
( ख ) जिसे प्रमेय कहते हैं वह वाह्य अर्थ है। वाह्य अर्थका परिहार करते समय उसकी खंडन
किया जा चुका है।
( ग ) स्व और परके जाननेवाले ज्ञानको प्रमाण अर्थात् प्रमिति क्रिया का कारण, कहते हैं।
प्रमेयके अभावमें प्रमाणभूत ज्ञानके विषयका अभाव हो जानेसे, वह प्रमाणभूत ज्ञान किसका ग्राहक
होगा, क्योंकि उसके पास कोई विपय ही नहीं है। तथा, अर्थके अस्तित्वकालमें विद्यमान ज्ञान पदार्थको
जानता है, अथवा जिस कालमें अर्थका सद्भाव होता है, उससे भिन्नकालमें प्रमाणभूत ज्ञान पदार्थको
जानता है ? प्रथम पक्ष स्वीकार करनेपर तीनों लोकोंके पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित होने चाहिये, क्योंकि
ज्ञान सभी पदार्थोंके समकालीन है। द्वितीय पक्षमें, वह ज्ञान निराकार (ज्ञेयाकार शून्य) होता है या
ज्ञेयाकार सहित ? यदि पदार्थके सद्भावके भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान निराकार है तो प्रतिनियत पदार्थके
ज्ञानकी सिद्धि न हो सकेगी। यदि पदार्थके सद्भावकालसे भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान साकार (पदार्थके
आकारवाला) है तो वह पदार्थका आकार ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न ? यदि पदार्थके सद्भावकालसे
भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे पदार्थोंका आकार भिन्न न हो तो यह पदार्थका आकार ज्ञानरूप ही होगा,
और पदार्थका आकार ज्ञानरूप होनेसे निराकार पक्षमें जो दोष आता है, वही दोष यहाँ भी उपस्थित होगा;
अर्थात् प्रतिनियत पदार्थके ज्ञानकी सिद्धि नहीं होगी। यदि पदार्थके कालसे भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे
पदार्थका आकार भिन्न है तो वह चिद्रूप है या अचिद्रूप ? यदि यह आकार चिद्रूप है तो वह-पदार्थके आकारका
भी ज्ञाता होगा। तथा, पदार्थके आकारका ज्ञाता होनेपर, यह आकार निराकार अथवा साकार होता हुआ
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७१
इत्यावर्त्तनेनानवस्था । अथ अचिद्रूपः, किमज्ञातः ज्ञातो वा तज्ज्ञापकः स्यात् । प्राचीनविकल्पे,
चैत्रस्येव मैत्रस्यापि तज्ज्ञापकोऽसौ स्यात् । तदुत्तरे तु, निराकारेण साकारेण वा ज्ञानेन, तस्यापि
ज्ञानं स्यात् । इत्याद्यावृत्तावनवस्थैवेति ।
इत्थं प्रमाणाभावे तत्फलरूपा प्रमितिः कुतस्तनी । इति सर्वशून्यतैव परं तत्त्वमिति ।
यथा च पठन्ति—
“यथा यथा विचार्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा
यदेतद् स्वयमर्थेभ्यो रोचते तन्न के वयम्”'१
इति पूर्वपक्षः । विस्तरतस्तु प्रमाणखण्डनं तत्त्वोपप्लवसिंहादवलोकनीयम् ॥
अत्र प्रतिविधीयते । ननु यदिदं शून्यवादव्यवस्थापनाय देवानांप्रियेण वचनमुपन्यस्तम्
पदार्थोंका ज्ञाता होता है क्या ? इस प्रकार फिर फिरसे प्रश्न उपस्थित होनेपर अनवस्था दोष उपस्थित
होता है । यदि वह पदार्थका आकार चिद्रूप न हो तो क्या वह ज्ञात आकार पदार्थका ज्ञान कराता है
या अज्ञात आकार ? यदि अज्ञात पदार्थका आकार पदार्थका ज्ञान कराता है तो वह अज्ञात आकार,
चैत्र और मैत्र द्वारा अज्ञात होनेसे, जिस प्रकार चैत्रको पदार्थका ज्ञान कराता है, उसी प्रकार मैत्रको भी
पदार्थका ज्ञान करायेगा । यदि पदार्थका आकार ज्ञात होनेपर पदार्थका ज्ञान कराता है तो क्या उस आकारका
ज्ञान आकारशून्य ज्ञानसे होता है या आकारसहित ज्ञानसे ? इस प्रकार फिर फिरसे प्रश्न उपस्थित
होनेपर अनवस्था दोष ही उपस्थित होता है ।
( घ ) प्रमाणकी सिद्धि न होनेपर प्रमाणका फल प्रमिति भी सिद्ध नहीं होती अतएव सर्वथा शून्यता
ही वास्तविक तत्त्व हैं । कहा भी है—
“जैसे जैसे तत्वोंका विचार करते हैं, वैसे वैसे तत्त्व विशीर्ण होते हैं । वास्तवमें पदार्थोंका स्वरूप
ही इस तरहका है, इसमें हमारा दोष नहीं ।”
प्रमाणका विस्तृत खंडन तत्त्वोपप्लवसिंह२ नामक ग्रंथमें देखना चाहिये ।
उत्तरपक्ष-जैन—देवानांप्रिय बौद्ध लोगोंने शून्यवादकी स्थापना करनेके लिये जो वाक्य कहा है, वह
१ बुद्धयां विवच्यमानानां स्वभावो नावधार्यते ।
अतो निरभिलाप्यास्ते निस्सभावाश्च कीर्तिताः
इदं वस्तु बलायातं यद्वदातं विपश्चितः ।
यथा यथाऽर्थाश्चिन्त्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा ॥
लंकावतारसूत्रे
२ यह ग्रंथ पाटनके एक जैन भंडारसे मिला है । इसके कर्ता जयराशि भट्ट हैं । पं. बेचरदास
जीवराज दोशीका अनुमान है, कि ये जयराशि भट्ट ही तत्त्वोपप्लववादी अथवा तत्त्वोपप्लवसिंह नामसे कहे
जाते थे । तत्त्वोपप्लवके अंतिम दो श्लोक—
‘ ये याता न हि गोचरं सुरगुरोर्बुद्धेर्विकल्पा दृढाः
प्राप्यन्ते ननु तेऽपि यत्र विमले पाषण्डदर्पच्छिदि ।
भट्टश्रीजयराशिदेवगुरुभिः सृष्टो महार्थोदय-
स्तत्त्वोपप्लवसिंह एव इति यः ख्यातिं परां यास्यति ॥
पाखण्डखण्डनाभिज्ञा ज्ञानोदधिविवर्धिताः ।
जयराशेर्जयन्तीह विकल्पा वादिजिष्णवः ॥
पहले श्लोकसे स्पष्ट है कि यही ग्रंथ तत्त्वोपप्लवसिंहके नामसे प्रसिद्ध था ।’
देखिये ‘पुरातत्त्व’ ५-४, पृ. २६१ ।
१७२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
तत् शून्यम् वा अशून्यम् वा ? । शून्यं चेत्, सर्वोपाख्याविरहितत्वात् खपुष्पेणेव नानेन
किञ्चित्साध्यते निषिध्यते वा । ततश्च निष्प्रतिपक्षा प्रमाणादितत्त्वचतुष्टयीव्यवस्था । अशून्यं
चेत्, प्रलीनस्तपस्वी शून्यवादः । भवद्वचनेनैव सर्वशून्यताया व्यभिचारात् । तत्रापि निष्कण्ट-
कैव सा भगवती । तथापि प्रामाणिकसमयपरिपालनाथं किञ्चित् तत्साधनं दूष्यते ॥
तत्र यत्तावदुक्तम् प्रमातुः प्रत्यक्षेण न सिद्धिः, इन्द्रियगोचरातिक्रान्तत्वादिति, तत्सिद्ध-
साधनम् । यत्पुनः अहंप्रत्ययेन तस्य मानसप्रत्यक्षत्वमनैकान्तिकमित्युक्तम् तदसिद्धम् । अहं
सुखी अहं दुःखी इति अन्तर्मुखस्य प्रत्ययस्यात्मालम्बनतयैवोपपत्तेः । तथा चाहुः—
“सुखादि चेत्यमानं हि स्वतंत्रं नानुभूयते ।
मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥
इदं सुखमिति ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥” १
यत्पुनः अहं गौरः श्यामः इत्यादिबहिर्मुखः प्रत्ययः स खल्वात्मोपकारकत्वेन लक्षणाय
शरीरे प्रयुज्यते । यथा प्रियभृत्येऽहमित्यपदेशः ॥ २
स्वयं शून्यरूप है, या अशून्यरूप ? यदियह वाक्य शून्यरूप है, तो समस्त इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य न होनेसे खरविषाणकी
तरह इस वचनके द्वारा न किसीकी सिद्धि हो सकती है, और न किसीका निषेध किया जा सकता है । अतएव
प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता इस प्रमाण चतुष्टयका निर्णय निर्विरोध सिद्ध हो जाता है । यदि कहो कि
उक्त वाक्य अशून्यरूप हैं, तो तपस्वी शून्यवाद ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि शून्यवादियोंके वचनोंको अशून्य
माननेसे सर्वशून्यता नहीं बन सकती । अतएव प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता ये चारों निर्बाध सिद्ध
हो जाते हैं ।
( क )—आप लोगोंने जो कहा कि 'प्रमाता इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिए प्रमाता प्रत्यक्षसे सिद्ध
नहीं होता' सो हम भी आत्माको प्रत्यक्षका विषय नहीं मानते, अतएव उक्त कथन हमारे लिये सिद्धसाधन है ।
( ख ) 'अहं प्रत्यय' से मानस प्रत्यक्षद्वारा आत्माका अस्तित्व स्वीकार करनेमें 'अनैकांतिक दोष' नहीं
आता, क्योंकि 'मैं सुखी हूँ,' 'मैं दुखी हूँ' इस प्रकारका अंतरंग ज्ञान आत्मा ही के आधारसे होता है ।
कहा भी है—
“जिसका अनुभव किया जाता है, ऐसे सुख आदिका अनुभव स्वतंत्ररूपसे अर्थात् आत्माके विना
नहीं किया जाता । 'सुखी' शब्द मत्वर्थीय इन् प्रत्यय लगनेसे बना है । 'सुखमस्यास्मिन्नास्तीतिसुखी' इस
निरुक्तिमें जो 'अस्य' पद है वह सुखके आश्रयभूत आत्माका ज्ञान कराता है । अतः मतुप् प्रत्ययसे सुखके
आश्रयभूत आत्मपदार्थका सूचन होनेसे, 'सुखी' .शब्दसे आत्माका ग्रहण होता है ।। जिस प्रकार यह घट है'
ऐसा कहनेसे घट पदार्थ दिखाई देता है, उसो प्रकार 'यह सुख है' ऐसा कहने पर सुख दिखाई नहीं
देता । अतः 'मैं सुखी हूँ' यह ज्ञान आत्माको भी प्रकाशित करता है ।”
तथा 'मै गोरा हूँ, मैं काला हूँ' इत्यादि रूप जो बहिर्मुख ज्ञान होता है, वह इसी आत्माका उपकार
( सुख-दुख आदिका अनुभव करनेमें सहकारी ) होनेसे, लक्षणके द्वारा, शरीरके विषयमें प्रयुक्त किया जाता
१. न्यायमंजर्याम् ।
२. मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् ।
अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ।
—काव्यप्रकाशे मम्मटः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७३
यच्च अहंप्रत्ययस्य कादाचित्कत्वम् तत्रेयं वासना । आत्मा तावदुपयोगलक्षणः १ । स च
साकारानाकारोपयोगयोरन्यतरस्मिन्नियमेनोपयुक्त एव भवति । अहंप्रत्ययोऽपि चोपयोग-
विशेष एव । तस्य च कर्मक्षयोपशमवैचित्र्यात् इन्द्रियानिन्द्रियालोकविषयादिनिमित्तसन्नपेक्ष-
तया प्रवर्त्तमानस्य कादाचित्कत्वमुपपन्नमेव । यथा बीजं सत्यामप्यङ्कुरोपजनशक्तौ पृथिव्युद-
कादिसहकारिकारणकलापसमवहितमेवाङ्कुरं जनयति, नान्यथा । न चैतावता तस्याङ्कुरो-
त्पादने कादाचित्केऽपि तदुत्पादनशक्तिरपि कादाचित्की, तस्याः कथंचिन्नित्यत्वात् । एवमात्मनः
सदा सन्निहितत्वेऽप्यहं प्रत्ययस्य कादाचित्कत्वम् ।।
यदप्युक्तम् तस्याव्यभिचारि लिङ्गं किमपि नोपलभ्यत इति तदप्यसारं । साध्याविना-
भाविनोऽनेकस्य लिङ्गस्य तत्रोपलब्धेः । तथाहि । रूपाद्युपलब्धिः सकर्तृका, क्रियात्वात् ,
छिदिक्रियावत् । यश्चास्याः कर्ता स आत्मा । न चात्र चक्षुरादीनां कर्तृत्वम् । तेषां कुठारादि-
वत् करणत्वेनास्वतन्त्रत्वात् । करणत्वं चैषां पौद्गलिकत्वेनाचेतनत्वात् , परप्रेर्यत्वात् , प्रयोक्तृ-
व्यापारनिरपेक्षप्रवृत्त्यभावात् । यदि हि इन्द्रियाणामेव कर्तृत्वं स्यात् , तदा तेषु विनष्टेषु पूर्वानु-
भूतार्थस्मृतेः मया दृष्टम् स्पृष्टम् घ्रातम् आस्वादितम् श्रुतम् इति प्रत्ययानामेककर्तृकत्वप्रतिपत्तेश्च
है । जैसे अपने प्रिय सेवकमें अहंबुद्धि होती है, उसी प्रकार यहाँ अहं प्रत्ययका प्रयोग आत्माके उपकारक
शरीरमें होता है ।
( ग ) 'अहं प्रत्यय'का जो कादाचित्कत्व ( अनित्यत्व ) है, उसके विषयमें यहाँ प्रतिपादन किया
गया है । आत्माका लक्षण उपयोग है । वह आत्मा साकार और अनाकार उपयोगमेंसे किसी एक
उपयोगमें नियमसे उपयुक्त ही रहती है । 'अहं प्रत्यय' भी एक प्रकारका उपयोग ही है । कर्मके क्षयोपशमके
वैचित्र्यके कारण इन्द्रिय, मन, आलोक, विषय आदि निमित्तोंकी अपेक्षा रखकर प्रवृत्त होनेवाले उस
'अहं प्रत्यय'रूप विशिष्ट उपयोगका कादाचित्क ( अनित्य ) होना ठीक ही है । जिस प्रकार बीजमें अंकुरके
उत्पन्न करनेकी शक्तिके सदा विद्यमान रहते हुए भी पृथिवी, जल आदि सहकारी सामग्री मिलनेपर
ही बीज अंकुरको उत्पन्न करता है, सहकारी सामग्रीके अभावमें वह अंकुरकी उत्पत्ति नहीं कर सकता ।
बीजकी अंकुर उत्पन्न करनेकी क्रियाके कादाचित्क ( अनित्य ) होनेपर भी बीजकी अंकुर उत्पादन करनेकी
शक्तिको कादाचित्क नहीं कह सकते, क्योंकि बीजकी वह अंकुर उत्पादन करनेकी शक्ति कथंचित् अनित्य
होती है । इसी तरह आत्माके सदा विद्यमान रहनेपर भी कर्मोंके क्षय और उपशमकी विचित्रतासे
इन्द्रिय, मन आदिके सहकार मिलनेपर ही 'अहं प्रत्यय' होता है, जो कादाचित्क ( अनित्य ) होता है ।
( घ ) आत्माको सिद्ध करनेवाले 'व्यभिचारी हेतुका अभाव', जो कहा है, वह भी ठीक
नहीं हैं । क्योंकि जिनका आत्मरूप साध्यके साथ अविनाभावी संबंध विद्यमान है, ऐसे अनेक हेतु हैं :
( १ ) रूप आदिको जाननेकी क्रियाका कर्ता विद्यमान है, क्योंकि रूप आदिको जानना क्रियारूप हैं, जैसे
छेदन क्रिया । जैसे छेदन रूप क्रियाका कोई काटनेवाला देखा जाता है, उसी तरह रूप आदि रूप
क्रियाका कोई कर्ता होना चाहिये । इन रूप आदिको जाननेकी जो क्रिया है उसका कर्ता आत्मा
ही है । यदि कहो कि चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदिको जाननेकी क्रियाके विषयमें कर्ता हैं, इसलिये
आत्माके माननेकी आवश्यकता नहीं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि जिस प्रकार कुठार आदि करण होनेसे
किसी दूसरे कर्ताके आधीन रहते हैं, उसी तरह इन्द्रियाँ करण हैं, इसलिये वे भी परतंत्र हैं । तथा,
इन्द्रियाँ पौद्गलिक होनेसे अचेतन होनेके कारण, दूसरेकी प्रेरणासे कार्य करनेके कारण और प्रयोक्ताकी क्रियाकी
अपेक्षाके अभावमें उनकी प्रवृत्ति न होनेके कारण, वे करणरूप हैं । यदि स्वयं इन्द्रियाँ ही रूप आदिको
जाननेकी क्रियाकी कर्ता हों, तो इन्द्रियोंके नष्ट होनेपर, इन्द्रियोंसे पूर्वकालमें अनुभूत पदार्थोंका स्मरण नहीं
१. बाह्याभ्यन्तरहेतुद्वयसन्निधाने यथासंभवमुपलब्धुश्चैतन्यानुविधायी परिणामः उपयोगः । राजवार्तिके पृ. ८२ ।
१७४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
कुतः संभवः । किञ्च, इन्द्रियाणां स्वस्वविषयनियतत्वेन रूपरसयोः साहचर्यप्रतीतौ न साम-
र्थ्यम् । अस्ति च तथाविधफलादे रूपग्रहणानन्तरं तत्सहचरितरसानुस्मरणम्, दन्तोदकसं-
प्लवान्यथानुपपत्तेः। तस्मादुभयोर्गवाक्षयोरन्तर्गतः प्रेक्षक इव द्वाभ्यामिन्द्रियाभ्यां रूपरसयोर्दर्शी
कश्चिदेकोऽनुमीयते । तस्मात्करणान्येतानि यश्चैषां व्यापारयिता स आत्मा ॥
तथा साधनोपादानपरिवर्जनद्वारेण हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्था चेष्टा प्रयत्नपूर्विका,
विशिष्टक्रियात्वात्, रथक्रियावत् । शरीरं प्रयत्नवदधिष्ठितम्, विशिष्टक्रियाश्रयत्वात्, रथवत् ।
यश्चास्याधिष्ठाता स आत्मा, सारथिवत् । तथात्रैव पक्षे, इच्छापूर्वकविकृतवाय्वाश्रयत्वाद्
भस्त्रावत् । वायुश्च प्राणापानादिः । यश्चास्याधिष्ठाता स आत्मा, भस्त्राध्मापयितृवत् ।
तथात्रैव पक्षे, इच्छाधीननिमेषोन्मेषवदवयवयोगित्वाद्, दारुयन्त्रवत् । तथा शरीरस्य वृद्धि-
क्षतभग्नसंरोहणं च प्रयत्नवत्कृतम् , वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणत्वाद्, गृहवृद्धिक्षतभग्नसंरोहणवत् ।
वृक्षादिगतेन वृद्ध्यादिना व्यभिचार इति चेत्, न । तेषामपि एकेन्द्रियजन्तुत्वेन सात्मक-
त्वात् । यश्चैषां कर्ता, स आत्मा, गृहपतिवत् । वृक्षादीनां च 'सात्मकत्वमाचाराङ्गादेरवसे-
यम् । किंचिद्वक्ष्यते च ॥
तथा प्रेर्यं मनः, अभिमतविषयसम्बन्धीनिमित्तक्रियाश्रयत्वाद्, दारकहस्तगतगोलकवत् ।
यश्चास्य प्रेरकः स आत्मा इति । तथा आत्मचेतनक्षेत्रज्ञजीवपुद्गलादयः पर्याया न निर्वि-
होना चाहियें । तथा, 'मैने देखा, मैने छुआ, मैने सूँघा, मैने चाखा, मैने सुना', इस प्रकार विविध इन्द्रियोंसे
उत्पन्न होनेवाला ज्ञान एक कर्ताके साथ संवद्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रत्येक इन्द्रियका विषय अलग
अलग है, इसलिये रूप और रसका एक साथ ज्ञान करनेमें वे समर्थ नहीं हैं; परन्तु हम देखते हैं कि
आम वगैरह फलके देखते ही मुँहमें पानी आ जानेसे, साथ ही साथ, आमके रसका भी अनुभव होता
हैं। अतएव दो खिड़कियोंमेंसे देखनेवाले प्रेक्षककी तरह, दो इन्द्रियों ( नेत्र और रसना ) द्वारा रूप
और रसको अनुभव करनेवाला एक आत्मा ही है । इसलिये ये इन्द्रियाँ करण हैं, और इन इन्द्रियोंका
प्रेरक आत्मा है ।
( २ ) हित रूप साधनोंका ग्रहण और अहित रूप साधनोंका त्याग प्रयत्नपूर्वक ही होता है, क्योंकि
यह क्रिया है । जितनी क्रिया होती हैं, वे सब यत्नपूर्वक होती हैं । जैसे रथकी चलनेकी क्रिया सारथिके
प्रयत्नसे होती है, वैसे ही शरीरको नियत दिशामें लेजानेवाली चेष्टा आत्माके प्रयत्नसे होती है । यही आत्मा
रथको चलानेवाले सारथिकी तरह कर्ता है । (३) जिस प्रकार वायुकी सहायतासे कोई पुरुष धोंकनीको फूंकता
है, वैसे ही इच्छापूर्वक श्वासोच्छ्वास रूप वायुसे शरीर रूपी धोंकनीको फूंकनेवाला शरीरका अधिष्ठाता आत्मा
है । (४) जिस प्रकार लकड़ीके बने मशीनके खिलौनेकी आखोंका खुलना और बंद होना किसी कर्ताके अधीन
रहता है, उसी प्रकार शरीर रूपी यंत्रका कर्ता किसी आत्माको स्वीकार करना चाहिये । ( ५ ) जैसे घरका
बनाना, फोड़ना और टूटे हुएकी मरम्मत करना आदि किसी कर्ताद्वारा किये जाते हैं, उसी प्रकार शरीरकी
वृद्धि, हानि, घावका भर जाना आदि कार्य आत्माके स्वीकार करनेसे ही बन सकते हैं । यदि कहो कि वृक्ष
आदिमें जो वृद्धि, हानि होती है, उसका कोई अधिष्ठाता नहीं देखा जाता, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि वृक्ष
आदि एकेन्द्रिय जीव हैं, इसलिए उनमें भी आत्मा है । वृक्ष आदिमें आत्माकी सिद्धि आचारांग ( १-१-५)
से जाननी चाहिये । इसका वर्णन आगे भी किया जायगा ( देखिये श्लोक २९ की व्याख्या ) ।
( ६ ) तथा जिसप्रकार बालकके हाथकी गेंद अभिमत विषयके साथ होनेवाले संबंध की निमित्तभूत
क्रियाका आश्रय होनेसे प्रेर्य ( प्रेरित करनेके योग्य-फेंकने के योग्य ) होती है; अर्थात् जिस प्रकार दीवार पर
१ आचाराङ्गसूत्रश्रुतस्कंधे १-१-५
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७५
पयाः, पर्यायत्वाद्, घटकुटकलशादिपर्यायवत् । व्यतिरेके षष्ठभूतादि । यश्चैषां विषयः स
आत्मा । तथा अस्त्यात्मा, असमस्तपर्यायवाच्यत्वात् । यो योऽसाङ्केतिकशुद्धपर्यायवाच्यः,
स सोऽस्तित्वं न व्यभिचरति, यथा घटादिः । व्यतिरेके खरविषाणनभोऽम्भोरुहादयः । तथा
सुखादीनि द्रव्याश्रितानि, गुणत्वाद्, रूपवत् । योऽसौ गुणी स आत्मा । इत्यादिलिङ्गानि ।
तस्मादनुमानतोऽप्यात्मा सिद्धः ॥
आगमानां च येषां पूर्वापरविरुद्धार्थत्वम् तेषामप्रामाण्यमेव । यस्त्वाप्तप्रणीत आगमः स
प्रमाणमेव, कषच्छेदतापलक्षणोपाधित्रयविशुद्धत्वात् । कषादीनां च स्वरूपं पुरस्ताद्वक्ष्यामः ।
न च वाच्यमाप्तः क्षीणसर्वदोषः तथाविधं चाप्तत्वं कस्यापि नास्तीति । यतः रागादयः कस्य-
चिदत्यन्तमुच्छिद्यन्ते, अस्मदादिषु तदुच्छेदप्रकर्षापकर्षोपलम्भात्, सूर्याद्यावरकजलदपटलवत् ।
तथा चाहुः—
पटकनेकी इच्छासे बालक जिस गेंदको अपने हाथमें लेता है, वह गेंद दीवारकी ओर जानेकी क्रियाका आश्रय
होनेवाली होनेसे प्रेर्य–पटकने योग्य होती है, उसी प्रकार मन अभिमत विषयके साथ होनेवाले संबंधकी निमित्त
भूत क्रियाका आश्रय होनेसे प्रेर्य है । इस मनकी प्रेरक आत्मा है । (७) तथा, जिस प्रकार घट, कुट, कलश
आदि पर्यायें पर्यायरूप होनेसे निराश्रय नहीं होतीं (उनका उपादानभूत मृत्तिका रूप विद्यमान होता है),
उसी प्रकार आत्मा, चेतन, क्षेत्रज्ञ, जीव, पुद्गल (पुद्गल-संज्ञक जीव द्रव्य) आदि (निष्पर्याय द्रव्य)
पर्यायें पर्यायरूप होनेसे निराश्रय (उपादानके बिना) नहीं होतीं । (साध्यके अभावमें जब साधनका
अभाव बताया जाता है, तब व्यतिरेकदृष्टांत होता है) । षष्ठभूत आदिका अभाव होने पर उनकी पर्यायोंका
अभाव होना व्यतिरेकदृष्टांत है । (तात्पर्य यह कि जिस प्रकार षष्ठभूतका अभाव होनेके कारण उसकी
पर्यायोंके द्वारा षष्ठभूतके अस्तित्वकी सिद्धि नहीं की जा सकती, उसी प्रकार पर्यायका अभाव होनेसे पर्यायी
आत्माके अभावकी सिद्धि नहीं की जा सकती । आत्माकी पर्यायोंका सद्भाव होनेसे उनके द्वारा आत्माकी
सिद्धि की जा सकती है ।) इन चेतन, आत्मा आदि पर्यायोंका आश्रय आत्मा है । (८) तथा, आत्मा
अस्तिरूप है, क्योंकि वह अपनी अनारोपित शुद्ध पर्यायके द्वारा वाच्य कहा जाता है । (असमस्त अर्थात्
अमिश्रित–शुद्ध । सोने और तांबेके मिश्रणसे बनाये आभूषणसे जिस प्रकार शुद्ध सुवर्णका ज्ञान नहीं होता,
उसी प्रकार आत्माकी अशुद्ध पर्यायसे शुद्ध आत्माका ज्ञान नहीं होता—आत्माकी शुद्ध पर्यायसे ही आत्माका
ज्ञान होता है) । जो अनारोपित शुद्ध होनेसे, जिसपर शुद्धत्वका आरोप नहीं किया गया होता, ऐसी शुद्ध
पर्यायके द्वारा वाच्य होता है, वह अस्तित्वरहित नहीं होता, जैसे घट आदि (घट आदिके कपाल आदि शुद्ध
पर्यायके द्वारा जिस प्रकार घट आदिका ज्ञान होता है; उसी प्रकार आत्माकी शुद्ध पर्यायके द्वारा शुद्ध
आत्माका ज्ञान होता है) । खरविषाण, आकाशपुष्प आदिका अभाव होनेसे उनकी अनारोपित शुद्ध पर्यायों
का अभाव होना, यह व्यतिरेकदृष्टांत है । (तात्पर्य यह कि जिस प्रकार खरविषाण आदिका अभाव होनेसे,
उनकी शुद्ध पर्यायोंका अभाव होनेके कारण, उन पर्यायोंके द्वारा खरविषाण आदि वाच्य नहीं होते, उसी
प्रकार आत्माकी शुद्ध पर्यायका अभाव न होनेसे–सद्भाव होनेसे–उसके द्वारा आत्मा वाच्य होती है) । (९)
तथा, जिसप्रकार रूप गुण होनेसे द्रव्यके आश्रित होता है, उसी प्रकार सुख आदि गुण होनेसे द्रव्यके आश्रित
होते हैं । जो गुणोंका आश्रय है, वह आत्मा है । इस प्रकार आत्माके अस्तित्वको सिद्ध करनेवाले अनेक
हेतुओंका सद्भाव पाया जाता है । अतएव अनुमानसे भी आत्माकी सिद्धि होती है ।
तथा, आप लोगोंने जो 'आगमोंका परस्पर विरोध' दिखलाया, वह भी ठीक नहीं । क्योंकि हम
आप्तके द्वारा प्रणीत आगमको ही प्रमाण मानते हैं, परस्पर विरुद्ध अर्थके प्रतिपादन करनेवाले आगमको
नहीं । आप्तकथित आगममें कष, छेद और ताप रूप उपाधियोंका निषेध किया गया है, इसलिये वह आगम
प्रमाण है । (कष आदिका स्वरूप बत्तीसवें श्लोककी व्याख्यामें बताया गया है) । शंका—जिसके सम्पूर्ण
१७६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
“देशतो नाशिनो भावा दृष्टा निखिलनश्वराः ।
मेघपङ्क्त्यादयो यद्वत् एवं रागादयो मताः ॥”
इति । यस्य च निरवयवतयैते विलीनाः स एवाप्तो भगवान् सर्वज्ञः ॥
अथ अनादित्वाद् रागादीनां कथं प्रक्षयः इति चेत् । न । उपायतस्तद्भावात् । अनादे-
रपि सुवर्णमलस्य क्षारमृत्पुटपाकादिना विलयोपलम्भात् । तद्वद्देवानादीनामपि रागादिदो-
षाणां प्रतिपक्षभूतरत्नत्रयाभ्यासेन विलयोपपत्तेः । क्षीणदोषस्य च केवलज्ञानाव्यभिचारात्
सर्वज्ञत्वम् ॥
तत्सिद्धिरस्तु-ज्ञानतारतम्यं क्वचिद् विश्रान्तम्, तारतम्यत्वात्, आकाशे परिमाणतार-
तम्यवत् । तथा सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः कस्यचित्प्रत्यक्षाः, अनुमेयत्वात्, क्षितिधरकन्दराधिकरण-
धूमध्वजवत् । एवं चन्द्रसूर्ययोपरागादिसूचकज्योतिर्ज्ञाना विसंवादान्यथानुपपत्तिप्रभृतयोऽपि
हेतवो वाच्याः । तदेवमाप्तन सर्वविदा प्रणीत आगमः प्रमाणमेव । तदप्रामाण्यं हि प्रनायक-
दोषनिबन्धनम् ।
“रागाद्वा द्वेषाद्वा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम् ।
दोष क्षय हो गये हों, उसे आप्त कहते हैं, ऐसा आप्त होना संभव नहीं है। समाधान-राग आदि दोष
किसी जीवमें सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि हमलोगोंमें राग आदि दोषोंकी हीनाधिकता देखी जाती है।
जिसकी हीनाधिकता देखी जाती है, उसका सर्वथा नाश होना संभव है। जिस प्रकार सूर्यको आच्छादित करने-
वाले बादलोंमें हीनाधिकता पायी जाती है, इसलिये कहीं पर बादलोंका सर्वथा नाश भी संभव है, इसी तरह
राग आदि दोषोंमें हीनाधिकता रहनेके कारण कहीं पर राग आदिका सर्वथा विनाश भी संभव है।
कहा भी है—
“जो पदार्थ एक देशसे नाश होते हैं, उनका सर्वथा नाश भी होता है। जिस प्रकार मेघोंके पटलों
का आंशिक नाश होनेसे उनका सर्वथा नाश भी होता है, इसी प्रकार राग आदिका आंशिक नाश होनेसे
उनका भी सर्वथा नाश होता है।”
जिस पुरुषविशेषमें राग आदिका सम्पूर्ण रीतिसे नाश हो जाता है, वही पुरुष विशेष आप्त भगवान्
सर्वज्ञ है।
शंका-राग आदि दोष अनादि हैं, इसलिये उनका क्षय नहीं हो सकता। समाधान-जिस
प्रकार अनादि सुवर्णके मैलका खार मिट्टीके पुटपाक आदिसे नाश हो जाता है, उसी तरह अनादि राग
आदि दोषोंका सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रयकी भावनासे नाश हो जाता है। जिस
पुरुषके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं, उसके केवलज्ञानकी उत्पत्ति होती है, अतएव वीतराग भगवान् सर्वज्ञ हैं।
सर्वज्ञसिद्धि-(क) ज्ञानकी हानि और वृद्धि किसी जीवमें सर्वोत्कृष्ट रूपमें पायी नहीं जाती है,
हानि, वृद्धि होनेसे। जैसे आकाशमें परिमाणकी सर्वोत्कृष्टता पायी जाती है, वैसेही ज्ञानकी सर्वोत्कृष्टता
सर्वज्ञमें पायी जाती है। (ख) स्वभावसे दूर परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थ, देशसे दूर सुमेरु पर्वत आदि,
तथा कालसे दूर राम, रावण आदि किसीके प्रत्यक्ष होते हैं, अनुमेय होनेसे। जो अनुमेय होते हैं, वे
किसीके प्रत्यक्ष होते हैं। जिस प्रकार पर्वतकी गुफाकी अग्नि अनुमानका विषय होनेसे किसी न किसीके
प्रत्यक्ष होती है, इसी प्रकार हमारे प्रत्यक्षज्ञानके बाह्य परमाणु आदि किसी न किसीके प्रत्यक्ष अवश्य होने
चाहिये। इसी प्रकार चन्द्र और सूर्यके ग्रहणको बतानेवाले ज्योतिषशास्त्रकी सत्यता आदिसे भी सर्वज्ञकी
होती है। इसलिये सर्वज्ञ आप्तका बनाया हुआ आगम ही प्रमाण है। जिस आगमका बनानेवाला सदोष
होता है, वही आगम अप्रमाण होता हैं। कहा भी है—
१. उपरागो ग्रहो राहुग्रस्ते त्विन्दौ च पूष्णि च । इत्यमरः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७७
यस्य तु नैते दोषास्तस्यानृतकारणं किं स्यात्" ॥
इति वचनात् । प्रणेतुश्च निर्दोषत्वमुपपादितमेवेति सिद्ध आगमादप्यात्मा “एगे
आया"१ इत्यादि वचनात् । तदेवं प्रत्यक्षानुमानागमैः सिद्धः प्रमाता ॥
प्रमेयं चानन्तरमेव वाह्यार्थसाधने साधितम् । तत्सिद्धौ च प्रमाणं ज्ञानम् तच्च प्रमेया-
भावे कस्य ग्राहकम्स्तु निर्विषयत्वात् इति प्रलापमात्रम्, करणमन्तरेण क्रियासिद्धेरयोगाद्
लवनादिषु तथादर्शनात् । यच्च, अर्थसमकालमित्याद्युक्तम्, तत्र विकल्पद्वयमपि स्वीक्रियत
एव । अस्मदादिप्रत्यक्षं हि समकालार्थाकलनकुशलम् । स्मरणमतीतार्थस्य ग्राहकम् । शब्दानु-
माने च त्रैकालिकस्याप्यर्थस्य परिच्छेदके । निराकारं चैतद् द्वयमपि । न चातिप्रसङ्गः,
स्वज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमविशेषवशादेवास्य नैयत्येन प्रवृत्तेः । शेषविकल्पानामस्वी-
कार एव तिरस्कारः ॥
प्रमितिस्तु प्रमाणस्य फलं स्वसंवेदनसिद्धैव । न ह्यनुभवेऽप्युपदेशापेक्षा । फलं च द्विधा
आनन्तर्यपारम्पर्यभेदात् । तत्रानन्तर्येण सर्वप्रमाणानामज्ञाननिवृत्तिः फलम् । पारम्पर्येण केवल-
ज्ञानस्य तावत् फलमौदासीन्यम् । शेषप्रमाणानां तु हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः । इति सुव्यवस्थितं
प्रमात्रादिचतुष्टयम् । ततश्च—
"राग द्वेष और मोहके कारण असत्य वाक्य बोले जाते हैं । जिस पुरुषके राग, द्वेष और मोहका
अभाव है, वह पुरुष असत्य वचन नहीं कह सकता ।"
अतएव आगमोंके प्रणेताके निर्दोष सिद्ध होनेपर आगमसे भी "आत्मा एक है" इत्यादि वचनोंसे
आत्माकी सिद्धि होती है । इसलिये प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम आत्माको सिद्ध करते हैं ।
(२) वाह्य पदार्थोंके अस्तित्व सिद्ध करनेके प्रसंगमें पिछली कारिकामें प्रमेयकी सिद्धि की जा चुकी
है । (३) प्रमेयकी सिद्धि होनेपर ज्ञानके प्रमिति क्रियाके करणत्वकी सिद्धि हो जाती है । 'प्रमिति क्रियाका
कारणभूत स्वपरावभासक ज्ञान प्रमेयके अभावमें निर्विषय (प्रमेयशून्य) होनेसे किसका ग्राहक होगा ?'
यह कथन प्रलापमात्र है । क्योंकि प्रमाणको न माननेसे प्रमिति क्रियाके करणका अभाव हो जानेके कारण
'प्रमेयके अभावमें ज्ञान जान नहीं सकता'—इस अभिप्रायको जाननेकी क्रियाकी सिद्धि, जिस प्रकार कुठार
आदि रूप करणके अभावमें छेदन आदि क्रियाकी सिद्धि नहीं होती, उसी प्रकार नहीं हो सकती । 'ज्ञानका
काल और पदार्थका काल समान होनेपर ज्ञान प्रमेयको जानता है या भिन्न होनेपर ?' यह जो आपलोगोंनें
कहा है, तो हम दोनों ही विकल्पोंको स्वीकार करते हैं । हमलोगोंके मतमें प्रत्यक्ष प्रमाण ज्ञानके कालमें
रहनेवाले (विद्यमान) पदार्थोंका, स्मरण अतीत कालीन पदार्थोंका, तथा शब्द और अनुमान तीनों कालके
पदार्थोंका ज्ञान करनेमें कुशल होते हैं। शब्द 'और अनुमान तीनों कालोंमें विद्यमान पदार्थको जाननेवाले
होते हैं । दोनों ही ज्ञेय पदार्थके आकारसे रहित होते हैं। यहाँ अतिप्रसंग दोष नहीं आता । क्योंकि इस
ज्ञानकी पदार्थोंको जाननेकी जो प्रवृत्ति होती है, वह अपने अपने ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्मोंके विशिष्ट
क्षयोपशमके कारण होती है । शून्यवादका स्थापन करनेमें जो दूसरे विकल्प प्रतिपादित किये गये हैं,
उनको न मानना ही शून्यवादका तिरस्कार करना है ।
(४) प्रमाणकी फलभूत प्रमिति स्वसंवेदन प्रत्यक्ष अर्थात् अनुभवसे सिद्धि ही है । अतएव प्रमितिको
सिद्ध करनेके लिये प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है । प्रमाणका फल साक्षात् और परम्पराके भेदसे दो
प्रकारका होता है । पदार्थविषयक अज्ञानकी निवृत्ति सभी प्रमाणोंका साक्षात् फल है । केवलज्ञानका
परम्पराफल संसारसे उदासीन होना है, केवलज्ञानके अतिरिक्त शेष प्रमाणोंका परम्पराफल इष्टानिष्ट पदार्थों
को छोड़ना, ग्रहण करना तथा उपेक्षा करना है । अतएव प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण और प्रमिति ये चारों पदार्थ
१. स्थानाङ्गसूत्रे १-१ । प्रकृतार्थतया असंख्यातप्रदेशोऽपि जीवो द्रव्यार्थतया एकः इति अभयदेवसूरिटीकायां ।
२३
here has a loop! No, wait, look at 'स' in 'तस्या': it's a standard Devanagari 'स' (Nagari 'स' has a loopless left arch).
The letter in question has a flat/square bottom with a loop at bottom left: it is 'म'!
Wait, wait, is it 'म' or 'स'?
Wait, look at "अभिसन्यते": 'अभिसन्यते' is not even a Sanskrit word. 'अभिमन्यते' is one of the most common words in Indian philosophy (अभिमन्यते = मन्यते, इष्टं मन्यते).
Wait, look at line 5: "तावदिष्टव्यम् । तच्चासौ प्रमाणादभिमन्यते अप्रमाणाद्वा ?"
"तावद् इष्टव्यम् । तच्चासौ प्रमाणाद् अभिमन्यते अप्रमाणाद् वा ?"
(That must be accepted by the Shunyavadin. And does he believe/hold that through pramana or non-pramana?)
It is absolutely अभिमन्यते!
Wait, let's look at the sandhi in line 6:
Does it say "प्रमाणात् अभिमन्यते" or "प्रमाणाद् अभिमन्यते" or "प्रमाणात् अभिसन्यते"?
In the print: "प्रमाणात्" has a virama under त: "प्रमाणात् ".
Then: "अभिस
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १७९
अधुना क्षणिकवादिन् ऐहिकामुष्मिकव्यवहारानुपपन्नार्थसमर्थनमविमृश्यकारितं दर्श-
यन्नाह—
कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगभवप्रमोक्षस्मृतिभङ्गदोषान् ।
उपेक्ष्य साक्षात् क्षणभङ्गमिच्छन्नहो महासाहसिकः परस्ते ॥ १८ ॥
कृतप्रणाशदोषम् अकृतकर्मभोगदोषम् भवभङ्गदोषम् प्रमोक्षभङ्गदोषम् स्मृतिभङ्गदोष-
मित्येतान् दोषान् । साक्षादित्यनुभवसिद्धान् । उपेक्ष्यानादृत्य । साक्षात् कुर्वन्नपि गजनिमी-
लिकामवलम्ब्यमानः१ । सर्वभावानां क्षणभङ्गम् उदयान्तरविनाशरूपां क्षणक्षयिताम् । इच्छन्
प्रतिपद्यमानः । ते तव । परः प्रतिपक्षी वैनाशिकः सौगत इत्यर्थः । अहो महासाहसिकः सहसा
होनेपर प्रमाण भी नहीं बन सकता । (घ) प्रमाणके अभावमें प्रमिति भी नहीं सिद्ध हो सकती । अतएव
सर्वथा शून्य मानना ही वास्तविक तत्त्व है । क्योंकि अनुमान और अनुमेयका व्यवहार बुद्धिजन्य है । वास्तव
में बुद्धिके बाहर सत् और असत् कोई वस्तु नहीं । अतएव न सत्, न असत्, न सत्-असत्, और न सत्-असत्
का अभाव रूप ही वास्तवमें परमार्थ है ।
जैन—प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण और प्रमिति प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं । ( क )
'मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' आदि 'अहं प्रत्यय'से प्रमाता सिद्ध होता है । ( ख ) बाह्य पदार्थोंका ज्ञान अनुभवसे
सिद्ध है । तथा बाह्य पदार्थोंके अनुभव होनेपर ही वासना बन सकती है । अतएव प्रमेय भी स्वीकार करना
चाहिये । ( ग ) प्रमेयके सिद्ध होनेपर प्रमाण भी अवश्य मानना चाहिये । जैसे कुठारसे काटनेकी क्रिया हो
सकती है, वैसे जानने रूप क्रियाका भी कोई करण होना चाहिये । ( घ ) पदार्थको जानते समय पदार्थ,
संबंधी अज्ञानका नाश होना ही प्रमाणका साक्षात् फल है, अतएव प्रमिति भी मानना चाहिये । तथा
शून्यवादी लोग प्रमाता आदिको प्रमाण अथवा अप्रमाण किसीसे भी सिद्ध नहीं कर सकते । अप्रमाण अकिं-
चित्कर है, इसलिये अप्रमाणसे प्रमाता आदि सिद्ध नहीं हो सकते । इसी तरह प्रमाणसे भी प्रमाता आदि
सिद्ध नहीं होते, क्योंकि शून्यवादियोंके मतमें स्वयं प्रमाण ही अवस्तु है । तथा, जिस प्रमाणसे शून्यवादी
लोग अपने पक्षकी सिद्धि करते हैं, वह प्रमाण बिना प्रमेयके नहीं बन सकता, क्योंकि प्रमाण निर्विषय नहीं
होता, अतएव शून्यवादियोंको मौन रहना ही श्रेयस्कर है ।
क्षणिकवादियोंके मतमें इस लोक और परलोककी व्यवस्था नहीं बन सकती । अतएव उनके मतको
अविचारपूर्ण सिद्ध करते हैं—
श्लोकार्थ—आपके प्रतिपक्षी क्षणिकवादी बौद्ध क्षणिकवादको स्वीकार करके, किये हुए कर्मोंके
फलको न भोगना, अकृत कर्मोंके फलको भोगनेके लिये बाध्य होना, परलोकका नाश, मुक्तिका
नाश, तथा स्मरण शक्तिका अभाव, इन दोषोंकी उपेक्षा करके अपने सिद्धांतको स्थापित करनेका महान्
साहस करते हैं ।
व्याख्यार्थ—जिस प्रकार हाथी आँखोंको बन्द करके जलपान करता है, वैसे ही संसार, मोक्ष
आदिका साक्षात् अनुभव करते हुए भी सम्पूर्ण पदार्थोंको क्षणस्थायी माननेवाले प्रतिपक्षी बौद्ध ( १ ) किये
हुए कर्मोंका नाश, ( २ ) नहीं किये हुए कर्मोंका भोग, ( ३ ) संसारका क्षय, ( ४ ) मोक्षका नाश और
१. गजो नेत्रे निमील्य जलपानादि करोति नेत्रनिमीलनेन न किंचित्करोमीति भावयति च तद्वदयं
वादी कृतप्रणाशादीन् दोषान् साक्षादनुभवन् सर्वभावानां क्षणभङ्गुरतां प्रतिपद्यते ।
१८० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १८
अविमर्शात्मकेन बलेन वर्तते साहसिकः । भाविनमर्थमविभाव्य यः प्रवर्तते स एवमुच्यते ।
महांश्चासौ साहसिकश्च महासाहसिकोऽत्यन्तमविमृश्य प्रवृत्तिकारी । इति मुकुलितार्थः ॥
विवृतार्थस्त्वयम् । बौद्धा बुद्धिक्षणपरम्परामात्रमेवात्मानमामनन्ति न पुनर्मौक्तिककणनि-
करानुस्यूतैकसूत्रवत् तदन्वयिनमेकम् । तन्मते येन ज्ञानक्षणेन सदनुष्ठानमसदनुष्ठानं वा कृतम् तस्य
निरन्वयविनाशान्न तत्फलोपभोगः । यस्य च फलोपभोगः, तेन तत् कर्म न कृतम् । इति प्राच्य-
ज्ञानक्षणस्य चाकृतकर्मभोगः, स्वयमकृतस्य परकृतस्य कर्मणः फलोपभोगादिति । अत्र च कर्म-
शब्दः उभयत्रापि योज्यः, तेन कृतप्रणाश इत्यस्य कृतकर्मप्रणाश इत्यर्थो दृश्यः । बन्धानुलोम्याच्चे-
त्थमुपन्यासः ॥
यथा भवभङ्गदोषः । भव आजवीभावलक्षणः संसारः, तस्य भङ्गो विलोपः । स एव
दोषः क्षणिकवादे प्रसज्यते । परलोकाभावप्रसङ्ग इत्यर्थः । परलोकिनः² कस्यचिदभावात् ।
परलोको हि पूर्वजन्मकृतकर्मानुसारेण भवति । तच्च प्राचीनज्ञानक्षणानां निरन्वयं नाशात् केन
नामोपभुज्यतां जन्मान्तरे ॥
यच्च मोक्षाकरगुप्तेन “यच्चित्तं तच्चित्तान्तरं प्रतिसन्धत्ते यथेदानीन्तनं चित्तं, चित्तं च
( ५ ) स्मृतिका अभाव, इन दोषोंकी उपेक्षा करते हुए क्षणवादके सिद्धान्तको प्रतिपादन करनेका महान्
साहस करते हैं।
( १ ) बौद्ध लोग विचारके क्षणोंकी परम्पराको आत्मा मानते हैं। जिस प्रकार एक सूतका डोरा
बहुतसे मोतियोंमें प्रविष्ट होकर सब मोतियोंकी एक माला बनाता है, उस तरह बौद्धोंके मतमें विचारके
सम्पूर्ण क्षणोंमें अन्वित होनेवाली किसी एक वस्तुको आत्मा स्वीकार नहीं किया गया है। अतएव बौद्ध
मतमें जिस विचारके क्षणसे अच्छे या बुरे कर्म किये जाते हैं, उस विचार क्षणके सर्वथा नष्ट हो जानेसे
अच्छे या बुरे कर्म करनेवाले मनुष्यको उन अच्छे, बुरे कर्मोंका फल न मिलना चाहिये। क्योंकि फल
भोगनेवाले मनुष्यने उन कर्मोंको किया ही नहीं है। कारण कि जिस पूर्व विचारके क्षणसे कर्म किया गया
था, .वह क्षण सर्वथा नष्ट हो चुका है। अतएव मनुष्यको अपने कर्मोंके फलका उपभोग नहीं करना
चाहिये । ( २ ) तथा क्षणिकवादमें जिस विचारक्षणने कर्मोंको नहीं किया, उस विचारक्षणको कर्मोंके
फलको भोगनेके लिये बाध्य होनेके कारण, स्वयं नहीं किये हुए दूसरोंके कर्मोंको भोगनेसे अकृत कर्मभोग
नामका दोष आता है। यहाँ जिस प्रकार श्लोककी प्रथम पंक्तिमें 'अकृतकर्मभोग' में कर्म शब्दका संबंध
है, उसी तरह 'कृतप्रणाश' में भी कर्म शब्द जोड़कर 'कृतकर्मप्रणाश' अर्थ करना चाहिये ।
( ३ ) क्षणिकवादमें परलोक का अभाव होनेका प्रसंग उपस्थित होता है, क्योंकि परलोकको
प्राप्त होनेवालेका अभाव है। पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके अनुसार ही परलोककी प्राप्ति होती है। तथा क्षणिक-
वादियोंके मतमें पूर्वजन्ममें किये गये कर्मका, प्राचीन ज्ञानक्षणोंका निरन्वय नाश हो जानेसे, अन्य जन्ममें
किसके द्वारा उपभोग किया जायेगा ? अतएव बौद्ध मतमें परलोकी ( आत्मा ) के अभाव होनेसे परलोककी
भी सिद्धि नहीं होती ।
मोक्षाकरगुप्त ( बौद्ध )—"वर्तमानकालीन चित्तक्षणके समान जो चित्तक्षण होता है वह अन्य
१. संतानस्यैकमाश्रित्य कर्ता भोक्तेति देशितं ॥
यथैव कदलीस्तंभो न कश्चिद्भागशः कृतः । तथाहमप्यसद्भूतो मृग्यमाणो विचारतः ॥
बोधिचर्यावतारे ९-७३, ७५ ।
२. काचिन्नियतमर्यादाऽवस्थैव परिकीर्त्यते ।
तस्याश्चानाद्यनन्तायाः परः पूर्वं इहेति च ॥ तत्त्वसंग्रहे १८७३ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८१
मरणकालभावि" इति भवपरम्परासिद्धये प्रमाणमुक्तम्, तद्व्यर्थम्; चित्तक्षणानां निरवशेष-
नाशिनां चित्तान्तरप्रतिसंधानायोगात् । द्वयोरवस्थितयोर्हि प्रतिसंधानमुभयानुगामिना केन-
चित् क्रियते । यश्चानयोः प्रतिसंधाता, स तेन नाभ्युपगम्यते । स ह्यात्मान्वयी ।।
न च प्रतिसंधत्ते इत्यस्य जनयतीत्यर्थः, कार्यहेतुप्रसङ्गात् । तेन वादिनास्य हेतोः
स्वभावहेतुत्वेनोक्तत्वात् । स्वभावहेतुश्च तादात्म्ये सति भवति । भिन्नकालभाविनोश्च
चित्तचित्तान्तरयोः कुतस्तादात्म्यम् । युगपद्भाविनोश्च प्रतिसन्धेयप्रतिसंधायकत्वाभावापत्तिः,
युगपद्भावित्वेऽविशिष्टेऽपि किमत्र नियामकम्, यदेकः प्रतिसन्ध्यायकोऽपरश्च प्रतिसन्धेय इति ।
अस्तु वा प्रतिसन्धानस्य जननमर्थः । सोऽप्यनुपपन्नः । तुल्यकालत्वे हेतुफलभावस्याभावात् ।
भिन्नकालत्वे च पूर्वचित्तक्षणस्य विनष्टत्वात् उत्तरचित्तक्षणः कथमुपादानमन्तरेणोत्पद्यताम् ।
इति यत्किञ्चिदेतत् ।।
तथा प्रमोक्षभङ्गदोषः । प्रकर्षेणापुनर्भावेन कर्मबन्धनाद् मोक्षो मुक्तिः प्रमोक्षः । तस्यापि
भङ्गः प्राप्नोति । तन्मते तावदात्मैव नास्ति । कः प्रेत्य सुखीभवनाथं यतिष्यते । ज्ञानक्षणोऽपि
संसारी कथमपरज्ञानक्षणसुखीभवनाय घटिष्यते । न हि दुःखी देवदत्तो यज्ञदत्तसुखाय चेष्ट-
मानो दृष्टः । क्षणस्य तु दुःखं स्वरसनाशित्वात् तेनैव सार्धं ध्वंसे । सन्तानस्तु न वास्तवः
कश्चित् । वास्तवत्वे तु आत्माभ्युपगमप्रसङ्गः ॥
चित्तक्षणके साथ संबद्ध होता है। मरणकालमें जो उत्पन्न होता है, वह चित्तक्षण होता है। अतः वह
चित्तक्षण उत्तर चित्तक्षणके साथ सम्बद्ध होता है" ( यच्चित्तं तच्चित्तान्तरं प्रतिसंधत्ते यथेदानींतनं चित्तं,
चित्तं च मरणकालभावि ), अतएव संसारकी परम्परा सिद्ध होती है। जैन—यह अनुमान व्यर्थ है क्योंकि
सम्पूर्ण रूपसे विनाशको प्राप्त होनेवाले चित्तक्षणोंका अन्य चित्तक्षणोंके साथ सम्बद्ध होना घटित नहीं होता ।
अवस्थित रहनेवाले—संपूर्णरूपसे विनष्ट न होनेवाले—दो पदार्थोंका सम्बन्ध दोनोंमें अन्वित होनेवाले किसीके
द्वारा ही घटित होता है । किन्तु दो चित्तक्षणोंमें जो कोई संवन्ध करानेवाला है, उसे क्षणिकवादियोंके
मतमें स्वीकार नहीं किया गया । और दोनों चित्तक्षणोंमें जो अन्वित होता है वह आत्मा है।
शंका—'यच्चित्तं तच्चित्तान्तरं प्रतिसंधत्ते' यहां 'प्रतिसंधत्ते' इस क्रियापदका अर्थ 'उत्पन्न करता
है,' ऐसा नहीं है । क्योंकि ऐसा अर्थ करनेसे मोक्षाकरगुप्तके वचनका अर्थ हो जाता है—'जो चित्तक्षण
होता है वह अन्य चित्तको उत्पन्न करता है' । इससे पूर्वचित्त द्वारा उत्पन्न उत्तर चित्तक्षणके, पूर्व चित्तक्षण
का कार्यहेतु बननेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । परन्तु बौद्धोंने पूर्व और अपर चित्तक्षणोंमें स्वभाव-
हेतु माना है । तथा, स्वभावहेतु तादात्म्य संबंध होनेपर ही होता है। जैसे, यह वृक्ष है, सीसम होनेसे, यहां
वृक्ष और सीसमका तादात्म्य होनेसे स्वभावहेतु अनुमान है । इसलिये भिन्न-भिन्न समयमें होनेवाले पूर्व
और अपर चित्तक्षणोंमें स्वभावहेतु भी नहीं बन सकता । क्योंकि यदि पूर्व और अपर चित्तक्षणोंको एक
ही समयमें होनेवाला माना जाय, तो उनमें प्रतिसन्धेय और प्रतिसंधायकका विभाग नहीं बन सकता । तथा,
प्रतिसंधानका अर्थ उत्पन्न करना भी ठीक नहीं। क्योंकि यदि पूर्व और उत्तर क्षणोंको भिन्न समयवर्ती मानो,
तो पूर्व चित्तक्षणके सर्वथा नाश हो जानेपर, उपादान कारणके विना, उत्तर क्षणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
(४) तथा, मोक्षके अभाव होनेका दोष उपस्थित होता है। फिरसे सद्भूत न होने रूप कर्मोंके
बंधनसे मुक्त होना प्रमोक्ष है। इसके भी अभाव होनेका प्रसंग आ जाता है। क्योंकि बौद्ध मतमें जब आत्मा ही
नहीं है तो परलोकमें सुखी होनेके लिये कौन प्रयत्न करेगा ? क्षणमात्रमें निरन्वय विनाशको प्राप्त होनेवाला
संसारी ज्ञानक्षण भी अन्य ज्ञानक्षणके सुखी होनेके लिये प्रयत्न नहीं कर सकता । क्योंकि पूर्व और अपर ज्ञान
क्षणोंमें कोई संबंध नहीं रह सकता । जैसे, दुखी हुआ देवदत्त यज्ञदत्तके सुखके लिए प्रयत्न करता हुआ नहीं
देखा जाता । प्रत्येक ज्ञानक्षणका दुख भी उसी क्षणके साथ नष्ट हो जाता है। यदि सब ज्ञानक्षणोंमें सुख-दुख
१८२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [अन्य. यो. व्य. श्लोक १८
अपि च बौद्धाः “निखिलवासनोच्छेदे विगतविषयाकारोपप्लवविशुद्धज्ञानोत्पादो मोक्षः”
इत्याहुः । तच्च न घटते । कारणाभावादेव तदनुपपत्तेः । भावनाप्रचयो १हि तस्य कारण-
मिष्यते । स च स्थिरैकाश्रयाभावाद् विशेषानाधायकः, प्रतिक्षणमपूर्ववद् उपजायमानः,
निरन्वयविनाशी, गगनलङ्घनाभ्यासवत् अनासादितप्रकर्षो न स्फुटाभिज्ञानजननाय प्रभवति,
इत्यनुपपत्तिरेव तस्य । समलचित्तक्षणानां स्वाभाविक्याः सदृशारम्भणशक्तेरसद्दृशारम्भम् प्रत्य-
शक्तेश्च अकस्मादनुच्छेदात् । किंच, समलचित्तक्षणाः पूर्वं स्वरसपरिनिर्वाणाः, अयमपूर्वो
जातः सन्तानश्चैको न विद्यते, बन्धमोक्षौ चैकाधिकरणौ न विषयभेदेन वर्तते । तत् कस्येयं
मुक्तिर्य एतदर्थं प्रयतते । अयं हि मोक्षशब्दो बन्धनविच्छेदपर्यायः । मोक्षश्च तस्यैव घटते यो
बद्धः । क्षणक्षयवादे त्वन्यः क्षणो बद्धः क्षणान्तरस्य च मुक्तिरिति प्राप्नोति मोक्षाभावः ॥
तथा स्मृतिभङ्गदोषः । तथाहि । पूर्वबुद्धयानुभूतेऽर्थे नोत्तरबुद्धीनां स्मृतिः सम्भवति ।
ततोऽन्यत्वात्, सन्तानान्तरबुद्धिवत् । न ह्यन्यदृष्टोऽर्थोऽन्येन स्मर्यते अन्यथा एकेन दृष्टोऽर्थः
पहुँचानेवाली संतान स्वीकार की जाय, तो यदि वह संतान ज्ञानक्षणोंके अतिरिक्त कोई पृथक् वस्तु है,
तो उसे आत्मा ही कहना चाहिये । यदि संतान अवस्तु है, तो वह संतान अकार्यकारी है ।
तथा बौद्ध लोग “सम्पूर्ण वासनाओंका उच्छेद हो जानेपर विषयोंके आकारोंकी विघ्न-बाधाओंसे
रहित विशुद्ध ज्ञानके उत्पन्न होनेको मोक्ष” कहते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं । क्योंकि क्षणिकवादियोंके मतमें
वासना-विनाशके कारणका अभाव होनेसे, वासनाओंके विनाशकी सिद्धि न होनेसे, विशुद्ध ज्ञानोत्पाद रूप
मोक्षकी सिद्धि नहीं होती । भावनाओंका समूह ही समस्त वासनाओंके उच्छेदका कारण माना गया है ।
(बौद्धोंके मतमें 'सव पदार्थ क्षणिक हैं, सब दुख रूप हैं, सामान्य रूपसे ज्ञात न हो कर अपने असाधारण
रूपसे ज्ञात होते हैं, अतएव स्वलक्षण हैं, तथा सब पदार्थ निस्वभाव होनेसे शून्य हैं'—इस प्रकार भावना-
चतुष्टयकी उत्कटतासे सम्पूर्ण वासनाओंका उच्छेद हो जाना मोक्ष है ) । स्थिर-अक्षणिक-अर्थात् नित्य आत्म-
रूप एक आश्रयका बौद्ध मतमें अभाव होनेके कारण, विशेष-अतिशय-को उत्पन्न न करनेवाला, प्रत्येक ज्ञान-
क्षणमें अपूर्वकी भाँति उत्पन्न होनेवाला, निरन्वयविनाशी, आकाशको लाँघनेके अभ्यासकी भाँति प्रकर्षको
प्राप्त न करनेवाला भावनाओंका समूह, विशुद्ध ज्ञानकी उत्पत्ति करनेमें समर्थ नहीं होता, अतएव मोक्षकी
सिद्धि नहीं हो सकती । कारण कि मलसहित (अर्थात् अशुद्ध ) ज्ञानक्षणोंकी सदृश (अर्थात् अशुद्ध ) अन्य
ज्ञानक्षणोंकी उत्पत्तिको आरंभ करनेकी स्वाभाविक शक्तिका, तथा असदृश (अर्थात् शुद्ध ) ज्ञान क्षणों-
की उत्पत्तिको आरम्भ करनेकी शक्तिके अभावका अकस्मात् भावनाप्रचयरूप कारणके अभावमें उच्छेद नहीं
होता । तथा, अशुद्ध ज्ञानक्षणके स्वभावतः क्षणिक होनेके कारण नष्ट होनेवाले और अपूर्व रूपमें उत्पन्न
शुद्ध ज्ञानरूप ज्ञानक्षण—ये दोनों एक सन्तान नहीं हैं । तथा, बंधका अधिकरणभूत अशुद्ध ज्ञानक्षण और
मोक्षका अधिकरणभूत शुद्ध ज्ञानक्षणके परस्पर भिन्न होनेसे, ये बंधमोक्षरूप एक अधिकरणमें नहीं रह सकते—
अर्थात् बंध और मोक्ष एक ज्ञानक्षणके नहीं हो सकते—जो ज्ञानक्षण बद्ध होता है वही ज्ञानक्षण मुक्त नहीं हो
सकता । फिर, जो मोक्ष प्राप्तिके लिये प्रयत्न करेगा, उसे मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकेगा ? मोक्ष शब्द बन्धन-
च्छेदका पर्यायवाची है, अर्थात् बन्धका अभाव होना मोक्ष है । क्षणवादियोंके मतमें अन्य क्षण ( ज्ञानक्षण )
बद्ध होता है और उससे भिन्न क्षण अर्थात् भिन्न ज्ञानक्षणकी मुक्ति होती है, अतएव मोक्षका अभाव होनेका
प्रसंग उपस्थित हो जाता है ।
( ५ ) बौद्धोंके मतमें स्मृतिभंग हो जानेका प्रसंग उपस्थित होता है । तथाहि—जिस प्रकार
एक बुद्धिसन्तानके द्वारा अनुभूत पदार्थका, जिसने उस पदार्थको अनुभूत नहीं किया ऐसे अन्य संतानकी बुद्धि-
को स्मरण नहीं होता, उसी प्रकार पूर्व ज्ञानके द्वारा अनुभूत पदार्थके विषयमें उत्तर ज्ञानक्षणोंके द्वारा स्मरण
१. सर्वं क्षणिकं सर्वं क्षणिकम्, दुःखं दुःखं, स्वलक्षणम् स्वलक्षणं, शून्यं शून्यमिति भावनाचतुष्टयं ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८४
सर्वैः स्मर्येत । स्मरणाभावे च कौतस्कुती प्रत्यभिज्ञाप्रसूतिः, तस्याः स्मरणानुभवोभयसंभव-
त्वात् । पदार्थप्रेक्षणप्रबुद्धप्राक्तनसंस्कारस्य हि प्रमातुः स एवायमित्याकारेण इयमुत्पद्यते ।
अथ स्यादयं दोषः, यद्यविशेषेणान्यदृष्टमन्यः स्मरतीत्युच्यते; किन्तु अन्यत्वेऽपि कार्य-
कारणभावाद्¹ एव च स्मृतिः । भिन्नसंतानबुद्धीनां तु कार्यकारणभावो नास्ति । तेन संताना-
न्तराणां स्मृतिर्न भवति । न चैकसान्तानिकीनामपि बुद्धीनां कार्यकारणभावो नास्ति, येन
पूर्वबुद्ध्यनुभूतेऽर्थे तदुत्तरबुद्धीनां स्मृतिर्न स्यात् । तदप्यनवदातम्, एवमपि अन्यत्वस्य तद-
वस्थत्वात् । न हि कार्यकारणभावाभिधानेऽपि तदपगतं, क्षणिकत्वेन सर्वासां भिन्नत्वात् ।
न हि कार्यकारणभावात् स्मृतिरित्यत्रोभयप्रसिद्धोऽस्ति दृष्टान्तः ॥
अथ— “यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना ।
फलं तत्रैव संधत्ते कर्पासे रक्तता यथा” ॥
होना संभव नहीं। यदि अन्य पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका किसी अन्य पुरुषके द्वारा स्मरण किया जाता हो तो
एक पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका ( जिन्होंने इस पदार्थको कभी नहीं देखा ऐसे ) अन्य सभी पुरुषोंको स्मरण हो
जानेका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। यदि पूर्वज्ञानके द्वारा अनुभूत पदार्थका उत्तरबुद्धियोंको स्मरण न हुआ
तो प्रत्यभिज्ञान कहाँसे बन सकता है ? क्योंकि प्रत्यभिज्ञान स्मरण और अनुभव इन दोनोंसे उत्पन्न होता है।
पदार्थके दर्शनसे जिसका संस्कार प्रबुद्ध हो जाता है, ऐसे प्रमाताको ही 'यह वही है' इस रूपसे प्रत्यभि-
ज्ञान होता है ।
शंका—यदि सामान्यरूपसे अन्य विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका अन्य विज्ञानक्षण स्मरण करता
है—ऐसा हमने कहा होता तो स्मृतिभंग नामका दोष आ सकता था। किन्तु पूर्वोत्तर विज्ञानक्षणोंमें भेद
होनेपर भी उनमें कार्यकारण भाव होनेसे ही स्मरण होता है—अर्थात् पूर्व विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका
उत्तर विज्ञानक्षणको स्मरण होता है । अन्योन्यभिन्न संतानोंकी बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता ।
इससे एक संतानकी बुद्धिके द्वारा दृष्ट पदार्थका उससे भिन्न संतानकी बुद्धिको स्मरण नहीं होता । तथा,
एक संतानकी भी ( भिन्न-भिन्न ) बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता—ऐसी बात नहीं है, जिससे
पूर्वबुद्धिके द्वारा जो पदार्थ अनुभूत है, उस पदार्थका स्मरण उसकी उत्तरकालीन बुद्धियोंको न होगा।
समाधान—यह कथन भी ठीक नहीं। पूर्वोत्तर बुद्धियोंमें कार्य-कारण भाव होनेपर भी उन
दोनोंमें होनेवाला भिन्नत्व जैसेका तैसा बना रहता है। पूर्वोत्तरकालीन बुद्धियोंमें कार्य-कारण माननेपर
भी उनमें होनेवाले भेदका अभाव नहीं होता। क्योंकि सभी बुद्धियोंके क्षणिक होनेसे वे अन्योन्यभिन्न
होती हैं। 'उनमें परस्पर भेद होनेपर भी दोनोंमें कार्यकारण भाव होनेसे स्मृति उत्पन्न होती है'—इस
विषयमें वादी-प्रतिवादी-प्रसिद्ध दृष्टान्तका सद्भाव नहीं है। ( अतएव पूर्वोत्तरकालवर्ती दो भिन्न बुद्धियोंमें
कार्य-कारण भावकी, उभयमान्य दृष्टांतके अभावके कारण सिद्धि न होने और उनमें भेद होनेसे, स्मृतिका
प्रादुर्भाव असम्भव होनेके कारण स्मृतिभंग नामक दोष आता ही है ) ।
शंका—“जिस प्रकार जिस कपासमें लाल रंग द्वारा संस्कार किया जाता है, उसीमें ललाई होती है,
उसी प्रकार जिस संतानमें कर्मवासना उत्पादित की गई होती है, उसी ( संतान ) में कर्मवासनाका
फल रहता है” ।
इस प्रकार कपासमें रक्तताका दृष्टांत विद्यमान है।
१. कार्यकारणभावप्रतिनियमादेव स्मृत्यभावोऽपि निरस्तः । न स्मर्त्ता कश्चिदिह विद्यते । किं तर्हि स्मरणमेव
केवलमारोपवशात् । अनुभूते हि वस्तुनि विज्ञानसंताने स्मृतिबीजाधानात्कालान्तरेण संततिपरिपाकहेतोः
स्मरणं नाम कार्यमुत्पद्यते । बोधिचर्यावतारपञ्जिकायां पृ. ४१५ ।
१८४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १८
इति । कर्पासे रक्तादृष्टान्तोऽस्तीति चेत्, तदसाधीयः, साधनदूषणयोरसम्भवात् । तथाहि—
अन्वयाद्यसम्भवान्न साधनम् । न हि कार्यकारणभावो यत्र तत्र स्मृतिः कर्पासे रक्ततावदित्य-
न्वयः सम्भवति । नापि यत्र न स्मृतिस्तत्र न कार्यकारणभाव इति व्यतिरेकोऽपि । असिद्ध-
त्वाद्यनुद्भावनाच्च न दूषणम् । न हि ततोऽन्यत्वात् इत्यस्य हेतोः कर्पासे रक्ततावत् इत्यनेन
कश्चिद्दोषः प्रतिपाद्यते ॥
किञ्च, यद्यनन्वयत्वेऽपि कार्यकारणभावेन स्मृतेरुत्पत्तिरिष्यते, तदा शिष्याचार्यादि-
बुद्धीनामपि कार्यकारणभावसद्भावेन स्मृत्यादिः स्यात् । अथ नायं प्रसङ्गः, एकसंतानत्वे
सतीतिविशेषणादिति चेत्, तदप्युक्तं, भेदाभेदपक्षाभ्यां तस्योपक्षीणत्वात् । क्षणपरम्परातस्त-
स्याभेदे हि क्षणपरम्परैव सा । तथा च संतान इति न किञ्चिदतिरिक्तमुक्तं स्यात् । भेदे तु
पारमार्थिकः अपारमार्थिको वासौ स्यात् ? अपारमार्थिकत्वेऽस्य दूषणं, अकिंचित्करत्वात् ।
पारमार्थिकत्वे स्थिरो वा स्यात् क्षणिको वा ? क्षणिकत्वे संताननिर्विशेष एवायम्, इति किम-
नेन स्तेनभीतस्य स्तेनान्तरशरणस्वीकरणानुकरिणा । स्थिरश्चेत् आत्मैव संज्ञाभेदतिरोहितः
प्रतिपन्नः । इति न स्मृतिर्घटते क्षणक्षयवादिनाम् ॥
समाधान—यह ठीक नहीं है । क्योंकि पूर्वोत्तर बुद्धिक्षणोंमें (बौद्धों द्वारा मान्य ) कार्य-कारण
भाव रूप हेतुसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी, न इस दृष्टांतसे सिद्धि होती है और न वह साध्य
दूषित ही होता है । तथाहि—बुद्धिके पूर्वोत्तरक्षणोंमें होनेवाला कार्य-कारण भाव रूप हेतु और स्मृति इनमें
अन्वय-व्यतिरेक संभव न होनेसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'जहाँ कार्य-कारण
भाव होता है, वहाँ स्मृतिका सद्भाव होता है, जैसे कपासमें रक्तता,' तथा 'जहाँ स्मृति नहीं होती, वहाँ
कार्य-कारण भाव भी नहीं होता' इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक सम्बन्ध नहीं बनते । इस प्रकार
स्मृतिरूप साध्य और कार्य-कारण भाव रूप हेतु इनमें अन्वय-व्यतिरेक न बननेसे उस हेतुसे स्मृतिरूप
साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'उससे अर्थात् पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके असिद्धत्व आदि
दोषोंका प्रकटीकरण न होनेसे यह हेतु दूषित नहीं है । 'पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके विषयमें
'जैसे कपासमें रक्तता' इस दृष्टांतके द्वारा किसी दोषका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।
तथा, 'जहाँ कार्य-कारण भाव होता है वहाँ स्मृति होती है'—इस प्रकार कार्य-कारण भावमें और
स्मृतिमें अन्वयका अभाव होनेपर भी, यदि उत्तर बुद्धिक्षण और पूर्व बुद्धिक्षणमें कार्य-कारण भाव होनेसे
स्मृतिकी उत्पत्तिका इष्ट होना माना गया, तो शिष्यबुद्धि और आचार्यबुद्धिमें, आचार्यबुद्धिके कारण और शिष्य-
बुद्धिके कार्य होनेसे, कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृतिका सद्भाव हो जायेगा । 'शिष्यबुद्धिमें और आचार्यबुद्धिमें
अन्वयका अभाव होनेपर भी उनमें कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृति आदिके सद्भाव होनेका प्रसंग उपस्थित
नहीं होता; क्योंकि शिष्य और आचार्य ये दो भिन्न संतान हैं, और हमने 'एक संतानत्व' ( एक संतानत्वे
सति ) विशेषणका प्रयोग किया है ।' यह भी ठीक नहीं । क्योंकि भेदपक्ष औरअ भेदपक्षके द्वारा 'एक-
संतानत्व' विशेषण क्षीण हो जाता है—अकिंचित्कर बन जाता है । क्षण परंपरासे उस 'एकसंतानत्व' को
अभिन्न माननेपर वह क्षणपरंपरारूप ही होगा । इस प्रकार संतानके क्षणपरंपरारूप होनेसे, संतानको
क्षणपरंपरा ( संतानी ) ही कहना चाहिये, संतान नहीं । यदि संतान और क्षणपरंपराको भिन्न मानो, तो
यह संतान वास्तविक है, या अवास्तविक ? यदि यह अवास्तविक है, तो वह अकिंचित्कर होनेसे दूषित
है। यदि संतान वास्तविक है, तो वह स्थिर है, या क्षणिक ? यदि क्षणपरंपरासे भिन्न संतान क्षणिक है,
तो यह संतान क्षणपरंपरासे अभिन्न ही है । इस प्रकार क्षणपरंपराको छोड़कर संतानका आश्रय लेना,
एक चोरके भयसे दूसरे चोरके आश्रय लेनेके समान है। यदि वास्तविक संतानको स्थिर मानो, तो फिर
संतान-संज्ञासे तिरोहित आत्मा स्वीकार करनेमें ही क्या दोष है ? अतएव क्षणिकवादियोंके मतमें स्मृति
भी नहीं बनती ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८५
तद्भावे च अनुमानस्यानुत्थानमित्युक्तम् प्रागेव । अपि च, स्मृतेरभावे निहित-
प्रत्युन्मार्गणप्रत्यर्पणादिव्यवहारा विशीर्येरन् ।
“इत्येकोनवते कल्पे शक्त्या मे पुरुषो हतः ।
तेन कर्मविपाकेन पादे विद्धोऽस्मि भिक्षवः ॥”
इति वचनस्य का गतिः। एवमुत्पत्तिरुत्पादयति, स्थितिः स्थापयति, जरा जर्जरंयति,
विनाशो नाशयतीति चतुःक्षणिकं१ वस्तु प्रतिजानाना अपि प्रतिक्षेप्याः । क्षणचतुष्कानन्तर-
मपि निहितप्रत्युन्मार्गणादिव्यवहाराणां दर्शनात् । तदेवमनेकदोषापातेऽपि यः क्षणभङ्गमभि-
प्रैति तस्य महत् साहसम् ॥ इति काव्यार्थः ॥ १८ ॥
स्मृतिके अभाव होनेपर अनुमान भी नहीं बन सकता, यह पहले ही कहा जा चुका है तथा
स्मृतिके अभावमें धरोहर आदि रख कर भूल जाना, धरोहरको लौटानेकी याद न रहना आदि व्यवहारका भी
लोप हो जायगा । तथा—
“अबसे इक्यानवॅवें भवमें मैने एक पुषपको बलात्कारसे मार डाला, उस कर्मके खोटेफ लसे मेरा
पैर छिद गया है ।”
आदि वचनोंके लिए भी कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति, जरा और विनाश इन
चार क्षण पर्यंत जो वस्तुकी स्थिति मानी है ( क्षणिकवादका परिवर्तित रूप ), वह भी नहीं बन सकती ।
क्योंकि चार क्षणोंके बाद भी धरोहर आदिको रखकर भूल जाने और उसे लौटानेकी याद न रहने आदिका
व्यवहार देखा जाता है । इसलिए अनेक दोषोंके आनेपर भी क्षणभंगको मानना बौद्धोंका महान् साहस है ॥
यह श्लोकका अर्थ है ॥१८॥
भावार्थ—इस श्लोकमें बौद्धोंके 'क्षणभंग' वादपर विचार किया गया है। जैन लोगोंका कहना है
कि प्रत्येक वस्तु क्षणस्थायी माननेपर बौद्धोंके मतमें आत्मा कोई पृथक् पदार्थ नहीं बन सकता । तथा, आत्माके
न माननेपर ( १ ) संसार नहीं बनता, क्योंकि क्षणिकवादियोंके मतमें पूर्व और अपर क्षणोंमें कोई संबंध न
हो सकनेसे पूर्व जन्मके कर्मोंका जन्मांतरमें फल नहीं मिल सकता । बौद्ध लोग संतानको वस्तु मानते हैं ।
उनके मतानुसार संतानका एक क्षण दूसरे क्षणसे संबद्ध होता है, मरणके समय रहनेवाला ज्ञानक्षण भी
दूसरे विचारसे संबद्ध होता है, इसीलिये संसारकी परम्परा सिद्ध होती है । परन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि
संतानक्षणोंका परस्पर संबंध करनेवाला कोई पदार्थ नहीं है, जिससे दोनों क्षणोंका परस्पर संबंध हो सके ।
( २ ) आत्माके न माननेपर मोक्ष भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि संसारी आत्माका अभाव होनेसे मोक्ष
किसको मिलेगा । बौद्ध लोग सम्पूर्ण वासनाओंके नष्ट होजाने पर भावनाचतुष्टयसे होनेवाले विशुद्ध ज्ञानको
मोक्ष कहते हैं । परन्तु क्षणिकवादियोंके मतमें कार्य-कारण भाव नहीं सिद्ध होता । तथा, अशुद्ध ज्ञानसे
अशुद्ध ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है, विशुद्ध ज्ञान नहीं । तथा, जिस पुरुषके बंध हो, उसे ही मोक्ष मिलना
चाहिये । परन्तु क्षणिकवादियोंके मतमें बंधके क्षणसे मोक्षका क्षण दूसरा है, अतएव बद्ध पुरुषको मोक्ष नहीं
हो सकता । ( ३ ) अनात्मवादी बौद्धोंके मतमें स्मृतिज्ञान भी नहीं बन सकता । क्योंकि एक बुद्धिसे अनुभव
किये हुए पदार्थोंका दूसरी बुद्धिसे स्मरण नहीं हो सकता । स्मृतिके स्थानमें संतानको एक अलग पदार्थ मान
कर एक संतानका दूसरी संतानके साथ कार्य-कारण भाव माननेपर भी संतानक्षणोंकी परस्पर भिन्नता नहीं
मिट सकती, क्योंकि बौद्ध मतमें सम्पूर्ण क्षण परस्पर भिन्न हैं ।
१. लक्षणानि तथा जातिर्जरास्थितिरनित्यता ।
जाति जात्यादयस्तेषां तेऽष्टधर्मैकवृत्तयः ।
वसुबन्धुविरचिताभिधर्मकोशे २-४५,४६ ।
२४
१८६ श्रीमद्द्वाजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १९
अथ ताथागताः क्षणक्षयपक्षे सर्वव्यवहारानुपपत्तिं परैरुद्भावितामाकर्ण्य इत्थं प्रतिपाद-
यन्ति—यत् सर्वपदार्थानां क्षणिकत्वेऽपि वासनावललब्धजन्मना ऐक्याध्यवसायेन ऐहिका-
मुष्मिकव्यवहारप्रवृत्तेः कृतप्रणाशादिदोषा निरवकाशा एव इति । तदाकूतं परिहर्तुकामस्तत्क-
ल्पितवासनायाः क्षणपरम्परातो भेदाभेदानुभयलक्षणे पक्षत्रयेऽप्यघटमानत्वं दर्शयन् स्वाभि-
प्रेतभेदाभेदस्याद्वादमकामयमानानपि तानङ्गीकारयितुमाह—
सा वासना सा क्षणसन्ततिश्च नामेदभेदानुभयैर्घटेते ।
ततस्तदादर्शिशकुन्तपोतन्यायात्त्वदुक्तानि परे श्रयन्तु ॥१९॥
सा शाक्यपरिकल्पिता त्रुटितमुक्तावलीकल्पानां परस्परविशकलितानां क्षणानामन्योन्या-
नुस्यूतप्रत्ययजनिका एकसूत्रस्थानीया सन्तानापरपर्याया वासना । वासनेति पूर्वज्ञानजनिता-
मुत्तरज्ञाने शक्तिमाहुः । सा च क्षणसन्ततिस्तद्दर्शनप्रसिद्धा प्रदीपकलिकावत् नवनवोत्पद्यमाना-
परापरसदृशक्षणपरम्परा । एते द्वे अपि अभेदभेदानुभयैर्न घटेते ॥
न तावदभेदेन तादात्म्येन ते घटेते । तयोर्हि अभेदे वासना वा स्यात् क्षणपरम्परा वा,
बौद्ध—पदार्थोंके क्षणस्थायी होनेपर भी वासनासे उत्पन्न होनेवाले अभेद ज्ञानसे इस लोक और
परलोक संबंधी व्यवहार चल सकता है, अतएव 'कृतकर्मप्रणाश' आदि दोष हमारे सिद्धांतमें नहीं आ सकते ।
जैन—आप लोग जिस वासनाको स्वीकार करते हैं, वह कल्पित वासना क्षणपरम्परासे भिन्न, अभिन्न,
अथवा न भिन्न और न अभिन्न, ( अनुभय ) किसी भी तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव हमारे द्वारा
अभिप्रेत स्याद्वादके भेदाभेदको ही स्वीकार करना चाहिये—
श्लोकार्थ—वासना और क्षणसंतति परस्पर भिन्न, अभिन्न, और अनुभय—तीनों प्रकारसे किसी भी
तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव जिस प्रकार समुद्रमें, जहाजसे उड़ा हुआ पक्षी समुद्रका किनारा न देखकर
पीछे जहाजपर ही लौट आता है, उसी तरह उपायान्तर न होनेसे हे भगवन् ! बौद्ध लोगोंको आपके ही सिद्धा-
न्तोंका आश्रय लेना चाहिये ।
व्याख्यार्थ—जिसका अपर नाम संतान है, ऐसी बौद्धों द्वारा कल्पित वासना, त्रुटित मुक्तावलिके
भिन्न-भिन्न मोतियोंके समान, परस्पर भिन्न क्षण एक दूसरेसे अनुस्यूत हुए हैं, इस प्रकारका ज्ञान उत्पन्न
करनेवाली—एक सूत्रके समान होती है। पूर्व ज्ञानक्षणसे उत्तर ज्ञानक्षणमें उत्पन्न की हुई शक्तिको वासना
कहते हैं। दीपककी लौके समान नये नये उत्पन्न होनेवाले अपर अपर सदृश पूर्व और उत्तर क्षणोंकी परम्परा-
को क्षणसंतति कहते हैं । ( जिस प्रकार दीपककी लौके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहने पर भी लौके पूर्व और
उत्तर क्षणोंमें परस्पर सदृश ज्ञान होनेके कारण, यह वही लौ है, ऐसा ज्ञान होता है; उसी तरह पदार्थोंके
प्रत्येक क्षणमें बदलते रहनेपर भी पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सदृश ज्ञान होनेके कारण यह वही पदार्थ
है, ऐसा ज्ञान होता है । इसे ही बौद्ध मतमें क्षणसंतति कहा है । ) यह वासना और क्षणसंतति परस्पर
भिन्न, अभिन्न, अथवा अनुभय रूपसे किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती ।
(१) वासना ( संतति ) और क्षणसंततिको परस्पर अभिन्न मानना ठीक नहीं । क्योंकि वासना
१. यथा बीजादिष्वात्मानमन्तरेणापि प्रतिनियमेन कार्यं तदुत्पत्तिश्च क्रमेण भवति, तथा प्रकृतेऽपि परलोक-
गामिनमेकं विनापि कार्यकारणभावस्य नियामकत्वात्प्रतिनियतमेव फलं । क्लेशकर्माभिसंस्कृतस्य संतान-
स्याविच्छेदेन प्रवर्तनात् परलोके फलप्रतिलम्भोऽभिधीयते । इति नाकृताभ्यागमो न कृतविप्रणाशो बाधकं ।
बोधिचर्यावतारपंजिका पृ. ४७३ । अत्र शान्तरक्षितकृततत्त्वसंग्रहे कर्मफलसम्बन्धपरीक्षोनामप्रकरणम्
अवलोकयितव्यम् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १९ ] स्याद्वादमञ्जरी १८७
न द्वयम्। यद्धि यस्मादभिन्नं न तत् ततः पृथगुपलभ्यते, तथा घटाद् घटस्वरूपम्। केवलायां
वासनायामन्वयिस्वीकारः। वास्याभावे च किं तया वासनीयमस्तु। इति तस्या अपि न
स्वरूपमवतिष्ठते। क्षणपरम्परामात्राङ्गीकरणे च प्राञ्च एव दोषाः॥
न च भेदेन ते युज्येते। सा हि भिन्ना वासना क्षणिका वा स्यात् अक्षणिका वा?
क्षणिका चेत्, तर्हि क्षणेभ्यस्तस्याः पृथक्कल्पनं व्यर्थम्। अक्षणिका चेत्, अन्वयिपदार्थाभ्यु-
पगमेनागमबाधः। तथा च पदार्थान्तराणां क्षणिकत्वकल्पनाप्रयासो व्यसनमात्रम् ॥
अनुभयपक्षेणापि न घटते। स हि कदाचित् एवं ब्रूयात्, नाहं वासनायाः क्षण-
श्रेणितोऽभेदं प्रतिपद्ये, न च भेदं किंत्वनुभयमिति। तदप्यनुचितम्। भेदाभेदयोर्विधिनिषेध-
रूपयोरेकतरप्रतिषेधेऽन्यतरस्यावश्यं विधिभावात् अन्यतरपक्षाभ्युपगमः। तत्र च प्रागुक्त एव
दोषः। अथवाऽनुभयरूपत्वेऽवस्तुत्वप्रसङ्गः। भेदाभेदलक्षणपक्षद्वयव्यतिरिक्तस्य मार्गान्तरस्य
नास्तित्वात्। अनार्हतानां हि वस्तुना भिन्नेन वा भाव्यम् अभिन्नेन वा? तदुभयातीतस्य
वन्ध्यास्तनन्धयप्रायत्वात्। एवं विकल्पत्रयेऽपि क्षणपरम्परावासनयोरनुपपत्तौ पारिशेष्याद्
भेदाभेदपक्ष एव कक्षीकरणीयः। न च “प्रत्येकं यो भवेद् दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः।”
इति वचनादत्रापि दोषतादवस्थ्यमिति वाच्यम्। कुक्कुटसर्पनरसिंहादिवद् १ जात्यन्तरत्वाद-
नेकान्तपक्षस्य ॥
और क्षणसंततिके अभिन्न होनेसे वासना और क्षणसंतति दोनोंमेंसे किसी एकको ही मानना चाहिए दोनोंको
नहीं। जो पदार्थ जिससे अभिन्न होता है, वह उससे अलग नहीं पाया जाता। जैसे घटस्वरूप घटसे अभिन्न है,
इसलिये घटस्वरूप घटसे अलग नहीं पाया जाता। अतएव केवल वासनाको स्वीकार करना नित्य पदार्थको
स्वीकार करनेके समान है। तथा, वास्य (क्षणसंतति) को स्वीकार न करके केवल वासनाको स्वीकार करना
निष्प्रयोजन है। यदि केवल क्षणपरम्परा स्वीकार करो तो पूर्वोक्त दोष आते हैं।
(२) यदि वासना और क्षणसंततिको परस्पर भिन्न मानो तो वासना क्षणिक है, अथवा अक्षणिक ?
यदि वासना क्षणिक है तो वासनाको क्षणोंसे भिन्न मानना निरर्थक है। यदि वासना अक्षणिक है तो वासना
को नित्य माननेसे आपके आगमसे विरोध आता है, इसलिये पदार्थोंके क्षणिकत्वकी कल्पनाका प्रयास
व्यसनमात्र है।
(३) वासना और क्षणसंततिमें भेद और अभेदसे विलक्षण भेदाभेदका अभाव (अनुभय) भी
नहीं बन सकता। क्योंकि भेद विधिरूप है, और अभेद निषेधरूप, इसलिये एकके निषेध करनेपर दूसरेको
स्वीकार करना पड़ता है—भेद न माननेसे अभेद, और अभेद न मानसे, भेद मानना पड़ता है। यह ठीक
नहीं है। अलग-अलग भेद और अभेद पक्ष स्वीकार करनेमें दोष दिये जा चुके हैं। तथा, वासना और क्षण-
संततिका संबंध परस्पर भेदाभेदके अभावरूप मानने पर क्षणसंतति और वासनाको अवस्तु अर्थात् कल्पित ही
कहना चाहिये, क्योंकि बौद्धोंके मतमें भेद और अभेदसे विलक्षण तीसरा पक्ष नहीं बन सकता। अनेकांत-
वादियोंको छोड़कर अन्य वादियोंके मतमें पदार्थोंके परस्पर भेद और अभेदसे विलक्षण तीसरा पक्ष वंध्यापुत्रके
समान, संभव नहीं है। अतएव भेद, अभेद और अनुभय तीनों विकल्पोंसे वासना और क्षणपरम्परा
सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये वासना और क्षणपरम्परामें भेदाभेद ही स्वीकार करना चाहिये। यदि
कहो कि “भेद और अभेद पक्ष स्वीकार करनेमें जो दोष आते हैं, वे सब दोष भेदाभेद माननेमें भी आते हैं”
तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जैसे कुक्कुटसर्पमें कुक्कुट और सर्प दोनोंसे विलक्षण, और नरसिंहमें नर और
१. यथा नरसिंहे नरत्वसिंहत्वोभयजातिव्यतिरिक्तं नरसिंहत्वाख्यं जात्यन्तरम्, तद्वदित्यर्थः। कुक्कुटसर्पोऽपि
कश्चन कुक्कुटत्वसर्पत्वेत्युभयजातिव्यतिरिक्तः कुक्कुटसर्पत्वजातिमान् प्राणिविशेषः स्यात्।