स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
तत् शून्यम् वा अशून्यम् वा ? । शून्यं चेत्, सर्वोपाख्याविरहितत्वात् खपुष्पेणेव नानेन
किञ्चित्साध्यते निषिध्यते वा । ततश्च निष्प्रतिपक्षा प्रमाणादितत्त्वचतुष्टयीव्यवस्था । अशून्यं
चेत्, प्रलीनस्तपस्वी शून्यवादः । भवद्वचनेनैव सर्वशून्यताया व्यभिचारात् । तत्रापि निष्कण्ट-
कैव सा भगवती । तथापि प्रामाणिकसमयपरिपालनाथं किञ्चित् तत्साधनं दूष्यते ॥
तत्र यत्तावदुक्तम् प्रमातुः प्रत्यक्षेण न सिद्धिः, इन्द्रियगोचरातिक्रान्तत्वादिति, तत्सिद्ध-
साधनम् । यत्पुनः अहंप्रत्ययेन तस्य मानसप्रत्यक्षत्वमनैकान्तिकमित्युक्तम् तदसिद्धम् । अहं
सुखी अहं दुःखी इति अन्तर्मुखस्य प्रत्ययस्यात्मालम्बनतयैवोपपत्तेः । तथा चाहुः—
“सुखादि चेत्यमानं हि स्वतंत्रं नानुभूयते ।
मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥
इदं सुखमिति ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥” १
यत्पुनः अहं गौरः श्यामः इत्यादिबहिर्मुखः प्रत्ययः स खल्वात्मोपकारकत्वेन लक्षणाय
शरीरे प्रयुज्यते । यथा प्रियभृत्येऽहमित्यपदेशः ॥ २
स्वयं शून्यरूप है, या अशून्यरूप ? यदियह वाक्य शून्यरूप है, तो समस्त इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य न होनेसे खरविषाणकी
तरह इस वचनके द्वारा न किसीकी सिद्धि हो सकती है, और न किसीका निषेध किया जा सकता है । अतएव
प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता इस प्रमाण चतुष्टयका निर्णय निर्विरोध सिद्ध हो जाता है । यदि कहो कि
उक्त वाक्य अशून्यरूप हैं, तो तपस्वी शून्यवाद ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि शून्यवादियोंके वचनोंको अशून्य
माननेसे सर्वशून्यता नहीं बन सकती । अतएव प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता ये चारों निर्बाध सिद्ध
हो जाते हैं ।
( क )—आप लोगोंने जो कहा कि 'प्रमाता इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिए प्रमाता प्रत्यक्षसे सिद्ध
नहीं होता' सो हम भी आत्माको प्रत्यक्षका विषय नहीं मानते, अतएव उक्त कथन हमारे लिये सिद्धसाधन है ।
( ख ) 'अहं प्रत्यय' से मानस प्रत्यक्षद्वारा आत्माका अस्तित्व स्वीकार करनेमें 'अनैकांतिक दोष' नहीं
आता, क्योंकि 'मैं सुखी हूँ,' 'मैं दुखी हूँ' इस प्रकारका अंतरंग ज्ञान आत्मा ही के आधारसे होता है ।
कहा भी है—
“जिसका अनुभव किया जाता है, ऐसे सुख आदिका अनुभव स्वतंत्ररूपसे अर्थात् आत्माके विना
नहीं किया जाता । 'सुखी' शब्द मत्वर्थीय इन् प्रत्यय लगनेसे बना है । 'सुखमस्यास्मिन्नास्तीतिसुखी' इस
निरुक्तिमें जो 'अस्य' पद है वह सुखके आश्रयभूत आत्माका ज्ञान कराता है । अतः मतुप् प्रत्ययसे सुखके
आश्रयभूत आत्मपदार्थका सूचन होनेसे, 'सुखी' .शब्दसे आत्माका ग्रहण होता है ।। जिस प्रकार यह घट है'
ऐसा कहनेसे घट पदार्थ दिखाई देता है, उसो प्रकार 'यह सुख है' ऐसा कहने पर सुख दिखाई नहीं
देता । अतः 'मैं सुखी हूँ' यह ज्ञान आत्माको भी प्रकाशित करता है ।”
तथा 'मै गोरा हूँ, मैं काला हूँ' इत्यादि रूप जो बहिर्मुख ज्ञान होता है, वह इसी आत्माका उपकार
( सुख-दुख आदिका अनुभव करनेमें सहकारी ) होनेसे, लक्षणके द्वारा, शरीरके विषयमें प्रयुक्त किया जाता
१. न्यायमंजर्याम् ।
२. मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् ।
अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ।
—काव्यप्रकाशे मम्मटः ।