सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामयणजीकी आरती
आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥ १॥
गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की॥ २॥
गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड के ही की॥ ३॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥ ४॥
श्रीहनुमान्जीकी आरती
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥ टेक॥
जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै॥ १ ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥ २ ॥
दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये॥ ३ ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ ४ ॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजीके काज सँवारे॥ ५ ॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे॥ ६ ॥
पैठि पताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे॥ ७ ॥
बायें भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे॥ ८ ॥
सुर नर मुनि आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे॥ ९ ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥ १०॥
जो हनुमान (जी) की आरति गावै। बसि बैकुंठ परमपद पावै॥ ११॥