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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 458 में से

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पृष्ठ 302

२५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
भिन्नमर्थं समभिरोहन् समभिरूढः । इन्‍दनाद् इन्द्रः शकनाच्छक्रः पूर्दारणात् पुरन्दर इत्यादिषु
यथा । पर्यायध्वनीनामभिधेयनानात्वमेव कक्षीकुर्वाणस्तदाभासः । यथेन्द्रः शक्रः पुरन्दर
इत्यादयः शब्दा भिन्नाभिधेया एव भिन्नशब्दत्वात् करिकुरङ्गतुरङ्गशब्दवद् इत्यादिः । शब्दानां
स्वप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाविशिष्टमर्थं वाच्यत्वेनाभ्युपगच्छन् एवम्भूतः । यथेन्दनमनुभवन्
इन्द्रः शकनक्रियापरिणतः शक्रः पूर्दारणप्रवृत्तः पुरन्दर इत्युच्यते । क्रियानाविष्टं वस्तु न घट-
शब्दवाच्यम् घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाशून्यत्वात् पटवद् इत्यादिः ॥
एतेषु चत्वारः प्रथमेऽर्थनिरूपणप्रवणत्वाद् अर्थनयाः । शेषास्तु त्रयः शब्दवाच्यार्थ-
गोचरतया शब्दनयाः । पूर्वः पूर्वो नयः प्रचुरगोचरः परः परस्तु परिमितविषयः । सन्मात्र-
गोचरात् संग्रहात् नैगमो भावाभावभूमिकत्वाद् भूमविषयः । सद्विशेषप्रकाशकाद् व्यवहारतः
संग्रहः समस्तसत्सम्मूहोपदर्शकत्वाद् बहुविषयः । वर्तमानविषयाद् ऋजुसूत्राद् व्यवहारस्त्रि-
कालविषयावलम्बित्वाद् अनल्पार्थः । कालादिभेदेन भिन्नार्थोपदर्शिनः शब्दादृजुसूत्रस्तद्विपरीत-
वेदकत्वाद् महार्थः । प्रतिपर्यायशब्दमर्थभेदमभीप्सतः समभिरूढात् शब्दस्तद्विपर्ययानुयायित्वात्
प्रभूतविषयः । प्रतिक्रियं विभिन्नमर्थं प्रतिजानानाद् एवम्भूतात् समभिरूढस्तदन्यथार्थस्थाप-
कत्वाद् महागोचरः । नयवाक्यमपि स्वविषये प्रवर्तमानं विधिप्रतिषेधाभ्यां सप्तभङ्गीमनु-
निरुक्तिके भेदसे भिन्न अर्थको कहना समभिरूढ़ नय है; जैसे ऐश्वर्यवान् होनेसे इन्द्र, समर्थ होनेसे शक्र और
नगरोंका नाश करनेवाला होनेसे पुरन्दर कहना । पर्यायवाची शब्दोंको सर्वथा भिन्न मानना समभिरूढ़
नयाभास है; जैसे करि ( हाथी ) कुरंग ( हरिण ) और तुरंग शब्द परस्पर भिन्न हैं, वैसे ही इन्द्र, शक्र
और पुरन्दर शब्दोंको सर्वथा भिन्न मानना । ( ४ ) जिस समय पदार्थोंमें जो क्रिया होती हो, उस समय उस
क्रियाके अनुरूप शब्दोंसे अर्थके प्रतिपादन करनेको एवंभूत नय कहते हैं; जैसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करते
समय इन्द्र, समर्थ होनेके समय शक्र, और नगरोंका नाश करनेके समय पुरन्दर कहना । पदार्थमें अमुक क्रिया
होनेके समयको छोड़कर दूसरे समय उस पदार्थको उसी शब्दसे नहीं कहना, एवंभूत नयाभास है; जैसे, जिस
प्रकार जल लाने आदिकी क्रियाका अभाव होनेसे पटको घट नहीं कहा जा सकता, वैसे ही जल लाने आदि
क्रियाके अतिरिक्त समय घड़ेको घट नहीं कहना ।
सात नयोंमें नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चार नय अर्थका प्रतिपादन करनेके कारण
अर्थनय कहे जाते हैं । बाकीके शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नय शब्दका प्रतिपादन करनेसे शब्दनय कहे
जाते हैं । इन नयोंमें पहले-पहले नय अधिक विषयवाले हैं, और आगे आगेके नय परिमित विषयवाले हैं ।
संग्रह नय सत् मात्रको जानता है, और नैगम नय सामान्य और विशेष दोनोंको जानता है, इसलिये संग्रह
नयकी अपेक्षा नैगम नयका अधिक विषय है । व्यवहार नय संग्रहसे जाने हुए पदार्थोंको विशेष रूपसे जानता
है, और संग्रह समस्त सामान्य पदार्थोंको जानता है, इसलिये संग्रह नयका विषय व्यवहार नयसे अधिक है ।
व्यवहार नय तीनों कालोंके पदार्थोंको जानता है, और ऋजुसूत्रसे केवल वर्तमानकालीन पदार्थोंका ज्ञान
होता है, अतएव व्यवहार नयका विषय ऋजुसूत्रसे अधिक है । शब्द नय, काल आदिके भेदसे वर्तमान पर्यायको
जानता है, ऋजुसूत्रमें काल आदिका कोई भेद नहीं, इसलिये शब्द नयसे ऋजुसूत्र नयका विषय अधिक है ।
समभिरूढ़ नय इन्द्र, शक्र आदि पर्यायवाची शब्दोंको भी व्युत्पत्तिकी अपेक्षा भिन्न रूपसे जानता है, परन्तु
शब्द नयमें यह सूक्ष्मता नहीं रहती, अतएव समभिरूढ़से शब्द नयका विषय अधिक है । समभिरूढ़से जाने
हुए पदार्थोंमें क्रियाके भेदसे वस्तुमें भेद मानना एवंभूत है; जैसे समभिरूढ़की अपेक्षा पुरन्दर और शचीपतिमें
भेद होनेपर भी नगरोंका नाश करनेकी क्रिया न करनेके समय भी पुरन्दर शब्द इन्द्रके अर्थमें प्रयुक्त होता
है, परन्तु एवंभूतकी अपेक्षा नगरोंका नाश करते समय ही इन्द्रको पुरन्दर नामसे कहा जा सकता है ।
अतएव एवंभूतसे समभिरूढ़ नयका विषय अधिक है । प्रमाणके सात भंगोंकी तरह अपने विषयमें विधि और