सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
१७४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
औरऊ कष्ट करै अतिशै करि,
प्रत्यक आतम तत्त न पेखै ।
सुन्दर भूलि गयौ निज रूप ही,
है कर ककन दर्पन देखै ॥१६॥
सूत्र गले महि मेलि भयौ द्विज,
ब्राह्मन व्है कर ब्रह्म न जान्यौ ।
छत्रिय व्है करि छत्र धर्यौ सिर,
है गय पैदल सी मन मान्यौ ॥
वैशि भयौ वपु की वय देखत,
झूठ प्रपंच वनिज्ज हि ठान्यौ ।
शूद्र भयौ मिलि शूद्र शरीर ही,
सुन्दर आपु नही पहिचान्यौ ॥२०॥
ज्यो रवि कौ रवि ढूंढत है कहु,
तप्ति मिलै तनु शीत गवाऊ ।
ज्यौ शशिकौ शशि चाहत है पुनि,
शीतल व्है करि तप्ति बुझाऊ ।
ज्यौ सनिपात भये नर टेरत,
है घर मैं अपनै घर जाऊ ।
त्यौ यह सुन्दर भूलि स्वरूप ही,
ब्रह्म कहै कब ब्रह्म हि पाऊ ॥२१॥
॥ स्वरूप बिसमरण को अंग ॥ [ १७५
आपु न देखत है अपनौ मुख,
दर्पन काट लग्यौ अति थूला।
ज्यौ दृग देखत तें रहि जात,
भयौ जबही पुतरी परि फूला॥
छाइ अज्ञान रह्यो अभि अंतरि,
जांनि सकै नहिं आतम मूला।
सुन्दर यौ उपज्यो मन कै मल,
ज्ञान बिना निजरूपहि भूला॥२२॥
दीन हुवौ बिललात फिरै नित,
इंद्रिनि कै बस छीलक छोलै।
सिंह नही अपनौ बल जानत,
जबुक ज्यौ जितही तित डोलै॥
चेतनता बिसराइ निरतर,
लै जडता भ्रम गाठि न खोलै।
सुन्दर भूलि गयौ निज रूप हि,
देह स्वरूप भयौ मुख बोलै॥२३॥
मै सुखिया सुख सेज सुखासन,
है गय भूमि महा रजधानी।
हौ दुखिया दिन रैनि भरौ दुख,
मोहि विपत्ति परी नही छानी॥
१७६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
हौं अति उत्तम जाति बडौ कुल,
हौं अति नीच क्रिया कुल हानी ।
सुन्दर चेतनता न सभारत,
देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२४॥
गर्भ बिषै उतपत्ति भई पुनि,
जन्म लियौ शिशु बुद्धि न जानी ।
बाल कुमार किशोर जुवादिक,
बृद्ध भये अति बुद्धि नसानी ॥
जैसी ही भाति भई बपु की गति,
तैसौ ही होइ रह्यौ यहु प्रानी ।
सुन्दर चेतनता न सभारत,
देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२५॥
ज्यो कोऊ त्याग करै अपनौ घर,
बाहर जाइ कै भेष बनावै ।
मूं ड मुडाइ कै कान फराइ,
बिभूति लगाइ जटाऊ बधावै ॥
जैसौई स्वाग करै बपु कौ पुनि,
तैसौई मानि तिसौ व्है जावै ।
त्यौ यह सुन्दर आपुन जानत,
भूलि स्वरूप हि और कहावै ॥२६ ।
॥ इति स्वरूप बिस्मरणको अंग सम्पूर्ण ॥
॥ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥ [ १७७
अथ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥२५॥
मनहर छंद
क्षिति जल पावक पवन नभ मिलि करि,
शबद रु सपरस रूप रस गंध जू ।
श्रोत्र त्वक चक्षु घ्रान रसना रस कौ ज्ञान,
वाक् पानि पाद पायु उपस्थ हि बध जू ॥
मन बुद्धि चित अहकार ये चौबीस तत,
पचंबिश जीव तत करत है धध जू ।
षड विश कौ है ब्रह्म सुन्दर सु निहकर्म,
व्यापक अखंड एक रस निरसध जू । १॥
श्रोत्र दिक् त्वक् वायु लोचन प्रकाश रवि,
नासिका अश्वनी जिव्हा बरुन बखानिये ।
वाक अग्नि हस्त इन्द्र चरन उपेन्द्र बल,
मेढ प्रजापति गुदा मित्र हू कौ ठानिये ॥
मन चन्द्र बुद्धि बिधि चित बासुदेव श्राहि,
अहकार रुद्र कौ प्रभाव करि मानिये ।
(१) क्षिति-पृथ्वी । पावक-तेज. अग्नि । पवन-वायु ।
नभ-आकाश । वाक्-वाणी । पानि-हाथ । पाद-पैर ।
पायु-मलेन्द्रिय । उपस्थ-मूत्रेन्द्रिय । पचविंश-पचीसवा ।
षड्विंश-छब्बीसवा । निहकर्म-निष्कर्म । निरसध-संधि
रहित-निरवयव ।
१७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जाकी सत्ता पाइ सब देवता प्रकाशत है,
सुन्दर सु आतमा हि न्यारौ करि जानिये ॥२॥
इन्दव छन्द
श्रोत्र सुनै दृग देखत हैं,
रसना रस घ्रान सुगंध पियारौ ।
कोमलता त्वक् जानत है पुनि,
बोलत है मुख शब्द उचारौ ॥
पानि ग्रहै पद गौन करै,
मल मूत्र तजै उभऊ अध द्वारौ ।
जाके प्रकाश प्रकाशत हैं सब,
सुन्दर सोई रहै घट न्यारौ ॥३॥
बुद्धि भ्रमै मन चित्त भ्रमै,
अहंकार भ्रमै कहा जांनत नांही ।
श्रोत्र भ्रमै त्वक् घ्रान भ्रमै,
रसना दृग देखि दसौ दिसि जाही ॥
वाक् भ्रमै कर पाद भ्रमै,
गुदद्वार उपस्थ भ्रमै कँहु काही ।
तेरे भ्रमाये भ्रमै सबही गुन,
सुन्दर तू क्यौ भ्रमै इन 'माहीं ॥४॥
(२) उपेन्द्र-विष्णु। मेढ-मेढ्र, उपस्थ। प्रजापति-ब्रह्मा ।
विधि-ब्रह्मा। वासुदेव-विष्णु । रुद्र-शंकर ।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १७६
बुद्धि कौ बुद्धि रु चित्तकौ चित्त,
अह कौ ग्रह मन कौ मन वोई ।
नैन कौ नैन है बैन कौ बैन है,
कान कौ कान त्वचा त्वक् होई ।1
घ्रान कौ घ्रान है जीभ कौ जीभ है,
हाथ कौ हाथ पगौ पग दोई ।
शीश कौ शीश है प्रान कौ प्रांन है,
जीव कौ जीवहै सुन्दर सोई ॥५॥
मनहर छंद (प्रश्न)
कसै कै जगत यह रच्यौ है जगतगुरु,
मौ सौ कहौ प्रथम ही कौन तत्व कीनौ है ।
प्रकृति कि पुरुष कि महत्तत अहकार,
किधौ उपजाये सत रज तम तीनौ है ।1
किधौ व्योम वायु तेज आप कै अवनि कीन,
किधौ पंच विषय पसारि करि लीनौ है ।
किधौ दस इन्द्री किधौं अन्तहकरन कीन,
सुन्दर कहंत किधौं सकल विहीनौ है ॥६॥
उत्तर
ब्रह्म तै पुरुष अरु प्रकृति प्रगट भई,
प्रकृति तै महत्तत्त पुनि अहंकार है ।
अहकार हू तै तीन गुन सत रज तम,
तम हू तै महाभूत विषय पसार है ।1
१८० ] ।। सुन्दर विलास ।।
रज हूं तैं इन्द्रिय दस पृथक पृथक भई,
सत हूं तैं मन आदि देवता विचार है ।
ऐसे अनुक्रम करि सिष्य सौं कहत गुरु,
सुन्दर सकल यह मिथ्या भ्रम जार है ॥७॥
प्रश्न ?
मेरौ रूप भूमि है कि मेरौ रूप आप है कि,
मेरौ रूप तेज है कि मेरौ रूप पौन है ?
मेरौ रूप व्योम है कि मेरौ रूप इन्द्रिय है कि,
अन्त करन है कि बैठौ है कि गौन है ॥
मेरौ रूप त्रिगुन कि अहकार महत्तत्त,
प्रकृति पुरुष किधौ बोले है कि मौन है ।
मेरौ रूप थूल है कि सुनि आदि मेरौ रूप,
सुन्दर पूछत गुरु मेरौ रूप कौन है ॥८॥
उत्तर
तूं तौ कछु भूमि नाहि आप तेज वायु नांहि,
व्योम पच विषै नाहि सौ तौ भ्रम कूप है ।
तू तो कछु इन्द्रिय अरु अन्तहकरन नाहि,
तीनौ गुनहू तू नाहि सोऊ छाह धूप है ॥
तूं तौ अहकार नाहि पुनि महत्तत्त नाहिं,
प्रकृति पुरुष नाहि तू तौ सु अनूप है ।
(८) आप-जल । पौन-पवन, वायु । व्योम-आकाश ।
गौन-गमन ।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८१
सुन्दर बिचारि ऐसे सिष्य सौ कहत गुरु,
नांहि नाहि करते रहे सु तेरौ रूप है ॥६॥
तेरौ तौ स्वरूप है अनूप चिदानंद घन,
देह तौ मलीन जड या विवेक कीजिये ।
तूं तौ बिहसंग निराकार अविनाशी अज,
देह तौ बिनाशवत ताहि नहिं धीजिये ॥
तू तौ षट उरमी रहित सदा एक रस,
देह के बिकार सब देह सिर दीजिये ।
सुन्दर कहत यौ बिचारि आपु भिन्न जानि,
पर की उपाधि कहा आप खेंचि लीजिये ॥१०॥
देह ई नरक रूप दुख, कौ न वारपार,
देह ई स्वरग रूप झूठौ सुख मान्यौ है ।
देह ई कौ वध मोक्ष देह ई अप्रोक्ष प्रोक्ष,
देह ई के क्रिया कर्मँ शुभाशुभ ठान्यौ है ॥
देह ई मैं और देह, खुशी व्है बिलास करै,
ताहि कौं समुझि बिन आतमा बखान्यौ है ।
दोऊ देह तै अलिप्त दोऊ कौ प्रकाशक है,
सुन्दर चैतन्य रूप न्यारौ कर जान्यौ है ॥११॥
(१०-११) षट् ऊर्मि-शीत-उष्ण, भूख-प्यास, सुख-दुःख ।
प्रोक्ष परोक्ष । अप्रोक्ष-अपरोक्ष । दो देह-स्थूल, सूक्ष्म ।
१८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
देह हलै देह चलै देह ही सौ देह मिलै,
देह खाद देह पीवै देह ही भरतु है ।
देह ही हिमारै गरै, देह ही पावक जरै,
देह रन माँहि झूझ, देह ही परतु है ॥
देह ही अनेक कर्म करत बिबिध भांति,
चुंबक की सत्ता पाइ लोह ज्यों फिरतु है ।
आतमा चेतनरूप व्यापक साक्षी अनूप,
सुन्दर कहत सौ तौ जन्मै न मरतु है ॥१२॥
देह की न देह कछु देह कौ ममत छाडि,
देह तौ दमामा दीयै देह देह जात है ।
घट तौ घटत घरी बरी घट नाश होत,
घट के गये नै घट की न फेरि बात है ॥
पिंड पिंड माहि पिंड पिंड कौ उपावत है,
पिंड पिंड खात पुनि पिंड ही कौ पात है ।
सुन्दर न होइ जासौ सुन्दर कहत जग,
सुन्दर चेतनरूप सुन्दर विख्यात है ॥१३॥
प्रश्नोत्तर
देहू यह किनको है ? देह पंच भूतन की,
पंच भूत कीन ते है ? तामसाहंकार त ।
अहंकार कीन ते है ? जाकौ महत्तत कहें,
महत्तत कीन ते है ? प्रकृति मझार ते ॥
॥ साख्य ज्ञान को अग ॥ [ १८३
प्रकृति हू कौन तै है ? पुरुष है जाकौ नाम,
पुरुष सु कौन तै है ? ब्रह्म निराधार तै ।
ब्रह्म अब जान्यौ हम, जान्यौ है तौ निश्चै कर,
निश्चै हम कियौ है तौ चुप मुख द्वार तै ॥१४॥
एक घट मांहि तौ सुगध जल भरि राख्यो,
एक घट मांहि तौ दुर्गन्ध जल भर्यौ है ।
एक घट माहि पुनि गंगोदक राख्यो आन, '
एक घट माहि आनि मदिराऊ कर्यौ है ॥
एक घृत एक तेल एक माहि लघुनीति,
सबही मैं सविता कौ प्रतिबिब पर्यौ है ।
तैसे ही सुन्दर 'ऊच नीच मध्य एक ब्रह्म,
देह भेद देखि भिन्न भिन्न नाम धर्यौ है ॥१५॥
भूमि परै अप, अपहू कै परै पावक है,
पावक कै परै पुनि वायु हू बहुत है ।
वायु परै व्योम व्योम हू कै परै इन्द्रिय दस,
इन्द्रिनि कै पर अन्त.करन रहतु है ॥
अन्तहकरन परै तीनौ गुन 'अहकार,
अहकार परै महत्तत कौ लहतु है ।
महत्तत्त परै मूल माया, माया परै ब्रह्म,
ताहि तै परात्पर सुन्दर कहतु है ॥१६॥
(१५) सविता-सूर्य । लघुनीति-पेशाब ।
(१६) परात्पर-सबसे परे, ऊपर ।
१८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
भूमि तौ विलीन गंध गंध हू विलीन आप,
आप हू विलीन रस रस तेज खातु है ।
तेज रूप रूप वायु वायु हू सपर्श लीन,
सो सपर्श व्योम शब्द तम हि बिलातु है ॥
इन्द्रिय दस रज मन देवता विलीन सत्व,
तीनि गुन अह महतत्त गलि जातु है ।
महतत्त प्रकृति प्रकृति हू पुरुष लीन,
सुन्दर पुरुष जाय ब्रह्म मैं समातु है ॥१७॥
आतमा अचल शुद्ध एक रस रहै सदा,
देह बिवहारनि मैं देह ही सौ जानिये ।
जैसे शशि मंडल अभग नही भग होइ,
कला आवै जाहि घटि बढ़ि सौ बखानिये ॥
जैसे द्रुम सुथिर नदी कै तट देखियत,
नदो के प्रवाह माहि चलतौ सौ मानिये ।
तैसैं आतमा अतीत देह कौ प्रकाशक है,
सुन्दर कहत यौ बिचारि भ्रम भानिये ॥१८॥
आतमा शरीर दोऊ एकमेक देखियत,
जब लग अन्तहकरन मैं अज्ञान है ।
जसै अन्धियारी रैनि घर मैं अन्धेरौ होइ,
आंखिनि कौ तेज ज्यौ कौ त्यौं ही विद्यमान है ।
जदपि अधेरै माहि नैन कौ न सूझै कछु,
तदपि अधेरै तैं सौ अलिप्त बखानि है ।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८५
सुन्दर कहत तौ जौं एक मेक जांनत है,
जौ लौ नहि प्रगट प्रकाश ज्ञान भानु है ॥१९॥
देह जड देवल मैं आतमा चैतन्य देव,
याही कौ समुझि कर यासौ मन लाइये ।
देवल कौ बिनशत बार नहिं लागै कछु,
देव तौ सदा अभग देवल मैं पाइये ॥
देब की शकति कर देवल की पूजा होइ,
भोजन बिबिध भाति भोग हू लगाइये ।
देवल तें न्यारौ देव देवल मैं देखियत,
सुन्दर बिराजमान और कहा जाइये ॥२०॥
प्रीति सो न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और,
चित्त सौ न चदन सनेहू सौ न सेहरा ।
हृदै सौ न आसन सहज सौ न सिंघासन,
भाव सी न सौज और मुनि सौ न गेहरा ॥
शील सौ सनान नाहिं ध्यान सौ न धूप और,
ज्ञान सौ न दीपक अज्ञान तम के हरा ।
मन सी न माला कोऊ सोऽहू सौ न जाप और,
आतमा सौ देव नाहिं देह सौ न देहुरा ॥२१॥
(२०) देवल-देवालय, मन्दिर ।
(२१) देहुरा-देवालय, मन्दिर ।
१८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
श्वासै श्वास राति दिन सोह सोह होइ जाप,
याहि माला बार बार दिढकै धरतु है ।
देह परै इन्द्रिय परै अतहकरन परै,
एक ही अखंड जाप ताप कौ हरतु है ॥
काठ की रुद्राक्ष की रु सूतहू की माला और,
इनकै फिरायै कान कारिज सरतु है ।
सुन्दर कहत ताते आतमा चेतनि रूप,
आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥
क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे,
नीर छाडि हस जैसे क्षीर कौ गहतु है ।
कचन मैं ओर धात मिलि कर बान पर्यौ,
शुद्ध कर कचन सुनार ज्यौ लहतु है ।
पावक हू दारु मधि दारु ही सौ होइ रह्यौ,
मथि कर काढै सोई दारु कौ दहतु है ।
तैसे ही सुन्दर मिल्यौ आत्मा अनात्मा जू,
भिन्न भिन्न करिये सु साख्य यौ कहतु है ॥२३॥
अन्नमय कोश सु तौ पिंड है प्रगट यह,
प्रानमय कोश पच वायु हू बखानिये ।
मनोमय कोश पच कर्म इन्द्रिय प्रसिद्ध,
पच ज्ञान इन्द्रिय विज्ञान कोश जानिये ॥
जाग्रत सुपन विषै कहि चत्वार कोश,
सुषुपति माहि कोश आनदमय मानिये ।
॥ साख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८७
पच कोश आतमा कौ जीव नाम कहियत,
सुन्दर शंकर भाष्य साख्य यह आनिये ॥२४॥
जाग्रत अवस्था जैसे सदन मै बैठियत,
तहा कछु होइ ताहि भली भाति देखिये ।
स्वपन अवस्था जैसे ओवरे मै बैठे जाइ,
रहै रहै उहा हू की वस्तु सब लेखिये ॥
सुषुपति भौंहरे मै बैठे तै न सूझि परै,
महा अंध घोर तहा कछू हू न पेखिये ।
व्यौम अनुसूत घर आवरे भौंहरे मै,
सुन्दर साक्षी स्वरूप तुरिया विसेखिये ॥२५॥
जाग्रत कै विषै जीव नैननि मैं देखियत,
विविध व्योहार सब इन्द्रिन गहतु है ।
स्वपने हूं मांहि पुनि वैसे ही व्यौहार होत,
नैननि तै आइ कर कठ मैं रहतु है ॥
सुषुपति हृदै मै बिलोन होइ जात जब,
जाग्रत स्वपन की तौ सुधि न लहतु है ।
तीनि हू अवस्था कौ साक्षी जब जाने आपु,
तुरिया स्वरूप यह सुन्दर कहतु है ।२६।
(२५) अनुसूत-अनुस्यूत, प्रविष्ट । तुरिया-तुरीय,
चतुर्थ ।
१८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्द्वव छन्द
जाग्रत रूप लिये सब तत्त्वनि,
इन्द्रिय द्वार करै व्यवहारी।
स्वप्न शरीर भ्रमै नव तत्त्व कौ,
मानत है सुख दुख अपारौ ॥
लीन सबै गुन होत सुषूप्ति,
जानै नही कछु घोर अंधारी।
तीनौ कौ साक्षी रहे तुरियातत,
सुन्दर सोई स्वरूप हमारौ ॥२७॥
भूमि तै सूक्षिम आप कौ जानहु,
आप तैं सूक्षिम तेज कौ अंगा।
तेज तैं सूक्ष्म वायु बहै नित,
वायु तैं सूक्ष्म व्योम उतगा ॥
व्योम तैं सूक्षिम है गुन तीनि,
तिन्हू तैं अह महत्तत्त्व प्रसंगा।
ताहु तै सूक्षिम मूल प्रकृति जू,
मूलतैं सुन्दर ब्रह्म अभंगा ॥२८॥
ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि,
अरूप अखंडित है सब माही।
ईश्वर पावक रासि प्रचंड जू,
सग उपाधि लिये वर ताही।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८६
जीव अनंत मसाल चिराग सु,
दीप पतंग अनेक दिखाँही ।
सुन्दर द्वैत उपाधि मिटै जब,
ईश्वर जीव जुदै कछु नाही ॥२६॥
ज्यों नर पावक लौह तपावत,
पावक लौह मिले सु दिखाही ।
चोट अनेक परै घन की सिर,
लोह वधै कछु पावक नाही ॥
पावक लीन भयौ अपनै घर,
शीतल लौह भयौ तब ताही ।
त्यौं यह आतम देह निरंतर,
सुन्दर भिन्न रहै मिलि माही ॥३०॥
आतम चेतनि शुद्ध निरंतर,
भिन्न रहै कहुं लिप्त न होई ।
है जड़ चेतनि अन्त करन जु,
शुद्ध अशुद्ध लिये गुन दोई ॥
देह अशुद्ध मलीन महा जड़,
हालि न चालि सकै पुनि वोई ।
सुन्दर तीनि विभाग किये बिन,
भूलि परै भ्रमतै सब कोई ॥३१॥
१६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सवैया छंद
ब्रह्म अरूप अरूपी पावक,
व्यापक जुगल न दीसत रग ।
देह दारु तै प्रगट देखियत,
अन्त'करन अग्नि द्वय अग ॥
तेज प्रकाश कल्पना तौ लग,
जौ लग रहै उपाधि प्रसग ।
जह के तहा लोन पुनि होई,
सुन्दर दोऊ सदा अभग ॥३२।
देह शराव तेल पुनि मारुत,
वाती अन्त करन विचार ।
प्रगट जोति यह चेतनि दीसै,
जातै भयौ सकल उजियार ॥
व्यापक अग्नि मथन कर जोये,
दीपक बहुत भाति बिस्तार ।
सुन्दर अद्भुत रचना तेरी,
तूं ही एक अनेक प्रकार ॥३३॥
तिल मैं तेल दूध मैं घृत है,
: दारु मांहि पावक पहिचानि ।
पुहुप मांहि ज्यौ प्रगट बासना,
इक्षु मांहि रस कहत बखानि ॥
।(३३) शराव-शकोरा, मिट्टी का दीया ।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १६१
पोसत मांहि अफीम निरंतर,
बनस्पती मैं सहत प्रवानि ।
सुन्दर भिन्न मिल्यौ पुनि दीसत,
देह मांहि यौं आतम जानि ॥३४॥
जाग्रत स्वप्न सुषूपति तीनों,
अन्त करन अवस्था पावैं ।
प्रान चलै जाग्रत अरु सुप्ने,
सुषुपति मैं पुनि अहर्निसि धावै ॥
प्रांन गये तै रहै न कोऊ,
सकल देखता थाट बिलावै ।
सुन्दर आतम तत्त्व निरंतर,
सौ तौ कतहू जाड न आवै ॥३५॥
पन्द्रह तत्व स्थूल कुम्भ मैं,
सुक्षिम लिंग भर्यौ ज्यौ तोय ।
वहा जीव यहा आभा दीसै,
ब्रह्म इन्दु प्रतिबिंबे दोय ॥
घट फूटै जल गयौ विलय व्है,
अन्तहकरन कहै नहि कोय ।
तब प्रतिबिंब मिलै'शशि बिंबहि,
सुन्दर जीव ब्रह्ममय होय ॥३६॥
४. अंग १६-२०: भक्ति-माहात्म्य, वैराग्य-निरूपण व समाधि-दशा
१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद
जैसे व्योम कुम्भ कै बाहिर अरु भीतरहू,
कोऊ नर कुम्भ कौ हजार कोस लै गयौ ।
ज्यौ ही व्योम इहा त्यौही उहा पुनि है अखड,
इहां न बिछौह न तौ उहा मिलाप है भयौ ॥
कुम्भ तौ नयौ पुरानौ होइ कै बिनशि जाइ,
व्योम तौ न व्है पुरानौ न तौ कछु व्है नयौ ।
तैसे ही सुन्दर देह आवै रहै नाश होइ,
आतमा अचल अविनाशी है अनामयौ ॥३७॥
देह कै सजौग ही तै शीत लगै घाम लगै,
देह कै सजौग ही तै क्षुधा तृषा पौन कौं ।
देह कै सजौग ही तै कटुक मधुर स्वाद,
देह कै सजौग कहै खाटौ खारौ लौन कौ ॥
देह कै सजौग कहै मुख तै अनेक बात,
देह कै सजौग ही पकरि रहै मौन कौ ।
सुन्दर देह कै सग सुख मानै दुख मानै,
देह कौ सजौग गयौ सुख दुख कौन कौं ॥३८।
श्रापु की प्रशसा सुनि आपु ही खुशाल होइ,
आपु ही की निंदा सुनि श्राप मुरझाइ है ।
श्रापु ही कौं सुख मानि आपु सुख पावत है,
श्रापु ही कौं दुख मानि आपु दुख पाइ है ॥
(३७) अनामयो-निर्विकार ।
!। सांख्य ज्ञान को अंग ।। [ १६३
आपु ही की रक्षा करै आपु ही की घात करै,
आपु ही हत्यारो होइ गंगा जाउ न्हाइ है ।
सुन्दर कहत ऐसे देह ही को आपु मानि,
निज रूप भूलि कै करत हाइ हाइ है ॥३६॥
॥ इति सांख्य ज्ञान को अंग सम्पूर्णं ॥