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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 458 में से

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पृष्ठ 314

२६२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो . व्य. श्लोक ३०
अन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद् यथा परे मत्सरिणः प्रवादाः ।
नयानशेषानविशेषमिच्छन् न पक्षपाती समयस्तथा ते ॥३०॥
प्रकर्षेण उद्यते प्रतिपाद्यते स्वाभ्युपगतोऽर्थो यैरिति प्रवादाः । यथा येन प्रकारेण । परे
भवच्छासनाद् अन्ये । प्रवादा दर्शनानि । मत्सरिणः अतिशयने मत्वर्थीयविधानात् साति-
शयासहनताशालिनः क्रोधकषायकलुषितान्तःकरणाः सन्तः पक्षपातिनः, इतरपक्षतिरस्कारेण
स्वकक्षीकृतपक्षव्यवस्थापनप्रवणा वर्तन्ते । कस्माद् हेतोर्मत्सरिणः इत्याह । अन्योऽन्यपक्ष-
प्रतिपक्षभावात् । पच्यते व्यक्तीक्रियते साध्यधर्मवैशिष्टयेन हेत्वादिभिरिति पक्षः । कक्षीकृत-
धर्मप्रतिष्ठापनाय साधनोपन्यासः । तस्य प्रतिकूलः प्रतिपक्षः । पक्षस्य प्रतिपक्षो विरोधी
पक्षः प्रतिपक्षः । तस्य भावः पक्षप्रतिपक्षभावः । अन्योऽन्यं परस्परं यः पक्षप्रतिपक्षभावः
पक्षप्रतिपक्षत्वमन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावस्तस्मात् ॥
तथाहि । य एव मीमांसकानां नित्यः शब्द इति पक्षः स एव सौगातानां प्रतिपक्षः ।
तन्मते शब्दस्यानित्यत्वात् । य एव सौगतानामनित्यः शब्द इति पक्षः स एव मीमांसकानां
प्रतिपक्षः । एवं सर्वप्रयोगेषु योज्यम् । तथा तेन प्रकारेण ते तव । सम्यक् एति गच्छति शब्दोऽ-
र्थमनेन इति “पुंनाम्नि घः ।२” समयः संकेततः । यद्वा सम्यग् अवैपरीत्येन ईयन्ते ज्ञायन्ते
जीवाजीवादयोऽर्था अनेन इति समयः सिद्धान्तः । अथवा सम्यग् अयन्ते गच्छन्ति जीवाद्यः
पदार्थाः स्वस्मिन् स्वरूपे प्रतिष्ठां प्राप्नुवन्ति अस्मिन् इति समय आगमः । न पक्षपाती नैक-
पक्षानुरागी । पक्षपातित्वस्य हि कारणं मत्सरित्वं परप्रवादेषु उक्तम् । त्वत्समयस्य च
मत्सरित्वाभावाद् न पक्षपातित्वम् । पक्षपातित्वं हि मत्सरित्वेन व्याप्तम् , व्यापकं च निवर्तमानं
श्लोकार्थ—अन्यवादी लोग परस्पर पक्ष और प्रतिपक्ष भाव रखनेके कारण एक दूसरेसे ईर्ष्या करते
हैं, परन्तु सम्पूर्ण नयोंको एक समान देखनेवाले आपके शास्त्रोंमें पक्षपात नहीं है ।
व्याख्यार्थ—जिसके द्वारा इष्ट अर्थको उत्तमतासे प्रतिपादन किया जाय, उसे प्रवाद कहते हैं ।
आपके शासनके अतिरिक्त अन्य दर्शन परस्पर पक्ष और प्रतिपक्षका दुराग्रह रखनेके कारण एक दूसरेके
पक्षका तिरस्कार करके अपने सिद्धान्तको स्थापित करते हैं, अतएव वे लोग अत्यन्त असहनशील होनेके
कारण क्रोध कषायसे युक्त होकर अपने दर्शनोंमें पक्षपात करते हैं । 'मत्सरी' शब्दमें मत्वर्थमें इन् प्रत्यय
सातिशय अर्थको द्योतन करनेके लिए किया गया है । जो साध्यसे युक्त होकर हेतु आदिके द्वारा व्यक्त किया
जाय, उसे पक्ष कहते हैं । जो पक्षके विरुद्ध हो, उसे प्रतिपक्ष कहते हैं ।
तथाहि—जैसे मीमांसकोंके मतमें 'शब्द नित्य है,' यह पक्ष बौद्धोंकाप्रतिपक्ष है, क्योंकि बौद्धोंके मतमें
शब्द अनित्य है, इसी तरह 'शब्द अनित्य है' यह बौद्धोंका पक्ष मीमांसकोंका प्रतिपक्ष है । इसी प्रकार अन्यत्र
भी समझना चाहिये । परन्तु आपके समयमें किसी एक पक्षके प्रति अनुराग नहीं देखा जाता । अन्य वादोंमें
ईर्ष्या करना ही पक्षपातका कारण है । आपके समयमें ईर्ष्याका अभाव होनेसे पक्षपात नहीं है । व्यापकके
न होनेपर व्याप्य भी नहीं होता, अतएव आपके समयमें ईर्ष्या न होनेसे पक्षपातका भी अभाव है । यहाँ
समय शब्दका चार प्रकारसे अर्थ किया गया है । ( १ ) जिससे शब्दका अर्थ ठीक-ठीक मालूम हो—संकेत ।
यहाँ सम्-इ धातुसे “पुंनाम्नि घः” सूत्रसे समय शब्द बनता है; ( २ ) जिससे जीव, अजीव आदि पदार्थोंका
भले प्रकारसे ज्ञान हो—सिद्धान्त; ( ३ ) जिसमें जीव आदि पदार्थोंका ठीक प्रकारसे वर्णन हो—आगम;
१. भूमिन्निन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयने । संबन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुवादयः ।
२. हैमसूत्रे ५-३-१३० ।