सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 193

१८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
भूमि तौ विलीन गंध गंध हू विलीन आप,
आप हू विलीन रस रस तेज खातु है ।
तेज रूप रूप वायु वायु हू सपर्श लीन,
सो सपर्श व्योम शब्द तम हि बिलातु है ॥
इन्द्रिय दस रज मन देवता विलीन सत्व,
तीनि गुन अह महतत्त गलि जातु है ।
महतत्त प्रकृति प्रकृति हू पुरुष लीन,
सुन्दर पुरुष जाय ब्रह्म मैं समातु है ॥१७॥
आतमा अचल शुद्ध एक रस रहै सदा,
देह बिवहारनि मैं देह ही सौ जानिये ।
जैसे शशि मंडल अभग नही भग होइ,
कला आवै जाहि घटि बढ़ि सौ बखानिये ॥
जैसे द्रुम सुथिर नदी कै तट देखियत,
नदो के प्रवाह माहि चलतौ सौ मानिये ।
तैसैं आतमा अतीत देह कौ प्रकाशक है,
सुन्दर कहत यौ बिचारि भ्रम भानिये ॥१८॥
आतमा शरीर दोऊ एकमेक देखियत,
जब लग अन्तहकरन मैं अज्ञान है ।
जसै अन्धियारी रैनि घर मैं अन्धेरौ होइ,
आंखिनि कौ तेज ज्यौ कौ त्यौं ही विद्यमान है ।
जदपि अधेरै माहि नैन कौ न सूझै कछु,
तदपि अधेरै तैं सौ अलिप्त बखानि है ।