स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १७९
अधुना क्षणिकवादिन् ऐहिकामुष्मिकव्यवहारानुपपन्नार्थसमर्थनमविमृश्यकारितं दर्श-
यन्नाह—
कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगभवप्रमोक्षस्मृतिभङ्गदोषान् ।
उपेक्ष्य साक्षात् क्षणभङ्गमिच्छन्नहो महासाहसिकः परस्ते ॥ १८ ॥
कृतप्रणाशदोषम् अकृतकर्मभोगदोषम् भवभङ्गदोषम् प्रमोक्षभङ्गदोषम् स्मृतिभङ्गदोष-
मित्येतान् दोषान् । साक्षादित्यनुभवसिद्धान् । उपेक्ष्यानादृत्य । साक्षात् कुर्वन्नपि गजनिमी-
लिकामवलम्ब्यमानः१ । सर्वभावानां क्षणभङ्गम् उदयान्तरविनाशरूपां क्षणक्षयिताम् । इच्छन्
प्रतिपद्यमानः । ते तव । परः प्रतिपक्षी वैनाशिकः सौगत इत्यर्थः । अहो महासाहसिकः सहसा
होनेपर प्रमाण भी नहीं बन सकता । (घ) प्रमाणके अभावमें प्रमिति भी नहीं सिद्ध हो सकती । अतएव
सर्वथा शून्य मानना ही वास्तविक तत्त्व है । क्योंकि अनुमान और अनुमेयका व्यवहार बुद्धिजन्य है । वास्तव
में बुद्धिके बाहर सत् और असत् कोई वस्तु नहीं । अतएव न सत्, न असत्, न सत्-असत्, और न सत्-असत्
का अभाव रूप ही वास्तवमें परमार्थ है ।
जैन—प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण और प्रमिति प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं । ( क )
'मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' आदि 'अहं प्रत्यय'से प्रमाता सिद्ध होता है । ( ख ) बाह्य पदार्थोंका ज्ञान अनुभवसे
सिद्ध है । तथा बाह्य पदार्थोंके अनुभव होनेपर ही वासना बन सकती है । अतएव प्रमेय भी स्वीकार करना
चाहिये । ( ग ) प्रमेयके सिद्ध होनेपर प्रमाण भी अवश्य मानना चाहिये । जैसे कुठारसे काटनेकी क्रिया हो
सकती है, वैसे जानने रूप क्रियाका भी कोई करण होना चाहिये । ( घ ) पदार्थको जानते समय पदार्थ,
संबंधी अज्ञानका नाश होना ही प्रमाणका साक्षात् फल है, अतएव प्रमिति भी मानना चाहिये । तथा
शून्यवादी लोग प्रमाता आदिको प्रमाण अथवा अप्रमाण किसीसे भी सिद्ध नहीं कर सकते । अप्रमाण अकिं-
चित्कर है, इसलिये अप्रमाणसे प्रमाता आदि सिद्ध नहीं हो सकते । इसी तरह प्रमाणसे भी प्रमाता आदि
सिद्ध नहीं होते, क्योंकि शून्यवादियोंके मतमें स्वयं प्रमाण ही अवस्तु है । तथा, जिस प्रमाणसे शून्यवादी
लोग अपने पक्षकी सिद्धि करते हैं, वह प्रमाण बिना प्रमेयके नहीं बन सकता, क्योंकि प्रमाण निर्विषय नहीं
होता, अतएव शून्यवादियोंको मौन रहना ही श्रेयस्कर है ।
क्षणिकवादियोंके मतमें इस लोक और परलोककी व्यवस्था नहीं बन सकती । अतएव उनके मतको
अविचारपूर्ण सिद्ध करते हैं—
श्लोकार्थ—आपके प्रतिपक्षी क्षणिकवादी बौद्ध क्षणिकवादको स्वीकार करके, किये हुए कर्मोंके
फलको न भोगना, अकृत कर्मोंके फलको भोगनेके लिये बाध्य होना, परलोकका नाश, मुक्तिका
नाश, तथा स्मरण शक्तिका अभाव, इन दोषोंकी उपेक्षा करके अपने सिद्धांतको स्थापित करनेका महान्
साहस करते हैं ।
व्याख्यार्थ—जिस प्रकार हाथी आँखोंको बन्द करके जलपान करता है, वैसे ही संसार, मोक्ष
आदिका साक्षात् अनुभव करते हुए भी सम्पूर्ण पदार्थोंको क्षणस्थायी माननेवाले प्रतिपक्षी बौद्ध ( १ ) किये
हुए कर्मोंका नाश, ( २ ) नहीं किये हुए कर्मोंका भोग, ( ३ ) संसारका क्षय, ( ४ ) मोक्षका नाश और
१. गजो नेत्रे निमील्य जलपानादि करोति नेत्रनिमीलनेन न किंचित्करोमीति भावयति च तद्वदयं
वादी कृतप्रणाशादीन् दोषान् साक्षादनुभवन् सर्वभावानां क्षणभङ्गुरतां प्रतिपद्यते ।