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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

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पृष्ठ 118

११८ * श्रीरामचरितमानस *
[छन्द]
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत
(उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको
हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है।
श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले
और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका
सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।
[दोहा ६०]
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला
है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य
साधन)-के ही भवसागरको तर जायँगे॥ ६०॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
(सुन्दरकाण्ड समाप्त)