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स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

Devanagarihipublished94 पृष्ठ

(४२)

(स्वरोदय विज्ञान)

विलबु कहिजै।

अथ वायु तत्व

मुखतै पूरे अछिरक है। सुरज सुर होई तो कारजु सिद्धि होई। जो सरीर पांच तत्व कौ है सो तेह तत्व में जानि अत है।

पृथ्वी तत्व - सुर में पीत वरन है। चौकोनी। मीठी स्वाद है। पूर्व दिसा वैस वरन। माझनासा बहै अंगुर १२।

जल तत्व - सफेद वरन। गोल मूरत। खारी स्वाद। पछिम दिसा ब्रह्मन वरन। अधोगति सुर वहै, अंगुर १६।

अग्नि तत्व - रक्त वर्ण। त्रिकोन मूरति। चिरपिरो स्वाद। दछिन दिसा। छत्रीवरन। ऊचौ सुर वहै, अंगुर ४८।

वायु तत्व - हरौ वरन। खाटौ स्वाद। लव मूरति। उत्तर दिसा। सुद्र वरन। टेढौ सूत्य जानिजै।

दौऊ बहै तौ दो बालक जानिजै। सुरन सुर होई तौ कन्या जानिजै। अग्नि में गर्भ पतन जानायै। आकास में मृतक जानीजै।

अथ संवत्सर को प्रश्न

चैत्र सुदी परवा के दिन उदय होइ ता समय पदम आसन बैठे, पछिम मुख करकै। उदय होइ सूरज कौ तब पृथ्वी तत्व बहै तो अन्न बहुत होई। पानी नीकौ होइ। मानिषु निरोग होइ। देश विदेस आनन्द बहुत होई। राजा प्रजा सुखी होई।

बरस दिना कौ आगुमनि सुजै जलु तत्व होई तो जलु बहुत होई। मनुष निरोगी होई। अनस्यारी यान उनाहरी बहुत होइ। उपद्रव होइ तेज बहुत। अग्नि बहुत लगै। जलु थोरी होई। लराई राजा प्रजा की होय। अन्न कौ रोगु लगै। जैसी अगिमु बरस कौ जाने अरु युद्ध बलवा अधिक होई। मरही बहुत होई।

अरु वायु तत्व उदौ होइ मुसौ बहुत लगै। बैहर चले। या टाड़ी आवै।

(स्वरोदय विज्ञान)

(४३)

मेघ थोरी बरसै। वायु की पीड़ा अधिक होई। सीतांग अग्नि थोरी जागा में उपद्रव होई।।

आकास तत्व होई तो मेघ बहुत बरसै। पानी की अधिकाई सों अन्न महागी होई। मरही लगी। उपद्रव होई। अन्न की सैन होई। जौं सुन्नसुर होई तौ जागा छूटै। राज छूटै। आयु ना रहे।

मेघ संक्रांति के दिन तत्व विचारे एही प्रकार के। जो सुभ तत्व बहै तो कछु शुभ होई के अत्यधिक निषिद्ध फल होई।

प्रश्न घाउ की जो कोउ पुछै कै वाकै घाउ लगौ है ताहां अग्नि तत्व होई तौ काँधे में कहिजे। वायु तत्व होई तौ पैर में कहिये। आकास तत्व होई तौ माथे में कहिये। जल तत्व होई तौ पांउ में कहिये। सुन्नसुर होई तौ अंग में बताइये।

कोऊ अपनी कारजु पूछै— जो पृथ्वी तत्व होई तौ लाभु होइ झेल सौ। जल तत्व होई तौ तनु लाभु होई। अग्नि तत्व होइ कै वायु तत्व होई तौ हानु होई। आकास निरफल है।

जल तत्व होई तो वेग आवे। पृथ्वी तत्व होई तो नीको जानिअै। लाभु कहिये।

उहाँ है ठिकानै। वायु तत्व होई तौ राह में बताइये। अग्नि तत्व होई तौ रोगी जानिये। रोगी को परसग पूछै तौ पुरन सुर होई तौ जीवै। सुन्न सुर हो पुछै तौ मीचु जानिये। तौ महादेव रक्षा करे तोलौ मरै।

पुछत सुन्न होई, पाछै पुरत होई, तौ जमु आवै। अनेक रोग होई तो लगि जीवै। एक दिना सुरजा वहै कै चन्द्र बहै एक रात बहै तौ तीन बरस में मरै। दो दिन दो रात एक सुर बहै तौ एक बरस जीवै। विसन पट्ट का अरु धरती युव हो न देखै तो छै महिना जीवै। छाया दरपन में सिर नहीं देखै, तो पंद्रह दिन जीवै। भीहै न देखै तौ नौ दिन जीवै। मात्र मंडल न देखै तो सात दिन जीवै। तारा न देखै तौ पाँच दिन जीवै। जीभ न देखै तौ एक दिन जीवै।

ये तत्व जानाति योगी ये पठति नित्यस्व।

(४४)

(स्वरोदय विज्ञान)

मुच्यते सर्व पापेभ्यो लभ्यते वाञ्छितं फलं।

जो याही पौने अभ्यास करे या को निति पाठन करै ताके सब पापु छुटै, मनि वाञ्छित फल पावै।

रविवार को पृथ्वी तत्व होइ उदै में बुद्धवार को प्रथवी तत्व होई। मंगल वा सुक्र को अग्नि तत्व होई सुरज के उदै बृहस्पत को वायु तत्व होई। सनीचर को आकास तत्व को उदै होई।

प्रथम आकास है पाछे वायु है ता पाछे अग्नि है, चौथो जल तत्व है पाँच पौ प्रथी तत्व है एक-एक घरी की मरजादा क्रम तै है। जाहिन जोत पगै तातै घरी-घरी तत्व लीजें छापा प्रमान हारी घरी की छाया पाँउ।

६४४१२४१४१२१११०६
१२३४५६७८
८७६५४३२१
८६१०१११२१३१४१५
आकासवायुअग्निजलप्रथीतत्वप्रभा
१६न.
१७
३०६०९०१२०१४०

अथ स्वासन की मरजादा

डोक नाड़ी पांच घरी प्रभात छुपतर संध्या चंद्रमा के उदै में आप छाया देखै निमषन लागै। छाया गरे में छिन मात्र देखै। मन थीर करकै ता पाछे ऊँची आप परेरै। आसा मिक्षित सुपेत काल पुरुष है तासीं छा प्रान की है ताके मुख में तीन लोक हैं कान न देखै तौ वरष १२ जीवै, २ हातन देखै तौ वरष दस जीवै, १० मुखन देखै तौ वरष १ जीवै।

(स्वरोदय विज्ञान)

(४५)

॥ श्री गणेशायनमः॥

अथ दीपक-ज्ञान-स्वरोदय

(ऋषीकेश कृत)

॥ श्री गणपति स्तुति ॥

दुरद वदन सुख सदन विराजत ।
ईस तनय गनईस सीस रजनीस जु छाजत ।
सिद्धि सिद्धि बुधि देत जाहि कछु विलम न लागै ।
जो सुमिहै चितलाइ भागि ता जन कौ जागै ।
रिषीकेस कलिमल दलन विथन विनासन अघहरन ।
जै गिरिजा नंदन परम गुर, काम धाम मंगल करन ।

अथ नूतक छंद

आदि धरौ ध्यान सुखद स्याम कौ ।
मोहि भरोसी जुहै उनिही के नाम कौ ।
प्राण सकल प्राणनि कौ जानियै ।
देवनि कौ देव सोइ मानियै ।
मैं कौ हरण हार है भगवंत सौ ।
आदि वही मध्य वही अंतसौ ।
वारन की तारन की बार उन ।
वेस्या अजामेर लियौ तारि उन ।
द्रौपती कौ चीर बढ़ायौ उनहीं ।

(४६)

(स्वरोदय विज्ञान)

धर्मसुतै जुद्ध जितायौ उन्हीं ।
राखि लियौ आगितै पैहेलाद कौ ।
टारि दियौ दैत्य की मर्जाद कौ ।
भगतनि के हेत देह धरी जू ।
मतमंद जु उनि सौ न करै नेहजू ।
जानत हो स्याम सवै चित की ।
लाज तुम ही कौ पतित भक्त की
दास रिषीकेश तुम्हारौ जु है ।
तुम तौ बहुत काल नियारौ जु है ।
वेगि दया सिंध दया कीजिये ।
चाहत हो आई दरस दीजिये ।
देखौ न कोऊ और दुख हरन ।
या ते आई परौ तिहारे सरन ।
सरण आये की लाज कीजिये ।
ज्ञान ध्यान देव मोहि भक्ति दीजिये ।

सोरठा

ज्ञान दीप सुख रास, जीवनराम स्नेह सौ ।
जैसे कियौ प्रकास, सुनीयै सो सब कहत हौ ।

नवल छन्द

जमुना के तीर मित्र आगरी बसै ।
जेते नगर है आगरो सुन्दर लसै ।
जानो निवास दास रिषीकेश को वही ।
गुर के प्रसाद कछू ग्यान रीति मैं लही ।
जे मित्र है दयाल जे दया सवै करौ ।
दर्शन दिखाइ दुख विविध दास के हरौ ।

विज्ञान)

(स्वरोदय विज्ञान)

(४७)

तिनि में। महा सुजान जीवनराम जानिये।
परमारथी सुबुधी सुधी सुबखानिये।
तिनि येक धोस मोसो कहीये सुनाइकैं।
भाषा में स्वरोदय सो मुझे दे बनाइकैं।
जदपि में कहौ मित्र गुनी कौ कियौ।
श्री कृष्ण की कृपा सै जथा मत सौ करि दियौ।
जानौ नहीं मैं तो कछू छन्द रीति को।
टारौ न वचन मैंने देवता की प्रतीति कौ।
यह ज्ञान दीप गूँथ रचो हे बनाइकैं।
जों में सुखद प्रकास, तिमिर दे नसाइकैं।

सोरठा

षट् प्रकास सुख कंद, कहौ मित्र षट् छन्द करि।
कृपा करी ब्रज चंद, दीप प्रकासौ ज्ञान तब।

नाग स्वरूपिनी छन्द

सूनौ जु ज्ञान दीपकैं। सुबुधि के समीप कैं।
प्रकास होत लोक मैं। रहै न चित्त सोक मैं।

अरिल्ल

अष्ट दस संत अष्ट सु संवत जानिये।
चैत्र शुक्ल तिथि तीज वार ससि मानिये। (१८०८)

दोहा

अब सुनि ककुभा छन्द करि कहियत प्रथम प्रकास।
यह नाडी स्वर भेद सब भाषे शिव सुखरास।

ककुभाछन्दः पार्वत्युवाच

(४८)

(स्वरोदय विज्ञान)

येक दिन सिवा कही यह सिव सौ मुनौ महेश्वर ज्ञानी।
दीसतु नाहि और कोउ तुम सौ तिहु पर मध्य विहानी।
जिनि जाने नर सब कछू जाने, कौन ज्ञान सो कहिये।
सकल कार्ज की सिद्धि सु यामैं, बिनु प्रयासहि लहियै।
तिथि नक्षत्र अरु बार महूरत, भद्रादिक अपजोगा।
तिनि की तहाँ न कछु वस्याई, सवैं मैटि शुभ होगा।
जो तुम प्रभु प्रसन्न हो मो पर, हो दयाल सो कहिये
जाके किये सकल सुख सरसैं, दुःख न कबहू लहियै।

श्री सिव उवाच

तब सिव कही, सुनौ तुम गिरजा गुप्त ज्ञान यह जानौ।
काहूँ सौ अवनौ नहि भाषौ, गुप्त अति मानौ।
स्वर ही मैं चहु वेदहि जानौ, सास्त्र सकल स्वर माहीं।
तिहू लोक पुनि है, स्वर ही मैं, यामैं संसय नाहीं।
परमात्म जग मैं जो कहिये, ताको स्वर मैं वासा।
दृष्टि अदृष्टि सकल स्वर ही मैं, सब ही स्वर परकासा।
स्वामी बिन जैसे ग्रह जानौ, सिरविनु तनहि बखानौ।
सास्त्र हीन जो वचन न सोहै, सुर बिन पंडित मानौ।

अथ सिष्य लक्षणं

सात, सुद्ध आखर, कृतज्ञी गुरु को भक्त जु होई।
ताकौ स्वर को ज्ञान दीजिये, द्रढ़ मन चित है जोई।
दुर्जन दुष्ट असात छुद्र मति, भक्ति न गुर की जाने।
सुभ आचार सत्य सो हीनौ, देहु न तिनि स्वर ज्ञानै।

नाडी वर्णन

सहस्र चतुर्दस नाडी तन में, सुनीयै अचल कुमारी।

(स्वरोदय विज्ञान)

(४६)

बहु विस्तार रूप सब तिन के, जानत जे गुन धारी ।
यै चौबीस मुख्य ऐ तिन में, यह निश्चै जिय जानौ ।
दस नीचै दस ऊचै निकसी कमल नाभि ते मानों ।
दो-दो पुनि उत्तर अरु दक्षिण, जानौ सदा सुहाई ।
तिन में दस प्रधान अति मानौ, पार्वती मन भाई ।
तिन दस के अब नाम बखानौ, सुनौ प्रिया सुखदानी ।

इडा (१) पिगिला (२) सुषमना (३) गंधारी (४) मनमान बहुरि हस्तिचिक्का
(५) और पूषा (६) पुनि जसस्वनी (७) जानौ । है अलबुषा (८) कूहू (९) संखिनी ।
(१०) ये दस नाडी बखानौ ।

जौ तुम ये नाडी दस जानी, पवनहु दस परधाना । तिन हुं के अब
नामहि सुनियै, जेहि विधि कहत सुजाना ।

प्राण (१) (अपान) (२) उदान (३) समानह (४) मान (५) नाग (६)
पहियानौ । कूरम (७) क्रकल (८) धनंजय (९) है पुनि, देवदत्त (१०) उरआनौ ।

सुनि गिरिजा पावन मति तेरी, ये दस पवन विचारौ ।
अब इनिके अरु सब नाडिनि केई, प्रभाव हिय धारौ ।
बाँमें भाग इडा तुम जानौ, नाडी पिगिल दक्षिण ।
मधि सुषमना नैहचै जानौ मानौ गुनी विचक्षण ।
बाम चक्षु गंधारी कहियै, हस्ति जिह्वा पुनि दायै ।
पूषा कर्न दाहिने लहीयै, पुनि जसस्विनी बायै ।
नाभि माहि थिति है अलबुषा, कूहू लिंग में जानौ ।
मूल स्थान संखिनी तिष्ठै, यह निश्चै मन मानौ ।

नाडी अस्थान

प्राण पवन सौ बसै हृदे में, गुदा अपान बखानौ ।
पुनि समान सो नाभि देस में, कंठ उदान सो मानौ ।
सर्व सरीर मान सो व्योमे, पंच पवन परवाना ।

(५०)

(स्वरोदय विज्ञान)

नागादिक जे पांच और है, तिनिकौ सुनौ बखाना।
नाग उदर समैत तुम जानौ, कूरम उनमीलन में
क्षुत कृतज्ञ मैं कुकल बखानौ, सांची जानो मन में।
देवदत्त जु उवासित कहियै, या मैं संसय नाही।
बहुरि धनंजय सर्वसु व्यापी यह जानौ मन माही।

नाडी देवता

जानौ इडा जु नाडी ससि की, भानु पिंगला मानो।
संभु रूप पुनि जाति सुषमना, तीनि प्रधान बखानौ।
इनि मैं प्रान करै निसिदिन गत, जोगेश्वर सब जानै।
गुप्त भेद यह कहौ सिवा जू जाहि न कोई जानै।
निकसत स्वास हँकारहि जानौ, संभु रूप सो कहियै।
पुनि प्रवेस मैं जानि सकारहि रूप सकित कौ लहियै।

नाडी स्वर वर्णन

सक्ति रूप में जानि चंद्रमहि, वाम प्रवाह जु वाकौ।
संभरूप में जानि दिवाकर, मारग दच्छिन ताकौ।
खैचि पवन कौ दान जु दीजै, कौटि गुनौ फल पावै।
बुद्धिवंत सो यह विधि जानौ, जीव लोक में मानौ।
नित उठि लखै सु इनि को जोगी, एक चित्त जो होई।
ताकौ तुम सरवज्ञ बखानौ, भापत है गुनि जोई।
अस्थिर जीव तत्व कौ जानौ, थिरता विनु नहि आवै।
इष्ट सिद्धि ताही को कहियै, महालाभ जय पावै।
छिन में वाम छिनक में दक्षिन, वायु वहत जौ जानौ।
दोउ सुर सरत सुषमना कहियै, विषवंती तिहि मानौ।
काल रूप तहँ वास अग्नि को, कारज सकल विनासै।
जो जन जावै या नाडी में, काज न कछू प्रकासै।

ज्ञान

(स्वरोदय विज्ञान)

(५१)

वामें इडा जु नाड़ी ससि की, सो थिर सित सम कहिये।
पुनि गिरिजा त्रिय संज्ञा ताकी ताहि समझि सुख लहिये।
दक्षिण नाड़ी पिगिल रवि की, विषम असित चर जानौ।
संज्ञा ताहि पुरुष की कहियै, सत्य वचन मन मानौ।
जब सुर सरे चंद्र नाड़ी में, सौम्य कार्ज सब करियै।
सूरज नाड़ी बहै जा समैं, रौद्र कर्म अनुसरियै।
तब स्वर चलै सुषमना पूरन, मुक्ति लाभ अति जानौ।
तीनि स्वरूप पान एकै गत, क्रम-क्रम ते सब मानो।
बीस अरु एक सहस्त्र सिवाजू, पुनि षट सत अधिकाई।
निस दिन स्वास चलत प्राननि कै, यौ गुर जुगति बताई।
रहे एक स्वर पांच घरी लौ, जानत है स्वर ज्ञानी।
एक सहस्त्र आठ से स्वासा, तिहि स्वर चले भवानी।

तत्त्व वर्णत्र

पांच तत्व मुनि पांच घरी में, चलै सु निहचै जानौ।
तिनि के रूप भेद गुन भाषौ, भिन्न-भिन्न पहिचानौ।
पहिलौ तत्व प्रथी तब जानौ, पीत वर्ण सो कहिये।
द्वादस आँगुर तेहि परमाना, जाहि मध्य गति लहियै।
दूजौ तथ्य नीर पुनि कहियै, उज्जल वरण बखानौ।
तेहि परमान सु षोडस आंगुर ताहि अधोगति मानौ।
तत्व तीसरौ अग्नि बखानो, चतुरंगुल परमाना।
ऊर्ध्व गति अरु रक्त वरण है, जानत जाहि सुजाना।
चौथी वायु तत्व है, जाकी गति तिरछौहीं कहियै।
अष्टांगुल परमान सु जाकौ, हरित वरन जिहि लहियै।
पंचम सो नभ तत्व बखानौ, नील वरण जेहि जानौ।
कछुक स्वेत तास मैं मानौ, अंतर गति पहिचानौ।
सुर अरु नाड़ी भेद जिते ये, कहे सकल तुम पाही।

(५२)

(स्वरोदय विज्ञान)

अब इक इक के काजहि वरनौं, सुनि राखौं मन मांही ।
जाकौ काज ता समय कीजै, सिद्धि सकल विधि लहियै ।
अपजोगनि की कछु न वस्याई, जो स्वर मारग चलियै ।
भाषा रिषीकेस कृते नाड़ी-स्वर भेद वर्णनानाम प्रथमोप्रकासः ॥१॥

इति श्री भाषा स्वरोदये ज्ञान दीपकं उमा महेश्वर संवादं ।

द्वितीय प्रकास

स्वर-कार्य-वर्णन

दोहा

अब हरिगीता छन्द करि, कहियत दुतिय प्रकास ।
एकए स्वर के काज सब, भाषे सिव सुखराम ।

हरिगीतिका छन्द

जेकाज ससि स्वर मध्य सूभ, तिनो को सुनौ चितलाइ जू ।
कबहू न निर्फल होहि जे, निश्चये सदा फलदाइ जू ।

अथ चन्द्र-स्वर

जात्रा, विवाह, सुदान भूषण, वसन, ससि सुभ जानियै ।
पुनि सांति पौष्टि सुमित्र दर्शन स्वामि कौ सनमानियै ।
कहि बंज अरु धन, बहुरि रस कौ सार संग्रह कीजियै ।
तहा जानि ग्रह परवेस शुभ, पुनि बीज खेतहि दीजियै ।
सुभ मंत्र-साधन जज्ञ विद्या, सुर प्रतिष्ठा जानियै ।

न)

(६६)

(स्वरोदय विज्ञान)

जो पिय करै तौ त्रिय वस्य होई, जो त्रिय करै तौ पि यवस्य सोई।
जो चाहियै हेतु काहू सों कीजै, भाषों सुनौ ताहि सो जानि लीजै
लै चन्द्र नाडी दिन सात ताई, लै अंजुली नीर भू में सु नाई।
ताको धरै ध्यान जो चित भावै, गुर ज्ञान पूरौं सु ऐसै बतावै।
निज स्वास जानौ नीचे को थीवै, सो नीर गौरी तिहि काल पीवै।
तौ प्रीति वाढ़ै कछु संस नाँही, यों साचु मानौ निज चित माँही।
औरौ कहौ जू हित वृद्धि रीती, जासों बढ़ावै अनजान प्रीती।
चमेली डारी सप्तांगु लीजै, ज्ञानी बतावै सो चित दीजै।
लै नाम ताको विधि आन छाड़ै, ताके तरै देहरी ताहि गाड़ै।
जो चंद जानौं निजु स्वास माही, तौं यौं करै जू कछु संसै नाही।
सो आप ही सों प्रीतिहि लगावै, यों गुर बखानै जो चित भावै।
यह कोई जानै जो चित्तई लहै जू, काहू को प्यारी आपै रहे जू।
जो हौं कहौजू काजहि करै सो, सोक आपने जीयको तो हरै सो।
भानोदये चंद्र नाडी जु जानौं, सैमरि चमेली कौ मूल आनौं।
ले खेर हू की चौथी तिलनु की, है पांचई सो जानौं चंदन की।
लै कै इनै पांच खूटी गढ़ावै, पांचों को गाड़ै जहां भूमि पावै।
चारौ चहू दिसि तिल मध्य कीजै, जी भावतौ जो तेहिनाम लीजै।
चारंगुली ते भुव मध्य राखै, औरु करौ जू गुनि लोइ भाखै।
लै सूत की जसुनि तार नीकी, कातै जु कन्या भावत जी की।
खूटी जु गाड़ै तिनि मैं लपेटे, मन में जु इच्छा सो ताहि भेटै।
तारे लपेटै जेहि काल जोई, या भांति भावै तेहि काल सोई।
ताके हिये में सो होइ प्यारी, जो लोई ज्ञानी सोई उचारों।

इति वसीकरण - विधि

अथ डर कौ उपाय

काहू सौ कोउ मन मैं डरै, जू ताको बतावौं सु या विधि करे जू।

(स्वरोदय विज्ञान)

(७०
७१)

लैं वृक्ष ते जू अरसी सुमन कों, लै नाम ताकौ थिर राखि मन कौ।
सो लैं नदी में तेहि नाम डारे, तौ होइ किरपाल रोसे निवारे।
नाडी इडा में यह रीति ठानै, तो सिद्धि होई साँची बखानै।
ता पाँइ तल की लै मृतिका कौ, बहे सूर्य नाडी जेहि काल जाकौ।
सो सात चुटकी उन्मान कीजै, लै और माटी तेहि माँहि दीजै।
ता द्वार पै मंडलै खँचि आवै, सो बीच ताके तेहि काल घावै।
गई मित्र ताकौजु या विधि करै जु, सुरजान ज्ञानी सु यों उच्चरैजू।
जो बाम कौ तौ पग बाम जानौ, जो पुरिष होई दाहिनों बखानी।
नाडी ससी की कछु लै सुगंधे, याकौ जु दीजै सो प्रीति बंधे।

इति डर की उपाय

अथ रोस कौ उपाउ

जो कोउ रुठौ कबहूँ न मानै, ताहेत भेदी भेदहि बखानै।
रात्रैस नाडी पुनि वार ताकौ, पीपर की डारी लै आव जाकौ।
सप्तोंगुरी है परमान जाकौ, सो आपने जू तुम पास राखौ।
बायँ जु जावै जब फेरि आवो; दै पाऊँ वायौ तहाँ बैठि जावो।
ताके तरे देहिरि ताहि गाडै, जो मैं बताऊँ मत कोंन छाडै।
सो आपु मानो कछु संस नाही, ज्ञानी बखानौ धरिचिन्त मांही।

इति रोस की उपाउ

अथ जिभ्या - स्थंमन विधि

जौ मौम के जू लैं सात टूकै लै सूर्य नाडी मुख मांही मूकै।
मुख ही में गोलीजो बांधि लीजै, ताकौ सुध्यानैमन माँहि कीजै।
ताकीसु जिभ्या बँधि जाइ जानौ, भाषी सु ऊनो कबहूँ न मानौ।
जे हेत की रीति तु सो बखानी, अन हेत हूँ की सुनियै भवानी।

(७०)

(स्वरोदय विज्ञान)

इति जिभ्या स्थंभव-विधि

अथ उच्चाटन उथाटन - विधि

सत्रै उचाटै मन में जुचित्ता, तो मंत्र सुनियै दै कान मित्ता।
समसान माटी जो जाइ लीजै, सो सात चुकटी नीकें गिनीजै।
पै सूरनाडी तेहिकाल जानौं, जिहि काल माटी कौं जाइ आनौं।
जल जो बहै जू ताकै किनारै, घड़ी येक मैं जूल्यायै पियारै।
स्वासा जो जानौं बाहिर को आवै, सो मृतिका लै तामै बहावै।
जो नाम ध्यानै इति भांति ठानो, सो न बसै जू तेहि नग्र मानौ।
जौ भानु नाडी स्वर मैं सु जानौं, पीपर की खूटी तौ येक ठानौं।
सप्तांगुली है परमान जाकौं, जिहि देहरी पै गाडौं सु ताकौं।
सो गांव छांडै बहु दुःख पावै, जोगी जु जाने सो यह बतावै।
द्वै मैं जु चाहै हित कौ नसावौं, तौ अर्क के जू मुनि पुष्प लावौं।
लै नाम दोऊ तिनो की जरवै, जो सूर्य नाडी तिहि काल पावै।
केती बखानी विधि मारिवे की, ते नाहि मानै जन जो विवेकी।
ताही ते नाही कहिवे मैं आई, जो भावते के मन मैं न भाई।
सत्रै जु चाहै निज मित्र कीजै, ताको बखानी चित दै सुनी जै।
नाडी ससी की तिथि वार ताके, बैठो ससी धातु मतीर वाके।
तब मित्र होई जो सत्र कोई, इहि भांति भाषौ ज्ञानी जु सोई।

इति उचाटन-विधि

अथ अनुग्रह -विधि

काहू अनुग्रह कीनौ जु चाहौं, जा भांति भाषौ सो तुम निबाहौं।
गुरु प्रात मानौं सित पक्ष माँही, भानोदये जो जेहि काल नाँही।
लै चन्द नाडी कल्यान चाहै, आसीर्वादे जिहि विधि निबाहै।
सब सुःख बाढै धन बुद्धि होई, गौरी न जानौं यह संस कोई।

(७२)

(स्वरोदय विज्ञा)

(स्वरो)

इति अनुग्रह -वि

अथ आप-विधि

काहू जु चाहै आपहि दियै जू तौ चाहियै मीत ऐसे कियै जू।
जो सूर्य कौ वार सो भौम जानौ, भानोदये स्याम पाखै जु मानौं।
उदैं विंब रवि कौ सुनीकैं दिखाई, है पिगिला मै तेहि काल बाँई।
जिहि आप दीजै सौ सर्व लागै, सब सुख जानौ तासौं सु भागै।
जो साध जग में आपै सुनाई, कीजै अनुग्रह धरि चित माहीं।
जी में बिने वासों मानि लीजै, कीजै अनुग्रह आपै न दीजै।
काहू जु आपौं सो नीचे जानौं, साधू सुनौ जू यह बात मानौं।
है रामजी की तुम कौ दुहाई, आपौं त काहू यह बुद्धि पाई।
श्रीराम करेंगे सभी न्याउ तेरौ, ताही के हाथै सब कौ नवेरौ।
आपहि देह तौ तुम सोचि लोजौ, जामेभलौं है तुम चित दीजौ।
इति श्री महा स्वरोदये ज्ञान दीपके उमा महेश्वर संवादे भाषा।
रिषीकेश कृते रतित्यादि विधि वर्णनानाम चतुर्थो प्रकास ॥४॥

पंचम - प्रकाश

काल-ज्ञान-वर्णन

दोहा

छन्द भुजंग प्रयात करि, पंचम कहौ प्रकास।
काल ज्ञान जामै कहौ, सुनौ सकल सुखरास।
आये काल काहा करै, सुनौ सकल तुम सोइ।
आयु बढ़ै जाकैं कियै, जोगी स्वर मुनि लोइ।

छंद भुजंग प्रयास

चतुर्भाति जानौं हियै काल ज्ञानौं।

दय विज्ञान
युग्रह -विधि

(स्वरोदय विज्ञान)

(७३)

महाकाल जानौ सो जोगी बखानौ ।
तहाँ आदि स्वासा सुनौ जानियै जू ।
भली भाँति ताकौ हियै राखियै जू ।

अथ काल ज्ञान

सरै सूर्य नाड़ी दिनौ राति जानौ ।
न आवै ससी कबहू जो सु मानौ ।
रही आयु थोरी जियै वर्ष थौरौ ।
सुजोगी बखानै करै काल जोरौ ।
रही आयु ताकी सु तीनी अब्द जानौ ।
महादेव भाषी सु यों सांचु मानौ ।
जो पै दौस दो लौ सरै सूर्य नाड़ी ।
रही आयु द्वै वर्ष ताकी विचारी ।
सरै तीनि लौ तौ जियै वर्ष एकै ।
भजै रामनामै सुजानै विवेकै ।
दिवस पांच लौ जो सरे सूर्य नाड़ी ।
कहौ आयु ताकी सु मासै विचारी ।
सरै पिगिला पक्षनौ जानियै जू ।
त्रमासै अबदी तहाँ मानियै जू ।
सरै मास लौ आयु षट् मास जानौ ।
कहै काल ज्ञानी सु यों सांचु मानौ ।
निसा कौ ससी के प्रवाहै जु जानौ ।
सरै सूर्यनाड़ी जबै द्वौ समानौ ।
सबै मास ऐसौ निरंतर बहै जू ।
तीसै मास एकै अबदी कहे जू ।
सुनौ विष्णु पद भोह दोऊ कहावै
धटै आयु जाकी न तौ दृष्टि आवै ।

(७४)

(स्वरोदय विज्ञा (७५))

कहो द्यौस नों है रही आयु बाकी ।
भजौ रामनामै यहै मुक्ति ताकी ।
कदै वक्र जातौ जु नासाग्र जानौ ।
न दीखै अवदी दिना सात मानौ ।
नहीं और कीजै तहां तौ उपाई ।
भजौ राम नामै महा सुःख पाई ।
कहौ मात्र मंडल सुहै तारुका जू ।
न दीखै जुनै ना रही आयुषा जू ।
दिना पांच लौ जीव ताकौ बखानौ ।
महादेव बानी सबै सांचू मानौ ।
जु आरुन्धाती नाम जिभ्या कहावै ।
घटै आयु जौ पै नतौ दृष्टि आवै ।
कहै द्यौस नों है रही आयु बाकी ।
कहौ और निश्चै रही नाहिं ताकी ।
द्वै मूत्र विष्टा जहाँ एक कालै ।
सरै वायुता संग तौ जानि कालै ।
रही द्यौस लौ सुनियै आयु ताकी ।
अवस्था सुनौ होइ ऐसी जु जाकी ।
द्रगनि कौ मूदि अंगुली एक लावै ।
सु दावै मलै तौ वलै नै क पावै ।
अरुन सामरौ चक्र जा कौ न दीखै ।
दसई द्यौस जीवै भजे जगत ईसै ।
उठै प्रात ही सो वन को सिधावै ।
उदै होइ जब ऊपर को आवै ।
तहाँ होहि ठाड़ौ रविहि पीठी दै जू ।
जहां येकसी भूमिलै ना चलै जू ।

शरीरदय विज्ञान) ३५)

(स्वरोदय विज्ञान)

दोऊ हाथ नीचें तवैं छाडि देईं ।
कहुं ये क चिंता न तौ चित लेईं ।
करै दृष्टि ऊंची सु भू को निहारै ।
तहौ छाँह अपनी बड़ी सो विचारै ।
सबै विंब पेखे बड़ी आयु जानौं ।
द्रगनि होन तौ पांच मासै बखानौं ।
बिना कान तौ जानियै तीनि मासै ।
कछू औरहू भेद ज्ञानी प्रकासै ।
हिये में परै दृष्टि तौ छिद्र जानौं ।
तहां तीनि वर्ष सुनौं मित्र मानौं ।
बिना नैन पेखे जु दौं वर्ष जानौं ।
चरण जो न पेखे सु येकै बखानौं ।
सबै सुद्ध विंब लिखे जो सु ज्ञानी ।
रही ताहि नव वर्ष लौं मृत्यु मानी ।
न देखे जु विंब षटै मास वाकी ।
लखौं दौतिही घोस है मृत्यु ताकी ।
करै या जतन मित्र यौं जुक्ति जानौं ।
सिवा में बखानी सबै साँचु मानौं ।

इति काल-ज्ञान

अथ काल कौ उपाइ

जु पै लोइ ज्ञानी लखे कालु आयौं ।
उपायै करै जू सु योगी बतायौं ।
तजै ग्रह कौं जू तबै होइ त्यागी ।
सबै रोग मैटै सु है बीतरागी ।
करै पूरकौ पिंगला में तहां लौं ।

(स्वरोदय विज्ञान)

(७) (७)

धरै कुंभकी सक्ति जाकी तहां लौं ।
इडा नांडि का रेचकौ जानि कीजै ।
बढ़ै आयु निश्चै बहुत काल जीजै ।
जहाँ भूकुटी में मनै थाभि राखै ।
लगावै तहाँ टकटकी ईस भाषै ।
बढ़ै आयु ताकी प्रति दौस मानौ ।
घटी तीनो संकर बखानी सु मानौ ।
सुजाना जु पद्मासनै जानि बाधै ।
पवन मूल कौ सो तबै ऊर्ध साधै ।
तहां नासिका पवन कौ पूर ज्ञानी ।
इडा पिंगला कौ तलै जानि आनी ।
अर्ध औ उर्ध द्वै बखानी जहां जू ।
सबै बीच में सुषमना सो तहाँ जू ।
गुरु ज्ञान लैकै करै जोग रीतै ।
अमर होइ जोगी सोई काल जीतै ।
दसम द्वार माँही सबै पूर्ण धावै ।
कमल नाभि ते सक्ति ऊंची उठावै ।
दोहू में जवै होइ संजोग नीकौ ।
अभी दृष्टि होई जो सुखकार जी कौ ।
गिरे अंग पै सो अमर होई प्रानी ।
हिंये राखि ता कौ जु संकर बखानी ।
सदां जुक्ति ऐसी करै जो सु ज्ञानी ।
हरै काल चीन्है प्रथम जो सु ज्ञानी ।
हरै काल चीन्है प्रथम जो बखानी ।
ससी सूर्य जौनों, निसा में प्रवाहै ।
सदा भ्यास कौ जो क्रिया को निवाहै ।

(७६) (७७)

(स्वरोदय विज्ञान)

गगन मंडल में ससी सूर्य जीनों ।
सुलीला सरूपी जियै साधु तो लौ ।
जियै साध साधै जु है सिद्ध जानों ।
करै तो परम पद लहै सांचु मानों ।

इति काल कौ उपाइ

कहें पंच परकास में काम जेतै ।
बिना साधना सो नहीं सिद्ध तै तै ।
छटै में कही साधन रीति या तै ।
जु चाहौ कि साधै लहौ सिद्धि ता तै ।
उमा गुप्त ही सो प्रगट में सुनाई ।
हियै समझिले बात मन में जु आई ।

इति श्री महास्वरोदये ज्ञाना-दीपके उमा महेश्वर संवादे ।

भाषारिषीकेस कृते काल ज्ञान वर्णनोनाम पंचमो प्रकास । ॥५॥

षष्ठम-प्रकाश

योग-साधना-विधि

दोहा

षष्ठम कहौ प्रकास में, लियौ चौपही रीति ।
जहा साधना जोग की, किहि विधि, सुनियै मीत ॥

चौपाई

द्वौ मारग जग भीतर जानों, मित्र प्रवृत्ति निवृत्ति बखानों ।
जे प्रवृत्त माया में बहैं, जे निवृत्त तीरहि लगि रहैं ।
सिद्धि सिद्धि नव निद्धि जु चाहै, इनि ही के हित कष्ट निवाहै ।
तिनि जन पूरन ज्ञान न पायौ, नट ज्यौ नाचौ जगत रिझायौ ।
सो उपाइ ज्ञानी किनि करै, जासे भव सागर कौ तिरै ।