सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ * श्रीरामचरितमानस *
शूद्र, पशु और स्त्री—ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं॥ ३॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।
करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ ४॥
प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी,
इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि
प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं
हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं
तुरंत वही करूँ॥ ४॥
[दोहा ५९]
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने
मुसकराकर कहा—हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर
जाय, वह उपाय बताओ॥ ५९॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥ १॥
[समुद्रने कहा—] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई
हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श
कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर
तैर जायँगे॥ १॥