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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 115
  • सुन्दरकाण्ड * ११५
    कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही
    फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाँटनेपर ही झुकता
    है (रास्तेपर आता है) ॥ ५८ ॥
    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
    छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
    गगन समीर अनल जल धरनी।
    इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥ १ ॥
    समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा—हे
    नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश,
    वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सबकी करनी स्वभावसे ही
    जड़ है॥ १ ॥
    तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
    सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
    सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥ २ ॥
    आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है,
    सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा
    है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है॥ २ ॥
    प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।
    मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
    सकल ताड़ना के अधिकारी॥ ३ ॥
    प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा
    (जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार,