स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 94 में से
संदर्भ में पढ़ें(५०)
(स्वरोदय विज्ञान)
नागादिक जे पांच और है, तिनिकौ सुनौ बखाना।
नाग उदर समैत तुम जानौ, कूरम उनमीलन में
क्षुत कृतज्ञ मैं कुकल बखानौ, सांची जानो मन में।
देवदत्त जु उवासित कहियै, या मैं संसय नाही।
बहुरि धनंजय सर्वसु व्यापी यह जानौ मन माही।
नाडी देवता
जानौ इडा जु नाडी ससि की, भानु पिंगला मानो।
संभु रूप पुनि जाति सुषमना, तीनि प्रधान बखानौ।
इनि मैं प्रान करै निसिदिन गत, जोगेश्वर सब जानै।
गुप्त भेद यह कहौ सिवा जू जाहि न कोई जानै।
निकसत स्वास हँकारहि जानौ, संभु रूप सो कहियै।
पुनि प्रवेस मैं जानि सकारहि रूप सकित कौ लहियै।
नाडी स्वर वर्णन
सक्ति रूप में जानि चंद्रमहि, वाम प्रवाह जु वाकौ।
संभरूप में जानि दिवाकर, मारग दच्छिन ताकौ।
खैचि पवन कौ दान जु दीजै, कौटि गुनौ फल पावै।
बुद्धिवंत सो यह विधि जानौ, जीव लोक में मानौ।
नित उठि लखै सु इनि को जोगी, एक चित्त जो होई।
ताकौ तुम सरवज्ञ बखानौ, भापत है गुनि जोई।
अस्थिर जीव तत्व कौ जानौ, थिरता विनु नहि आवै।
इष्ट सिद्धि ताही को कहियै, महालाभ जय पावै।
छिन में वाम छिनक में दक्षिन, वायु वहत जौ जानौ।
दोउ सुर सरत सुषमना कहियै, विषवंती तिहि मानौ।
काल रूप तहँ वास अग्नि को, कारज सकल विनासै।
जो जन जावै या नाडी में, काज न कछू प्रकासै।