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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 195

१८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
श्वासै श्वास राति दिन सोह सोह होइ जाप,
याहि माला बार बार दिढकै धरतु है ।
देह परै इन्द्रिय परै अतहकरन परै,
एक ही अखंड जाप ताप कौ हरतु है ॥
काठ की रुद्राक्ष की रु सूतहू की माला और,
इनकै फिरायै कान कारिज सरतु है ।
सुन्दर कहत ताते आतमा चेतनि रूप,
आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥
क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे,
नीर छाडि हस जैसे क्षीर कौ गहतु है ।
कचन मैं ओर धात मिलि कर बान पर्यौ,
शुद्ध कर कचन सुनार ज्यौ लहतु है ।
पावक हू दारु मधि दारु ही सौ होइ रह्यौ,
मथि कर काढै सोई दारु कौ दहतु है ।
तैसे ही सुन्दर मिल्यौ आत्मा अनात्मा जू,
भिन्न भिन्न करिये सु साख्य यौ कहतु है ॥२३॥
अन्नमय कोश सु तौ पिंड है प्रगट यह,
प्रानमय कोश पच वायु हू बखानिये ।
मनोमय कोश पच कर्म इन्द्रिय प्रसिद्ध,
पच ज्ञान इन्द्रिय विज्ञान कोश जानिये ॥
जाग्रत सुपन विषै कहि चत्वार कोश,
सुषुपति माहि कोश आनदमय मानिये ।