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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 458 में से

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पृष्ठ 228

१७६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
“देशतो नाशिनो भावा दृष्टा निखिलनश्वराः ।
मेघपङ्क्त्यादयो यद्वत् एवं रागादयो मताः ॥”
इति । यस्य च निरवयवतयैते विलीनाः स एवाप्तो भगवान् सर्वज्ञः ॥
अथ अनादित्वाद् रागादीनां कथं प्रक्षयः इति चेत् । न । उपायतस्तद्भावात् । अनादे-
रपि सुवर्णमलस्य क्षारमृत्पुटपाकादिना विलयोपलम्भात् । तद्वद्देवानादीनामपि रागादिदो-
षाणां प्रतिपक्षभूतरत्नत्रयाभ्यासेन विलयोपपत्तेः । क्षीणदोषस्य च केवलज्ञानाव्यभिचारात्
सर्वज्ञत्वम् ॥
तत्सिद्धिरस्तु-ज्ञानतारतम्यं क्वचिद् विश्रान्तम्, तारतम्यत्वात्, आकाशे परिमाणतार-
तम्यवत् । तथा सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः कस्यचित्प्रत्यक्षाः, अनुमेयत्वात्, क्षितिधरकन्दराधिकरण-
धूमध्वजवत् । एवं चन्द्रसूर्ययोपरागादिसूचकज्योतिर्ज्ञाना विसंवादान्यथानुपपत्तिप्रभृतयोऽपि
हेतवो वाच्याः । तदेवमाप्तन सर्वविदा प्रणीत आगमः प्रमाणमेव । तदप्रामाण्यं हि प्रनायक-
दोषनिबन्धनम् ।
“रागाद्वा द्वेषाद्वा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम् ।
दोष क्षय हो गये हों, उसे आप्त कहते हैं, ऐसा आप्त होना संभव नहीं है। समाधान-राग आदि दोष
किसी जीवमें सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि हमलोगोंमें राग आदि दोषोंकी हीनाधिकता देखी जाती है।
जिसकी हीनाधिकता देखी जाती है, उसका सर्वथा नाश होना संभव है। जिस प्रकार सूर्यको आच्छादित करने-
वाले बादलोंमें हीनाधिकता पायी जाती है, इसलिये कहीं पर बादलोंका सर्वथा नाश भी संभव है, इसी तरह
राग आदि दोषोंमें हीनाधिकता रहनेके कारण कहीं पर राग आदिका सर्वथा विनाश भी संभव है।
कहा भी है—
“जो पदार्थ एक देशसे नाश होते हैं, उनका सर्वथा नाश भी होता है। जिस प्रकार मेघोंके पटलों
का आंशिक नाश होनेसे उनका सर्वथा नाश भी होता है, इसी प्रकार राग आदिका आंशिक नाश होनेसे
उनका भी सर्वथा नाश होता है।”
जिस पुरुषविशेषमें राग आदिका सम्पूर्ण रीतिसे नाश हो जाता है, वही पुरुष विशेष आप्त भगवान्
सर्वज्ञ है।
शंका-राग आदि दोष अनादि हैं, इसलिये उनका क्षय नहीं हो सकता। समाधान-जिस
प्रकार अनादि सुवर्णके मैलका खार मिट्टीके पुटपाक आदिसे नाश हो जाता है, उसी तरह अनादि राग
आदि दोषोंका सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रयकी भावनासे नाश हो जाता है। जिस
पुरुषके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं, उसके केवलज्ञानकी उत्पत्ति होती है, अतएव वीतराग भगवान् सर्वज्ञ हैं।
सर्वज्ञसिद्धि-(क) ज्ञानकी हानि और वृद्धि किसी जीवमें सर्वोत्कृष्ट रूपमें पायी नहीं जाती है,
हानि, वृद्धि होनेसे। जैसे आकाशमें परिमाणकी सर्वोत्कृष्टता पायी जाती है, वैसेही ज्ञानकी सर्वोत्कृष्टता
सर्वज्ञमें पायी जाती है। (ख) स्वभावसे दूर परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थ, देशसे दूर सुमेरु पर्वत आदि,
तथा कालसे दूर राम, रावण आदि किसीके प्रत्यक्ष होते हैं, अनुमेय होनेसे। जो अनुमेय होते हैं, वे
किसीके प्रत्यक्ष होते हैं। जिस प्रकार पर्वतकी गुफाकी अग्नि अनुमानका विषय होनेसे किसी न किसीके
प्रत्यक्ष होती है, इसी प्रकार हमारे प्रत्यक्षज्ञानके बाह्य परमाणु आदि किसी न किसीके प्रत्यक्ष अवश्य होने
चाहिये। इसी प्रकार चन्द्र और सूर्यके ग्रहणको बतानेवाले ज्योतिषशास्त्रकी सत्यता आदिसे भी सर्वज्ञकी
होती है। इसलिये सर्वज्ञ आप्तका बनाया हुआ आगम ही प्रमाण है। जिस आगमका बनानेवाला सदोष
होता है, वही आगम अप्रमाण होता हैं। कहा भी है—
१. उपरागो ग्रहो राहुग्रस्ते त्विन्दौ च पूष्णि च । इत्यमरः ।