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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

॥ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥ [ १७७
अथ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥२५॥
मनहर छंद
क्षिति जल पावक पवन नभ मिलि करि,
शबद रु सपरस रूप रस गंध जू ।
श्रोत्र त्वक चक्षु घ्रान रसना रस कौ ज्ञान,
वाक् पानि पाद पायु उपस्थ हि बध जू ॥
मन बुद्धि चित अहकार ये चौबीस तत,
पचंबिश जीव तत करत है धध जू ।
षड विश कौ है ब्रह्म सुन्दर सु निहकर्म,
व्यापक अखंड एक रस निरसध जू । १॥
श्रोत्र दिक् त्वक् वायु लोचन प्रकाश रवि,
नासिका अश्वनी जिव्हा बरुन बखानिये ।
वाक अग्नि हस्त इन्द्र चरन उपेन्द्र बल,
मेढ प्रजापति गुदा मित्र हू कौ ठानिये ॥
मन चन्द्र बुद्धि बिधि चित बासुदेव श्राहि,
अहकार रुद्र कौ प्रभाव करि मानिये ।
(१) क्षिति-पृथ्वी । पावक-तेज. अग्नि । पवन-वायु ।
नभ-आकाश । वाक्-वाणी । पानि-हाथ । पाद-पैर ।
पायु-मलेन्द्रिय । उपस्थ-मूत्रेन्द्रिय । पचविंश-पचीसवा ।
षड्विंश-छब्बीसवा । निहकर्म-निष्कर्म । निरसध-संधि
रहित-निरवयव ।