सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ११७
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।
करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥ २ ॥
मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके
अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ!
इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका
सुन्दर यश गाया जाय॥ २ ॥
एहिं सर मम उत्तर तट बासी।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा।
तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥ ३ ॥
इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट
मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके
मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन
दुष्टोंका वध कर दिया)॥ ३ ॥
देखि राम बल पौरुष भारी।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ४ ॥
श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित
होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह
सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया॥ ४ ॥