सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

Devanagarihipublished94 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 94 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

(४८)

(स्वरोदय विज्ञान)

येक दिन सिवा कही यह सिव सौ मुनौ महेश्वर ज्ञानी।
दीसतु नाहि और कोउ तुम सौ तिहु पर मध्य विहानी।
जिनि जाने नर सब कछू जाने, कौन ज्ञान सो कहिये।
सकल कार्ज की सिद्धि सु यामैं, बिनु प्रयासहि लहियै।
तिथि नक्षत्र अरु बार महूरत, भद्रादिक अपजोगा।
तिनि की तहाँ न कछु वस्याई, सवैं मैटि शुभ होगा।
जो तुम प्रभु प्रसन्न हो मो पर, हो दयाल सो कहिये
जाके किये सकल सुख सरसैं, दुःख न कबहू लहियै।

श्री सिव उवाच

तब सिव कही, सुनौ तुम गिरजा गुप्त ज्ञान यह जानौ।
काहूँ सौ अवनौ नहि भाषौ, गुप्त अति मानौ।
स्वर ही मैं चहु वेदहि जानौ, सास्त्र सकल स्वर माहीं।
तिहू लोक पुनि है, स्वर ही मैं, यामैं संसय नाहीं।
परमात्म जग मैं जो कहिये, ताको स्वर मैं वासा।
दृष्टि अदृष्टि सकल स्वर ही मैं, सब ही स्वर परकासा।
स्वामी बिन जैसे ग्रह जानौ, सिरविनु तनहि बखानौ।
सास्त्र हीन जो वचन न सोहै, सुर बिन पंडित मानौ।

अथ सिष्य लक्षणं

सात, सुद्ध आखर, कृतज्ञी गुरु को भक्त जु होई।
ताकौ स्वर को ज्ञान दीजिये, द्रढ़ मन चित है जोई।
दुर्जन दुष्ट असात छुद्र मति, भक्ति न गुर की जाने।
सुभ आचार सत्य सो हीनौ, देहु न तिनि स्वर ज्ञानै।

नाडी वर्णन

सहस्र चतुर्दस नाडी तन में, सुनीयै अचल कुमारी।