स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ श्रीमद्द्वाजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १९
अथ ताथागताः क्षणक्षयपक्षे सर्वव्यवहारानुपपत्तिं परैरुद्भावितामाकर्ण्य इत्थं प्रतिपाद-
यन्ति—यत् सर्वपदार्थानां क्षणिकत्वेऽपि वासनावललब्धजन्मना ऐक्याध्यवसायेन ऐहिका-
मुष्मिकव्यवहारप्रवृत्तेः कृतप्रणाशादिदोषा निरवकाशा एव इति । तदाकूतं परिहर्तुकामस्तत्क-
ल्पितवासनायाः क्षणपरम्परातो भेदाभेदानुभयलक्षणे पक्षत्रयेऽप्यघटमानत्वं दर्शयन् स्वाभि-
प्रेतभेदाभेदस्याद्वादमकामयमानानपि तानङ्गीकारयितुमाह—
सा वासना सा क्षणसन्ततिश्च नामेदभेदानुभयैर्घटेते ।
ततस्तदादर्शिशकुन्तपोतन्यायात्त्वदुक्तानि परे श्रयन्तु ॥१९॥
सा शाक्यपरिकल्पिता त्रुटितमुक्तावलीकल्पानां परस्परविशकलितानां क्षणानामन्योन्या-
नुस्यूतप्रत्ययजनिका एकसूत्रस्थानीया सन्तानापरपर्याया वासना । वासनेति पूर्वज्ञानजनिता-
मुत्तरज्ञाने शक्तिमाहुः । सा च क्षणसन्ततिस्तद्दर्शनप्रसिद्धा प्रदीपकलिकावत् नवनवोत्पद्यमाना-
परापरसदृशक्षणपरम्परा । एते द्वे अपि अभेदभेदानुभयैर्न घटेते ॥
न तावदभेदेन तादात्म्येन ते घटेते । तयोर्हि अभेदे वासना वा स्यात् क्षणपरम्परा वा,
बौद्ध—पदार्थोंके क्षणस्थायी होनेपर भी वासनासे उत्पन्न होनेवाले अभेद ज्ञानसे इस लोक और
परलोक संबंधी व्यवहार चल सकता है, अतएव 'कृतकर्मप्रणाश' आदि दोष हमारे सिद्धांतमें नहीं आ सकते ।
जैन—आप लोग जिस वासनाको स्वीकार करते हैं, वह कल्पित वासना क्षणपरम्परासे भिन्न, अभिन्न,
अथवा न भिन्न और न अभिन्न, ( अनुभय ) किसी भी तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव हमारे द्वारा
अभिप्रेत स्याद्वादके भेदाभेदको ही स्वीकार करना चाहिये—
श्लोकार्थ—वासना और क्षणसंतति परस्पर भिन्न, अभिन्न, और अनुभय—तीनों प्रकारसे किसी भी
तरह सिद्ध नहीं होती । अतएव जिस प्रकार समुद्रमें, जहाजसे उड़ा हुआ पक्षी समुद्रका किनारा न देखकर
पीछे जहाजपर ही लौट आता है, उसी तरह उपायान्तर न होनेसे हे भगवन् ! बौद्ध लोगोंको आपके ही सिद्धा-
न्तोंका आश्रय लेना चाहिये ।
व्याख्यार्थ—जिसका अपर नाम संतान है, ऐसी बौद्धों द्वारा कल्पित वासना, त्रुटित मुक्तावलिके
भिन्न-भिन्न मोतियोंके समान, परस्पर भिन्न क्षण एक दूसरेसे अनुस्यूत हुए हैं, इस प्रकारका ज्ञान उत्पन्न
करनेवाली—एक सूत्रके समान होती है। पूर्व ज्ञानक्षणसे उत्तर ज्ञानक्षणमें उत्पन्न की हुई शक्तिको वासना
कहते हैं। दीपककी लौके समान नये नये उत्पन्न होनेवाले अपर अपर सदृश पूर्व और उत्तर क्षणोंकी परम्परा-
को क्षणसंतति कहते हैं । ( जिस प्रकार दीपककी लौके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहने पर भी लौके पूर्व और
उत्तर क्षणोंमें परस्पर सदृश ज्ञान होनेके कारण, यह वही लौ है, ऐसा ज्ञान होता है; उसी तरह पदार्थोंके
प्रत्येक क्षणमें बदलते रहनेपर भी पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सदृश ज्ञान होनेके कारण यह वही पदार्थ
है, ऐसा ज्ञान होता है । इसे ही बौद्ध मतमें क्षणसंतति कहा है । ) यह वासना और क्षणसंतति परस्पर
भिन्न, अभिन्न, अथवा अनुभय रूपसे किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती ।
(१) वासना ( संतति ) और क्षणसंततिको परस्पर अभिन्न मानना ठीक नहीं । क्योंकि वासना
१. यथा बीजादिष्वात्मानमन्तरेणापि प्रतिनियमेन कार्यं तदुत्पत्तिश्च क्रमेण भवति, तथा प्रकृतेऽपि परलोक-
गामिनमेकं विनापि कार्यकारणभावस्य नियामकत्वात्प्रतिनियतमेव फलं । क्लेशकर्माभिसंस्कृतस्य संतान-
स्याविच्छेदेन प्रवर्तनात् परलोके फलप्रतिलम्भोऽभिधीयते । इति नाकृताभ्यागमो न कृतविप्रणाशो बाधकं ।
बोधिचर्यावतारपंजिका पृ. ४७३ । अत्र शान्तरक्षितकृततत्त्वसंग्रहे कर्मफलसम्बन्धपरीक्षोनामप्रकरणम्
अवलोकयितव्यम् ।