सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१७६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
हौं अति उत्तम जाति बडौ कुल,
हौं अति नीच क्रिया कुल हानी ।
सुन्दर चेतनता न सभारत,
देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२४॥
गर्भ बिषै उतपत्ति भई पुनि,
जन्म लियौ शिशु बुद्धि न जानी ।
बाल कुमार किशोर जुवादिक,
बृद्ध भये अति बुद्धि नसानी ॥
जैसी ही भाति भई बपु की गति,
तैसौ ही होइ रह्यौ यहु प्रानी ।
सुन्दर चेतनता न सभारत,
देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२५॥
ज्यो कोऊ त्याग करै अपनौ घर,
बाहर जाइ कै भेष बनावै ।
मूं ड मुडाइ कै कान फराइ,
बिभूति लगाइ जटाऊ बधावै ॥
जैसौई स्वाग करै बपु कौ पुनि,
तैसौई मानि तिसौ व्है जावै ।
त्यौ यह सुन्दर आपुन जानत,
भूलि स्वरूप हि और कहावै ॥२६ ।
॥ इति स्वरूप बिस्मरणको अंग सम्पूर्ण ॥