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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 458 में से

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पृष्ठ 305

अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५३
अंशके जाननेको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं कहा जा सकता । इसलिये नयको प्रमाण और अप्रमाण दोनोंसे
अलग मानना चाहिए । ¹
( २ ) जितने तरहके वचन हैं, उतने ही नय हो सकते हैं । इसलिये नयके उत्कृष्ट भेद असंख्यात
हो सकते हैं । इसलिये विस्तारसे नयोंका प्ररूपण नहीं किया जा सकता । एकसे लेकर नयोंके असंख्यात भेद
किये गये हैं । ( क ) सामान्यसे शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा नयका एक भेद ² है ( ख ) सामान्य और विशेष-
की अपेक्षा द्रव्यार्थिक ( द्रव्यास्तिक ) और पर्यायार्थिक ( पर्यायास्तिक ) ये नयके दो भेद हैं । सामान्य और
विशेषको छोड़कर नयका कोई दूसरा विषय नहीं होता, अतएव सम्पूर्ण नैगम आदि नयोंका इन्हीं दो नयोंमें
अन्तर्भाव हो जाता है । ³ ( ग ) संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र इन तीन अर्थनयोंमें शब्द नयको मिलाकर
नयके चार भेद होते हैं । ⁴ ( घ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द नयके भेदसे नय पाँच प्रकारके
होते हैं । यहाँ भाष्यकारने सांप्रत, समभिरूढ़ और एवंभूतको शब्द नयके भेद स्वीकार किये हैं । ⁵ ( च )
जिस समय नैगम नय सामान्यको विषय करता है, उस समय वह संग्रह नयमें गर्भित होता है, और जिस
समय विशेषको विषय करता है, उस समय व्यवहारमें गर्भित होता है । अतएव नैगम नयका संग्रह और
व्यवहार नयमें अन्तर्भाव करके सिद्धसेन दिवाकरने छह नयोंको माना है । ⁶ ( छ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूतके भेदसे नयके सात भेद होते हैं । यह मान्यता श्वेताम्बर आगम
परंपरामें और दिगम्बर ग्रन्थोंमें पायी जाती है । ⁷ ( ज ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र तथा सांप्रत,
१. नायं वस्तु न चावस्तु वस्त्वंशः कथ्यते बुधैः ।
नासमुद्रः समुद्रो वा समुद्रांशो यथैव हि ॥
तन्मात्रस्य समुद्रत्वे शेषांशास्यासमुद्रता ।
समुद्रबहुता वा स्यात् तत्त्वे क्वास्तु समुद्रवित् ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-६-५, ६ ।
२. (अ) सामान्यादेशतस्तावदेक एव नयः स्थितः ।
स्याद्वादप्रविभक्तार्थविशेषव्यञ्जनात्मकः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२ ।
(आ) यदि वा शुद्धत्वनयान्नाप्युत्पादो व्ययोऽपि न ध्रौव्यम् ।
गुणश्च पर्यय इति वा न स्याच्च केवलं सदिति ॥ राजमल्ल-पंचाध्यायी १-२१६ ।
३. ( अ ) दव्वट्ठिओ य पज्जवणओ य सेसा वियप्पा सिं ।
( द्रव्यास्तिकश्च पर्यायनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः ) सन्मतितर्क १-३ ।
परस्परविविक्तसामान्यविशेषविषयत्वात् द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकावेव नयौ, न च तृतीयं प्रकारान्तर-
मस्ति यद्विषयोऽन्यस्ताभ्यां व्यतिरिक्तो नयः स्यात् । अभयदेव टीका ।
( आ ) संक्षेपाद् द्वौ विशेषेण द्रव्यपर्यायगोचरौ । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-३ ।
४. नैगमनयो द्विविधः सामान्यग्राही विशेषग्राही च । तत्र यः सामान्यग्राही स संगृहेऽन्तर्भूतः, विशेषग्राही तु
व्यवहारे । तदेवं संग्रहव्यवहारऋजुसूत्रशब्दादित्रयं चैक इति चत्वारो नयाः । समवायांग टीका ।
५. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा नयाः । तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४ ।
६. जो सामन्नगाही स नेगमो संगहं गओ अहवा ।
इयदो ववहारमिओ जो तेण समाणणिद्देसो ॥ विशेषावश्यक भाष्य ३९ ।
सिद्धसेनीयाः पुनः षडेव नयानभ्युपगतवन्तः । नैगमस्य संग्रहव्यवहारयोरन्तर्भावविवक्षणात् । विशेषावश्यक
भाष्य ४५ ।
७. से किं तं णए ? सत्तमूलणया पण्णत्ता । तं जहा—णेगमे संगहे ववहारे उज्जुसुए सद्दे समभिरूढे एवंभूए ।
अनुयोगद्वारसूत्र । तथा स्थानांग सू० ५५२; भगवती सू० ४६९ ।