सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद
जैसे व्योम कुम्भ कै बाहिर अरु भीतरहू,
कोऊ नर कुम्भ कौ हजार कोस लै गयौ ।
ज्यौ ही व्योम इहा त्यौही उहा पुनि है अखड,
इहां न बिछौह न तौ उहा मिलाप है भयौ ॥
कुम्भ तौ नयौ पुरानौ होइ कै बिनशि जाइ,
व्योम तौ न व्है पुरानौ न तौ कछु व्है नयौ ।
तैसे ही सुन्दर देह आवै रहै नाश होइ,
आतमा अचल अविनाशी है अनामयौ ॥३७॥
देह कै सजौग ही तै शीत लगै घाम लगै,
देह कै सजौग ही तै क्षुधा तृषा पौन कौं ।
देह कै सजौग ही तै कटुक मधुर स्वाद,
देह कै सजौग कहै खाटौ खारौ लौन कौ ॥
देह कै सजौग कहै मुख तै अनेक बात,
देह कै सजौग ही पकरि रहै मौन कौ ।
सुन्दर देह कै सग सुख मानै दुख मानै,
देह कौ सजौग गयौ सुख दुख कौन कौं ॥३८।
श्रापु की प्रशसा सुनि आपु ही खुशाल होइ,
आपु ही की निंदा सुनि श्राप मुरझाइ है ।
श्रापु ही कौं सुख मानि आपु सुख पावत है,
श्रापु ही कौं दुख मानि आपु दुख पाइ है ॥
(३७) अनामयो-निर्विकार ।