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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 458 में से

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पृष्ठ 309

अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५७
न च क्षीणकर्मणां भवाधिकारः ।
“दग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः ।
कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्कुरः ॥”१
इति वचनात् । आह च पतञ्जलिः—“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः”२ इति । तट्टीका३
च—“सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुषावनद्धा
शालितण्डुला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति नापनीततुषा दग्धबीजभावा । तथा
क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति । नापनीतक्लेशो न प्रसंख्यानदग्धक्लेशबीजभावो
वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोगः” इति । अक्षपादोऽप्याह—“न प्रवृत्तिः प्रति-
सन्धानाय हीनक्लेशस्य”४ इति ॥
एवं विभङ्गज्ञानिशिवराजर्षिमतानुसारिणो दूषयित्वा उत्तरार्द्धेन भगवदुपज्ञमपरि-
मितात्मवादं निर्दोषतया स्तौति । षड्जीवेत्यादि । त्वं तु हे नाथ तथा तेन प्रकारेण अनन्त-
संख्यमनन्ताख्यसंख्याविशेषयुक्तं षड्जीवकायम् । अजीवन् जीवन्ति जीविष्यन्ति चेति जीवा
इन्द्रियादिज्ञानादिद्रव्यभावप्राणधारणयुक्ताः तेषां “संघे चानूर्ध्वे ।”५ इति चिनोतेर्घञि आदेइच
कत्वे कायः समूह जीवकायः पृथिव्यादिः षण्णां जीवकायानां समाहारः षड्जीवकायम् ।
पात्रादिदर्शनाद् नपुंसकत्वम् । अथवा षण्णां जीवानां कायः प्रत्येकं सङ्घातः षड्जीवकायस्तं
षड्जीवकायम् । पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसलक्षणषड्जीवनिकायम् । तथा तेन प्रकारेण ।
जिन जीवोंके कर्म नष्ट हो गये हैं, वे फिरसे संसारमें नहीं आते । कहा भी है—
“जिस प्रकार बीजके जल जानेपर बीजसे अंकुर नहीं पैदा हो सकता, उसी तरह कर्मबीजके जल
जानेपर संसार रूपी अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता ।”
पतंजलिने कहा है—“मूलके रहनेपर ही जाति, आयु और भोग होते हैं ।” टीकाकार व्यासने
कहा है—“क्लेशोंके होनेपर ही कर्मोंकी शक्ति फल दे सकती है, क्लेशके उच्छेद होनेपर कर्म फल नहीं देते ।
जिस प्रकार छिलकेसे युक्त चावलोंसे अंकुर पैदा हो सकते हैं, छिलका उतार देनेसे चावलोंमें पैदा होनेकी
शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार क्लेशोंसे युक्त कर्मशक्ति फल देती है, क्लेशोंमें नष्ट हो जानेपर कर्मशक्तिमें
विपाक नहीं होता । यह विपाक जाति, आयु और भोगके भेदसे तीन प्रकारका है ।” अक्षपाद ऋषिने भी
कहा है—“जिसके क्लेशोंका क्षय हो गया है, उसको प्रवृत्ति बन्धका कारण नहीं होती ।”
इस प्रकार विभंगज्ञानी शिवराज महर्षिके अनुयायियोंकी मान्यता सदोष सिद्ध करके जिन
भगवान्के कहे हुए अनन्त जीववादको निर्दोष सिद्ध करते हैं । जो भूतकालमें जीते थे, वर्तमानमें जीते हैं,
और भविष्यमें जीयेंगे, उन्हे जीव कहते हैं । ये जीव इन्द्रिय आदि दस द्रव्य प्राणोंको और ज्ञान आदि भाव
प्राणोंको धारण करते हैं । जीवोंके समूहको जीवकाय कहते हैं । यहाँ 'संघे वानूर्ध्वे' सूत्रसे 'चि' धातुसे
'घञ्' प्रत्यय होनेपर 'च' के स्थानमें 'क' हो जानेसे 'काय' शब्द बनता है । पृथिवी, अप्, तेज, वायु,
वनस्पति और त्रस इन छह प्रकारके जीवोंको 'षट्काय जीव' कहा है । यहाँ 'पात्र' आदि शब्दोंमें षड्-
१. तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये १०-७ ।
२. पातञ्जलसूत्रे २-१३ ।
३. व्यासभाष्ये । २-१३ ।
४. गौतमसूत्रे ४-१-६४ ।
५. हैमसूत्रे ५-३-८० ।
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