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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 458 में से

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पृष्ठ 222

१७० श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
वेत्यादौ शरीराश्रयतयाप्युपपत्तेः । किञ्च, यद्ययमहङ्कारप्रत्यय आत्मगोचरः स्यात् तदा न
कादाचित्कः स्यात् । आत्मनः सदा सन्निहितत्वात् । कादाचित्कं हि ज्ञानं, कादाचित्ककारण-
पूर्वकं दृष्टम् । यथा सौदामिनीज्ञानमिति । नाप्यनुमानेन, अव्यभिचारिलिङ्गाग्रहणात् । आग-
मानां च परस्परविरुद्धार्थवादिनां नास्त्येव प्रामाण्यम् । तथाहि । एकेन कथमपि कश्चिदर्थो
व्यवस्थापितः, अभियुक्ततरेणापरेण स एवान्यथा व्यवस्थाप्यते । स्वयमव्यवस्थितप्रामाण्यानां
च तेषां कथमन्यव्यवस्थापने सामर्थ्यम् । इति नास्ति प्रमाता ॥
प्रमेयं च बाह्योऽर्थः, स चानन्तरमेव बाह्यार्थप्रतिक्षेपक्षणे निर्लोठितः । प्रमाणं च
स्वपरावभासि ज्ञानम् । तच्च प्रमेयाभावे कस्य ग्राहकमस्तु, निर्विषयत्वात् । किंच, एतत् अर्थ-
समकालम्, तद्भिन्नकालं वा तद्ग्राहकं कल्प्येत ? आद्यपक्षे, त्रिभुवनवर्तिनोऽपि पदार्थास्तत्राव-
भासेरन्, समकालत्वाविशेषात् । द्वितीये तु, निराकारम् साकारम् वा तत्स्यात् ? प्रथमे, प्रति-
नियतपदार्थपरिच्छेदानुपपत्तिः । द्वितीये तु, किमियमाकारो व्यतिरिक्तो अव्यतिरिक्तो वा
ज्ञानात् ? अव्यतिरेके, ज्ञानमेवायम्, तथा च निराकारपक्षदोषः । व्यतिरेके, यद्ययं चिद्रू-
पस्तदानीमाकारोऽपि वेदकः स्यात् । तथा चायमपि निराकारः साकारो वा तद्वेदको भवेत् ?
'मैं काला हूँ' इस प्रकारका ज्ञान शरीरमें भी होता है। तथा, यदि 'अहं प्रत्यय' से आत्माका ज्ञान
होता है, तो यह 'अहं प्रत्यय' आत्मामें सदा होना चाहिये, कभी-कभी नहीं। क्योंकि आत्मा सदा
विद्यमान है। ज्ञान सदा विद्यमान नहीं रहता, इसलिये वह कभी-कभी उत्पन्न होता है; बिजली-
के ज्ञानकी तरह ज्ञान अनित्य कारणोंसे ही उत्पन्न होता है। अतएव आत्मामें सदा ही 'अहं प्रत्यय'
होना चाहिये। अनुमानसे भी आत्मा सिद्ध नहीं होती। क्योंकि आत्माको ग्रहण करनेवाला कोई निर्दोष
हेतु नहीं है। तथा, आगम परस्पर विरुद्ध अर्थके प्रतिपादन करनेवाले हैं, इसलिये आगमसे भी आत्माका
अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। तथाहि—जिस पदार्थको एक शास्त्र अमुक प्रकारसे प्रतिपादन करता
है, उसी पदार्थको दूसरा दूसरी तरहसे कहता है। अतएव आगमके स्वयं अव्यवस्थित होनेके कारण आगमसे
दूसरे तत्त्वोंकी व्यवस्था नहीं बन सकती। अतएव प्रमाता आत्माका अस्तित्व मानना ठीक नहीं है।
( ख ) जिसे प्रमेय कहते हैं वह वाह्य अर्थ है। वाह्य अर्थका परिहार करते समय उसकी खंडन
किया जा चुका है।
( ग ) स्व और परके जाननेवाले ज्ञानको प्रमाण अर्थात् प्रमिति क्रिया का कारण, कहते हैं।
प्रमेयके अभावमें प्रमाणभूत ज्ञानके विषयका अभाव हो जानेसे, वह प्रमाणभूत ज्ञान किसका ग्राहक
होगा, क्योंकि उसके पास कोई विपय ही नहीं है। तथा, अर्थके अस्तित्वकालमें विद्यमान ज्ञान पदार्थको
जानता है, अथवा जिस कालमें अर्थका सद्भाव होता है, उससे भिन्नकालमें प्रमाणभूत ज्ञान पदार्थको
जानता है ? प्रथम पक्ष स्वीकार करनेपर तीनों लोकोंके पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित होने चाहिये, क्योंकि
ज्ञान सभी पदार्थोंके समकालीन है। द्वितीय पक्षमें, वह ज्ञान निराकार (ज्ञेयाकार शून्य) होता है या
ज्ञेयाकार सहित ? यदि पदार्थके सद्भावके भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान निराकार है तो प्रतिनियत पदार्थके
ज्ञानकी सिद्धि न हो सकेगी। यदि पदार्थके सद्भावकालसे भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान साकार (पदार्थके
आकारवाला) है तो वह पदार्थका आकार ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न ? यदि पदार्थके सद्भावकालसे
भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे पदार्थोंका आकार भिन्न न हो तो यह पदार्थका आकार ज्ञानरूप ही होगा,
और पदार्थका आकार ज्ञानरूप होनेसे निराकार पक्षमें जो दोष आता है, वही दोष यहाँ भी उपस्थित होगा;
अर्थात् प्रतिनियत पदार्थके ज्ञानकी सिद्धि नहीं होगी। यदि पदार्थके कालसे भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे
पदार्थका आकार भिन्न है तो वह चिद्रूप है या अचिद्रूप ? यदि यह आकार चिद्रूप है तो वह-पदार्थके आकारका
भी ज्ञाता होगा। तथा, पदार्थके आकारका ज्ञाता होनेपर, यह आकार निराकार अथवा साकार होता हुआ