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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 458 में से

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पृष्ठ 236

१८४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १८
इति । कर्पासे रक्तादृष्टान्तोऽस्तीति चेत्, तदसाधीयः, साधनदूषणयोरसम्भवात् । तथाहि—
अन्वयाद्यसम्भवान्न साधनम् । न हि कार्यकारणभावो यत्र तत्र स्मृतिः कर्पासे रक्ततावदित्य-
न्वयः सम्भवति । नापि यत्र न स्मृतिस्तत्र न कार्यकारणभाव इति व्यतिरेकोऽपि । असिद्ध-
त्वाद्यनुद्भावनाच्च न दूषणम् । न हि ततोऽन्यत्वात् इत्यस्य हेतोः कर्पासे रक्ततावत् इत्यनेन
कश्चिद्दोषः प्रतिपाद्यते ॥
किञ्च, यद्यनन्वयत्वेऽपि कार्यकारणभावेन स्मृतेरुत्पत्तिरिष्यते, तदा शिष्याचार्यादि-
बुद्धीनामपि कार्यकारणभावसद्भावेन स्मृत्यादिः स्यात् । अथ नायं प्रसङ्गः, एकसंतानत्वे
सतीतिविशेषणादिति चेत्, तदप्युक्तं, भेदाभेदपक्षाभ्यां तस्योपक्षीणत्वात् । क्षणपरम्परातस्त-
स्याभेदे हि क्षणपरम्परैव सा । तथा च संतान इति न किञ्चिदतिरिक्तमुक्तं स्यात् । भेदे तु
पारमार्थिकः अपारमार्थिको वासौ स्यात् ? अपारमार्थिकत्वेऽस्य दूषणं, अकिंचित्करत्वात् ।
पारमार्थिकत्वे स्थिरो वा स्यात् क्षणिको वा ? क्षणिकत्वे संताननिर्विशेष एवायम्, इति किम-
नेन स्तेनभीतस्य स्तेनान्तरशरणस्वीकरणानुकरिणा । स्थिरश्चेत् आत्मैव संज्ञाभेदतिरोहितः
प्रतिपन्नः । इति न स्मृतिर्घटते क्षणक्षयवादिनाम् ॥
समाधान—यह ठीक नहीं है । क्योंकि पूर्वोत्तर बुद्धिक्षणोंमें (बौद्धों द्वारा मान्य ) कार्य-कारण
भाव रूप हेतुसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी, न इस दृष्टांतसे सिद्धि होती है और न वह साध्य
दूषित ही होता है । तथाहि—बुद्धिके पूर्वोत्तरक्षणोंमें होनेवाला कार्य-कारण भाव रूप हेतु और स्मृति इनमें
अन्वय-व्यतिरेक संभव न होनेसे स्मृतिकी उत्पत्ति होना रूप साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'जहाँ कार्य-कारण
भाव होता है, वहाँ स्मृतिका सद्भाव होता है, जैसे कपासमें रक्तता,' तथा 'जहाँ स्मृति नहीं होती, वहाँ
कार्य-कारण भाव भी नहीं होता' इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक सम्बन्ध नहीं बनते । इस प्रकार
स्मृतिरूप साध्य और कार्य-कारण भाव रूप हेतु इनमें अन्वय-व्यतिरेक न बननेसे उस हेतुसे स्मृतिरूप
साध्यकी सिद्धि नहीं होती । 'उससे अर्थात् पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके असिद्धत्व आदि
दोषोंका प्रकटीकरण न होनेसे यह हेतु दूषित नहीं है । 'पूर्वबुद्धिसे उत्तरबुद्धि भिन्न होनेसे' इस हेतुके विषयमें
'जैसे कपासमें रक्तता' इस दृष्टांतके द्वारा किसी दोषका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।
तथा, 'जहाँ कार्य-कारण भाव होता है वहाँ स्मृति होती है'—इस प्रकार कार्य-कारण भावमें और
स्मृतिमें अन्वयका अभाव होनेपर भी, यदि उत्तर बुद्धिक्षण और पूर्व बुद्धिक्षणमें कार्य-कारण भाव होनेसे
स्मृतिकी उत्पत्तिका इष्ट होना माना गया, तो शिष्यबुद्धि और आचार्यबुद्धिमें, आचार्यबुद्धिके कारण और शिष्य-
बुद्धिके कार्य होनेसे, कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृतिका सद्भाव हो जायेगा । 'शिष्यबुद्धिमें और आचार्यबुद्धिमें
अन्वयका अभाव होनेपर भी उनमें कार्य-कारण भाव होनेसे स्मृति आदिके सद्भाव होनेका प्रसंग उपस्थित
नहीं होता; क्योंकि शिष्य और आचार्य ये दो भिन्न संतान हैं, और हमने 'एक संतानत्व' ( एक संतानत्वे
सति ) विशेषणका प्रयोग किया है ।' यह भी ठीक नहीं । क्योंकि भेदपक्ष औरअ भेदपक्षके द्वारा 'एक-
संतानत्व' विशेषण क्षीण हो जाता है—अकिंचित्कर बन जाता है । क्षण परंपरासे उस 'एकसंतानत्व' को
अभिन्न माननेपर वह क्षणपरंपरारूप ही होगा । इस प्रकार संतानके क्षणपरंपरारूप होनेसे, संतानको
क्षणपरंपरा ( संतानी ) ही कहना चाहिये, संतान नहीं । यदि संतान और क्षणपरंपराको भिन्न मानो, तो
यह संतान वास्तविक है, या अवास्तविक ? यदि यह अवास्तविक है, तो वह अकिंचित्कर होनेसे दूषित
है। यदि संतान वास्तविक है, तो वह स्थिर है, या क्षणिक ? यदि क्षणपरंपरासे भिन्न संतान क्षणिक है,
तो यह संतान क्षणपरंपरासे अभिन्न ही है । इस प्रकार क्षणपरंपराको छोड़कर संतानका आश्रय लेना,
एक चोरके भयसे दूसरे चोरके आश्रय लेनेके समान है। यदि वास्तविक संतानको स्थिर मानो, तो फिर
संतान-संज्ञासे तिरोहित आत्मा स्वीकार करनेमें ही क्या दोष है ? अतएव क्षणिकवादियोंके मतमें स्मृति
भी नहीं बनती ।