सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
- सुन्दरकाण्ड * ११३
(शिवजी कहते हैं—) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था,
अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजीके
चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको चला
गया॥ ६॥
[दोहा ५७]
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड़ समुद्र विनय नहीं
मानता। तब श्रीरामजी क्रोधसहित बोले—बिना भयके प्रीति नहीं
होती!॥ ५७॥
लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुंदर नीती॥ १॥
हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाणसे समुद्रको सोख
डालूँ। मूर्खसे विनय, कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही
कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश), ॥ १॥
ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा॥ २॥
ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे
११४ * श्रीरामचरितमानस *
वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति)-की बात और कामीसे
भगवान्की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज
बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब
व्यर्थ जाता है) ॥ २ ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥ ३ ॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजीके
मनको बहुत अच्छा लगा। प्रभुने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान
किया, जिससे समुद्रके हृदयके अंदर अग्निकी ज्वाला उठी ॥ ३ ॥
मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना॥ ४ ॥
मगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब
समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों
(रत्नों)-को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें
आया ॥ ४ ॥
[दोहा ५८]
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! सुनिये, चाहे
- सुन्दरकाण्ड * ११५
कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही
फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाँटनेपर ही झुकता
है (रास्तेपर आता है) ॥ ५८ ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥ १ ॥
समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा—हे
नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश,
वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सबकी करनी स्वभावसे ही
जड़ है॥ १ ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥ २ ॥
आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है,
सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा
है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है॥ २ ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥ ३ ॥
प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा
(जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार,
११६ * श्रीरामचरितमानस *
शूद्र, पशु और स्त्री—ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं॥ ३॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।
करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ ४॥
प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी,
इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि
प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं
हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं
तुरंत वही करूँ॥ ४॥
[दोहा ५९]
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने
मुसकराकर कहा—हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर
जाय, वह उपाय बताओ॥ ५९॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥ १॥
[समुद्रने कहा—] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई
हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श
कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर
तैर जायँगे॥ १॥
- सुन्दरकाण्ड * ११७
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।
करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥ २ ॥
मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके
अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ!
इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका
सुन्दर यश गाया जाय॥ २ ॥
एहिं सर मम उत्तर तट बासी।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा।
तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥ ३ ॥
इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट
मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके
मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन
दुष्टोंका वध कर दिया)॥ ३ ॥
देखि राम बल पौरुष भारी।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ४ ॥
श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित
होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह
सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया॥ ४ ॥
११८ * श्रीरामचरितमानस *
[छन्द]
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत
(उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको
हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है।
श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले
और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका
सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।
[दोहा ६०]
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला
है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य
साधन)-के ही भवसागरको तर जायँगे॥ ६०॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
(सुन्दरकाण्ड समाप्त)
॥ श्रीहनूमते नमः ॥
श्रीहनुमानचालीसा
[दोहा]
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
[चौपाई]
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चतुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
१२० * श्रीरामचरितमानस *
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
- श्रीहनुमानचालीसा * १२१
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
१२२ * श्रीरामचरितमानस *
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
- संकटमोचन हनुमानाष्टक * १२३
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
[दोहा]
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लषन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
॥ इति ॥
संकटमोचन हनुमानाष्टक
मत्तगयन्द छन्द
बाल समय रबि भक्षि लियो तब
तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को
यह संकट काहु सों जात न टारो॥
देवन आनि करी बिनती तब
छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो॥ १॥
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि
जात महाप्रभु पंथ निहारो।
१२४ * श्रीरामचरितमानस *
चौंकि महा मुनि साप दियो तब
चाहिय कौन बिचार बिचारो॥
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु
सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥
अंगद के सँग लेन गये सिय
खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु
बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय
सिया-सुधि प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥
रावन त्रास दई सिय को सब
राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु
जाय महा रजनीचर मारो॥
चाहत सीय असोक सों आगि सु
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
- संकटमोचन हनुमानाष्टक * १२५
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ४ ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब
प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत
तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥
आनि सजीवन हाथ दई तब
लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ५ ॥
रावन जुद्ध अजान कियो तब
नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल
मोह भयो यह संकट भारो॥
आनि खगेस तबै हनुमान जु
बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ६ ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन
लै रघुनाथ पताल सिधारो।
१२६ * श्रीरामचरितमानस *
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि
देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥
जाय सहाय भयो तब ही
अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥
काज किये बड़ देवन के तुम
बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को
जो तुमसों नहिं जात है टारो॥
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु
जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥
दो०— लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
॥ इति संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ॥
श्रीरामयणजीकी आरती
आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥ १॥
गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की॥ २॥
गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड के ही की॥ ३॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥ ४॥
श्रीहनुमान्जीकी आरती
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥ टेक॥
जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै॥ १ ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥ २ ॥
दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये॥ ३ ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ ४ ॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजीके काज सँवारे॥ ५ ॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे॥ ६ ॥
पैठि पताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे॥ ७ ॥
बायें भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे॥ ८ ॥
सुर नर मुनि आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे॥ ९ ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥ १०॥
जो हनुमान (जी) की आरति गावै। बसि बैकुंठ परमपद पावै॥ ११॥
श्रीराम-स्तुति
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं॥
कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद सुंदरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश-निकंदनं।
रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं॥
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग बिभूषणं।
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं॥
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं॥
मनु जाहिँ राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
सो०— जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥
॥ सियावर रामचन्द्रकी जय॥