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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 458 में से

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पृष्ठ 311

अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५९
षण्णां जीवनिकायानामेतद् अल्पबहुत्वम् । सर्वस्तोकास्त्रसकायिकाः । तेभ्यः संख्यातगुणाः
तेजस्कायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिकाः पृथिवीकायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिका अप्कायिकाः ।
तेभ्योऽपि विशेषाधिका वायुकायिकाः । तेभ्योऽनन्तगुणा वनस्पतिकायिकाः । ते च व्यवहारिका
अव्यवहारिकाश्च ।¹
"गोला य असंखिज्जा असंखणिग्गोअ गोलओ भणिओ ।
इक्किक्कम्मि णिगोए अणन्तजीवा मुणेअव्वा ॥ १ ॥
सिज्झन्ति जत्तिया खलु इह संव्यवहारजीवरासीओ ।
एंति अणाइवणस्सइ रासीओ तत्तिया तम्मि ॥ २ ॥"²
इति वचनाद् यावन्तश्च यतो मुक्तिं गच्छन्ति जीवास्तावन्तोऽनादिनिगोदवनस्पतिरा-
शेस्तत्रागच्छन्ति । न च तावता तस्य काचित् परिहाणिर्निगोदजीवानन्त्यस्याक्षयत्वात् । निगोद्-
स्वरूपं च समयराग्गराद् अवगन्तव्यम् । अनाद्यननन्तेऽपि काले ये केचिन्निर्वृताः निर्वान्ति निर्वा-
अग्निकायसे विशेष अधिक पृथिवीकायिक, पृथिवीकायसे जलकायिक जलकायसे वायुकायिक और वायुकायसे
अनंतगुणे वनस्पतिकायिक जीव हैं । व्यवहारिक और अव्यवहारिकके भेदसे वनस्पतिकायिक जीव
दो प्रकारके होते हैं—
"गोल असंख्यात होते हैं, एक गोलमें असंख्यात निगोद रहते हैं और एक निगोदमें अनन्त जीव
रहते हैं । जितने जीव व्यवहारराशिसे निकल कर मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि वनस्पति राशिसे
निकल कर व्यवहारराशि में आ जाते हैं ।"
इसलिये जितने जीव मोक्ष जाते हैं, उतने प्राणी अनादि निगोद [ देखिये परिशिष्ट ( क ) ]
वनस्पति राशिमेंसे आ जाते हैं । अतएव निगोद राशिमेंसे जीवोंके निकलते रहनेके कारण संसारी जीवोंका
कभी सर्वथा क्षय नहीं हो सकता । निगोदका स्वरूप समयसागर से जानना चाहिये । जितने जीव अब
तक मोक्ष गये हैं, और आगे जानेवाले हैं, वे निगोद जीवोंके अनन्तवें भाग भी न हैं, न हुए हैं और न
होंगे । अतएव हमारे मतमें न तो मुक्त जीव संसारमें लौटकर आते हैं, और न यह संसार जीवोंसे शून्य
होता है । इसे दूसरे वादियोंने भी माना है। वार्त्तिककारने भी कहा है—
"इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव हैं, इसलिये संसारसे ज्ञानी जीवोंकी मुक्ति होते हुए यह संसार जीवोंसे
खाली नहीं होता । जिस वस्तुका परिमाण होता है, उसीका अंत होता है, वही घटती और समाप्त होती
१. द्विविधा जीवा सांव्यवहारिका असांव्यवहारिकाश्चेति । तत्र ये निगोदावस्थात ऽउद्धृत्य पृथिवीकायि-
कादिभेदेषु वर्तन्ते ते लोकेषु दृष्टिपथमागताः सन्तः पृथिवीकायिकादिव्यवहारमनुपतन्तीति व्यवहारिका
उच्यन्ते । ते च यद्यपि भूयोऽपि निगोदावस्थामुपयान्ति तथापि ते सांव्यवहारिका एव, संव्यवहारे पति-
तत्वात् । ये पुनरनादिकालादारभ्य निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्ठन्ते ते व्यवहारपथातीतत्वादसांव्य-
वहारिकाः । प्रज्ञापनाटीकायां सू० २३४ ।
२. छाया—गोलाश्च असंख्येयाः असंख्येयनिगोदो गोलको भणितः ।
एकैकस्मिन् निगोदे अनन्तजीवा ज्ञातव्याः ॥ १ ॥
सिद्ध्यन्ति यावन्तः खलु इह संव्यवहारजीवराशितः ।
आयान्ति अनादिवनस्पतिराशितस्तावन्तस्तस्मिन् ॥ २ ॥