सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ साख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८७
पच कोश आतमा कौ जीव नाम कहियत,
सुन्दर शंकर भाष्य साख्य यह आनिये ॥२४॥
जाग्रत अवस्था जैसे सदन मै बैठियत,
तहा कछु होइ ताहि भली भाति देखिये ।
स्वपन अवस्था जैसे ओवरे मै बैठे जाइ,
रहै रहै उहा हू की वस्तु सब लेखिये ॥
सुषुपति भौंहरे मै बैठे तै न सूझि परै,
महा अंध घोर तहा कछू हू न पेखिये ।
व्यौम अनुसूत घर आवरे भौंहरे मै,
सुन्दर साक्षी स्वरूप तुरिया विसेखिये ॥२५॥
जाग्रत कै विषै जीव नैननि मैं देखियत,
विविध व्योहार सब इन्द्रिन गहतु है ।
स्वपने हूं मांहि पुनि वैसे ही व्यौहार होत,
नैननि तै आइ कर कठ मैं रहतु है ॥
सुषुपति हृदै मै बिलोन होइ जात जब,
जाग्रत स्वपन की तौ सुधि न लहतु है ।
तीनि हू अवस्था कौ साक्षी जब जाने आपु,
तुरिया स्वरूप यह सुन्दर कहतु है ।२६।
(२५) अनुसूत-अनुस्यूत, प्रविष्ट । तुरिया-तुरीय,
चतुर्थ ।