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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

१६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सवैया छंद
ब्रह्म अरूप अरूपी पावक,
व्यापक जुगल न दीसत रग ।
देह दारु तै प्रगट देखियत,
अन्त'करन अग्नि द्वय अग ॥
तेज प्रकाश कल्पना तौ लग,
जौ लग रहै उपाधि प्रसग ।
जह के तहा लोन पुनि होई,
सुन्दर दोऊ सदा अभग ॥३२।
देह शराव तेल पुनि मारुत,
वाती अन्त करन विचार ।
प्रगट जोति यह चेतनि दीसै,
जातै भयौ सकल उजियार ॥
व्यापक अग्नि मथन कर जोये,
दीपक बहुत भाति बिस्तार ।
सुन्दर अद्भुत रचना तेरी,
तूं ही एक अनेक प्रकार ॥३३॥
तिल मैं तेल दूध मैं घृत है,
: दारु मांहि पावक पहिचानि ।
पुहुप मांहि ज्यौ प्रगट बासना,
इक्षु मांहि रस कहत बखानि ॥
।(३३) शराव-शकोरा, मिट्टी का दीया ।