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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

२४४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
संग्रहस्तु अशेषविशेषतिरोधानद्वारेण सामान्यरूपतया विश्वमुपादत्ते । एकच्च सामान्यैकान्तवादे
प्राक् प्रपञ्चितम् ॥
व्यवहारस्त्वेवमाह यथा—लोकग्राह्यमेव वस्तु अस्तु, किमनया अदृष्टान्यवह्रियमाणवस्तु-
परिकल्पनकष्टसृष्टिकया । यदेव च लोकव्यवहारपथमवतरति तस्यैवानुग्राहकं प्रमाणमुपलभ्यते
नेतरस्य । न हि सामान्यमनादिनिधनमेकं संग्रहाभिमतं प्रमाणभूमिः, तथानुभवाभावात् ।
सर्वस्य सर्वदर्शित्वप्रसङ्गाच्च । नापि विशेषाः परमाणुलक्षणाः क्षणक्षयिणः प्रमाणगोचराः,
तथा प्रवृत्तेरभावात् । तस्माद् इदमेव निखिललोकाबाधितं प्रमाणप्रसिद्धं कियत्कालभाविस्थू-
लतामाबिभ्राणमुदकाद्याहरणार्थक्रियानिर्वर्तनक्षमं घटादिकं वस्तुरूपं पारमार्थिकम् ।
पूर्वोत्तरकालभावितत्पर्यायपर्यालोचना पुनरज्यायसी, तत्र प्रमाणप्रसराभावात् । प्रमाणमन्तरेण
विचारस्य कर्तुमशक्यत्वात् । अवस्तुत्वाच्च तेषां किं तद्गोचरपर्यालोचनेन । तथाहि—पूर्वोत्तर-
कालभाविनो द्रव्यविवर्ताः क्षणक्षयिपरमाणुलक्षणा वा विशेषा न कथंचन लोकव्यवहारमुपर-
चयन्ति । तन्न ते वस्तुरूपाः । लोकव्यवहारोपयोगिनामेव वस्तुत्वात् । अत एव पन्था
गच्छति, कुण्डिका स्रवति, गिरिर्दह्यते, मञ्चाः क्रोशन्ति इत्यादिव्यवहाराणां प्रामाण्यम् । तथा
च वाचमुख्यः—"लौकिकसम उपचारप्रायो विस्तृतार्थो व्यवहारः" १इति ॥
ऋजुसूत्रः पुनरिदं मन्यते—वर्तमानक्षणविवर्त्येव वस्तुरूपम् । नातीतमनागतं च ।
अतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्मलाभत्वात् खरविषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया
(२) विशेषोंकी अपेक्षा न करके वस्तुको सामान्यसे जाननेको संग्रह नय कहते हैं। इसका निरूपण
(चौथे, पाँचवें श्लोकमें) सामान्य एकान्तका प्ररूपण करते समय किया जा चुका है।
(३) जितनी वस्तु लोकमें प्रसिद्ध हैं, अथवा लोकव्यवहारमें आती हैं, उन्हींको मानना, और
अदृष्ट और अव्यवहार्य वस्तुओंकी कल्पना निष्प्रयोजन है। संग्रह नयसे जाना हुआ अनादि निधन रूप
सामान्य व्यवहार नयका विषय नहीं हो सकता, क्योंकि इस सामान्यका सर्व साधारणको अनुभव
नहीं होता। यदि इस सामान्यका सब लोगोंको अनुभव होने लगे, तो सब लोग सर्वज्ञ हो जायें।
इसी प्रकार क्षण-क्षणमें नष्ट होने वाले परमाणु रूप विशेष भी प्रमाणके विषय नहीं हो सकते,
क्योंकि परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थ हमारे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणके बाह्य होनेसे हमारी प्रवृत्तिके विषय नहीं
हैं। अतएव व्यवहार नयकी अपेक्षा कुछ समयके तक रहनेवाली स्थूल पर्यायको धारण करनेवाला और जल-
धारण आदि क्रियाओंके करनेमें समर्थ घट आदि वस्तु ही पारमार्थिक और प्रमाणसे सिद्ध हैं, क्योंकि इनके
माननेमें कोई लोक विरोध नहीं आता। इसलिये घटका ज्ञान करते समय घटकी पूर्व और उत्तर कालकी
पर्यायोंका विचार करना व्यर्थ है, क्योंकि सूक्ष्म पर्याय प्रमाणसे नहीं जानी जाती। तथा, ये पूर्वोत्तर पर्याय
अवस्तु हैं। पूर्व और उत्तर कालमें होनेवाली द्रव्यकी पर्याय अथवा क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले विशेष रूप
परमाणु लोकव्यवहारमें उपयोगी न होनेसे अवस्तु हैं। क्योंकि जो लोकव्यवहारमें उपयोगी होता है, उसे
ही वस्तु कहते हैं। अतएव 'रास्ता जाता है, कुंड बहता है, पहाड़ जलता है, मंच रोते हैं' आदि व्यवहार
भी लोकपयोगी होनेसे प्रमाण हैं। वाचकमुख्यने कहा भी है—"लोकव्यवहारके अनुसार उपचारित अर्थको
बतानेवाले विस्तृत अर्थको व्यवहार कहते हैं।"
(४) वस्तुकी अतीत और अनागत पर्यायोंको छोड़कर वर्तमान क्षणकी पर्यायोंको जानना ऋजुसूत्र
नयका विषय है। वस्तुकी अतीत पर्याय नष्ट हो जाती है, और अनागत पर्याय उत्पन्न नहीं होती, इसलिये
अतीत और अनागत पर्याय खरविषाणकी तरह सम्पूर्ण सामर्थ्यसे रहित होकर कोई अर्थक्रिया नहीं कर
१. तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये १-३५ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४५
सकलशक्तिविरहरूपत्वात् नार्थक्रियानिर्वर्तनक्षमत्वम् तदभावाच्च न वस्तुत्वं । “यदेवार्थ-
क्रियाकारि तदेव परमार्थसत्” इति वचनात् । वर्तमानक्षणालिङ्गितं पुनर्वस्तुरूपं समस्तार्थ-
क्रियासु व्यापियत इति तदेव पारमार्थिकम् । तदपि च निरंशमभ्युपगन्तव्यम् अंशव्याप्तेर्युक्ति-
रिक्तत्वात् । एकस्य अनेकस्वभावतामन्तरेण अनेकस्यावयवव्यापनायोगात् अनेकस्वभावता
एवास्तु इति चेत् । न । विरोधव्याप्तान्नाप्तत्वात् । तथाहि—यदि एकः स्वभावः कथमनेकः
अनेकश्चेत्कथमेकः एकानेकयोः परस्परपरिहारेणावस्थानात् । तस्मात् स्वरूपनिमग्नाः परमाणव
एव परस्परोपसर्पणद्वारेण कथंचिन्निचयरूपतामापन्ना निखिलकार्येषु व्यापारभाज इति त एव
स्वलक्षणं न स्थूलतां धारयत् पारमार्थिकमिति । एवमस्याभिप्रायेण यदेव स्वकीयं तदेव वस्तु
न परकीयम्, अनुपयोगित्वादिति ॥
शब्दस्तु रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिदर्थे प्रवर्तन्ते, यथा इन्द्रशक्रपुरन्दरादयः
सुरपतौ तेषां सर्वेषामप्येक मर्थमभिप्रैति किल, प्रतितिवशाद् । यथा शब्दादन्यतिरेकोऽर्थस्य
प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वमनेकत्वं वा प्रतिपादनीयम् । न च इन्द्रशक्रपुरन्दरादयः पर्यायशब्दा
विभिन्नार्थवाचितया कदाचन प्रतीयन्ते । तेभ्यः सर्वदा एकाकारपरामर्शोत्पत्तेरस्खलितवृत्तितया
तथैव व्यवहारदर्शनात् । तस्माद् एक एव पर्यायशब्दाना मर्थ इति शब्द्यते आहूयतेऽनेनाभि-
प्रायेणार्थः इति निरुक्तात् एकार्थप्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्यायध्वनीनां प्रयोगात् । यथा चायं
पर्यायशब्दानामेकमर्थमभिप्रैति तथा तटस्तटी तटम् इति विरुद्धलिङ्गलक्षणधर्माभिसम्बन्धाद्
वस्तुनो भेदं चाभिधत्ते । न हि विरुद्धधर्मकृतं भेदमनुभवतो वस्तुनो विरुद्धधर्मायोगो युक्तः ।
एवं सङ्ख्याकालकारकपुरुषादिभेदाद् अपि भेदोऽभ्युपगन्तव्यः । तत्र सङ्ख्या एकत्वादिः कालो-
ऽतीतादिः कारकं कत्र्रादि पुरुषः प्रथमपुरुषादिः ॥
सकती, इसलिये अवस्तु है। क्योंकि “अर्थक्रिया करनेवाला ही वास्तवमें सत् कहा जाता है।” वर्तमान
क्षणमें विद्यमान वस्तुसे ही समस्त अर्थक्रिया हो सकती है, इसलिये यथार्थमें वही सत् है। अतएव वस्तुका
स्वरूप निरंश मानना चाहिये, क्योंकि वस्तुको अंश सहित मानना युक्तिसे सिद्ध नहीं होता। शंका—एक
वस्तुके अनेक स्वभाव माने विना वह अनेक अवयवोंमें नहीं रह सकती, इसलिये वस्तुमें अनेक स्वभाव मानने
चाहिये। समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि यह माननेमें विरोध आता है। तथाहि—एक ओर अनेकमें
परस्पर विरोध होनेसे एक स्वभाववाली वस्तुमें अनेक स्वभाव, और अनेक स्वभाववाली वस्तुमें एक स्वभाव
नहीं बन सकते। अतएव अपने स्वरूपमें स्थित परमाणु ही परस्परके संयोगसे कथंचित् समूह रूप होकर
सम्पूर्ण कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा स्थूल रूपको धारण न करनेवाले स्वरूपमें
स्थित परमाणु ही यथार्थमें सत् कहे जा सकते हैं। अतएव ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा निज स्वरूप ही वस्तु है,
पर स्वरूपको अनुपयोगी होनेके कारण वस्तु नहीं कह सकते ।
(५) रूढिसे सम्पूर्ण शब्दोंके एक अर्थमें प्रयुक्त होनेको शब्द नय कहते हैं। जैसे शक्र, पुरन्दर—इन्द्र,
आदि सब शब्द एक अर्थके द्योतक हैं। जैसे, शब्द और अर्थका अभेद होता है, वैसे ही उसके एकत्व और
अनेकत्वका भी प्रतिपादन करना चाहिये। इन्द्र, शक्र और पुरन्दर आदि पर्यायवाची शब्द कभी भिन्न अर्थका
प्रतिपादन नहीं करते, क्योंकि उनसे एक ही अर्थका ज्ञान होता है। अतएव इन्द्र आदि पर्यायवाची शब्दोंका
एक ही अर्थ है। जिस अभिप्रायसे अर्थ कहा जाय, उसे शब्द कहते हैं। अतएव सम्पूर्ण पर्यायवाची शब्दोंसे
एक ही अर्थका ज्ञान होता है। जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर परस्पर पर्यायवाची शब्द एक अर्थको द्योतित
करते हैं, वैसे ही 'तट, तटी, तटम्' परस्पर विरुद्ध लिंगवाले शब्दोंसे पदार्थोंके भेदका ज्ञान होता है। इसी
प्रकार संख्या—एकत्व आदि, काल—अतीत आदि, कारक—कर्ता आदि, और पुरुष—प्रथम पुरुष आदिके
भेदसे शब्द और अर्थमें भेद समझना चाहिए।

२४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
समभिरूढस्तु पर्यायशब्दानां प्रविभक्तमेवार्थमभिमन्यते । तथ्यथा इन्दनात् इन्द्रः ।
पारमैश्वर्यम् इन्द्रशब्दवाच्यं परमार्थतस्तद्वत्यर्थे, अतद्वत्यर्थे पुनरुपचारतो वर्तते । न वा कश्चित्
तद्वान्, सर्वशब्दानां परस्परविभक्तार्थप्रतिपादितया आश्रयाश्रयिभावेन प्रवृत्त्यसिद्धेः । एवं
शकनात् शक्रः पूर्दारणात् पुरन्दर इत्यादिभिन्नार्थत्वं सर्वशब्दानां दर्शयति । प्रमाणयति च—
पर्यायशब्दा अपि भिन्नार्थाः, प्रविभक्तव्युत्पत्तिनिमित्तकत्वात् । इह ये ये प्रविभक्तव्युत्पत्ति-
निमित्तकास्ते ते भिन्नार्थकाः, यथा इन्द्रपशुरुषशब्दाः । विभिन्नव्युत्पत्तिनिमित्तकाश्च पर्याय-
शब्दा अपि । अतो भिन्नार्था इति ॥
एवम्भूतः पुनरेवं भाषते—यस्मिन् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्तिनिमित्तम् । अर्थो
यदैव प्रवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानमभिप्रैति, न सामान्येन । यथा उदकाद्याहरणवेलायां
योषिदादिमस्तकारूढो विशिष्टचेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते न शेषः, घटशब्दव्युत्पत्तिनिमित्त-
शून्यत्वात्, पटादिवद् इति । अतीतां भाविनीं वा चेष्टामङ्गीकृत्य सामान्यैनैवोच्यत इति चेत् ।
न । तयोर्विनष्टानुत्पन्नतया शशविषाणकल्पत्वात् तथापि तद्वारेण शब्दप्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्त-
यितव्यः, विशेषाभावात् । किंच यदि अतीतवर्त्स्यैच्चेष्टापेक्षया घटशब्दोऽचेष्टावत्यपि प्रयुज्येत
( ६ ) समभिरूढ़ नय पर्यायवाची शब्दोंमें भिन्न अर्थको द्योतित करता है। जैसे इन्द्र शक्र और
पुरन्दर शब्दोंके पर्यायवाची होनेपर भी इन्द्रसे परम ऐश्वर्यवान ( इन्दनात् इन्द्रः ), शक्रसे सामर्थ्यवान
( शकनात् शक्रः ) और पुरन्दरसे नगरोंको विदारण करनेवाले ( पूर्दारणात् पुरन्दरः ) भिन्न-भिन्न अर्थोंका
ज्ञान होता है। वास्तवमें इन्द्र शब्दके कहनेसे इन्द्र शब्दका वाच्य ( परम ऐश्वर्यवाले ) में ही मिल सकता
है। जिसमें परम ऐश्वर्य नहीं है, उसे केवल उपचारसे ही इन्द्र कहा जा सकता है। इसलिये वास्तवमें जो
परम ऐश्वर्यसे रहित है, उसे इन्द्र नहीं कह सकते । अतएव परस्पर भिन्न अर्थको प्रतिपादन करनेवाले
शब्दोंमें आश्रय और आश्रयी संबंध नहीं बन सकता । इसी तरह शक्र और पुरन्दर शब्द भी भिन्न अर्थको
द्योतित करते हैं। अतएव भिन्न व्युत्पत्ति होनेसे पर्यायवाची शब्द भिन्न भिन्न अर्थोंके द्योतक हैं। जिन
शब्दोंकी व्युत्पत्ति भिन्न भिन्न होती है, वे शब्द भिन्न भिन्न अर्थोंके द्योतक होते हैं, जैसे इन्द्र, पशु और पुरुष
शब्द । पर्यायवाची शब्द भी भिन्न व्युत्पत्ति होनेके कारण भिन्न अर्थको सूचित करते हैं।
( .७ ) एवंभूत नय ऐसा कहता है—जिस अर्थको लेकर शब्दकी व्युत्पत्ति की जाती है, वही अर्थ उस
शब्दकी व्युत्पत्ति—प्रवृत्ति—का निमित्त होता है। जिस समय अर्थ प्रवृत्त होता है, उस समय प्रवृत्त होता
हुआ उसे अभिप्रेत होता है, सामान्यतः नहीं। जैसे, जल लानेके समय स्त्रियोंके सिरपर रखे हुए विशिष्ट
क्रिया युक्त घड़ेको ही 'घट' कह सकते हैं, दूसरी अवस्थामें घड़ेको 'घट' नहीं कहा जा सकता । क्योंकि जिस
तरह पटको घट नहीं कहा जा सकता, उसी तरह घड़ा भी जल लाने आदिकी क्रिया रहित अवस्थामें घट
शब्दकी व्युत्पत्तिका निमित्त नहीं हो सकता । 'स्त्रियोंके सिर पर न रखे हुए और विशिष्ट क्रियासे रहित
पदार्थकी अतीत और अनागत विशिष्ट चेष्टा—क्रिया—को स्वीकार कर, वह दूसरा पदार्थ सामान्यतः घट कहा
जाता है'—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि उस दूसरे पदार्थकी अतीतकालीन चेष्टा नाश होने अथवा
अनागतकालीन चेष्टाके अनुत्पन्न होनेसे, ये चेष्टाएँ शशविषाणके सदृश होती हैं, अर्थात् उनका अभाव होता
है। दूसरे पदार्थकी अतीत चेष्टाका नाश अथवा अनागतकालीन चेष्टाकी अनुत्पत्ति होनेसे, उन चेष्टाओंका
अभाव होनेपर भी यदि उन चेष्टाओंके द्वारा उस दूसरे पदार्थको लेकर घट शब्द प्रवृत्त किया गया तो सभी
पदार्थोंको लेकर घट शब्दका व्यवहार करना चाहिये—सभी पदार्थोंको घट कहना चाहिये । क्योंकि जिस
प्रकार उस दूसरे पदार्थकी अतीत या अनागत चेष्टाओंका ( शब्दप्रवर्तन कालमें ) अभाव होता है, उसी
प्रकार ( शब्दप्रवर्तन कालमें ) अन्य सभी पदार्थोंकी अतीत या अनागत चेष्टाओंका अभाव होता है।
( तात्पर्य यह है कि जब प्रवृत्तिनिमित्तका अभाव होनेपर भी एक पदार्थको लेकर घट शब्दका व्यवहार

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४७
तदा कपालमृत्पिण्डादावपि तत्प्रवर्तनं दुर्निवारं स्याद्, विशेषाभावात् । तस्माद् यत्र क्षणे
व्युत्पत्तिनिमित्तमविकलमस्ति तस्मिन् एव सोऽर्थस्तच्छब्दवाच्य इति ॥
अत्र संग्रहश्लोकाः—
“अन्यदेव हि सामान्यभिन्नज्ञानकारणम् ।
विशेषोऽप्यन्य एवेति मन्यते नैगमो नयः ॥ १ ॥
सद्रूपतानतिक्रान्तं स्वस्वभावमिदं जगत् ।
सत्तारूपतया सर्वं संगृह्णन् संग्रहो मतः ॥ २ ॥
व्यवहारस्तु तामेव प्रतिवस्तु व्यवस्थिताम् ।
तथैव दृश्यमानत्वाद् व्यापारयति देहिनः ॥ ३ ॥
तत्रर्जुसूत्रनीतिः स्याद् शुद्धपर्यायसंश्रिता ।
नश्वरस्यैव भावस्य भावात् स्थितिवियोगतः ॥ ४ ॥
विरोधि लिङ्गसंख्यादिभेदाद् भिन्नस्वभावताम् ।
तस्यैव सन्मन्यानोऽयं प्रत्यवतिष्ठते ॥ ५ ॥
तथाविधस्य तस्यापि वस्तुनः क्षणवर्तिनः ।
ब्रूते समभिरूढस्तु संज्ञाभेदेन भिन्नताम् ॥ ६ ॥
एकस्यापि ध्वनेर्वाच्यं सदा तन्नोपपद्यते ।
क्रियाभेदेन भिन्नत्वाद् एवंभूतोऽभिमन्यते” ॥ ७ ॥
किया जाता है तो प्रवृत्तिनिमित्त का अभाव होनेपर अन्य सभी पदार्थोंको लेकर घट शब्दका व्यवहार क्यों
न किया जाये ?) यदि अतीत या अनागत चेष्टाओंकी अपेक्षासे वर्तमानकालीन चेष्टा रहित, उस दूसरे
पदार्थको लेकर घट शब्द प्रयुक्त किया जाता है तो कपाल और मृत्पिण्डमें भी घट शब्दका प्रयोग करना दुर्निवार
हो जायेगा । क्योंकि जिस प्रकार उस दूसरे पदार्थमें वर्तमानकालीन विशिष्ट चेष्टाका अभाव होता है तथा
भूत अथवा भविष्य कालमें चेष्टाका सद्भाव होता है, उसी प्रकार कपालमें भूतकालमें तथा मृत्पिण्डमें भविष्य
कालमें चेष्टाका सद्भाव और वर्तमानकालीन चेष्टाका अभाव होता है । अतएव जिस क्षणमें किसी शब्दकी
व्युत्पत्तिका निमित्त कारण भूत पदार्थ सम्पूर्ण रूपसे विद्यमान हो, उसी क्षणमें वह पदार्थके द्वारा वाच्य
होता है ।
यहाँ संग्रह श्लोक हैं—
“नैगम नयके अनुसार विशेष रहित सामान्य ज्ञानका कारणभूत (वस्तुगत) सामान्य भिन्न होता
है और विशेष भी भिन्न होता है ॥ १ ॥
अपने-अपने स्वभावमें स्थित सभी पदार्थ हैं अस्तित्व धर्मको नहीं छोड़ते हैं । इन सभी पदार्थोंका
सत्तारूपसे जो संग्रह करता है, उसे संग्रह नय कहते हैं ॥ २ ॥
सत्ताके समान दिखाई देनेवाली होनेके कारण प्रत्येक वस्तुमें विद्यमान रहनेवाली उस सत्ताके लिये—
अवान्तर सत्तावाले पदार्थोंके लिये—प्राणियोंको व्यवहार नय प्रवृत्त कराता है ॥ ३ ॥
स्थिति—ध्रौव्य—का अभाव (गौणत्व) होनेसे केवल नश्वर पर्यायका सद्भाव होनेके कारण, अर्थ-
क्रियाकारी होनेसे पारमार्थिक पर्यायका आश्रयी ऋजुसूत्र नय होता है ॥ ४ ॥
परस्पर विरोधी लिंग, संख्या आदिके भेदसे भिन्न-भिन्न धर्मोंको माननेवाला शब्द नय होता है ॥५॥
क्षणस्थायी वस्तुको भिन्न-भिन्न संज्ञाओंके भेदसे भिन्न मानना समभिरूढ नय है ॥ ६ ॥
वस्तु अमुक क्रिया करनेके समय ही अमुक नामसे कही जा सकती है, वह सदा एक शब्दका वाच्य
नहीं हो सकती, इसे एवंभूत नय कहते हैं ॥ ७ ॥”

२४८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
एत एव च परामर्शा अभिप्रेतधर्मावधारणात्मकतया शेषधर्मतिरस्कारेण प्रवर्तमाना दुर्नयसंज्ञा-
मश्नुवते । तद्बलप्रभावितसत्ताका हि खल्वेते परप्रवादाः । तथाहि—नैगमनयदर्शनानुसारिणौ
नैयायिकवैशेषिकौ । संग्रहाभिप्रायवृत्ताः सर्वेऽप्यद्वैतवादाः सांख्यदर्शनं च । व्यवहारनयानुपाति
प्रायश्चार्वाकदर्शनम् । ऋजुसूत्राकूतप्रवृत्तबुद्धयस्तथागताः शब्दादिनयावलम्बिनो
वैयाकरणादयः ॥
उक्तं च सोदाहरणं नयदुर्नयस्वरूपं श्रीदेवसूरिपादैः । तथा च तद्ग्रन्थेः— "नीयते येन
श्रुताख्यप्रमाणविषर्याकृतस्य अर्थस्य अंशस्तदितरांशौदासीन्यतः स प्रतिपत्तुर्भिप्रायविशेषो नयः
इति । स्वाभिप्रेताद् अंशाद् इतरांशपलावी पुनर्नयाभासः । स व्याससमासाभ्यां द्विप्रकारः ।
व्यासतोऽनेकविकल्पः २ । समासतस्तु द्विभेदो द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च ३ । आद्यो नैगमसंग्रह-
व्यवहारभेदात् त्रेधा । धर्मयोर्धर्मिणोर्धर्मधर्मिणोश्च प्रधानोपसर्जनभावेन यद्विवक्षणं स
नैकगमो नैगमः । सत् चैतन्यमात्मनीति धर्मयोः । वस्तुपर्यायवद्द्रव्यमिति धर्मिणोः । क्षणमेकं
सुखी विषयासक्तजीव इति धर्मधर्मिणोः धर्मद्वयादीनामैकान्तिकपार्थक्याभिसन्धिर्नैगमाभासः ।
यथा आत्मनि सत्त्वचैतन्ये परस्परमत्यन्तं पृथग्भूते इत्यादि । सामान्यमात्रग्राही परामर्शः
संग्रह

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २४९
मभिमन्यमानः परसंग्रहः । विश्वमेकं सद्विशेषादिति यथा । सत्ताद्वैतं स्वीकुर्वाणः सकल-
विशेषान् निराचक्षाणस्तदाभासः । यथा सत्तैव तत्त्वम् ततः पृथग्भूतानां विशेषाणामदर्शनात् ।
द्रव्यत्वादीनि अवान्तरसामान्यानि मन्वानस्तद्भेदेषु गजनिमीलिकामवलम्बमानः पुनरपरसंग्रहः।
धर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवद्रव्याणामैक्यं द्रव्यत्वाभेदात् इत्यादिर्यथा । तद्द्रव्यत्वादिकं
प्रतिजानानस्तद्विशेषान्निह्नुवानस्तदाभासः । यथा द्रव्यत्वमेव तत्त्वम् ततोऽर्थान्तरभूतानां
द्रव्याणामनुपलब्धेरित्यादिः । संग्रहेण गोचरीकृतानामर्थानां विधिपूर्वकंमवहरणं येनाभि-
सन्धिना क्रियते स व्यवहारः । यथा यत् सत् तद् द्रव्यं पर्यायो वेत्यादिः । यः पुनरपारमार्थि-
कद्रव्यपर्यायविभागमभिप्रैति स व्यवहाराभासः । यथा चार्वाकदर्शनम् ॥
पर्यायार्थिकश्चतुर्धा ऋजुसूत्रः शब्दः समभिरूढः एवंभूतश्च । ऋजु वर्तमानक्षणस्थायि
पर्यायमात्रं प्राधान्यतः सूत्रयन्नभिप्रायः ऋजुसूत्रः । यथा सुखविवर्त्तः सम्प्रति अस्तीत्यादिः ।
सर्वथा द्रव्यापलापी तदाभासः । यथा तथागतमतम् । कालादिभेदेन ध्वनेरर्थभेदं प्रतिपद्यमानः
शब्दः । यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादिः । तद्भेदेन तस्य तमेव समर्थयमानस्त-
दाभासः । यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादयो भिन्नकालाः शब्दा भिन्नमेव अर्थ-
मभिदधति भिन्नकालशब्दत्वात् तादृक्सिद्धान्यशब्दवद् इत्यादिः । पर्यायशब्देषु निरुक्तिभेदेन
हैं । ( ग ) सुख और जीव परस्पर भिन्न हैं । ( २ ) विशेष रहित सामान्य मात्र जाननेवालेको संग्रह नय
कहते हैं । पर और अपर सामान्यके भेदसे संग्रहके दो भेद हैं । सम्पूर्ण विशेषोंमें उदासीन भाव रखकर
शुद्ध सत् मात्रको जानना पर संग्रह हैं; जैसे सामान्यसे एक विश्व ही सत् है । सत्ताद्वैतको मानकर सम्पूर्ण
विशेषोंका निषेध करना परसंग्रहाभास है; जैसे सत्ता ही एक तत्त्व है, क्योंकि सत्तासे भिन्न विशेष पदार्थोंकी
उपलब्धि नहीं होती । द्रव्यत्व, पर्यायत्व आदि अवान्तर सामान्योंको मानकर उनके भेदोंमें मध्यस्थ भाव
रखना अपर संग्रह नय हैं; जैसे द्रव्यत्वकी अपेक्षा धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव एक हैं ।
( इसी प्रकार पर्यायत्वकी अपेक्षा चेतन और अचेतन पर्याय एक हैं ) । धर्म, अधर्म आदिको केवल द्रव्यत्व
रूपसे स्वीकार करके उनके विशेषोंके निषेध करनेको अपर संग्रहाभास कहते हैं; जैसे द्रव्यत्व ही तत्त्व है,
क्योंकि द्रव्यत्वसे भिन्न द्रव्योंका ज्ञान नहीं होता । ( ३ ) संग्रह नयसे जाने हुए पदार्थोंमें योग्य रीतिसे विभाग
करनेको व्यवहार नय कहते हैं । जैसे जो सत् हैं, वह द्रव्य या पर्याय है । ( यद्यपि संग्रह नयकी अपेक्षा द्रव्य
और पर्याय सत्‌से अभिन्न हैं, परन्तु व्यवहार नयकी दृष्टिसे द्रव्य और पर्यायको सत्‌से भिन्न माना गया है ) ।
अपारमार्थिक द्रव्य और पर्यायके एकान्त भेद प्रतिपादन करनेको व्यवहाराभास कहते हैं; जैसे चार्वाकदर्शन ।
( चार्वाक लोग जीव द्रव्यके पर्याय आदि न मानकर केवलभूत चतुष्टयको मानते हैं, अतएव उनको
व्यवहाराभास कहा गया है ) ।
ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये चार पर्यायार्थिक नयके भेद हैं । ( १ ) वर्तमान क्षणकी
पर्याय मात्रकी प्रधानतासे वस्तुका कथन करना ऋजुसूत्र है; जैसे इस समय मैं सुखकी पर्याय भोगता हूँ ।
द्रव्यके सर्वथा निषेध करनेको ऋजुसूत्र नयाभास कहते हैं, जैसे बौद्धमत । ( बौद्ध लोग क्षण क्षणमें नाश
होनेवाली पर्यायोंको ही वास्तविक मानकर पर्यायोंके आश्रित द्रव्यका निषेध करते हैं, इसलिये उनका मत
ऋजुसूत्र नयाभास है ) । ( २ ) काल, कारक, लिंग, संख्या, वचन और उपसर्गके भेदसे शब्दके अर्थमें भेद
माननेको शब्द नय कहते हैं; जैसे बभूव, भवति, भविष्यति ( काल ); करोति, क्रियते ( कारक ); तटः,
तटी, तटं ( लिंग ); दारा, कलत्रम् ( संख्या ); एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यसि यातस्ते पिता
( पुरुष ); सन्तिष्ठते, अवतिष्ठते ( उपसर्ग ) । काल आदिके भेदसे शब्द और अर्थको सर्वथा अलग माननेको
शब्दाभास कहते हैं; जैसे सुमेरु था, सुमेरु है ओर सुमेरु होगा, आदि भिन्न-भिन्न कालके शब्द भिन्न कालके
शब्द होनेसे भिन्न-भिन्न अर्थोंका ही प्रतिपादन करते हैं, जैसे अन्य भिन्न कालके शब्द । ( ३ ) पर्याय शब्दोंमें
३२

२५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
भिन्नमर्थं समभिरोहन् समभिरूढः । इन्‍दनाद् इन्द्रः शकनाच्छक्रः पूर्दारणात् पुरन्दर इत्यादिषु
यथा । पर्यायध्वनीनामभिधेयनानात्वमेव कक्षीकुर्वाणस्तदाभासः । यथेन्द्रः शक्रः पुरन्दर
इत्यादयः शब्दा भिन्नाभिधेया एव भिन्नशब्दत्वात् करिकुरङ्गतुरङ्गशब्दवद् इत्यादिः । शब्दानां
स्वप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाविशिष्टमर्थं वाच्यत्वेनाभ्युपगच्छन् एवम्भूतः । यथेन्दनमनुभवन्
इन्द्रः शकनक्रियापरिणतः शक्रः पूर्दारणप्रवृत्तः पुरन्दर इत्युच्यते । क्रियानाविष्टं वस्तु न घट-
शब्दवाच्यम् घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाशून्यत्वात् पटवद् इत्यादिः ॥
एतेषु चत्वारः प्रथमेऽर्थनिरूपणप्रवणत्वाद् अर्थनयाः । शेषास्तु त्रयः शब्दवाच्यार्थ-
गोचरतया शब्दनयाः । पूर्वः पूर्वो नयः प्रचुरगोचरः परः परस्तु परिमितविषयः । सन्मात्र-
गोचरात् संग्रहात् नैगमो भावाभावभूमिकत्वाद् भूमविषयः । सद्विशेषप्रकाशकाद् व्यवहारतः
संग्रहः समस्तसत्सम्मूहोपदर्शकत्वाद् बहुविषयः । वर्तमानविषयाद् ऋजुसूत्राद् व्यवहारस्त्रि-
कालविषयावलम्बित्वाद् अनल्पार्थः । कालादिभेदेन भिन्नार्थोपदर्शिनः शब्दादृजुसूत्रस्तद्विपरीत-
वेदकत्वाद् महार्थः । प्रतिपर्यायशब्दमर्थभेदमभीप्सतः समभिरूढात् शब्दस्तद्विपर्ययानुयायित्वात्
प्रभूतविषयः । प्रतिक्रियं विभिन्नमर्थं प्रतिजानानाद् एवम्भूतात् समभिरूढस्तदन्यथार्थस्थाप-
कत्वाद् महागोचरः । नयवाक्यमपि स्वविषये प्रवर्तमानं विधिप्रतिषेधाभ्यां सप्तभङ्गीमनु-
निरुक्तिके भेदसे भिन्न अर्थको कहना समभिरूढ़ नय है; जैसे ऐश्वर्यवान् होनेसे इन्द्र, समर्थ होनेसे शक्र और
नगरोंका नाश करनेवाला होनेसे पुरन्दर कहना । पर्यायवाची शब्दोंको सर्वथा भिन्न मानना समभिरूढ़
नयाभास है; जैसे करि ( हाथी ) कुरंग ( हरिण ) और तुरंग शब्द परस्पर भिन्न हैं, वैसे ही इन्द्र, शक्र
और पुरन्दर शब्दोंको सर्वथा भिन्न मानना । ( ४ ) जिस समय पदार्थोंमें जो क्रिया होती हो, उस समय उस
क्रियाके अनुरूप शब्दोंसे अर्थके प्रतिपादन करनेको एवंभूत नय कहते हैं; जैसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करते
समय इन्द्र, समर्थ होनेके समय शक्र, और नगरोंका नाश करनेके समय पुरन्दर कहना । पदार्थमें अमुक क्रिया
होनेके समयको छोड़कर दूसरे समय उस पदार्थको उसी शब्दसे नहीं कहना, एवंभूत नयाभास है; जैसे, जिस
प्रकार जल लाने आदिकी क्रियाका अभाव होनेसे पटको घट नहीं कहा जा सकता, वैसे ही जल लाने आदि
क्रियाके अतिरिक्त समय घड़ेको घट नहीं कहना ।
सात नयोंमें नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चार नय अर्थका प्रतिपादन करनेके कारण
अर्थनय कहे जाते हैं । बाकीके शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नय शब्दका प्रतिपादन करनेसे शब्दनय कहे
जाते हैं । इन नयोंमें पहले-पहले नय अधिक विषयवाले हैं, और आगे आगेके नय परिमित विषयवाले हैं ।
संग्रह नय सत् मात्रको जानता है, और नैगम नय सामान्य और विशेष दोनोंको जानता है, इसलिये संग्रह
नयकी अपेक्षा नैगम नयका अधिक विषय है । व्यवहार नय संग्रहसे जाने हुए पदार्थोंको विशेष रूपसे जानता
है, और संग्रह समस्त सामान्य पदार्थोंको जानता है, इसलिये संग्रह नयका विषय व्यवहार नयसे अधिक है ।
व्यवहार नय तीनों कालोंके पदार्थोंको जानता है, और ऋजुसूत्रसे केवल वर्तमानकालीन पदार्थोंका ज्ञान
होता है, अतएव व्यवहार नयका विषय ऋजुसूत्रसे अधिक है । शब्द नय, काल आदिके भेदसे वर्तमान पर्यायको
जानता है, ऋजुसूत्रमें काल आदिका कोई भेद नहीं, इसलिये शब्द नयसे ऋजुसूत्र नयका विषय अधिक है ।
समभिरूढ़ नय इन्द्र, शक्र आदि पर्यायवाची शब्दोंको भी व्युत्पत्तिकी अपेक्षा भिन्न रूपसे जानता है, परन्तु
शब्द नयमें यह सूक्ष्मता नहीं रहती, अतएव समभिरूढ़से शब्द नयका विषय अधिक है । समभिरूढ़से जाने
हुए पदार्थोंमें क्रियाके भेदसे वस्तुमें भेद मानना एवंभूत है; जैसे समभिरूढ़की अपेक्षा पुरन्दर और शचीपतिमें
भेद होनेपर भी नगरोंका नाश करनेकी क्रिया न करनेके समय भी पुरन्दर शब्द इन्द्रके अर्थमें प्रयुक्त होता
है, परन्तु एवंभूतकी अपेक्षा नगरोंका नाश करते समय ही इन्द्रको पुरन्दर नामसे कहा जा सकता है ।
अतएव एवंभूतसे समभिरूढ़ नयका विषय अधिक है । प्रमाणके सात भंगोंकी तरह अपने विषयमें विधि और

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५१
ब्रजति ।” इति । विशेषार्थिना नयानां नामान्वर्थविशेषलक्षणाक्षेपपरिहारादिचर्चस्तु भाष्य-
महोदधिगन्धहस्तिटीका१न्यायावतारादिग्रन्थेभ्यो निरीक्षणीयः ॥
प्रमाणं तु सम्यगर्थनिर्णयलक्षणं सर्वनयात्मकं । स्याच्छब्दलाञ्छितानां नयानामेव
प्रमाणव्यपदेशभाक्त्वात् । तथा च श्रीविमलनाथस्तवे२ श्रीसमन्तभद्रः—
“नयास्तव स्यात्पदलाञ्छना इमे रसोपविद्धा इव लोहधातवः ।
भवन्त्यभिप्रेतफला यतस्ततो भवन्तमार्याः प्रणता हितैषिणः ॥” इति
“तच्च द्विविधम् प्रत्यक्षं परोक्षं च । तत्र प्रत्यक्षं द्विधा सांव्यवहारिकं पारमार्थिकं च ।
सांव्यवहारिकं द्विविधम् इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तभेदात् । तद् द्वितयम् अवग्रहेहावायधारणा-
भेदाद् एकैकश्चतुर्विकल्पम् । अवग्रहादीनां स्वरूपं सुप्रतीतत्वाद् न प्रतन्यते । पारमार्थिकं
पुनरुत्पत्तौ आत्ममात्रापेक्षम्” ।३ तद्द्विविधम् । क्षायोपशमिकं४ क्षायिकं च । आद्यम् अवधि-
मनःपर्य्यायभेदाद् द्विधा । क्षायिकं तु केवलज्ञानमिति ॥
परोक्षं च स्मृतिप्रत्यभिज्ञानोहानुमानागमभेदात् पञ्चप्रकारम् । “तत्र संस्कारप्रबोध-
सम्भूतमनुभूतार्थविषयं तदित्याकारं वेदनं स्मृतिः । तत् तीर्थकरबिम्बमिति यथा । अनुभव-
स्मृतिहेतुकं तिर्यगूर्ध्वतासामान्यादिगोचरं संकलनात्मकं ज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम् । यथा तज्जातीय
प्रतिषेधकी अपेक्षा नयके भी सात भंग होते हैं ।” नयोंका विशेष लक्षण और नयोंके ऊपर होनेवाले आक्षेपोंके
परिहार आदिकी चर्चा तत्त्वार्थाधिगमभाष्यवृहद्वृत्ति गंधहस्तिटीका, न्यायावतार आदि ग्रन्थोंसे
जाननी चाहिये ।
सम्यक् प्रकारसे अर्थके निर्णय करने को प्रमाण कहते हैं । प्रमाण सर्वनय रूप होता है । नय
वाक्योंमें स्यात् शब्द लगाकर बोलनेको प्रमाण कहते हैं । श्री समन्तभद्रने स्वयंभूस्तोत्रमें विमलनाथका
स्तवन करते हुए कहा है—
“जिस प्रकार रसोंके संयोग से लोहा अभीष्ट फलका देनेवाला बन जाता है, इसी तरह नयोंमें ‘स्यात्’
शब्द लगाने से भगवान्के द्वारा प्रतिपादित नय इष्ट फलको देते हैं, इसीलिये अपना हित चाहने वाले लोग
भगवान्के समक्ष प्रणत हैं ।”
“यह प्रमाण प्रत्यक्ष और परोक्षके भेदसे दो प्रकारका है । सांव्यवहारिक और पारमार्थिक—प्रत्यक्षके
दो भेद हैं । सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष इन्द्रिय और मनसे पैदा होता है । इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न होनेवाले
सांव्यवहारिक प्रत्यक्षके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा चार-चार भेद हैं । अवग्रह आदिका स्वरूप सुप्रतीत
होनेसे यहाँ नहीं लिखा जाता । पारमार्थिक प्रत्यक्षकी उत्पत्तिमें केवल आत्माकी सहायता रहती है ।” यह
क्षायोपशमिक और क्षायिकके भेदसे दो प्रकारका है । अवधिज्ञान और मनपर्ययज्ञान क्षायोपशमिकके भेद
हैं । केवलज्ञान क्षायिकका भेद है ।
स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, ऊहा, अनुमान और आगम—परोक्षके पाँच भेद हैं । “संस्कारसे उत्पन्न अनुभव
किये हुए पदार्थमें ‘वह है’ इस प्रकारके स्मरण होनेको स्मृति कहते हैं; जैसे वह तीर्थंकरका प्रतिबिम्ब है ।
वर्तमानमें किसी वस्तुके अनुभव करनेपर और भूतकालमें देखे हुए पदार्थका स्मरण होनेपर तिर्यक् सामान्य
१. सिद्धसेनगणिविरचिततत्त्वार्थाधिगमभाष्यवृत्तिः । तदेव गन्धहस्तिटीका ।
२. बृहत्स्वयंभूस्तोत्रावल्यां विमलनाथस्तवे ६५ ।
३. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे २–१, ४, ५, ६, १८ ।
४. क्षयेणोदयप्राप्तकर्मणो विनाशेन सहोपशमे विष्कम्भितोदयत्वं क्षयोपशमः ।

२५२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २८
एवायं गोपिण्डः गोसदृशो गवयः स एवायं जिनदत्त इत्यादिः । उपलम्भानुपलम्भसम्भवं
त्रिकालीकलितसाध्यसाधनसम्बन्धाद्यालम्बनमिदमस्मिन् सत्येव भवतीत्याद्याकारं संवेदन-
मूहस्तर्कापरपर्यायः । यथा यावान् कश्चिद् धूमः स सर्वो वह्नौ सत्येव भवतीति तस्मिन्नसति
असौ न भवत्येवेति वा । अनुमानं द्विधा स्वार्थं परार्थं च । तत्रान्यथानुपपत्त्येकलक्षणहेतुग्रहण-
संबन्धस्मरणकारणं साध्यविज्ञानं स्वार्थम् । पक्षहेतुवचनात्मकं परार्थमनुमानमुपचारात्” । १
“आप्तवचनाद् आविर्भूतमर्थसंवेदनमागमः । उपचाराद् आप्तवचनं च”२ इति । स्मृत्या-
दीनां च विशेषस्वरूपं स्याद्वादरत्नाकरात् साक्षेपपरिहारं ज्ञेयमिति । प्रमाणान्तराणां पुनरर्था-
पत्त्युपमानसंभवप्रातिभैतिह्यादीनामत्रैवान्तर्भावः । ३सन्निकर्षादीनां तु जडत्वाद् एव न
प्रामाण्यमिति । तदेवंविधेन नयप्रमाणोपन्यासेन दुर्नयमार्गस्त्वया खिलीकृतः ॥ इति
काव्यार्थः ॥ २८ ॥
( वर्तमान कालवर्ती एक जातिके पदार्थोंमें रहनेवाला सामान्य ) और ऊर्ध्वता सामान्य ( एक ही पदार्थके
क्रमवर्ती सम्पूर्ण पर्यायोंमें रहनेवाला सामान्य ) आदिको जाननेवाले संकलनात्मक ज्ञानको प्रत्यभिज्ञान कहते हैं;
जैसे यह गोपिंड उसी जातिका है, यह गवय गौके समान है, यह वही जिनदत्त है, आदि । उपलंभ और
अनुपलंभसे उत्पन्न, त्रिकालकलित, साध्य-साधनके संबंध आदिसे होनेवाले, 'इसके होनेपर यह होता है,'
इस प्रकारके ज्ञानको ऊह अथवा तर्क कहते हैं; जैसे अग्निके होनेपर ही धूम होता है, अग्निके न होनेपर धूम
नहीं होता । अनुमानके स्वार्थ और पदार्थ दो भेद हैं । अन्यथानुपपत्ति रूप हेतु-ग्रहण करनेके संबंधके स्मरण-
पूर्वक साध्यके ज्ञानको स्वार्थानुमान कहते हैं । पक्ष और हेतु कह कर दूसरेको साध्यके ज्ञान करानेको परार्था-
नुमान कहते हैं । परार्थानुमानको उपचारसे अनुमान कहा गया है ।” “आप्तके वचनसे पदार्थोंके ज्ञान करनेको
आगम कहते हैं ॥” उपचारसे आप्त वचनको प्रमाण कहा है । स्मृति आदिका विशेष स्वरूप और किये गये
आक्षेपोंका परिहार स्याद्वादरत्नाकर आदि ग्रंथोंसे जानना चाहिये । अर्थापत्ति, उपमान, संभव, प्रातिभ,
आदि प्रमाणोंका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणोंमें हो जाता है । सन्निकर्ष आदिके जड़ होनेके कारण
प्रमाण नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार आपने नय और प्रमाणका उपदेश देकर दुर्नयवादके मार्गका
निराकरण किया है ॥ यह श्लोक का अर्थ है ॥ २८ ॥
भावार्थ— ( १ ) किसी वस्तुके सापेक्ष निरूपण करनेको नय कहते हैं । प्रत्येक वस्तुमें अनन्त धर्म
विद्यमान हैं । इन अनन्त धर्मोंमें किसी एक धर्मको अपेक्षासे अन्य धर्मोंका निषेध न करके पदार्थोंका ज्ञान
करना नय है । प्रमाणसे जाने हुए पदार्थोंमें ही नयसे वस्तुके एक अंशका ज्ञान होता है । शंका—नयसे
पदार्थोंका निश्चय होता है, इसलिये नयको प्रमाण ही कहना चाहिये, नय और प्रमाणको अलग अलग कहनेकी
आवश्यकता नहीं । समाधान—नयसे सम्पूर्ण वस्तुका नहीं, किन्तु वस्तुके एक देशका ज्ञान होता है ।
इसलिये जिस प्रकार समुद्रको एक बूँदको सम्पूर्ण समुद्र नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यदि समुद्रकी एक
बूँदको समुद्र कहा जाय, तो शेष समुद्रके पानीको असमूद्र कहना चाहिये, अथवा समुद्रके पानीकी अन्य बूँदोंको
भी समुद्र कहकर बहुतसे समुद्र मानने चाहिये । तथा, समुद्रकी एक बूँदको असमुद्र भी नहीं कहा जा सकता ।
यदि समुद्रकी एक बूँदको असमुद्र कहा जाय, तो शेष अंशको भी समुद्र नहीं कहा जा सकता । उसी प्रकार
पदार्थोंके एक अंशके ज्ञान करनेको वस्तु नहीं कह सकते, अन्यथा वस्तुके एक अंशके अतिरिक्त वस्तुके अन्य
धर्मोंको अवस्तु मानना चाहिये, अथवा वस्तुके प्रत्येक अंशको अवस्तु मानना चाहिये । तथा, पदार्थोंके एक
अंशके ज्ञान करनेको अवस्तु भी नहीं कह सकते, अन्यथा वस्तुके शेष अंशोंको भी अवस्तु मानना पड़ेगा ।
अतएव जिस प्रकार समुद्रकी एक बूँदको समुद्र अथवा असमुद्र नहीं कहा जा सकता, उसी तरह वस्तुके एक
१. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे ३-३-२३ ।
२. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे ४-१, २ ।
३. प्रत्यक्षजनकः संबंधः । यथा चाक्षुषप्रत्यक्षे चक्षुर्विषययोः संसर्गः ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५३
अंशके जाननेको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं कहा जा सकता । इसलिये नयको प्रमाण और अप्रमाण दोनोंसे
अलग मानना चाहिए । ¹
( २ ) जितने तरहके वचन हैं, उतने ही नय हो सकते हैं । इसलिये नयके उत्कृष्ट भेद असंख्यात
हो सकते हैं । इसलिये विस्तारसे नयोंका प्ररूपण नहीं किया जा सकता । एकसे लेकर नयोंके असंख्यात भेद
किये गये हैं । ( क ) सामान्यसे शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा नयका एक भेद ² है ( ख ) सामान्य और विशेष-
की अपेक्षा द्रव्यार्थिक ( द्रव्यास्तिक ) और पर्यायार्थिक ( पर्यायास्तिक ) ये नयके दो भेद हैं । सामान्य और
विशेषको छोड़कर नयका कोई दूसरा विषय नहीं होता, अतएव सम्पूर्ण नैगम आदि नयोंका इन्हीं दो नयोंमें
अन्तर्भाव हो जाता है । ³ ( ग ) संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र इन तीन अर्थनयोंमें शब्द नयको मिलाकर
नयके चार भेद होते हैं । ⁴ ( घ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द नयके भेदसे नय पाँच प्रकारके
होते हैं । यहाँ भाष्यकारने सांप्रत, समभिरूढ़ और एवंभूतको शब्द नयके भेद स्वीकार किये हैं । ⁵ ( च )
जिस समय नैगम नय सामान्यको विषय करता है, उस समय वह संग्रह नयमें गर्भित होता है, और जिस
समय विशेषको विषय करता है, उस समय व्यवहारमें गर्भित होता है । अतएव नैगम नयका संग्रह और
व्यवहार नयमें अन्तर्भाव करके सिद्धसेन दिवाकरने छह नयोंको माना है । ⁶ ( छ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूतके भेदसे नयके सात भेद होते हैं । यह मान्यता श्वेताम्बर आगम
परंपरामें और दिगम्बर ग्रन्थोंमें पायी जाती है । ⁷ ( ज ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र तथा सांप्रत,
१. नायं वस्तु न चावस्तु वस्त्वंशः कथ्यते बुधैः ।
नासमुद्रः समुद्रो वा समुद्रांशो यथैव हि ॥
तन्मात्रस्य समुद्रत्वे शेषांशास्यासमुद्रता ।
समुद्रबहुता वा स्यात् तत्त्वे क्वास्तु समुद्रवित् ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-६-५, ६ ।
२. (अ) सामान्यादेशतस्तावदेक एव नयः स्थितः ।
स्याद्वादप्रविभक्तार्थविशेषव्यञ्जनात्मकः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२ ।
(आ) यदि वा शुद्धत्वनयान्नाप्युत्पादो व्ययोऽपि न ध्रौव्यम् ।
गुणश्च पर्यय इति वा न स्याच्च केवलं सदिति ॥ राजमल्ल-पंचाध्यायी १-२१६ ।
३. ( अ ) दव्वट्ठिओ य पज्जवणओ य सेसा वियप्पा सिं ।
( द्रव्यास्तिकश्च पर्यायनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः ) सन्मतितर्क १-३ ।
परस्परविविक्तसामान्यविशेषविषयत्वात् द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकावेव नयौ, न च तृतीयं प्रकारान्तर-
मस्ति यद्विषयोऽन्यस्ताभ्यां व्यतिरिक्तो नयः स्यात् । अभयदेव टीका ।
( आ ) संक्षेपाद् द्वौ विशेषेण द्रव्यपर्यायगोचरौ । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-३ ।
४. नैगमनयो द्विविधः सामान्यग्राही विशेषग्राही च । तत्र यः सामान्यग्राही स संगृहेऽन्तर्भूतः, विशेषग्राही तु
व्यवहारे । तदेवं संग्रहव्यवहारऋजुसूत्रशब्दादित्रयं चैक इति चत्वारो नयाः । समवायांग टीका ।
५. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा नयाः । तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४ ।
६. जो सामन्नगाही स नेगमो संगहं गओ अहवा ।
इयदो ववहारमिओ जो तेण समाणणिद्देसो ॥ विशेषावश्यक भाष्य ३९ ।
सिद्धसेनीयाः पुनः षडेव नयानभ्युपगतवन्तः । नैगमस्य संग्रहव्यवहारयोरन्तर्भावविवक्षणात् । विशेषावश्यक
भाष्य ४५ ।
७. से किं तं णए ? सत्तमूलणया पण्णत्ता । तं जहा—णेगमे संगहे ववहारे उज्जुसुए सद्दे समभिरूढे एवंभूए ।
अनुयोगद्वारसूत्र । तथा स्थानांग सू० ५५२; भगवती सू० ४६९ ।

२५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
समभिरूढ और एवंभूत ये शब्दके तीन विभाग करनेसे नयोंके आठ भेद होते हैं ।१ ( झ ) नैगम, संग्रह
आदि सात प्रसिद्ध नयोंमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय मिला देनेसे नयोंकी संख्या नौ हो जाती है । इन
नयोंके माननेवाले आचार्योंका खंडन द्रव्यानुयोगतर्कणामें मिलता है ।२ ( ट ) नैगमके नौ भेद करके
संग्रह आदि छह नयोंको मिलानेसे नयोंके १५ भेद होते हैं ।३ ( ठ ) निश्चय नयके २८ और व्यवहार नयके
८ भेद मिलाकर नयोंके ३६ भेद होते हैं ।४ ( ड ) प्रत्येक नयके सौ सौ भेद करनेपर नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र और शब्द इन पाँच नयोंके माननेसे नयोंके पाँच सौ, और सात नय माननेसे नयोंके सात सौ भेद
होते हैं ।५ ( ढ ) जितने प्रकारके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं, इसलिये नयके असंख्यात
भेद हैं ।
( ३ )—( १ ) ( क ) सामान्य और विशेष पदार्थोंको ग्रहण करना नैगम नय है । यह लक्षण
मल्लिषेण, सिद्धर्षि, जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण, अभयदेव आदि श्वेताम्बर आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता
है ।६ ( ख ) दो धर्म, अथवा दो धर्मी अथवा एक धर्म और एक धर्मीमें प्रधान और गौणताकी विवक्षा
करनेको नैगम कहते हैं । नैगम नयका यह लक्षण देवसूरि, विद्यानन्दि, यशोविजय आदिके ग्रन्थोंमें
पाया जाता है ।७ ( ग ) जिसके द्वारा लौकिक अर्थका ज्ञान हो, उसे नैगम कहते हैं । यह लक्षण जिन-
भद्रगणि, सिद्धसेनगणि आदि आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता है ।८ ( घ ) संकल्प मात्रके ग्रहण करनेको
नैगम कहते हैं ।९ जैसे किसी पुरुषको प्रस्थ ( पाँच सेरका परिमाण ) बनानेके लिये जंगलमें लकड़ी लेने
जाते हुए देखकर किसीने पूछा, तुम कहाँ जा रहे हो ? उस आदमीने उत्तर दिया कि वह प्रस्थ लेने जा
रहा है । पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानंदि आदि दिगम्बर आचार्योंको यही लक्षण मान्य है । ( प्रस्थका
उदाहरण नैगम नयके वर्णनमें हरिभद्रके आवश्यकटिप्पणमें भी दिया गया है )। नैगमके नौ भेद हैं ।
आरंभमें पर्याय नैगम, द्रव्य नैगम, द्रव्य-पर्याय नैगम—ये नैगमके तीन भेद हैं । इनमें अर्थ-पर्याय नैगम, व्यंजन-
पर्याय नैगम और अर्थ व्यंजन-पर्याय नैगम—ये पर्याय नैगमके तीन भेद हैं । शुद्ध द्रव्य नैगम और अशुद्ध द्रव्य
नैगम—ये द्रव्य नैगमके दो भेद हैं । तथा शुद्ध द्रव्यार्थ-पर्याय नैगम, शुद्ध द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम, अशुद्ध
द्रव्यार्थ द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम—ये चार द्रव्य-पर्याय नैगमके भेद हैं । इन सबको मिलानेसे नैगमके नौ भेद
होते हैं । न्याय-वैशेषिकोंका नैगमाभासमें अन्तर्भाव होता है । ( २ ) विशेषोंकी अपेक्षा न करके वस्तुको
सामान्य रूपसे जाननेको संग्रह नय कहते हैं; जैसे जीव कहनेसे त्रस, स्थावर आदि सब प्रकारके जीवोंका
ज्ञान होता है । संग्रह नय पर संग्रह और अपर संग्रहके भेदसे दो प्रकारका है । सत्ताद्वैतको मानकर सम्पूर्ण
१. तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४, ३५ ।
२. यदि पर्यायद्रव्यार्थनयौ भिन्नौ विलोकितौ ।
अर्पितानर्पिताभ्यां तु स्युर्नैकादश तत्कथम् ॥ द्रव्यानुयोगतर्कणा ८-११ ।
३. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-४८ ।
४. देवसेनसूरि, नयचक्रसंग्रह १८६, १८७, १८८ ।
५. इक्किक्कको य सयविहो सत्तणयसया हवंति एमेव ।
अन्ने वि य आएसो पंचेव सया नयाणं तु ॥ विशेषावश्यक भाष्य २२६४ ।
६. ये परस्परविशकलितौ सामान्यविशेषाविच्छन्ति तत् समुदायरूपो नैगमः । सिद्धर्षि, न्यायावतार टीका ।
७. यद्वा नैकं गमो योऽत्र सततां नैगमो मतः ।
धर्मयोर्धर्मिणो वापि विवक्षा धर्मधर्मिणोः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२१ ।
८. निगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते इति लौकिका अर्थाः तेषु निगमेषु भवो योऽध्यवसायः ज्ञानाख्यः स नैगमः ।
सिद्धसेनगणि, तत्त्वार्थ टीका ।
९. अर्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि पृ० ७८ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५५
विशेषोंके निषेध करनेको संग्रहाभास कहते हैं। अद्वैत वेदान्तियों और सांख्योंका संग्रहाभासमें अन्तर्भाव
होता है। (३) संग्रह नयसे जाने हुए पदार्थके योग्य रीतिसे विभाग करनेको व्यवहार नय कहते
हैं; जैसे जो सत् है वह द्रव्य या पर्याय है। इसके सामान्य भेदक और विशेष भेदकके भेदसे दो भेद हैं।
द्रव्य और पर्यायके एकान्तभेदको मानना व्यवहाराभास है। इसमें चार्वाक दर्शन गर्भित होता है। (४)
वस्तुकी अतीत और अनागत पर्यायको छोड़कर वर्तमान क्षणकी पर्यायको जानना ऋजुसूत्र नय हैं; जैसे इस
समय मैं सुखकी पर्याय भोग रहा हूँ। सूक्ष्म ऋजुसूत्र और स्थूल ऋजुसूत्रके भेदसे ऋजुसूत्रके दो भेद हैं।
केवल क्षण-क्षणमें नाश होनेवाली पर्यायोंको मानकर पर्यायके आश्रित द्रव्यका सर्वथा निषेध करना ऋजुसूत्र
नयाभास है। बौद्ध दर्शन इसमें गर्भित होता है। (५) पर्यायवाची शब्दोंमें भी काल, कारक, लिंग, संख्या,
पुरुष और उपसर्गके भेदसे अर्थभेद मानना शब्द नय है; जैसे 'आप्' जलका पर्यायवाची होनेपर भी जलकी
एक बूँदके लिये 'आप्' का प्रयोग नहीं करना; 'विरमते' और 'विरमति' पर्यायवाची होनेपर भी दूसरेके
लिये 'विरमति' परस्मैपदका प्रयोग, और अपने लिये 'विरमते' आत्मनेपदका प्रयोग करना काल आदिके भेदसे
शब्द और अर्थको सर्वथा भिन्न मानना शब्दाभास है (६) पर्यायवाची शब्दोंमें व्युत्पत्तिके भेदसे अर्थभेद
मानना समभिरूढ नय है; जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर इन शब्दोंके पर्यायवाची होनेपर भी ऐश्वर्यवानको
इन्द्र, सामर्थ्यवानको शक्र, और नगरोंके नाश करनेवालेको पुरन्दर कहना । पर्यायवाची शब्दोंको सर्वथा भिन्न
मानना समभिरूढ़ाभास है (७) जिस समय पदार्थोंमें जो क्रिया होती हो, उस समय क्रियाके अनुकूल
शब्दोंसे अर्थके प्रतिपादन करनेको एवंभूत नय कहते हैं; जैसे पूजा करते समय पुजारी, और पढ़ते समय
विद्यार्थी कहना । जिस समय पदार्थमें जो क्रिया होती है, उस समयको छोड़कर दूसरे समय उस पदार्थको
उस नामसे नहीं कहना एवंभूत नयाभास हैं; जैसे जल लानेके समय ही घड़ेको घट कहना, दूसरे
समय नहीं।
(४) (क) सात नयोंको द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक दो विभागोंमें विभक्त किया जा सकता है।¹
नैगम, संग्रह और व्यवहार नय ये तोन नय द्रव्यार्थिक हैं, क्योंकि ये द्रव्यकी अपेक्षा वस्तुका प्रतिपादन करते
हैं। तथा ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये चार नय पर्यायार्थिक हैं, क्योंकि ये वस्तुमें पर्यायकी
प्रधानताका ज्ञान करते हैं। (ख) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र—ये चार अर्थनय हैं। इनमें शब्दके लिंग
आदि बदल जानेपर भी अर्थमें अन्तर नहीं पड़ता, इसलिए अर्थकी प्रधानता होनेसे ये अर्थनय कहे जाते हैं।
शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नयोंमें शब्दोंके लिंग आदि बदलनेपर अर्थमें भी परिवर्तन हो जाता है, इसलिये
शब्दकी प्रधानतासे ये शब्दनय कहे जाते हैं। (ग) नय व्यवहार और निश्चय नयमें भी विभक्त हो सकते
हैं। एवंभूतका विषय सब नयोंकी अपेक्षा सूक्ष्म है, इसलिये एवंभूतको निश्चय, और बाकीके छह नयोंको
व्यवहार नय कहते हैं। (घ) सात नयोंके ज्ञाननय और क्रियानय विभाग भी हो सकते हैं। ये नय सत्यका
विचार करते हैं, इसलिये ज्ञानदृष्टिकी प्रधानता होनेके कारण ज्ञाननय, और क्रियादृष्टिकी प्रधानता होनेसे
क्रियानय कहे जाते हैं। नैगम आदि नय उत्तरोत्तर सूक्ष्म-सूक्ष्म विषयको जानते हैं।
१. तार्किकाणां त्रयो भेदा आद्या द्रव्यार्थिनो मताः ।
सैद्धान्तिकानां चत्वारः पर्यायार्थगताः परे ॥ यशोविजय, नयोपदेश १८ ।
यहाँ जैन शास्त्रोंमें दो परम्परायें दृष्टिगोचर होती हैं। पहली परम्पराके अनुसार द्रव्यास्तिकके नैगम
आदि चार और पर्यायास्तिकके शब्द आदि तीन भेद हैं। इस सैद्धांतिक परम्पराके अनुयायी जिनभद्रगणि,
विनयविजय, देवसेन आदि आचार्य हैं। दूसरी परम्परा तार्किक विद्वानोंकी है। इसके अनुसार द्रव्या-
स्तिकके नैगम आदि तीन, और पर्यायास्तिकके ऋजुसूत्र आदि चार भेद हैं। इसके अनुयायी सिद्धसेन
दिवाकर, माणिक्यनन्दि, वादिदेवसूरि, विद्यानन्दि, प्रभाचन्द्र, यशोविजय आदि विद्वान् हैं।

२५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
इदानीं सप्तद्वीपसमुद्रमात्रो१ लोक इति वावदूकानां तन्मात्रलोके परिमितानामेव सत्त्वानां
सम्भवात् परिमितात्मवादिनां दोषदर्शनमुखेन भगवत्प्रणीतं जीवानन्त्यवादं निर्दोषतया-
भिष्टुवन्नाह—
मुक्तोऽपि वाभ्येतु भवम् भवो वा भवस्थशून्योऽस्तु मितात्मवादे ।
षड्जीवकायं त्वमनन्तसंख्यमाख्यस्तथा नाथ यथा न दोषः ॥ २९ ॥
मितात्मवादे संख्यातानामात्मनामभ्युपगमे दूषणद्वयमुपतिष्ठते । तत्क्रमेण दर्शयति ।
मुक्तोऽपि वाभ्येतु भवमिति । मुक्तो निर्वृतिमाप्तः । सोऽपि वा । अपिर्विस्मये । वाशब्द
उत्तरदोषापेक्षया समुच्चयार्थः यथा देवो वा दानवो वेति । भवमभ्येतु संसारमभ्यागच्छतु ।
इत्येको दोषप्रसङ्गः । भवो वा भवस्थशून्योऽस्तु । भवः संसारः स वा भवस्थशून्यः संसारि-
[L

अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५७
न च क्षीणकर्मणां भवाधिकारः ।
“दग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः ।
कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्कुरः ॥”१
इति वचनात् । आह च पतञ्जलिः—“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः”२ इति । तट्टीका३
च—“सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुषावनद्धा
शालितण्डुला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति नापनीततुषा दग्धबीजभावा । तथा
क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति । नापनीतक्लेशो न प्रसंख्यानदग्धक्लेशबीजभावो
वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोगः” इति । अक्षपादोऽप्याह—“न प्रवृत्तिः प्रति-
सन्धानाय हीनक्लेशस्य”४ इति ॥
एवं विभङ्गज्ञानिशिवराजर्षिमतानुसारिणो दूषयित्वा उत्तरार्द्धेन भगवदुपज्ञमपरि-
मितात्मवादं निर्दोषतया स्तौति । षड्जीवेत्यादि । त्वं तु हे नाथ तथा तेन प्रकारेण अनन्त-
संख्यमनन्ताख्यसंख्याविशेषयुक्तं षड्जीवकायम् । अजीवन् जीवन्ति जीविष्यन्ति चेति जीवा
इन्द्रियादिज्ञानादिद्रव्यभावप्राणधारणयुक्ताः तेषां “संघे चानूर्ध्वे ।”५ इति चिनोतेर्घञि आदेइच
कत्वे कायः समूह जीवकायः पृथिव्यादिः षण्णां जीवकायानां समाहारः षड्जीवकायम् ।
पात्रादिदर्शनाद् नपुंसकत्वम् । अथवा षण्णां जीवानां कायः प्रत्येकं सङ्घातः षड्जीवकायस्तं
षड्जीवकायम् । पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसलक्षणषड्जीवनिकायम् । तथा तेन प्रकारेण ।
जिन जीवोंके कर्म नष्ट हो गये हैं, वे फिरसे संसारमें नहीं आते । कहा भी है—
“जिस प्रकार बीजके जल जानेपर बीजसे अंकुर नहीं पैदा हो सकता, उसी तरह कर्मबीजके जल
जानेपर संसार रूपी अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता ।”
पतंजलिने कहा है—“मूलके रहनेपर ही जाति, आयु और भोग होते हैं ।” टीकाकार व्यासने
कहा है—“क्लेशोंके होनेपर ही कर्मोंकी शक्ति फल दे सकती है, क्लेशके उच्छेद होनेपर कर्म फल नहीं देते ।
जिस प्रकार छिलकेसे युक्त चावलोंसे अंकुर पैदा हो सकते हैं, छिलका उतार देनेसे चावलोंमें पैदा होनेकी
शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार क्लेशोंसे युक्त कर्मशक्ति फल देती है, क्लेशोंमें नष्ट हो जानेपर कर्मशक्तिमें
विपाक नहीं होता । यह विपाक जाति, आयु और भोगके भेदसे तीन प्रकारका है ।” अक्षपाद ऋषिने भी
कहा है—“जिसके क्लेशोंका क्षय हो गया है, उसको प्रवृत्ति बन्धका कारण नहीं होती ।”
इस प्रकार विभंगज्ञानी शिवराज महर्षिके अनुयायियोंकी मान्यता सदोष सिद्ध करके जिन
भगवान्के कहे हुए अनन्त जीववादको निर्दोष सिद्ध करते हैं । जो भूतकालमें जीते थे, वर्तमानमें जीते हैं,
और भविष्यमें जीयेंगे, उन्हे जीव कहते हैं । ये जीव इन्द्रिय आदि दस द्रव्य प्राणोंको और ज्ञान आदि भाव
प्राणोंको धारण करते हैं । जीवोंके समूहको जीवकाय कहते हैं । यहाँ 'संघे वानूर्ध्वे' सूत्रसे 'चि' धातुसे
'घञ्' प्रत्यय होनेपर 'च' के स्थानमें 'क' हो जानेसे 'काय' शब्द बनता है । पृथिवी, अप्, तेज, वायु,
वनस्पति और त्रस इन छह प्रकारके जीवोंको 'षट्काय जीव' कहा है । यहाँ 'पात्र' आदि शब्दोंमें षड्-
१. तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये १०-७ ।
२. पातञ्जलसूत्रे २-१३ ।
३. व्यासभाष्ये । २-१३ ।
४. गौतमसूत्रे ४-१-६४ ।
५. हैमसूत्रे ५-३-८० ।
३३

२५८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
आख्यः मर्यादां प्ररूपितवान् । यथा येन प्रकारेण न दोषो दूषणमिति । जात्यपेक्षमेकवचनम् ।
प्रागुक्तदोषद्वयजातीया अन्येऽपि दोषा यथा न प्रादुःष्यन्ति तथा त्वं जीवानन्त्यमुपदिष्टवा-
नित्यर्थः । आख्यः इति आङ्पूर्वकस्य ख्यातेरङि सिद्धिः । त्वमित्येकवचनं चेदं ज्ञापयति यद्
जगद्गुरोरेव एकस्येदृक्प्ररूपणसामर्थ्यं, न तीर्थान्तरशास्तृणामिति ॥
पृथिव्यादीनां पुनर्जीवत्वमित्थं साधनीयम्¹ । यथा सात्मिका विद्रुमशिलादिरूपा
पृथिवी, छेदे समानधातूत्थानाद्, अर्शोऽङ्कुरवत् । भौममम्भोऽपि सात्मकम्, क्षतभूसजातीयस्य
स्वभावस्य सम्भवात्, शालूरवत् । आन्तरिक्षमपि सात्मकम्, अभ्रादिविकारे स्वतः सम्भूय
पातात्, मत्स्यादिवत् । तेजोऽपि सात्मकम्, आहारोपादानेन वृद्धयादिविकारोपलम्भात्, पुरु-
षाङ्गवत् । वायुरपि सात्मकः, अपरप्रेरितत्वे तिर्यग्गतिमत्त्वाद् गोवत् । वनस्पतिरपि सात्मकः,
अपरप्रेरितत्वे तिर्यग्गतिमत्त्वाद् गोवत् । वनस्पतिरपि सात्मकः, छेदादिभिर्म्लान्यादिदर्शनात्,
पुरुषाङ्गवत् । केषाञ्चित् स्वापाङ्गानोपश्लेषादिविकाराच्च² । अपकर्षतश्चैतन्याद् वा सर्वेषां
सात्मकत्वसिद्धिः । आप्रवचनाच्च । त्रसेषु च कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादिषु न केषाञ्चित्
सात्मकत्वे विगानमिति ।
यथा च भगवदुपक्रमे जीवानन्त्ये न दोषस्तथा दिङ्मात्रं भाष्यते । भगवन्मते हि
जीवकाय शब्दको मान कर समासमें ‘षड्जीवकायं’ नपुंसक लिंग बनाया है । अथवा समूह अर्थमें समास
न करके ‘छह प्रकारके जीवोंका संघात’ अर्थ करके ‘षड्कायजीवः’ पुँल्लिंगान्त समास बनाना चाहिये ।
अतएव जिन भगवान्ने ही निर्दोष रीतिसे जीवोंको अनन्त स्वीकार किया है, दूसरे वादियोंने नहीं । आङ्
पूर्वक ‘ख्या’ धातुसे अङ् प्रत्यय लगानेपर ‘आख्यः’ क्रियापद बनता है ।
(१) मूंगा पाषाण आदिरूप पृथिवी सजीव है, क्योंकि अर्शके अंकुरकी तरह पृथिवीके काटनेपर
वह फिरसे उग आती है । (२) पृथिवीका जल सजीव है, क्योंकि मेंढककी तरह जलका स्वभाव खोदी
हुई पृथिवीके समान है । आकाशका जल भी सजीव है, क्योंकि मछलीकी तरह बादलके विकार होनेपर
वह स्वतः ही उत्पन्न होता है । (३) अग्नि भी सजीव है, क्योंकि पुरुष के अंगोंकी तरह आहार आदिके
ग्रहण करनेसे उसमें वृद्धि होती है । (४) वायुमें भी जीव है, क्योंकि गौकी तरह वह दूसरेसे प्रेरित होकर
गमन करती है । (५) वनस्पतिमें भी जीव है, क्योंकि पुरुषके अंगोंकी तरह छेदनेसे उसमें मलिनता देखी
जाती है । कुछ वनस्पतियोंमें स्त्रियों के पादाघात आदिसे विकार होता है, इसलिये भी वनस्पतिमें जीव है ।
अथवा जिन जीवोंमें चेतना घटती हुई देखी जाती है, वे सब सजीव हैं । सर्वज्ञ भगवान्ने पृथिवी आदिको
जीव कहा है । (६) कृमि, पिपीलिका, भ्रमर, मनुष्य आदि त्रस जीवोंमें सभी लोगोंने जीव माना है ।
जिनमतमें छहनिकायके जीवोंमें सबसे कम त्रस जीव हैं । त्रस जीवों में संख्यात गुणे अग्निकायिक,
१. ननु चेतनत्वमपि क्वचिदचेतनत्वाभिमतानां भूतेन्द्रियाणां श्रूयते । यथा ‘मृदब्रवीत्’ ‘आपोऽब्रुवन्’
(श० प० ब्रा० ६–१–३–२–४) इति, ‘तत्तेज ऐक्षत’ ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छा० ६–२–३, ४)
इति चैवमाद्या भूतविषया चेतनत्वश्रुतिः । ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्ये २–१–४। वनस्पत्यादीनां चेतनत्वं
महाभारते (शांति० मो० अ० १८२ श्लोक ६–१८) मनुस्मृतौ (अ० १ श्लो० ४६–४९) च समर्थितम् ।
२. तथा मत्तकामिनीसनूपुरसुकुमारचरणताडनादशोकपरोः पल्लवकुसुमोद्भवः । तथा युवत्यालिंगनात्
पनंसस्य । तथा सुरभिसुरागण्डूषसेकाद्वकुलस्य । तथा सुरभिनिर्मलजलसेकाच्चम्पकस्य । तथा कटाक्ष-
वीक्षणात्तिलकस्य । तथा पंचमस्वरोद्गाराच्च्छीरपस्य विरहकस्य पुष्पविकिरणम् ।
षड्दर्शनसमुच्चय गुणरत्न टीका पृ० ६३ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५९
षण्णां जीवनिकायानामेतद् अल्पबहुत्वम् । सर्वस्तोकास्त्रसकायिकाः । तेभ्यः संख्यातगुणाः
तेजस्कायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिकाः पृथिवीकायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिका अप्कायिकाः ।
तेभ्योऽपि विशेषाधिका वायुकायिकाः । तेभ्योऽनन्तगुणा वनस्पतिकायिकाः । ते च व्यवहारिका
अव्यवहारिकाश्च ।¹
"गोला य असंखिज्जा असंखणिग्गोअ गोलओ भणिओ ।
इक्किक्कम्मि णिगोए अणन्तजीवा मुणेअव्वा ॥ १ ॥
सिज्झन्ति जत्तिया खलु इह संव्यवहारजीवरासीओ ।
एंति अणाइवणस्सइ रासीओ तत्तिया तम्मि ॥ २ ॥"²
इति वचनाद् यावन्तश्च यतो मुक्तिं गच्छन्ति जीवास्तावन्तोऽनादिनिगोदवनस्पतिरा-
शेस्तत्रागच्छन्ति । न च तावता तस्य काचित् परिहाणिर्निगोदजीवानन्त्यस्याक्षयत्वात् । निगोद्-
स्वरूपं च समयराग्गराद् अवगन्तव्यम् । अनाद्यननन्तेऽपि काले ये केचिन्निर्वृताः निर्वान्ति निर्वा-
अग्निकायसे विशेष अधिक पृथिवीकायिक, पृथिवीकायसे जलकायिक जलकायसे वायुकायिक और वायुकायसे
अनंतगुणे वनस्पतिकायिक जीव हैं । व्यवहारिक और अव्यवहारिकके भेदसे वनस्पतिकायिक जीव
दो प्रकारके होते हैं—
"गोल असंख्यात होते हैं, एक गोलमें असंख्यात निगोद रहते हैं और एक निगोदमें अनन्त जीव
रहते हैं । जितने जीव व्यवहारराशिसे निकल कर मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि वनस्पति राशिसे
निकल कर व्यवहारराशि में आ जाते हैं ।"
इसलिये जितने जीव मोक्ष जाते हैं, उतने प्राणी अनादि निगोद [ देखिये परिशिष्ट ( क ) ]
वनस्पति राशिमेंसे आ जाते हैं । अतएव निगोद राशिमेंसे जीवोंके निकलते रहनेके कारण संसारी जीवोंका
कभी सर्वथा क्षय नहीं हो सकता । निगोदका स्वरूप समयसागर से जानना चाहिये । जितने जीव अब
तक मोक्ष गये हैं, और आगे जानेवाले हैं, वे निगोद जीवोंके अनन्तवें भाग भी न हैं, न हुए हैं और न
होंगे । अतएव हमारे मतमें न तो मुक्त जीव संसारमें लौटकर आते हैं, और न यह संसार जीवोंसे शून्य
होता है । इसे दूसरे वादियोंने भी माना है। वार्त्तिककारने भी कहा है—
"इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव हैं, इसलिये संसारसे ज्ञानी जीवोंकी मुक्ति होते हुए यह संसार जीवोंसे
खाली नहीं होता । जिस वस्तुका परिमाण होता है, उसीका अंत होता है, वही घटती और समाप्त होती
१. द्विविधा जीवा सांव्यवहारिका असांव्यवहारिकाश्चेति । तत्र ये निगोदावस्थात ऽउद्धृत्य पृथिवीकायि-
कादिभेदेषु वर्तन्ते ते लोकेषु दृष्टिपथमागताः सन्तः पृथिवीकायिकादिव्यवहारमनुपतन्तीति व्यवहारिका
उच्यन्ते । ते च यद्यपि भूयोऽपि निगोदावस्थामुपयान्ति तथापि ते सांव्यवहारिका एव, संव्यवहारे पति-
तत्वात् । ये पुनरनादिकालादारभ्य निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्ठन्ते ते व्यवहारपथातीतत्वादसांव्य-
वहारिकाः । प्रज्ञापनाटीकायां सू० २३४ ।
२. छाया—गोलाश्च असंख्येयाः असंख्येयनिगोदो गोलको भणितः ।
एकैकस्मिन् निगोदे अनन्तजीवा ज्ञातव्याः ॥ १ ॥
सिद्ध्यन्ति यावन्तः खलु इह संव्यवहारजीवराशितः ।
आयान्ति अनादिवनस्पतिराशितस्तावन्तस्तस्मिन् ॥ २ ॥

.२६० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
स्यन्ति च ते निगोदानामनन्तभागेऽपि१ न वर्तन्ते नावतिष्ठत न वत्स्यन्ति । ततश्च कथं मुक्तानां
भवागमनप्रसङ्गः, कथं च संसारस्य रिक्तताप्रसक्तिरिति । अभिप्रेतं चैतद् अन्ययूथ्यानामपि ।
यथा चोक्तं वार्तिककारेण—
“अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।
ब्रह्माण्डलोकजीवानामनन्तत्वाद् अशून्यता ॥ १ ॥
अत्यन्यूनातिरिक्तत्वैर्युज्यते परिमाणवत् ।
वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः ॥ २ ॥”
इति काव्यार्थः ॥ २९ ॥
हैं । अपरिमित वस्तुका न कभी अंत होता है, न वह घटती ओर न समास होती है ।”
यह श्लोकका अर्थ है ॥२९॥
भावार्थ—( १ ) यदि संसारी जीवोंको बराबर मोक्ष मिलता रहे ( जैन शास्त्रोंके अनुसार छह
महीने और आठ समयमें ६०८ जीव मोक्ष जाते हैं ) तो कभी यह संसार जीवों से खाली हो जाना चाहिये !
आजीविक मतानुयायी मस्करी२ ( गोशाल ) आदिका मत था कि मुक्त जीव फिरसे संसारमें जन्म लेते
हैं । अश्वमित्रनेभी इस प्रश्नको लेकर जैन संघमें वाद खड़ा किया था । स्वामी दयानन्दके अनुसार जीव
महाकल्प कालपर्यंत मुक्तिके सुखको भोग कर फिरसे संसारमें उत्पन्न होते हैं । इस कथनकी पुष्टिके लिये
दयानन्द स्वामीने ऋग्वेद३ तथा मुण्डक उपनिषद्के४ प्रमाण उद्धृत किये हैं ।५
जैन विद्वानोंकी मान्यता है कि जिस प्रकार बीजके जल जानेपर अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता,
उसी प्रकार कर्मोंका सर्वथा क्षय होनेपर जीव फिरसे संसारमें जन्म नहीं लेते । पतंजलि, व्यास, अक्षपाद
आदि ऋषियोंकी भी यही मान्यता है । जैन सिद्धांतमें द्वीप और समुद्रोंका असंख्यात परिमाण स्वीकार
किया गया है । इन द्वीप-समुद्रोंमें अनन्तानन्त जीव रहते हैं । सबसे कम त्रस जीव हैं, त्रस जीवोंसे संख्यात
गुणे अग्निकायिक, अग्निकायिक जीवोंसे अधिक पृथिवीकायिक, पृथ्वीसे जलकायिक, जलसे वायुकायिक
और वायुकायिकसे अनन्तगुणे वनस्पतिकायिक जीव हैं । वनस्पतिकायिक जीव व्यावहारिक और अव्याव-
हारिकके भेदसे दो प्रकारके होते हैं । जो जीव निगोदसे निकल कर पृथिवीकाय आदि अवस्थाको प्राप्त
करके फिरसे निगोद अवस्थाको प्राप्त करते हैं, वे जीव व्यवहारिक कहे जाते हैं । तथा जो जीव अनादि
कालसे निगोद अवस्थामें ही पड़े हुए हैं, उन्हें अव्यवहारिक कहते हैं । जैन सिद्धांतके अनुसार असंख्यात
१. एक्कणिगोदसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहिं अणंतगुणा सव्वेण विदीदकालेण ॥
छाया—एकनिगोदशरीरे जीवा द्रव्यप्रमाणतो दृष्टा ।
सिद्धैरनन्तगुणाः सर्वेण व्यतीतकालेन ॥
गोम्मटसारे जीव० १९५ ।
२. कर्मजनसंश्लेषात् संसारसमागमोऽस्तीति मस्करिदर्शनं । गोम्मटसार जीवकांड ६९ टीका । तथा, ‘ज्ञानिनो
धर्मतीर्थस्य’ आदि, देखिये पीछे, स्याद्वादमंजरी पृ० ४ ।
३. १-२४-१-२ ।
४. ते ब्रह्मलोके ह परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे । मुण्डक उ० ३-२-६ ।
५. देखिये सत्यार्थप्रकाश सं० १९८३ पृ० १५५ ।

सर जे० सी० बोसने टिन, शीशा६, प्लैटिनम आदि धातुओंमें भी Footnote marker:शीशा६`.

  • Line 16:
    प्रतिक्रिया ( Response ) सिद्ध की है ।७
    Footnote marker: है ।७.

  • Line 17:
    परस्पर विरुद्ध अर्थको प्रतिपादन करनेवाले अन्य दर्शन एक दूसरेसे ईर्ष्या करते हैं, अतएव सम्पूर्ण

  • Line 18:
    नय स्वरूप होनेसे भगवानका सिद्धान्त ही मात्सर्य रहित हो सकता है—

  • Divider:
    There is a horizontal line below line 18. We can represent it or continue with footnotes. The user prompt says "line by line... prefix each line with line marker like , ".

  • Footnotes:

    • Line 19:
      १. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपरिणामेन भविष्यतीति भव्यः । तद्विपरीतोऽभव्यः । तत्त्वार्थराजवार्तिक २-७,
      Wait, let's verify तद्विपरीतोऽभव्यः:
      तद्विपरीतोऽभव्यः । -> yes, avagraha ऽ.
      तत्त्वार्थराजवार्तिक २-७,
    • Line 20:
      `७,

२६२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो . व्य. श्लोक ३०
अन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद् यथा परे मत्सरिणः प्रवादाः ।
नयानशेषानविशेषमिच्छन् न पक्षपाती समयस्तथा ते ॥३०॥
प्रकर्षेण उद्यते प्रतिपाद्यते स्वाभ्युपगतोऽर्थो यैरिति प्रवादाः । यथा येन प्रकारेण । परे
भवच्छासनाद् अन्ये । प्रवादा दर्शनानि । मत्सरिणः अतिशयने मत्वर्थीयविधानात् साति-
शयासहनताशालिनः क्रोधकषायकलुषितान्तःकरणाः सन्तः पक्षपातिनः, इतरपक्षतिरस्कारेण
स्वकक्षीकृतपक्षव्यवस्थापनप्रवणा वर्तन्ते । कस्माद् हेतोर्मत्सरिणः इत्याह । अन्योऽन्यपक्ष-
प्रतिपक्षभावात् । पच्यते व्यक्तीक्रियते साध्यधर्मवैशिष्टयेन हेत्वादिभिरिति पक्षः । कक्षीकृत-
धर्मप्रतिष्ठापनाय साधनोपन्यासः । तस्य प्रतिकूलः प्रतिपक्षः । पक्षस्य प्रतिपक्षो विरोधी
पक्षः प्रतिपक्षः । तस्य भावः पक्षप्रतिपक्षभावः । अन्योऽन्यं परस्परं यः पक्षप्रतिपक्षभावः
पक्षप्रतिपक्षत्वमन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावस्तस्मात् ॥
तथाहि । य एव मीमांसकानां नित्यः शब्द इति पक्षः स एव सौगातानां प्रतिपक्षः ।
तन्मते शब्दस्यानित्यत्वात् । य एव सौगतानामनित्यः शब्द इति पक्षः स एव मीमांसकानां
प्रतिपक्षः । एवं सर्वप्रयोगेषु योज्यम् । तथा तेन प्रकारेण ते तव । सम्यक् एति गच्छति शब्दोऽ-
र्थमनेन इति “पुंनाम्नि घः ।२” समयः संकेततः । यद्वा सम्यग् अवैपरीत्येन ईयन्ते ज्ञायन्ते
जीवाजीवादयोऽर्था अनेन इति समयः सिद्धान्तः । अथवा सम्यग् अयन्ते गच्छन्ति जीवाद्यः
पदार्थाः स्वस्मिन् स्वरूपे प्रतिष्ठां प्राप्नुवन्ति अस्मिन् इति समय आगमः । न पक्षपाती नैक-
पक्षानुरागी । पक्षपातित्वस्य हि कारणं मत्सरित्वं परप्रवादेषु उक्तम् । त्वत्समयस्य च
मत्सरित्वाभावाद् न पक्षपातित्वम् । पक्षपातित्वं हि मत्सरित्वेन व्याप्तम् , व्यापकं च निवर्तमानं
श्लोकार्थ—अन्यवादी लोग परस्पर पक्ष और प्रतिपक्ष भाव रखनेके कारण एक दूसरेसे ईर्ष्या करते
हैं, परन्तु सम्पूर्ण नयोंको एक समान देखनेवाले आपके शास्त्रोंमें पक्षपात नहीं है ।
व्याख्यार्थ—जिसके द्वारा इष्ट अर्थको उत्तमतासे प्रतिपादन किया जाय, उसे प्रवाद कहते हैं ।
आपके शासनके अतिरिक्त अन्य दर्शन परस्पर पक्ष और प्रतिपक्षका दुराग्रह रखनेके कारण एक दूसरेके
पक्षका तिरस्कार करके अपने सिद्धान्तको स्थापित करते हैं, अतएव वे लोग अत्यन्त असहनशील होनेके
कारण क्रोध कषायसे युक्त होकर अपने दर्शनोंमें पक्षपात करते हैं । 'मत्सरी' शब्दमें मत्वर्थमें इन् प्रत्यय
सातिशय अर्थको द्योतन करनेके लिए किया गया है । जो साध्यसे युक्त होकर हेतु आदिके द्वारा व्यक्त किया
जाय, उसे पक्ष कहते हैं । जो पक्षके विरुद्ध हो, उसे प्रतिपक्ष कहते हैं ।
तथाहि—जैसे मीमांसकोंके मतमें 'शब्द नित्य है,' यह पक्ष बौद्धोंकाप्रतिपक्ष है, क्योंकि बौद्धोंके मतमें
शब्द अनित्य है, इसी तरह 'शब्द अनित्य है' यह बौद्धोंका पक्ष मीमांसकोंका प्रतिपक्ष है । इसी प्रकार अन्यत्र
भी समझना चाहिये । परन्तु आपके समयमें किसी एक पक्षके प्रति अनुराग नहीं देखा जाता । अन्य वादोंमें
ईर्ष्या करना ही पक्षपातका कारण है । आपके समयमें ईर्ष्याका अभाव होनेसे पक्षपात नहीं है । व्यापकके
न होनेपर व्याप्य भी नहीं होता, अतएव आपके समयमें ईर्ष्या न होनेसे पक्षपातका भी अभाव है । यहाँ
समय शब्दका चार प्रकारसे अर्थ किया गया है । ( १ ) जिससे शब्दका अर्थ ठीक-ठीक मालूम हो—संकेत ।
यहाँ सम्-इ धातुसे “पुंनाम्नि घः” सूत्रसे समय शब्द बनता है; ( २ ) जिससे जीव, अजीव आदि पदार्थोंका
भले प्रकारसे ज्ञान हो—सिद्धान्त; ( ३ ) जिसमें जीव आदि पदार्थोंका ठीक प्रकारसे वर्णन हो—आगम;
१. भूमिन्निन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयने । संबन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुवादयः ।
२. हैमसूत्रे ५-३-१३० ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक ३० ] स्याद्वादमञ्जरी २६३
व्याप्यमपि निवर्तयति इति मत्सरित्वे निवर्त्तमाने पक्षपातित्वमपि निवर्त्तत इति भावः । तव
समय इति वाच्यवाचकभावलक्षणे सम्बन्धे षष्ठी । सूत्रापेक्षया गणधरकर्तृकत्वेऽपि समयस्य
अर्थापेक्षया भगवत्कर्तृकत्वाद् वाच्यवाचकभावो न विरुध्यते । “अत्थं भासइ अरहा सुत्तं
गंथंति गणहरा णिउणं”¹ इति वचनात् । अथवा उत्पादव्ययध्रौव्यप्रपञ्चः समयः । तेषां च
भगवता साक्षान्मातृकापदरूपतयाभिधानात् । तथा चार्षम्— “उप्पन्ने वा विगमे वा धुवेति
वा” इत्यदोषः ॥
मत्सरित्वाभावमेव विशेषणद्वारेण समर्थयति । नयानशेषानविशेषमिच्छन् इति ।
अशेषान् समस्तान् नयान् नैगमादीन्, अविशेषं निर्विशेषं यथा भवति एवम् इच्छन् आकाङ्-
क्षन् सर्वनयात्मकत्वादनेकान्तवादस्य । यथा विशकलितानां मुक्तामणीनामेकसूत्रानुस्यूतानां
हारव्यपदेशः एवं पृथगभिसन्धीनां नयानां स्याद्वादलक्षणैकसूत्रप्रोतानां श्रुताख्यप्रमाणव्यपदेश
इति । ननु प्रत्येकं नयानां विरुद्धत्वे कथं समुदितानां निर्विरोधितोच्यते । यथा हि समी-
चीनं मध्यस्थं न्यायनिर्णेतारमासाद्य परस्परं विवदमाना अपि वादिनो विवादाद् विरमन्ति
एवं नया अन्योऽन्यं वैरायमाणा अपि सर्वज्ञशासनमुपेत्य स्याच्छब्दप्रयोगोपशमितविप्रति-
पत्तयः सन्तः परस्परमत्यन्तं सुहृद्भूयावतिष्ठन्ते । एवं च सर्वनयात्मकत्वे भगवत्समयस्य
सर्वदर्शनमयत्वमविरुद्धमेव, नयरूपत्वाद् दर्शनानाम् ॥
न च वाच्यं तर्हि भगवत्समयस्तेषु कथं नोपलभ्यते इति । समुद्रस्य सर्वसरिन्मयत्वेऽपि
विभक्तासु तासु अनुपलम्भात् । तथा च वक्तृवचनयोरैक्यमध्यवस्य श्रीसिद्धसेनदिवाकर-
पादाः—
( ४ ) तथा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके सिद्धान्तको समय कहते हैं । उत्पाद आदिको जिन भगवान्ने 'अष्ट
प्रवचनमाता' कहा है । आर्षवाक्य भी है— “उत्पन्न भी होता है, नष्ट भी होता है, और स्थिर भी रहता
है । यद्यपि आगमोंके सूत्र गणधरोंके बनाये हुए होते हैं, परन्तु "अर्हंत अर्थका व्याख्यान करते हैं, और
गणधर उसे सूत्रमें उपनिबद्ध करते हैं”—इस वचनसे अर्थकी अपेक्षासे भगवान् ही समयके रचयिता हैं ।
अतएव आपके साथ आगमका वाच्य-वाचक भाव बन सकता है ।
आपका सिद्धान्त ईर्ष्यासे रहित है, क्योंकि आप नैगम आदि सम्पूर्ण नयोंको एक समान देखते हैं ।
अनेकांत वादमें सर्वनयोंका समावेश होता है । जिस प्रकार बिखरे हुए मोतियोंको एक सूतमें पिरो देनेसे
मोतियों का सुन्दर हार बन कर तैयार हो जाता है, उसी तरह भिन्न-भिन्न नयोंको स्याद्वाद रूपी सूतमें पिरो
देनेसे सम्पूर्ण नय 'श्रुत प्रमाण' कहे जाते हैं । शङ्का—यदि प्रत्येक नय परस्पर विरुद्ध है, तो उन नयोंके
एकत्र मिलानेसे उनका विरोध किस प्रकार नष्ट होता है । समाधान—जैसे परस्पर विवाद करते हुए वादी
लोग किसी मध्यस्थ न्यायीके द्वारा न्याय किये जानेपर विवाद करना बन्द करके आपसमें मिल जाते हैं,
वैसे ही .परस्पर विरुद्ध नय सर्वज्ञ भगवान्के शासनकी शरण लेकर 'स्यात्' शब्दसे विरोधके शान्त हो
जानेपर परस्पर अत्यन्त सुहृद् भावसे एकत्र रहने लगते हैं । अतएव भगवान्के शासनके सर्व नय स्वरूप
होनेसे भगवान्का शासन सम्पूर्ण दर्शनोंसे अविरुद्ध है, क्योंकि प्रत्येक दर्शन नय स्वरूप है ।
शङ्का—यदि भगवान्का शासन सर्व दर्शन स्वरूप हैं, तो यह शासन सब दर्शनोंमें क्यों नहीं पाया
जाता ? समाधान—जिस प्रकार समुद्रके अनेक नदी रूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न नदियोंमें समुद्र नहीं
पाया जाता, उसी तरह भिन्न-भिन्न दर्शनोंमें जैन दर्शन नहीं पाया जाता । वक्ता और उसके वचनोंमें अभेद
मान कर सिद्धसेन दिवाकरने कहा है—
१. छाया-अर्थं भाषतेऽर्हन् सूत्रं ग्रन्थन्ति गणधरा निपुणम् । विशेषावश्यकभाष्ये १११९ ।