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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

१८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
देह हलै देह चलै देह ही सौ देह मिलै,
देह खाद देह पीवै देह ही भरतु है ।
देह ही हिमारै गरै, देह ही पावक जरै,
देह रन माँहि झूझ, देह ही परतु है ॥
देह ही अनेक कर्म करत बिबिध भांति,
चुंबक की सत्ता पाइ लोह ज्यों फिरतु है ।
आतमा चेतनरूप व्यापक साक्षी अनूप,
सुन्दर कहत सौ तौ जन्मै न मरतु है ॥१२॥
देह की न देह कछु देह कौ ममत छाडि,
देह तौ दमामा दीयै देह देह जात है ।
घट तौ घटत घरी बरी घट नाश होत,
घट के गये नै घट की न फेरि बात है ॥
पिंड पिंड माहि पिंड पिंड कौ उपावत है,
पिंड पिंड खात पुनि पिंड ही कौ पात है ।
सुन्दर न होइ जासौ सुन्दर कहत जग,
सुन्दर चेतनरूप सुन्दर विख्यात है ॥१३॥
प्रश्नोत्तर
देहू यह किनको है ? देह पंच भूतन की,
पंच भूत कीन ते है ? तामसाहंकार त ।
अहंकार कीन ते है ? जाकौ महत्तत कहें,
महत्तत कीन ते है ? प्रकृति मझार ते ॥