स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
समभिरूढ और एवंभूत ये शब्दके तीन विभाग करनेसे नयोंके आठ भेद होते हैं ।१ ( झ ) नैगम, संग्रह
आदि सात प्रसिद्ध नयोंमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय मिला देनेसे नयोंकी संख्या नौ हो जाती है । इन
नयोंके माननेवाले आचार्योंका खंडन द्रव्यानुयोगतर्कणामें मिलता है ।२ ( ट ) नैगमके नौ भेद करके
संग्रह आदि छह नयोंको मिलानेसे नयोंके १५ भेद होते हैं ।३ ( ठ ) निश्चय नयके २८ और व्यवहार नयके
८ भेद मिलाकर नयोंके ३६ भेद होते हैं ।४ ( ड ) प्रत्येक नयके सौ सौ भेद करनेपर नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र और शब्द इन पाँच नयोंके माननेसे नयोंके पाँच सौ, और सात नय माननेसे नयोंके सात सौ भेद
होते हैं ।५ ( ढ ) जितने प्रकारके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं, इसलिये नयके असंख्यात
भेद हैं ।
( ३ )—( १ ) ( क ) सामान्य और विशेष पदार्थोंको ग्रहण करना नैगम नय है । यह लक्षण
मल्लिषेण, सिद्धर्षि, जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण, अभयदेव आदि श्वेताम्बर आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता
है ।६ ( ख ) दो धर्म, अथवा दो धर्मी अथवा एक धर्म और एक धर्मीमें प्रधान और गौणताकी विवक्षा
करनेको नैगम कहते हैं । नैगम नयका यह लक्षण देवसूरि, विद्यानन्दि, यशोविजय आदिके ग्रन्थोंमें
पाया जाता है ।७ ( ग ) जिसके द्वारा लौकिक अर्थका ज्ञान हो, उसे नैगम कहते हैं । यह लक्षण जिन-
भद्रगणि, सिद्धसेनगणि आदि आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता है ।८ ( घ ) संकल्प मात्रके ग्रहण करनेको
नैगम कहते हैं ।९ जैसे किसी पुरुषको प्रस्थ ( पाँच सेरका परिमाण ) बनानेके लिये जंगलमें लकड़ी लेने
जाते हुए देखकर किसीने पूछा, तुम कहाँ जा रहे हो ? उस आदमीने उत्तर दिया कि वह प्रस्थ लेने जा
रहा है । पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानंदि आदि दिगम्बर आचार्योंको यही लक्षण मान्य है । ( प्रस्थका
उदाहरण नैगम नयके वर्णनमें हरिभद्रके आवश्यकटिप्पणमें भी दिया गया है )। नैगमके नौ भेद हैं ।
आरंभमें पर्याय नैगम, द्रव्य नैगम, द्रव्य-पर्याय नैगम—ये नैगमके तीन भेद हैं । इनमें अर्थ-पर्याय नैगम, व्यंजन-
पर्याय नैगम और अर्थ व्यंजन-पर्याय नैगम—ये पर्याय नैगमके तीन भेद हैं । शुद्ध द्रव्य नैगम और अशुद्ध द्रव्य
नैगम—ये द्रव्य नैगमके दो भेद हैं । तथा शुद्ध द्रव्यार्थ-पर्याय नैगम, शुद्ध द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम, अशुद्ध
द्रव्यार्थ द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम—ये चार द्रव्य-पर्याय नैगमके भेद हैं । इन सबको मिलानेसे नैगमके नौ भेद
होते हैं । न्याय-वैशेषिकोंका नैगमाभासमें अन्तर्भाव होता है । ( २ ) विशेषोंकी अपेक्षा न करके वस्तुको
सामान्य रूपसे जाननेको संग्रह नय कहते हैं; जैसे जीव कहनेसे त्रस, स्थावर आदि सब प्रकारके जीवोंका
ज्ञान होता है । संग्रह नय पर संग्रह और अपर संग्रहके भेदसे दो प्रकारका है । सत्ताद्वैतको मानकर सम्पूर्ण
१. तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४, ३५ ।
२. यदि पर्यायद्रव्यार्थनयौ भिन्नौ विलोकितौ ।
अर्पितानर्पिताभ्यां तु स्युर्नैकादश तत्कथम् ॥ द्रव्यानुयोगतर्कणा ८-११ ।
३. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-४८ ।
४. देवसेनसूरि, नयचक्रसंग्रह १८६, १८७, १८८ ।
५. इक्किक्कको य सयविहो सत्तणयसया हवंति एमेव ।
अन्ने वि य आएसो पंचेव सया नयाणं तु ॥ विशेषावश्यक भाष्य २२६४ ।
६. ये परस्परविशकलितौ सामान्यविशेषाविच्छन्ति तत् समुदायरूपो नैगमः । सिद्धर्षि, न्यायावतार टीका ।
७. यद्वा नैकं गमो योऽत्र सततां नैगमो मतः ।
धर्मयोर्धर्मिणो वापि विवक्षा धर्मधर्मिणोः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२१ ।
८. निगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते इति लौकिका अर्थाः तेषु निगमेषु भवो योऽध्यवसायः ज्ञानाख्यः स नैगमः ।
सिद्धसेनगणि, तत्त्वार्थ टीका ।
९. अर्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि पृ० ७८ ।