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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

१७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जाकी सत्ता पाइ सब देवता प्रकाशत है,
सुन्दर सु आतमा हि न्यारौ करि जानिये ॥२॥
इन्दव छन्द
श्रोत्र सुनै दृग देखत हैं,
रसना रस घ्रान सुगंध पियारौ ।
कोमलता त्वक् जानत है पुनि,
बोलत है मुख शब्द उचारौ ॥
पानि ग्रहै पद गौन करै,
मल मूत्र तजै उभऊ अध द्वारौ ।
जाके प्रकाश प्रकाशत हैं सब,
सुन्दर सोई रहै घट न्यारौ ॥३॥
बुद्धि भ्रमै मन चित्त भ्रमै,
अहंकार भ्रमै कहा जांनत नांही ।
श्रोत्र भ्रमै त्वक् घ्रान भ्रमै,
रसना दृग देखि दसौ दिसि जाही ॥
वाक् भ्रमै कर पाद भ्रमै,
गुदद्वार उपस्थ भ्रमै कँहु काही ।
तेरे भ्रमाये भ्रमै सबही गुन,
सुन्दर तू क्यौ भ्रमै इन 'माहीं ॥४॥
(२) उपेन्द्र-विष्णु। मेढ-मेढ्र, उपस्थ। प्रजापति-ब्रह्मा ।
विधि-ब्रह्मा। वासुदेव-विष्णु । रुद्र-शंकर ।