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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 458 में से

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पृष्ठ 235

अन्य. यो. व्य. श्लोक १८ ] स्याद्वादमञ्जरी १८४
सर्वैः स्मर्येत । स्मरणाभावे च कौतस्कुती प्रत्यभिज्ञाप्रसूतिः, तस्याः स्मरणानुभवोभयसंभव-
त्वात् । पदार्थप्रेक्षणप्रबुद्धप्राक्तनसंस्कारस्य हि प्रमातुः स एवायमित्याकारेण इयमुत्पद्यते ।
अथ स्यादयं दोषः, यद्यविशेषेणान्यदृष्टमन्यः स्मरतीत्युच्यते; किन्तु अन्यत्वेऽपि कार्य-
कारणभावाद्¹ एव च स्मृतिः । भिन्नसंतानबुद्धीनां तु कार्यकारणभावो नास्ति । तेन संताना-
न्तराणां स्मृतिर्न भवति । न चैकसान्तानिकीनामपि बुद्धीनां कार्यकारणभावो नास्ति, येन
पूर्वबुद्ध्यनुभूतेऽर्थे तदुत्तरबुद्धीनां स्मृतिर्न स्यात् । तदप्यनवदातम्, एवमपि अन्यत्वस्य तद-
वस्थत्वात् । न हि कार्यकारणभावाभिधानेऽपि तदपगतं, क्षणिकत्वेन सर्वासां भिन्नत्वात् ।
न हि कार्यकारणभावात् स्मृतिरित्यत्रोभयप्रसिद्धोऽस्ति दृष्टान्तः ॥
अथ— “यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना ।
फलं तत्रैव संधत्ते कर्पासे रक्तता यथा” ॥
होना संभव नहीं। यदि अन्य पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका किसी अन्य पुरुषके द्वारा स्मरण किया जाता हो तो
एक पुरुषके द्वारा दृष्ट पदार्थका ( जिन्होंने इस पदार्थको कभी नहीं देखा ऐसे ) अन्य सभी पुरुषोंको स्मरण हो
जानेका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। यदि पूर्वज्ञानके द्वारा अनुभूत पदार्थका उत्तरबुद्धियोंको स्मरण न हुआ
तो प्रत्यभिज्ञान कहाँसे बन सकता है ? क्योंकि प्रत्यभिज्ञान स्मरण और अनुभव इन दोनोंसे उत्पन्न होता है।
पदार्थके दर्शनसे जिसका संस्कार प्रबुद्ध हो जाता है, ऐसे प्रमाताको ही 'यह वही है' इस रूपसे प्रत्यभि-
ज्ञान होता है ।
शंका—यदि सामान्यरूपसे अन्य विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका अन्य विज्ञानक्षण स्मरण करता
है—ऐसा हमने कहा होता तो स्मृतिभंग नामका दोष आ सकता था। किन्तु पूर्वोत्तर विज्ञानक्षणोंमें भेद
होनेपर भी उनमें कार्यकारण भाव होनेसे ही स्मरण होता है—अर्थात् पूर्व विज्ञानक्षणके द्वारा दृष्ट पदार्थका
उत्तर विज्ञानक्षणको स्मरण होता है । अन्योन्यभिन्न संतानोंकी बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता ।
इससे एक संतानकी बुद्धिके द्वारा दृष्ट पदार्थका उससे भिन्न संतानकी बुद्धिको स्मरण नहीं होता । तथा,
एक संतानकी भी ( भिन्न-भिन्न ) बुद्धियोंमें कार्यकारण भाव नहीं होता—ऐसी बात नहीं है, जिससे
पूर्वबुद्धिके द्वारा जो पदार्थ अनुभूत है, उस पदार्थका स्मरण उसकी उत्तरकालीन बुद्धियोंको न होगा।
समाधान—यह कथन भी ठीक नहीं। पूर्वोत्तर बुद्धियोंमें कार्य-कारण भाव होनेपर भी उन
दोनोंमें होनेवाला भिन्नत्व जैसेका तैसा बना रहता है। पूर्वोत्तरकालीन बुद्धियोंमें कार्य-कारण माननेपर
भी उनमें होनेवाले भेदका अभाव नहीं होता। क्योंकि सभी बुद्धियोंके क्षणिक होनेसे वे अन्योन्यभिन्न
होती हैं। 'उनमें परस्पर भेद होनेपर भी दोनोंमें कार्यकारण भाव होनेसे स्मृति उत्पन्न होती है'—इस
विषयमें वादी-प्रतिवादी-प्रसिद्ध दृष्टान्तका सद्भाव नहीं है। ( अतएव पूर्वोत्तरकालवर्ती दो भिन्न बुद्धियोंमें
कार्य-कारण भावकी, उभयमान्य दृष्टांतके अभावके कारण सिद्धि न होने और उनमें भेद होनेसे, स्मृतिका
प्रादुर्भाव असम्भव होनेके कारण स्मृतिभंग नामक दोष आता ही है ) ।
शंका—“जिस प्रकार जिस कपासमें लाल रंग द्वारा संस्कार किया जाता है, उसीमें ललाई होती है,
उसी प्रकार जिस संतानमें कर्मवासना उत्पादित की गई होती है, उसी ( संतान ) में कर्मवासनाका
फल रहता है” ।
इस प्रकार कपासमें रक्तताका दृष्टांत विद्यमान है।
१. कार्यकारणभावप्रतिनियमादेव स्मृत्यभावोऽपि निरस्तः । न स्मर्त्ता कश्चिदिह विद्यते । किं तर्हि स्मरणमेव
केवलमारोपवशात् । अनुभूते हि वस्तुनि विज्ञानसंताने स्मृतिबीजाधानात्कालान्तरेण संततिपरिपाकहेतोः
स्मरणं नाम कार्यमुत्पद्यते । बोधिचर्यावतारपञ्जिकायां पृ. ४१५ ।