सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

असद्ब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७५
नशे की जैसी मोहात्मक (तामसिक अचेतना) अवस्था ही कही जा सकती है। फिर ऐसी
दशा में, साधारण प्राणियों में पायी जाने वाली तामसिक सुषुप्ति और योगी की समाधि में
अन्तर ही क्या है ?
माध्यमिक लोगों के शून्यवाद के सम्बन्ध में भी लगभग ऐसी ही बाधायें उपस्थित
हो जाती हैं। उनके 'शून्य' का स्वरूप भी कुछ स्पष्ट नहीं है। वे लोग एक ओर किसी
वेदक आत्मसत्ता को स्वीकारने के पक्ष में नहीं हैं परन्तु दूसरी ओर ज़ोर-ज़ोर से निर्वाण
का ढोल पीटते रहते हैं। यदि आत्मा का कहीं अस्तित्व ही नहीं है तो निर्वाण किसका ?
शरीर आदि जड पदार्थ तो निर्वाण का विषय नहीं बन सकते हैं। किसी आत्मरूप वेदकसत्ता
के अनस्तित्व की दशा में क्लेश किसका और उसके क्षय के लिये संघर्ष करने का प्रयोजन ही
क्या ? आखिर 'शून्य' कौन सी और कैसी वस्तु है ? यदि उसका रूप सर्वाभाव जैसा
ही है तो उसकी अनुभूति और नामकरण किसके द्वारा और कैसे सम्भव हो सकता है ?
इन लोगों के द्वारा बतलाई गई निर्वाण की परिभाषा भी कुछ स्पष्ट नहीं है। इन्होंने
निर्वाण को शान्ति का नाम दिया है परन्तु इन्हीं के मन्तव्यानुसार उसका रूप भी शून्य ही
है। फिर यदि निर्वाण भी कोई ऐसी अवस्था है जिसमें ज्ञातृता और कर्तृता का सर्वथा लोप
हो जाता है तो वह शैवों को मान्य नहीं क्योंकि वे लोग ऐसी अवस्था को जड़ता के अतिरिक्त
और कुछ मानने के पक्ष में नहीं हैं। शैव दार्शनिकों के अनुसार¹ मोक्ष कोई अलग अवस्था
नहीं प्रत्युत 'स्वरूपख्याति' ही मोक्ष है। जब आत्मा अख्याति की सीमाओं से निकलकर
अपनी असीम ज्ञातृता और असीम कर्तृता की अनुभूति प्राप्त कर लेती है तब वह मुक्तात्मा
कही जाती है। स्पष्ट है कि मुक्तात्मा का रूप जड़ नहीं, प्रत्युत ज्ञान-क्रिया पर स्वतन्त्र
अधिकार रखने वाला 'पूर्णचैतन्य' है। ²शून्यवादी दार्शनिक प्रत्येक प्रकार के ज्ञान, ज्ञाता
और ज्ञेय पदार्थों की निःस्वभावता अथवा शून्यता को स्वीकारते हुए ज्ञातृ-कर्तृरूप संवित् को
भी निःस्वभाव ही मानते हैं। फलतः इनके मतानुसार संवित् की शून्यता ही निर्वाण है।
शैव दार्शनिकों का इस सम्बन्ध में एक भिन्न दृष्टिकोण है। इनका विश्वास है कि वास्तव में
संवित् का स्वरूप पूर्णज्ञातृता और पूर्णकर्तृतारूप स्पन्द है। इस स्पन्द या स्फुरणा से ही सारे
नील, पीत इत्यादि भावों का अवभासन और स्थिति सम्भव हो सकती है। यदि इस
विश्वात्मक स्फुरणा को ही नकारा जाये तो सारा विश्व प्रत्यक्षरूप में संज्ञी होने पर भी
एकदम संज्ञाहीन मानना आवश्यक है। विश्व की संज्ञाहीनता तो कदापि देखने में नहीं आती
है अतः इस ³स्फुरत्तारूप संवित् का अपलाप कदापि नहीं किया जा सकता है।
१. मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः।
स्वरूपं चात्मनः संविन्नान्यत्..................॥ (तं०, १.१५६)
२. ते खलु सर्वभावानैः स्वाभाव्यवादिनः संविदोऽपि नैःस्वाभाव्यान्मिथ्यात्वमभिदधतस्तच्छू-
न्यतायामेव मोक्षमाचक्षीरन्। (तं० वि०, १.३३)
३. संविदि तु स्फुरतामात्रसारायां मिथ्यात्वादसत्त्वमेव स्यात्, इति न किञ्चित्स्फुरेत्, इति
मूर्च्छव स्यात् इति। न च संविदः स्फुरतामात्रसाररूपाया अपह्नवः शक्यक्रिय इति।
(तं० वि०, १.३३)

७६ स्पन्दकारिका
शून्यवादी बौद्धों ने प्रसिद्ध माध्यमिक आचार्य नागार्जुन की यह उक्ति—
सर्वलम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः ।
सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥
प्रस्तुत करके इस बात का दावा किया है कि हमारे शून्य से ऐसी किसी दशा का अभिप्राय
नहीं जिसको अन्य दार्शनिकों ने सर्वाभाव का नाम देकर कटु आलोचना का विषय
बनाया है। वास्तव में हमारे शून्य से एक ऐसे निरपेक्ष परम-तत्त्व का अभिप्राय है जिसमें
कल्पित आलम्बनधर्मों, सम्पूर्ण तत्त्वों और सारी क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता हो।
वास्तव में उस शून्यतत्त्व का स्वरूप सर्वाभाव नहीं है। वह शून्यतत्त्व एक ऐसी अवस्था है जो
१चतुष्कोटियों की अविषय, मन और वाणी से अगोचर और अनिर्वचनीय है।
इस विषय में यह बात विचारणीय है कि यदि नागार्जुन की उक्ति के अनुसार 'शून्य'
में केवल कल्पित ग्राह्य, ग्राहक आदि भावों की ही शून्यता है और ज्ञानरूपता की स्थिरता
अटल रहती है तो फिर शून्यवाद में, बौद्धों की दूसरी शाखा २विज्ञानवाद के सिद्धान्त से
बढ़कर और कौन सी नई बात कही गई है ? विज्ञानवादियों का मन्तव्य भी यही है कि यह
३सारा कल्पित जगत्-प्रपञ्च, वास्तव में, अन्तःकरणों का धर्म बने हुए ज्ञान, जिसको उनकी
शब्दावली में 'विज्ञप्ति' कहते हैं, का विकासमात्र है। यह ज्ञान ही विचित्र रूपों को अवभा-
सित करने वाला है परन्तु स्वयं, कल्पित तत्त्वादि का रूप धारण नहीं करता है। यह चेतन-
क्रिया के साथ सम्बन्धित होने के कारण 'चित्त' कहलाता है और यही एक पारमार्थिक सत्य
है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शून्यवादियों के 'शून्य' और विज्ञानवादियों के
'चित्त' में शाब्दिक भेद के अतिरिक्त कोई सैद्धान्तिक भेद नहीं है।
जहाँ तक शैवों का सम्बन्ध है वे तो ज्ञान को चित्तरूप या अन्तःकरणरूप मानने के
पक्ष में नहीं हैं। अन्तःकरण इन्द्रिय होने के कारण स्वतः जड़ हैं। ज्ञान सर्वस्वतन्त्र और
चैतन्य होने के कारण उनका धर्म कैसे बन सकता है ?
'शून्य' की कल्पना के विषय में भी शैवों का दृष्टिकोण अन्य दार्शनिकों से नितरां
भिन्न है। इनके कथनानुसार 'शून्य' शब्द से वास्तव में ४अशून्य अर्थात् चिदानन्दघन और
१. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १५४-६२ ।
२. अथ 'सर्वलम्बनधमैश्च....................' इत्याद्युक्तयुक्त्या ग्राह्यग्राहकभावादिना कल्पितेन
रूपेण शून्यं न तु संविदापि इति चेत्, एवं ह्युच्यमाने विज्ञानवादे एवाभ्युपगमः स्यात्' ।
(तं० वि०. १.३३)
३. इत्यन्तःकरणस्यैव विचित्रात्मावभासिनः ।
अविभाविततत्त्वस्य विस्फूर्जितमिदं जगत् ॥ (तं० १.३३ में उदाहृत)
४. अशून्यं शून्यमित्युक्तं शून्यं चाभाव उच्यते ।
अभावः स समुद्दिष्टो यत्र भावाः क्षयं गताः ।
सत्तामात्रं परं शान्तं तत्पदं किमपि स्थितम् ॥ (स्व० तं० ४.२९२-९३)

सूत्र:—उक्त कारणों से वह अभाव समाधि प्रतिसमय (साधारण पशुवर्ग की) सुषुप्ति

स्मर्यमाणता की असंगति ७७
सतत स्फुरणशील परमशिवतत्त्व ही अभिप्रेत है। उसको 'शून्य' की संज्ञा इसलिये दी गई
है वह विश्वोत्तीर्ण रूप में, १माया का अविषय होने के कारण, उससे (माया से) जनित
परिणामित्व इत्यादि धर्मों से शून्य है। उस तत्त्व का यह 'शून्य' अर्थात् विश्वोत्तीर्ण रूप ही
कुछ ऐसा है जिसमें यह सारा इदंवाच्य प्रमेयमण्डल, उसी रूप में विश्रान्त होकर, अभिन्न
'अहं-रूप' में ही अवस्थित है। विश्वोत्तीर्ण दशा में इस नामरूपात्मक प्रमेयमण्डल का अलग
भाव न होने का नाम ही 'अभाव' है और ऐसे ही अभाव का नाम 'शून्य' है। 'शून्य' ही
एक महान् सत्ता है जो कि पूर्णज्ञानक्रियात्मक स्वातन्त्र्य होने के कारण प्रत्येक भाव या अभाव
को सत्ता प्रदान कर देती है। इस पद में जिस कारण प्रत्येक प्रकार की भेदकल्पना विश्रान्त
होती है उस कारण यह शान्त एवं अनिर्वाच्य है।
यह शून्यतत्त्व एक अति अद्भुत एवं विलक्षण तत्त्व है क्योंकि वह शून्य होकर भी
अशून्य है। इसका अभिप्राय यह कि (शून्यतत्त्व) विश्वोत्तीर्णता के अतिरिक्त, नाद, बिन्दु,
भुवन, भाव इत्यादि रूपों में आभासमान विश्वमयता में भी, सुमन में वास की तरह, २व्याप्त
होकर अवस्थित है। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि शैव आचार्यों के मतानुसार 'शून्य'
सर्वाभाव न होकर, पूर्णवेदक अर्थात् स्वतन्त्र ज्ञान-क्रियात्मक प्रमातृसत्ता का अभिव्यञ्जक है।
इस सारे पर्यालोचन का निष्कर्ष यही निकलता है कि शैव मान्यता के अनुसार
व्युत्थान, समाधि, शून्य, अभाव इत्यादि सारी अवस्थाओं में अनुभवितारूप आत्मा की ज्ञान-
क्रियात्मक स्पन्दना में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। फलतः सततस्पन्दमयी आत्मसत्ता के
प्रत्यभिज्ञान की अवस्था न सर्वाभाव, न सर्वशून्यता और न मूढ़ता की ही अवस्था है ॥१२॥
[स्मर्यमाणता की असंगति]
अब सूत्रकार अभावसमाधि को साधारण पशुवर्ग में पाई जाने वाली मोहात्मक सुषुप्ति
(प्रगाढ़ निद्रा) जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की ही अवस्था सिद्ध करने के अभिप्राय से अलग सूत्र
बतला देते हैं—
अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा ।
न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥
अभावभावनालब्धभूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे,
यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्यसन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशील-
नीयम् ॥१३॥
अनुवाद
सूत्र:—उक्त कारणों से वह अभाव समाधि प्रतिसमय (साधारण पशुवर्ग की) सुषुप्ति
(तामसिक निद्रा) के समान कृत्रिम ही समझनी चाहिये। वह तत्त्व (स्पन्दतत्त्व =
१. यत्तु अस्य शून्यत्वमुक्तं तन्मायाक्षयोपचारेण तद्धर्मैः परिणामित्वादिभिः शून्यत्वाच्छून्यम् ।
(तं० वि०, १.७६)
२. यत्र यत्र च नादादि स्थूला अन्येऽपि संस्थिताः ।
तत्र तत्र परं शून्यं सर्वं व्याप्य व्यवस्थितम् ॥ (स्व० तं०, ४.२९४)

सूत्र का अभिप्राय अच्छी प्रकार समझाने के लिए यहाँ पर पहले 'सौषुप्तपद' के

७८ स्पन्दकारिका
आत्मतत्त्व = स्वरूप) इस जड़समाधि की तरह कभी भी स्मर्यमाणता का विषय नहीं बन
जाता है ॥१३॥
वृत्तिः-(मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ—इस प्रकार की) अभाव-भावना का अभ्यास करने
से यदि योगी को ऐसी किसी भूमिका का साक्षात्कार हो भी जाये, वह अवस्था कृत्रिम अर्थात्
अनित्य ही होती है। उसकी अनुभूति कुछ ऐसी ही होती हैं जैसी कि (जीवभाव की
मोहात्मक) सुषुप्ति में होती है। इसका कारण यह कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप चित्-
रूपता है और उसकी अवस्थिति सतत सन्निहित अर्थात् त्रिकालाबाधित (शाश्वतिक वर्तमान)
ही है। प्रतिसमय गुरु के उपदेश पर कटिबद्ध रहकर उसी का (आत्मतत्त्व का) अनुशीलन
करते रहना चाहिये ॥१३॥
विवरण
सूत्र का अभिप्राय अच्छी प्रकार समझाने के लिए यहाँ पर पहले 'सौषुप्तपद' के
विषय में दो शब्द कहना आवश्यक है। अनुग्रहमूर्ति भगवान् भूतनाथ ने स्वयं एक १सूत्र में
साधारण पशुवर्ग और योगी-वर्ग की दृष्टि से सौषुप्तपद का निरूपण किया है।
पशुवर्ग की सुषुप्ति—साधारण पशुभाव में सुषुप्ति प्रगाढ निद्रा की अवस्था होती है।
इसमें तमोगुण से उद्भूत मोह की घनता के कारण वेद्यपदार्थों का प्रत्यक्ष ज्ञान या २स्मृति नहीं
रहती है। इस अवस्था में अविवेक अर्थात् ३ज्ञानरूप और ज्ञेयरूप चित्शक्ति पर अख्याति
का इतना मोटा आवरण छा जाता है कि अपनी चित्-रूपता और बाह्यरूप में अवभासमान
भाववर्ग की, स्फुटतर रूप में, विवेचना का सामर्थ्य पूर्णतया रुक जाता है। भाव यह कि यह
अवस्था मृत्यु की जडता जैसी होती है। सुषुप्ति काल तक ज्ञानज्ञेयरूप शक्ति पर ४मायीय
आवरण पड़ा रहने के कारण, स्पष्टरूप में, न तो बाह्य अर्थों की ओर उन्मुखता, न उनका
ऐन्द्रिय बोध और न उनकी स्मृति ही सम्भव हो सकती है। वास्तव में सुषुप्ति में पड़े हुए
व्यक्ति की सारी चेतनाशक्ति शरीर, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय इत्यादि से सिमट कर पुर्यष्टक-
प्रमातृभाव पर ही केन्द्रित हुई होती है। पुर्यष्टक पर लगे हुए सुषुप्तिकालीन संस्कारों के
फलस्वरूप वह व्यक्ति, सुषुप्ति से निकलने के अनन्तर, तत्कालीन दशा को धुंधली स्मर्यमाणता
के रूप में अभिव्यक्त कर लेता है। यथा—“मैं सुख से सोया था, मुझे कुछ भी ज्ञात
नहीं है”।
१. अविवेको मायासौषुप्तम्। (शिवसूत्र, १.१०)
२. यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम् । (शिवसूत्र, १.१० टिप्पणी)
३. ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा ।
चिद्रूपस्याविवेकः स्यादासवेवाविमर्शतः ।
सैव मायावृत्तिजालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता ।
.... —— —सुषुप्तता ॥ (शिवसूत्रवा०, १.१०)
४. यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः, एतदेव मायारूपं मोहमयं सौषुप्तम् ।
(शिवसूत्रवि०, १.१०)

स्मर्यमाणता की असंगति ७९
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
स्मर्यमाण रूप में अभिव्यक्त किये जाने के कारण यह दशा कृत्रिम होती है। सच्ची
आत्म-अनुभूति तो सतत उदीयमान होने के कारण कभी भी स्मर्यमाण नहीं बन
सकती है।
योगियों की दृष्टि में सुषुप्ति—पशुभाव की सुषुप्ति के प्रतिकूल योगियों की सुषुप्ति
समाधि की अवस्था होती है। इसमें समाधिकाल तक बाह्य भाववर्ग की ओर उन्मुखता न
रहने के कारण सब कुछ १स्वरूप में ही विश्रान्त हुआ होता है और फलतः योगी की आत्मा
तब तक विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही अवस्थित रहती है। यही कारण है कि २समाधिनिष्ठ
योगी को तावत्कालपर्यन्त ग्राह्यता और ग्राहकता के भेदभाव की चेतना नहीं रहती है, प्रत्युत
उसको सारे भाव स्वात्मरूप में ही अवभासित होते हैं। योगी को समाधिकाल में निजी
ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दना की पूर्ण चेतना रहती है अतः यह साधारण सुषुप्ति की तरह मूढ़ता
की जैसी अवस्था कदापि नहीं होती है। वेदकता सम्पूर्ण रूप में अक्षुण्ण रहने के कारण इस
काल में योगी को किसी प्रकार के अभाव या शून्यता की अनुभूति नहीं होती है। साथ ही
अनुभवी गुरुओं का कथन है कि समाधिकाल में प्राप्त की हुई स्वरूप-अनुभूति त्रिकालाबाधित
और सतत उदीयमान होती है। अतः ऐसी अवस्था न तो कृत्रिम और न अनित्य ही
होती है।
फलतः शैवगुरु अपनी यथार्थ अनुभूति के आधार पर यह उपदेश देते हैं कि अभाव-
समाधि या शून्य-समाधि दोनों उपरिवर्णित पशुभाव की सुषुप्ति के समान जड़, कालपरिधि में
संकुचित और कृत्रिम अवस्थायें हैं। जो भी कोई आध्यात्मिक अनुभूति, अनुभवकाल के
अनन्तर, बीते हुए रूप में स्मरण की जाती है वह केवल भूतकाल के साथ सम्बन्धित होने के
कारण कालकल्पना की परिधि में सीमित हो जाती है। कालकल्पना में सिमट जाने के साथ
ही वह अनित्य बन जाती है। आत्म-अनुभूति तो सतत स्फुरणामय होने के कारण इससे
बिल्कुल विपरीत है। वह तो अनुभव के समय और स्मृति के समय में भी एक ही उदीयमान
रूप में अवभासमान रहती है।
एक और बात ध्यान में रखने के योग्य है। वह यह कि अभाव या शून्य की भावना
करनेवाले योगियों में जो यह अपनी विद्यमान सत्ता को—'मैं नहीं हूँ' कहकर आग्रहपूर्वक
झुठलाने की प्रवृत्ति पाई जाती है वह तो, उनमें, चित्-रूपता के अभाव की नहीं; प्रत्युत
सद्भाव की ही द्योतिका है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति घर के अन्दर बैठा हो
और बाहर से कोई ऐसा व्यक्ति आकर उसको बुलाने लगे जिसके साथ उसको मिलने की
इच्छा न हो, तो ऐसी स्थिति में यदि वह पहला व्यक्ति अन्दर से स्वयं ही चिल्लाने लगे—
१. अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता।
पत्युश्च'''' .... .... ''''॥ (शिवसूत्रवा०, १.१०)
२. ग्राह्यग्राहकभेदसंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्, इत्यप्यनया वचोयुक्त्या दर्शितम्।
(शिवसूत्रवि०, १.१०)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र—( इस स्पन्दमार्ग में ) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की दो अवस्थाओं को कार्यता

८० स्पन्दकारिका
'जी, मैं यहाँ नहीं हूँ'—उसका ऐसा स्वरूप-अपलाप, सहज ही में, उसके वहाँ असद्भाव को
नहीं, प्रत्युत सद्भाव को ही सिद्ध कर देता है।
फलतः कौन व्यक्ति ऐसा मूर्ख होगा जो स्वयं चेतन होकर, अपने आपको ही अभाव-
रूप या शून्यरूप समझने की गलती करे ॥१३॥
[कर्तृता की अनश्वरता]
स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की, वेदकरूप और वेद्यरूप दो अवस्थायें हैं। इनको शास्त्रीय
शब्दों में क्रमशः कर्तृता और कार्यता अथवा भोक्तृता और भोग्यता कहते हैं। इनमें से
कर्तृतारूप अवस्था ही आत्मा का वास्तविक रूप है। कार्यता उसके द्वारा स्वयं अङ्गीकृत
कृत्रिमरूप है। यही कारण है कि पहली अवस्था अनश्वर और दूसरी नश्वर है। अगले सूत्र
में चित्तत्त्व की इन्हीं दो अवस्थाओं पर प्रकाश डाला जा रहा है :—
अवस्थायुगलं चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम् ।
कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥
अवस्थायुगलम्, अवस्थाद्वयमेव कार्यकार्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्, तत्र यो
भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च; भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचिद्
विनश्यति तेन नित्यः ॥ १४ ॥
अनुवाद
सूत्र—( इस स्पन्दमार्ग में ) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की दो अवस्थाओं को कार्यता
और कर्तृत्व ( कर्तृता ) इन दो शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है। इनमें से कार्यता नश्वर
है परन्तु कर्तृत्व कभी नष्ट नहीं होता है ।। १४ ।।
वृत्ति—( स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की ) दो अवस्थायें हैं। इन दो अवस्थाओं को कार्यता
और कर्तृत्व ( कर्तृता ) नाम दिया गया है। इनमें भेद यह है कि एक भोग्य है दूसरी भोक्ता
है। इनमें से जो 'भोग्य' नामवाला भेद है वह उत्पन्न भी होता है और नष्ट भी होता है।
परन्तु 'भोक्ता' नामवाला भेद मात्र चित्-रूप होने के कारण न तो उत्पन्न ही होता है और
न कभी नष्ट ही होता है। अतः वह नित्य है ।। १४ ।।
विवरण
पहले भी शैवदर्शन के इस सिद्धान्त का उल्लेख किया जा चुका है कि अहंदविमर्शात्मक
स्पन्दतत्त्व, स्वतन्त्र होने के कारण, प्रतिसमय दो प्रकार की अवस्थाओं में स्पन्दायमान रहता
है। इनमें पहली सामान्य-अवस्था और दूसरी विशेष-अवस्था है। सामान्य-अवस्था किसी भी
प्रकार के उपराग से रहित और विशुद्ध चिद्रूपता की अवस्था है। इसमें बाह्य प्रमेयवर्ग
विभागहीन अहंविमर्श के रूप में ही अवस्थित रहता है। प्रस्तुत सूत्र में इसी अवस्था को कर्तृत्व
की अवस्था का नाम दिया गया है। दूसरी विशेष-अवस्था वह अवस्था है जिसमें मौलिक चित्-
रूपता, स्वयं उत्पादित अख्याति के द्वारा, अपने ही वास्तविक रूप को आच्छादित करके, देह,
प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां, अथवा घट, पट इत्यादि अनन्त एवं विचित्र जड़ वेद्य
पदार्थों के रूप में अवभासमान है। इस अवस्था को प्रस्तुत सूत्र में कार्यता की अवस्था का नाम

सूत्र-( समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि बहिर्मुखीन कार्यता के प्रति

समाधि में मात्र कार्यता का लोप ८१
दिया गया है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने कहा है कि मौलिक तत्त्व अपने स्वातन्त्र्य से प्रति-
समय ^१आवरणरहित अर्थात् वेदक और आवरण-सहित अर्थात् वेद्य के रूप में स्वयं अवभासमान
है। वह तत्त्व युगपत् ही कर्तृता की अवस्था और कार्यता की अवस्था भी है पहले रूप में
अपरिणामी, अविचल और अनश्वर और दूसरे रूप में परिणामी, चल और नश्वर।
अनुभवी शैवगुरुओं ने तुरीयारूप शाक्तभूमिका का यथार्थ अनुभव प्राप्त करके इस
बात को स्पष्ट किया है कि शाक्त के 'कर्तृत्व' अंश में, किसी भी दशा में, कोई परिवर्तन नहीं
होता है। वेदकता का भाव, शाश्वतरूप में, अटल एवं अक्षुण्ण है क्योंकि यही शक्ति का वास्त-
विक रूप है। 'कार्यता' अंश में देश, काल एवं आकार के भेद के अनुसार उतार-चढ़ाव अथवा
उदय एवं अस्त होते ही रहते हैं। समाधि की अवस्था में कार्यता का क्षय हो जाता है। इसका
वास्तविक अभिप्राय यह है कि कार्यता संहृत होकर कर्तृता में ही विश्रान्त हो जाती है और
वह अपने विशुद्ध ज्ञानक्रियात्मक चित्-रूप में अवभासमान रहती है ॥ १४ ॥
[ समाधि में मात्र कार्यता का लोप ]
समाधिकाल में सतत स्पन्दमयी कर्तृता ( वेदकता ) बाह्य प्रमेयवर्ग की ओर उन्मुख न
होने के कारण, अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में
अवस्थित रहती है। ऐसी अवस्था में ^२सुप्रबुद्ध योगीजन ही उस चिन्मात्र रूपता को पहचानने
में समर्थ होते हैं। अभाव की भावना करने वाले योगी वास्तव में अबुद्ध होते हैं अतः समाधि-
काल में कार्यता अंश के विलीन होते ही उनको ऐसा लगता है कि हम अभाव में हो गये।
अगले सूत्र में इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है :-
कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ।
तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥
कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य
तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये 'स्वभावो मे विलुप्त'-इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य
विनाशोऽस्ति ॥ १५ ॥
अनुवाद
सूत्र-( समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि बहिर्मुखीन कार्यता के प्रति
उन्मुखता रूप प्रयत्न लुप्त हो जाता है। उसके लुप्त हो जाने पर अबुध योगी को ऐसा लगता
है कि-'मैं स्वयं भी लुप्त हो गया हूँ अर्थात् अभाव में ही हो गया हूँ' ॥ १५ ॥
वृत्ति-(समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने का सामर्थ्य,
जिसका बाह्य इन्द्रियों का, अपने शब्द स्पर्श इत्यादि विषयों को ग्रहण करने का व्यापार होता
है, लुप्त हो जाता है। बाह्य इन्द्रियों के विरत हो जाने की दशा में; विषयों को ग्रहण करने
का सामर्थ्य लुप्त हो जाने पर, अबुध योगी ऐसा समझ लेता है कि-'मेरे स्वभाव का ही लोप
१. 'निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः ।' (तं० १.९३)
२. आगे, सूत्र १७ की विवृत्ति देख लें।
६

८२ स्पन्दकारिका
हो गया है।' परन्तु जो भाव हो अर्थात् जिसकी सत्ता त्रिकालाबाधित हो, उसका विनाश कभी
नहीं होता है ।। १५ ।।
विवरण
पहले भी इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि अभाववादी लोग किसी भी पदार्थ
की सत्ता के अनस्तित्व को ही वास्तविक यथार्थ मानते हैं। उनके मतानुसार यही सिद्धान्त
आत्मसत्ता पर भी लागू हो जाता है। यही कारण है कि वे लोग इसी अनस्तित्व की अवस्था
को प्राप्त करने के लिए प्रतिसमम—'मैं नहीं हूँ, मेरा भाव नहीं है'—इस प्रकार की भावना
का अभ्यास करते रहते हैं। निरन्तर अभ्यास करते करते कभी ऐसे किसी योगी को, समाधि-
काल में, इन्द्रियों का व्यापार विरत हो जाने पर बाह्य विषयों के साथ पूर्णतया सम्बन्धविच्छेद
हो जाता है। उसके बाह्य इन्द्रिय वर्ग में अपने अपने शब्द, स्पर्श आदि विषयों को ग्रहण करने
का सामर्थ्य नहीं रहता है क्योंकि उसकी चेतना बहिर्मुखता से निवृत्त होकर अन्तर्मुख होने लगती
है। ऐसी दशा में वह अबुध होने के कारण यह समझ लेता है कि 'मैं' अर्थात् मेरी आत्मा
अभाव में ही हो गई है।''
कहना न होगा कि समाधि-काल में ऐसी अवस्था का उदय हो जाना केवल साधना की
अपरिपक्वता और साधक की अबुधता का परिचायक है। सुप्रबुद्ध योगी ही अपने पुरुषार्थ से
इस अवस्था को पार कर के तुरीया-रूप शाक्त-भूमिका का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं।
उनको तो उस भूमिका (तुरीया-भूमिका) पर पहुँच कर अपनी ज्ञानक्रियामयी स्पन्दना का अनुभव
हो जाने से पूर्ण वेदकता की अनुभूति हो जाती है। इसमें सद्गुरु की कृपा परम अपेक्षणीय है।
इस सम्बन्ध में यह बात ध्यान में रखना परम आवश्यक है कि कार्योन्मुख प्रयत्न के
लुप्त होने की दशा में यदि कर्तृत्व अंश का भी सचमुच लोप ही हुआ होता तो उस सर्वाभाव-
दशा के साक्षात्कार की अनुभूति किसको होती ? कौन सा तत्त्व एक ओर स्वयं को 'अहं रूप'
में सत्ता देकर, परन्तु दूसरी ओर अभाव में लय होकर, ऐसे लयीभवन की अनुभूति को अभि-
व्यक्त कर लेता ? फलतः यह एक तथ्य है कि योगी में अथवा सर्वसाधारण जीवधारियों में भी
जो यह 'अहं रूप' प्रतीति विद्यमान है वही वेदकता का अंश है। उसी में अनुभव करने की,
सोचने की, समझने की अथवा किसी प्रकार की भी अनुभूति को अभिव्यक्त करने की शक्ति
है। वही अभाव को भी अभाव के रूप में ( न होने के भावरूप में ) सत्ता देकर उसकी अनु-
भूति प्राप्त कर लेता है। उस वेदक अंश का, किसी भी अवस्था में, लोप नहीं होता है अतः
अभाववादियों की सर्वाभाव जैसी कपोलकल्पित अवस्था में मूढ़ता के अतिरिक्त और कुछ
नहीं है ।। १५ ।।
[ आत्मतत्त्व की स्थिरता ]
अगले सूत्र में, कर्तृत्व अंश के, किसी भी अवस्था में नष्ट न होने के मौलिक शैवसिद्धान्त
की पुष्टि, हेतु के द्वारा की जा रही है—
न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ।
तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ १६ ॥

आत्मतत्त्व की स्थिरता ८३
न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढस्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः
कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र
अनुभवति इति ॥ १६ ॥
अनुवाद
सूत्र—परन्तु वह अन्तर्मुख ( शाश्वत अहंवरूप में ही स्पन्दायमान ) चेतनसत्ता, सर्वज्ञता
इत्यादि गुणों की एकमात्र आश्रय है। उसका नाश कभी भी नहीं होता है क्योंकि ( समाधि-
काल में ) किसी भी अतिरिक्त-सत्ता की विद्यमानता अनुभव में नहीं आती है ॥ १६ ॥
विशेष
कई प्राचीन स्पन्दशास्त्रियों ने इस सूत्र के चौथे पाद—'अन्यस्यानुपलम्भनात्' से
दूसरे प्रकार के अभिप्राय भी लिये हैं। उनका आशय इस प्रकार है।
१. उस कर्तृत्वसत्ता का कभी भी नाश नहीं होता है क्योंकि यदि वैसा होता तो दूसरे
अर्थात् विश्व का भी अनुपलम्भ ( अदर्शन ) हो जाता।
२. उस वेदकसत्ता का कभी नाश नहीं होता है क्योंकि यदि वैसा होता तो दूसरे
अर्थात् अभाववादियों के अभाव और शून्यवादियों के शून्य का भी स्वरूप-निर्धारण नहीं हो
सकता।
वृत्ति—परन्तु जो तत्त्व अन्तर्मुख अर्थात् आन्तरिक संवित्तिचक्र के रूप में प्रतिसमय
स्पन्दायमान रहने के स्वभाव वाला और सर्वज्ञता इत्यादि गुणों का आधार है, उसका कभी भी
नाश नहीं होता है। अतः यह बात निर्विवाद है कि उससे इतर और किसी वेदकसत्ता का
अस्तित्व न होने के कारण वही, आकाश के समान स्वच्छ और सर्वव्यापक चैतन्यरूप तत्त्व
प्रत्येक अवस्था का अनुभव कर लेता है ॥ १६ ॥
विवरण
पूर्वोक्त सूत्र १४ में उल्लिखित 'कर्तृत्व सत्ता' को प्रस्तुत सूत्र में 'भाव' शब्द के द्वारा
अभिव्यक्त किया गया है। इसका एक विशेष अभिप्राय है। 'भाव' शब्द का मूल धातु 'भू' है
जिसका अर्थ 'सत्ता' अर्थात् अस्तित्व है। शैवशास्त्रों में सत्ता या भाव शब्दों का अर्थ ऐसा
अकालकलित अस्तित्व है जिसका वर्तमानता से स्वयं अस्तित्व भी सार्थक होता है। किसी भी
प्रकार की क्रिया से पहले उसके कर्ता की वर्तमानता आवश्यक है क्योंकि कर्ता के बिना क्रिया
सिद्ध नहीं हो सकती है। फलतः प्रत्येक क्रिया को सिद्ध करने की अबाध क्षमता रखने वाले
और शाश्वत रूप में स्वयं वर्तमान रहने वाले, स्वतन्त्र कर्तृत्व को ही भाव या सत्ता की संज्ञा
दी गई है।
साधारण जीवभाव के स्तर पर भी यदि यह कहा जाए—'देवदत्त अन्न पकाता है',
तो इस 'पकाता है' क्रियापद में से 'पकाता' अंश से पकाने की क्रिया का और 'है' अंश से
किसी चेतना कर्ता—जो कि पकाने की क्रिया करने में स्वतन्त्र है—का अवबोध हो जाता
है। इस उदाहरण से यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है कि देवदत्तरूप चेतन सत्ता की पूर्व-
१. सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम्। (तं० आ० वि० ५/२३)

सूत्र १ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि कोई भी क्रिया ज्ञान के बिना सम्भव

८४ स्पन्दकारिका
वर्तमानता से ही पकाने की क्रिया निष्पन्न हो सकती है। पारमार्थिक स्तर पर भी यही
सिद्धान्त लागू हो जाता है।
इस शाश्वत 'कर्तृत्व' का स्वरूप अहंविमर्शात्मक स्पन्द है। दूसरे शब्दों में इसको
'विमर्शशक्ति' भी कहते हैं। विमर्शशक्तिरूप 'कर्तृत्व' ही एक ऐसा अनिर्वचनीय 'भाव' है
जो कि विश्व के अणु अणु को सत्ता प्रदान करने वाला सारभूत चैतन्य है।
भगवान् उत्पलदेव ने इस भाव अथवा अहंविमर्शात्मक स्फुरण को '१महासत्ता' का
नाम दिया है क्योंकि यही सारे जड़ अथवा चेतन भावों की विश्रान्ति का स्थान अर्थात् 'हृदय'२
है। जड़ भावों की विश्रान्ति का स्थान चेतन है। चेतनों का आधार प्रकाशमानता है परन्तु
स्वयं प्रकाश की प्रकाशमानता का रहस्य भी विमर्श में ही अन्तर्निहित है। यह तो ३विमर्श-
रूप स्पन्दना ही है जो कि स्वयं अदेशकालकलित होने के कारण, विभिन्न एवं विचित्र प्रकार
के देश, काल एवं आकारों से परिकलित प्रमेयवर्ग को जीवन देकर, स्वयं उन उन रूपों में
निरर्गल क्रीड़ा करती रहती है। यद्यपि खरगोश के सींग या आकाश के फूल जैसी कल्पनाओं
का प्रत्यक्षरूप में कहीं भी अस्तित्व नहीं है परन्तु विमर्श में इनकी भी सत्ता ठीक उसी प्रकार
विद्यमान है जिस प्रकार दृश्यमान पदार्थों की है। फलतः यह ऐसा शाश्वत भाव है जिसमें
अभाव भी अन्तर्निहित है।
सूत्र १ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि कोई भी क्रिया ज्ञान के बिना सम्भव
नहीं हो सकती है। ज्ञान का मौलिकरूप स्वतन्त्र इच्छा है। अतः प्रस्तुत प्रकरण में वर्णित
'कर्तृत्व' अथवा 'भाव', स्वतन्त्र एवं अकालकलित इच्छा; ज्ञान और क्रिया की समरसता है,
इसी को शैवशब्दों में चित्-रूपता कहते हैं ॥१६॥
[प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध की अनुभूति]
अब यहाँ से अगले कई सूत्रों में इसी चिन्मात्ररूप स्वभाव के अनुभवपक्ष पर प्रकाश
डाला जा रहा है। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम अगले सूत्र में सुप्रबुद्ध और प्रबुद्ध योगियों में
पाई जाने वाली आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर में तारतम्य दिखाने के साथ-साथ, सूत्र में
अन्तर्निहित व्यंग्य के द्वारा, इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि प्रबुद्ध भूमिका पर
अवस्थित योगी को सुप्रबुद्ध-भाव प्राप्त करने के लिये गुरूपदेश की आवश्यकता होती है :—
तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदान्यभिचारिणी ।
नित्यं स्यात् सुप्रबुद्धस्य, तदाद्यन्तेऽपरस्य तु ॥१७॥
१. सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ (ई० प्र०, १.५.१४)
२. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशात्म-
त्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः । (ऊपर के सूत्र पर विमर्शिनी टीका)
३. महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते । (ऊपर के सूत्र में उदाहरण)

प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध की अनुभूति ८५
तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु
नित्यं सुप्रबुद्धस्य भवति, तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तुर्यौ
त्वागममात्रगम्यौ ॥१७॥
अनुवाद
सूत्र—सुप्रबुद्ध योगी को, उस चिद्रूप स्वभाव की उपलब्धि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
इन तीनों अवस्थाओं के आदि, मध्य और अन्त में समान एवं अखण्ड रूप में, प्रतिसमय, होती
रहती है। परन्तु इसके प्रतिकूल प्रबुद्ध योगी को, १इन तीनों अवस्थाओं में से पहली (जाग्रत्
अवस्था) की अन्तिम दो अवस्थाओं में (स्वप्न और सुषुप्ति में) उपलब्धि होती है ॥१७॥
वृत्ति—सुप्रबुद्ध योगी को, विश्व के कण-कण में अनुस्यूत चित्-रूप स्वभाव की
अनुभूति, जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में, प्रतिसमय अर्थात् प्रत्येक अवस्था के आदि, मध्य
और अन्त में अखण्डरूप में होती रहती है। परन्तु प्रबुद्ध योगी को, इन अवस्थाओं में से
पहली अर्थात् जाग्रत् अवस्था के अन्त में अर्थात् स्वप्न और सुषुप्ति में तथा इन्हीं दो
अवस्थाओं में अन्तर्भूत होने वाली २अन्य अवस्थाओं में ही होती है। उसको जाग्रत् और
तुर्या अवस्थाओं में ऐसी अनुभूति केवल सद्गुरु के उपदेश से ही प्राप्त हो सकती है ॥१७॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र का वर्ण्य विषय लोकोत्तर अनुभूति होने के कारण साधारण रूप में दुरूह
एवं असंगत जैसा प्रतीत होना स्वाभाविक है। यदि इस सूत्र को कुछ मात्रा तक कूटसूत्र की
संज्ञा दी जाये तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। विशेष रूप में इसके चौथे चरण में वर्तमान
कूटता ३श्री क्षेमराज और श्री भट्टलोल्लट जैसे प्राचीन व्याख्याकारों के लिये भी माथापच्ची
का कारण बनी हुई थी। प्रस्तुत वृत्तिकार भट्टकल्लट ने भी अपनी वृत्ति में 'तदाद्यन्ते' इस
मूलपद के लिये 'स्वप्नसुषुप्तादौ' यह पर्याय लिख कर ही इतिश्री कर दी है। मूलसूत्र और
वृत्ति दोनों का गम्भीर अनुसन्धान करने पर भी सूत्र का वास्तविक अभिप्राय समझ में नहीं
आता है। वृत्ति का अध्ययन करने पर केवल इतनी बात समझ में आती है कि जहाँ सुप्रबुद्ध
योगी को तीनों अवस्थाओं के आदि, मध्य और अन्त में आत्म-अनुभूति अखण्ड रूप में होती
रहती है वहाँ प्रबुद्ध योगी को केवल स्वप्न और सुषुप्ति में ही होती है। परन्तु इतने से इस
१. सूत्र के चौथे चरण का उपरिलिखित हिन्दी अनुवाद श्रीरामकण्ठाचार्य की विवृति के
आधार पर किया गया है। आचार्य जी ने सूत्र में उल्लिखित 'तदाद्यन्ते' पद का इस
प्रकार विग्रह किया है : “तत् = इन जाग्रत् आदि अवस्थाओं की, आदि = पहली अर्थात्
जाग्रत् अवस्था के, अन्ते = अन्तिम दो पदों में अर्थात् स्वप्न और सुषुप्ति में” (स्प०
का०, २.१)
२. रामकंठाचार्य के मतानुसार भट्टकल्लट की, वृत्ति में 'स्वप्न-सुषुप्तादौ' इस समस्त पद
में स्वप्न और सुषुप्ति शब्दों के साथ 'आदि' शब्द जोड़ देने से संवेदन की वे सारी
अवस्थायें अभिप्रेत हैं जिनका अन्तर्भाव इन दो अवस्थाओं में होता है। (स्प० का०, २.१)
३. द्रष्टव्य, स्पन्दनिर्णय पृ० ३४

८६ स्पन्दकारिका
शङ्का का समाधान नहीं होने पाता है कि क्या प्रबुद्ध योगी की आत्म-अनुभूति का रूप भी,
चाहे दो ही अवस्थाओं में सही, ठीक वैसा ही अखण्ड होता है जैसा सुप्रबुद्ध योगी की अनुभूति
का होता है ? तात्पर्य यह है कि क्या प्रबुद्ध योगी को भी इन दो अवस्थाओं के आदि, मध्य
और अन्त में समानरूप से आत्म-अनुभूति स्थिर रहती है या नहीं ? भट्टकल्लट की वृत्ति के
ही आधार पर लिखी हुई श्रीरामकण्ठाचार्य की विवृति में भी इस शङ्का का कोई सन्तोषजनक
समाधान नहीं मिलता है । फलतः वास्तविक स्थिति पूर्णरूप से स्पष्ट नहीं होने पाती है ।
श्रीरामकण्ठाचार्य ने अपनी विवृति में 'तदाद्यन्ते' इस मूलपद का जैसा अर्थ लिखा है
वैसे ही अर्थ को आधार मान कर इसका हिन्दी अनुवाद किया गया है । इस स्थल पर
आचार्य जी की विवृति को ही हिन्दी अनुवाद का आधार बनाने का कारण यह है कि
आचार्य जी ने स्वयं भट्टकल्लट की वृत्ति को ही अपनी विवृति का आधार बनाया है ।
इस सन्दर्भ में निःसंकोच रूप में इस बात को स्वीकार करना आवश्यक है कि प्रातः-
स्मरणीय ईश्वरस्वरूप जी को रामकंठाचार्य के द्वारा प्रस्तुत किया हुआ 'तदाद्यन्ते' शब्द का
विश्लेषण मान्य नहीं है । आपने कई बार अपने मौखिक प्रवचनों में इस आध्यात्मिक गुत्थी
को, इस मूल शब्द का दूसरी प्रकार से अर्थ लगाकर, सुलझाने की कृपा की है । आपके
मन्तव्यानुसार प्रबुद्ध योगी को, सद्गुरु के उपदेश से, स्वप्नपद के अन्त और सुषुप्ति पद के
आदि में, अर्थात् स्वप्नपद से सुषुप्तिपद में प्रविष्ट होने के अवसर पर, दोनों पदों के अन्त-
रालवर्ती संधिक्षण में स्वभाव की अनुभूति प्राप्त होती है परन्तु वह बिजली की कौंध के
समान क्षणपर्यवसायिनी होने के कारण अखण्ड नहीं कही जा सकती है । जब वह, सद्-गुरु के
द्वारा बताई गई विधि का अक्षरशः परिपालन करता हुआ, निरन्तर अभ्यास एवं अनुसन्धान
के द्वारा, इस तुर्यरूप स्वभाव पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, तब वह प्रबुद्ध-
भाव से निकल कर सुप्रबुद्ध-भाव में प्रविष्ट हो जाता है और उसकी आत्म-उपलब्धि तीनों
पदों के आदि, मध्य और अन्त में समानरूप से स्थिर बनी रहती है ।
अब रह जाता है प्रश्न सुप्रबुद्ध योगी का । उसके विषय में कुछ कहना चमकते हुए
सूर्य को दीये के द्वारा ढूंढने के बराबर है । उसने तो परमेश्वर के अनुग्रह से तुर्यरूप शाक्त-
भूमिका (सामान्य-स्पन्दभूमिका) आक्रान्त की हुई होती है और वह साक्षात् शिवभाव पर
आरूढ़ सिद्ध होता है । उसमें भेदव्याप्ति के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं होते हैं अतः उसकी
आत्म-अनुभूति में, कभी भी, कोई उतार-चढ़ाव आने का प्रश्न ही नहीं उठता है ।
अभी ऊपर कहा गया है कि इस सूत्र में गुरुपदेश के लिये उपयुक्त एवं अधिकारी
पात्र का निर्देश व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है । वृत्तिकार ने 'जाग्रत्तूर्यौ त्वागममात्रगम्यौ'
इतना कह कर ही उस व्यंग्य का स्पष्टीकरण किया है । इस कथन के अनुसार केवल प्रबुद्ध-
भाव पर अवस्थित व्यक्ति ही गुरुपदेश के लिए उपयुक्त पात्र है ।
इस सम्बन्ध में यहाँ पर प्रबुद्ध, सुप्रबुद्ध इत्यादि भूमिकाओं पर अवस्थित प्रमाताओं
की स्वभावगत विशेषताओं पर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है क्योंकि उससे पाठकों
को सूत्र का अर्थ भली-भाँति हृदयङ्गम करने में सहायता मिलने की आशा है ।

प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध की अनुभूति ८७
शास्त्रकारों ने, आध्यात्मिक संदर्भ में, संसार के प्रमातृवर्ग को १अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध
और सुप्रबुद्ध इन चार भेदों में विभक्त किया है । तंत्रग्रन्थों में इन चार प्रकार के प्रमाताओं
की स्वरूपगत विशेषताओं का जो उल्लेख किया गया है उसका संक्षिप्त आशय इस
प्रकार है—
अबुद्ध-प्रमातृवर्ग—इस २वर्ग में ऐसे प्रमाताओं को रखा गया है जो पारमेश्वरी
तिरोधानात्मिका शक्ति के द्वारा संहार की अवस्था में धकेले गये होते हैं । वे इस संहार की
अवधि में मायारूपी कालरात्रि अथवा दूसरे शब्दों में गुणत्रय की साम्यावस्था के गर्भ में; प्रगाढ
अंधकार से परिपूर्ण गहन गुफाओं में गहरी नींद में पड़े हुए अजगरों की तरह, निःसंज्ञ बनकर
पड़े रहते हैं । इस वेला में उनकी चेतना पर स्वात्म-अख्याति का इतना दुर्भेद्य आवरण छाया
रहता है कि उनको अपने सद्भाव या असद्भाव की चेतना नहीं रहती है और परिणाम-
स्वरूप वे शब्दादि विषयों को ग्रहण करने में सर्वथा असमर्थ होते हैं । तावत्कालपर्यन्त उनको
सुख, दुःख इत्यादि की भी कोई अनुभूति नहीं रहती है । यही कारण है कि ऐसे प्रमातृवर्ग को
अबुद्ध की संज्ञा दी गई है ।
इस सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान में रखने के योग्य है कि संहृत होने के समय ऐसे
प्रमाताओं के संचित-कर्म भी संहृत होकर तावत्कालपर्यन्त वासना अथवा संस्कारों के रूप में
उनके साथ ही प्रसुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं ।
बुद्ध प्रमातृवर्ग—३इन संहारावस्था में पड़े हुए प्रमाताओं में से किन्हीं के कर्मपरिपाक
का समय आने पर, भगवान् अनन्त-भट्टारक४ अपनी इच्छा शक्ति से उनको पूर्वसंचित कर्मों के
अनुसार योनियों में धकेल कर, उनके फलों का भोग करने की ओर प्रवृत्त करते हैं । उस
समय भगवान् कलातत्त्व के द्वारा उनमें पुनः अंशतः चेतना का संचार कर लेते हैं और वे
प्राकृतिक प्रतिविधान के अनुसार, स्थूल शरीरों को धारण करके विचित्र योनियों में भटकते
रहते हैं । ऐसे ही प्रमाताओं को दूसरे शब्दों में संसारी जीव या पशु कहा जाता है । विषय-
पिपासा को विषयोपयोग के द्वारा शान्त करना ही उनका मात्र कर्तव्य बन जाता है । फल यह
निकलता है कि वे प्रति-समय पारमेश्वरी निग्रहशक्ति के घोरतर प्रभाव में पड़कर, कामिनी-
काञ्चन को ही सर्वोत्कृष्ट एवं उपादेय फल समझते हुए, कभी भी आत्म-चिन्तन की ओर
१. चतुर्विधं तु पिण्डस्थमबुद्धं बुद्धमेव च ।
प्रबुद्धं सुप्रबुद्धं च•••• •••• •••• •••• ॥ (मा० वि०, २.४३)
२. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दतन्त्र, ११. ९१-९५
३. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दतन्त्र, ११. ९६-११२
४. शैव सिद्धान्त के अनुसार शुद्धाध्व में भगवान् शिव भेदरहित शिवरूप में ही सृष्टि-संहार
आदि करते रहते हैं । अशुद्धाध्व में अर्थात् मायातत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक के विश्व
में, स्वयं भी भेदव्याप्ति को अपना कर ही, सृष्टि संहार आदि करते हैं । उनके इस रूप
का नाम अनन्त-भट्टारक है ।

८८ स्पन्दकारिका
प्रवृत्त नहीं होते हैं। कामिनी-कांचन को ही जीवन का चरम लक्ष्य समझने के कारण उनको
'बुद्ध' कहा जाता है।
प्रबुद्ध प्रमातृत्वं—१भगवान् परम कारुणिक हैं अतः उनके शक्तिपात से किसी समय
किसी प्रमाता में अकस्मात् ऐसी योग्यता उभर आती है कि उसके अंतर-तम में दिव्य शाङ्कर-
भक्ति की किरण स्वयं फूट पड़ती है। इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम उसके हृदय में सांसारिक
विषयों के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। उसके सद्-ज्ञान पर छाया हुआ मायीय आवरण
हटने लगता है और वह संसार के सारे कृत्रिम सम्बन्धों को इन्द्रजाल के समान अनुभव करने
लगता है। गुरु कृपा से वह आत्म अनुसंधान करने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। जब उसकी
आत्मजिज्ञासा तीव्रतर रूप धारण करती है तब भगवान् चन्द्रमौलि स्वयं ही गुरु का रूप
धारण करके, उसको शाङ्कर-मार्ग में दीक्षित कर देते हैं और वह प्रबुद्ध-भाव की अवर भूमिका
से निकलकर सुप्रबुद्ध-भाव की उच्चतर भूमिका में प्रविष्ट होकर कृतार्थ हो जाता है। ऐसे
प्रमाता को शैव शब्दों में प्रबुद्ध-प्रमाता कहते हैं।
सुप्रबुद्ध प्रमातृत्वं—२प्रबुद्ध-प्रमाता ही, अनथक प्रयत्न। और निश्चल एवं पवित्र
भक्ति के द्वारा प्रसन्न किये हुए, शङ्कर-स्वरूप गुरु से शैवी दीक्षा प्राप्त करके, योगमार्ग पर
अग्रसर होता हुआ सुप्रबुद्ध अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है। उसको उत्कृष्ट एवं अवर्णनीय
तुर्यरूप शाक्त-भूमिका की अखण्ड अनुभूति प्राप्त हो जाती है। ऐसा प्रमाता, भगवान् के
तीव्रतम शक्तिपात के प्रभाव से एक ऐसी भूमिका पर पहुँचा हुआ होता है जो वर्ण, पद, मन्त्र,
कला, तत्त्व और भुवन इन छः मार्गों से अतिगत होने के कारण पूर्णतया विरज, विमल और
शान्त है। संक्षेप में केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि सुप्रबुद्ध योगी साक्षात् शिवभाव पर
पहुँचा हुआ प्रमाता होता है अतः उसको प्रत्येक अवस्था में, प्रतिसमय और प्रत्येक दिशा में
आनन्द रस से परिपूर्ण मात्र शिवभाव की अनुभूति त्रिकालाबाधित रूप में होती है।
इतनी बातें समझने के अनन्तर पाठक स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि प्रबुद्ध
योगी ही गुरुपदेश के लिये उपयुक्त पात्र है। अबुद्ध तथा बुद्ध प्रमाता उपदेश के पात्र ही
नहीं होते क्योंकि वे प्रमाद-मदिरा के नशे में झूमते हुए कभी भी आत्मचिन्तन की ओर प्रवृत्त
ही नहीं होते हैं। हाँ यदि उनमें से स्वयं ही भगवान् किसी को उभारना चाहें तो वह बात
दूसरी है। सुप्रबुद्ध योगी को उपदेश देने की आवश्यकता ही नहीं हैं क्योंकि साक्षात् शिवभाव
पर अवस्थित व्यक्ति को उपदेश देने का प्रयोजन ही क्या है ? ॥१७॥
[अवस्था भेदों में स्वरूप की अभेद अवस्था]
अगले सूत्र में इस रहस्य को अनावृत किया जा रहा है कि अनुभूति के दृष्टिकोण
से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य अवस्थाओं में स्वभाव की उपलब्धि किन किन रूपों में
होती है :—
१. द्रष्टव्य—मा० वि०, १. ४२-४५, तथा स्व० तं०, ११. ११३-१२०
२. द्रष्टव्य—मा० वि०, १. ४६-४७, तथा स्व० तं०, ११. १२१-१३५

धारणा और समाधि इन तीन अवस्थाओं का अभिप्राय है।

अवस्था भेदों में स्वरूप की अभेद अवस्था ८९
१ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥१८॥
ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे २जाग्रत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम्, सुषुप्ततुर्यात्मके
पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः, न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥१॥
अनुवाद
सूत्र—शक्तिघन एवं सर्वव्यापक आत्मतत्त्व जाग्रत्-अवस्था में केवल ज्ञेयपदार्थों का
रूप धारण करने वाली और स्वप्न-अवस्था में केवल ज्ञान (मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक ज्ञप्ति)
का रूप धारण करने वाली, महान् विमर्शशक्ति के द्वारा प्रकाशमान रहता है। उन दो अव-
स्थाओं से इतर अवस्थाओं में (सुषुप्ति और तुर्या में) केवल चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान
रहता है ॥१८॥
वृत्ति—जाग्रत् और स्वप्न इन दो अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार
यह है कि पहली में संवेदन का रूप ज्ञेय और दूसरी में ज्ञान होता है। इसके प्रतिकूल सुषुप्ति
और तुर्या नामवाली दो अवस्थाओं में, स्वभाव की अनुभूति, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही
होती है। इन दो अवस्थाओं में स्वभाव की उपलब्धि (चित्-रूपता के अतिरिक्त) और किसी
रूप में नहीं होती है ॥१८॥
विवरण
जाग्रत् आदि अवस्थाओं के सर्वसाधारण लौकिक रूप पर ३पहले प्रकाश डाला गया
है। यह भी कहा गया है कि वास्तव में ये अवस्थाभेद औपचारिक हैं क्योंकि इन सबों का
अनुभविता (वेदक) एक ही होता है। अब यहाँ पर केवल इतना विचारणीय है कि आध्या-
त्मिक दृष्टिकोण से इन अवस्थाओं की स्वरूपगत विशेषतायें कौन सी हैं और इनमें शक्ति की
स्पन्दना किन-किन रूपों में विलासमान होती है।
४मुख्य जाग्रत्-अवस्था—अनुभवी सिद्ध पुरुषों का कथन है कि मुख्य जाग्रत्-अवस्था
पूर्णरूप में ५प्रमेय-भूमिका है। इसमें संवित्-भट्टारिका (विमर्श शक्ति) प्रमेय-भूमिका पर
१. इस सूत्र में पाठक्रम को छोड़कर आर्थक्रम से ज्ञानरूपता का सम्बन्ध स्वप्न के साथ और
ज्ञेयरूपता का सम्बन्ध जाग्रत्-अवस्था के साथ जोड़ना चाहिये क्योंकि पाठक्रम की अपेक्षा
आर्थक्रम बलवान् होता है। (श्री स्वामी ईश्वरस्वरूप जी)
२. प्रस्तुत संदर्भ में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं से योगियों की ध्यान
धारणा और समाधि इन तीन अवस्थाओं का अभिप्राय है।
३. द्रष्टव्य, सूत्र ३ का विवरण।
४. 'मुख्य-अवस्था' कहने से किसी भी अवस्था का वह विशुद्धरूपं अभिप्रेत है जिसमें अभी
उससे इतर अवस्थाओं का संकर न हुआ हो। जैसे मुख्य जाग्रत्-अवस्था विशुद्ध जाग्रत्
को ही कहा जायेगा जाग्रत्-जाग्रत्, जाग्रत् स्वप्न इत्यादि को नहीं।
५. मेयभूमिरियं मुख्यं पञ्चमदशायाम् (तं० १०.२४०)

९० स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
उतर कर, सांसारिक प्रमेय, प्रमाण, १प्रमाता और प्रमा की विचित्रताओं से भरे हुए, प्रमेय
विश्व के रूप में ही स्पन्दायमान रहती है। शास्त्रीय शब्दों में इस अवस्था को अधिष्ठेय-
अवस्था कहते हैं क्योंकि इसमें, २मन में अन्तःसकल्पात्मक संवेदन के रूप में भासमान घट-पट
आदि वेद्य पदार्थों के द्वारा ही, बाहर के स्थूल घट-पट आदि वेद्यपदार्थों का अवभासन हो
जाता है । यही कारण है कि इसमें मानसिक संकल्परूप घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठाता
पदवी पर और उनके द्वारा अवभासित होने वाले बाह्य स्थूल घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठेय
पदवी पर अवस्थित रहते हैं । जाग्रत्-अवस्था में, अन्तःसंवेदन के रूप में वर्तमान वेद्य पदार्थों
का बाह्य स्थूल वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासित होना आवश्यक है क्योंकि तभी तो इस
अवस्था की सार्थकता मानी जाती है । इस कारण से यह अवस्था प्रति समय अधिष्ठेय-अवस्था
ही कही जाती है । यह ३कभी भी अधिष्ठातृ-अवस्था नहीं बन सकती है । इस अवस्था में
शक्ति (स्पन्दमयी विमर्शशक्ति) ज्ञेयरूप में ही विलासमान रहती है अतः सावधान पुरुषों को
ज्ञेयता में ही स्वरूप की अनुभूति होती रहती है ।
मुख्य स्वप्न-अवस्था--मुख्य स्वप्नावस्था में संवित्-भट्टारिका वैकल्पिक ज्ञानरूप में
ही स्पन्दित होती हुई, ४जाग्रत्-अवस्था के ही घट पट आदि ज्ञेय पदार्थों को मानसिक
संकल्परूप में इस प्रकार सुस्पष्ट रूप में अवभासित कर लेती है कि मानो प्रमाता, जाग्रत्-
अवस्था के समान ही, बाह्य इन्द्रियों के द्वारा उनका ग्रहण कर रहा हो । शास्त्रों के अनुसार
जहां जाग्रत्-अवस्था को ज्ञेयप्रधानता के कारण प्रमेय पद कहते हैं, वहाँ स्वप्नावस्था को
वैकल्पिक ज्ञानप्रधानता के कारण ५प्रमाण पद कहते हैं । प्रमाण पद होने का अभिप्राय यह
है कि इस अवस्था में अनुभवित्ता के मानसिक संकल्प, स्थूल घट पट आदि वेद्य पदार्थों की
वास्तविक स्थिति के अभाव में भी, संकल्परूप में उनकी छाया६ को अवभासित करते हैं ।
१. इस प्रमाता शब्द से संसार भूमिका पर अवस्थित पशुवर्ग का अभिप्राय है । संसार का
पशुवर्ग चेतन होने पर भी विश्वात्मक संवित् की अपेक्षा से प्रमेय वर्ग में ही अन्तर्भूत हो
जाता है ।
२. तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तःप्रवेदने ।
संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ।।
यत्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते ।
कथञ्चिदप्यधिष्ठातृभावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥ (तं०, १०.२३४-३५)
३. यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रत्समुदाहृतम् ।। (तत्रैव १०.२३१)
४. यत्त्वधिष्ठानकरणभावमध्यास्य वर्तते ।
वेद्यं सत्पूर्वकथितं भूततत्त्वाभिधामयम् ।
तत्स्वप्नो मुख्यतो ज्ञेयं तच्च वैकल्पिके पथि ॥ (तं०, १०.२४७-४८)
५. मानभूमिरियं मुख्या स्वप्नो ह्यत्र प्रमाणकः । (तत्रैव, १०.२४८)
६. मेयच्छायावभासिनी मानप्रधाना स्वप्नावस्थेयमित्यर्थः । (तं० वि०, १०.२४८)

अवस्था भेदो में स्वरूप की अभेद अवस्था ९१
फलतः यह बात स्पष्ट है कि स्वप्नावस्था में, जाग्रत्-अवस्था के ही अनुभूयमान वेद्य पदार्थ,
बाह्य स्थूल रूप में वर्तमान न होते हुए भी, मानसिक संकल्परूप में (ज्ञानरूप में) वर्तमान
रहते हैं। इसी कारण से इस अवस्था का दूसरा शास्त्रीय नाम अधिष्ठान-अवस्था भी है।
सावधान पुरुषों को इस अवस्था में, वैकल्पिक ज्ञानरूप में ही स्पन्दायमान स्वरूप की अनुभूति
प्राप्त होती है।
मुख्य सुषुप्ति-अवस्था—यद्यपि सुषुप्ति शब्द का अर्थ पूर्णस्वाप है तथापि आध्यात्मिक
स्तर पर इसका अभिप्राय प्रगाढ़ निद्रा नहीं है। योग की प्रक्रिया के अनुसार यह समाधि की
अवस्था है। इसको सुषुप्ति की संज्ञा इसलिए दी गई है कि इस अवधि में, वह जाग्रत् एवं
स्वप्न का अनुभव करने वाला अनुभवित्ता ही, चिन्मात्र रूप में अवस्थित रह कर, जाग्रत् के
ज्ञेयरूप और स्वप्न के वैकल्पिक ज्ञानरूप वेद्य पदार्थों को ग्रहण करने के प्रति पूर्णतया¹ सुप्त
अर्थात् विमुख हो जाता है। फलतः इस काल में, वही पूर्वोक्त ²अधिष्ठातृरूप में (अन्तः-
संवेदन के रूप में) वर्तमान प्रमेयभाव, जो कि बाह्य प्रमेयविश्व के बीज जैसे होते हैं, संस्कार
रूप बन कर, मानो गहरी नींद में जैसे पड़े रहते हैं। इसका अभिप्राय यह कि सुषुप्ति काल
में वेद्यता पूर्णतया गलकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है, प्रत्युत तावत्कालपर्यन्त
संस्काररूप में वर्तमान रहती है। यही कारण है कि सुषुप्ति काल के बीत जाते ही अन्तः-
संवेदन में फिर भी वेद्यता का उदय हो जाता है। शास्त्रकारों ने इस अवस्था को 'मुख्य
मातृदशा'³ की संज्ञा दी है क्योंकि इसमें, तावत्काल पर्यन्त, ज्ञेयरूपता और वैकल्पिक ज्ञान-
रूपता का सारा क्षोभ शान्त होने के कारण, प्रमाता मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित
रहता है।
तुर्या अवस्था—सुषुप्ति कालीन प्रमातृभाव अमित नहीं, अपितु मित ही है क्योंकि इस
काल के बीतते ही, संस्काररूप में, विद्यमान वेद्यता फिर भी उदय में आ जाती है और
चिन्मात्ररूपता पर भेदव्याप्ति का आवरण पड़ जाता है। अतः सावधान योगी, अपने अथक
अनुसंधान के द्वारा इस अवस्था को लांघ कर, इसके उपरितन स्तर पर विद्यमान एक ऐसी
अवर्णनीय अवस्था में प्रविष्ट हो जाते हैं जहां उनके मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी
अवशिष्ट नहीं रहते हैं। इसको तुर्यावस्था कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह विशुद्ध ⁴प्रमारूप
अर्थात् विरज, विमल, अखण्ड एवं सर्वतोमुखी चिन्मात्ररूपता की अवस्था है। यही अन्तिम
१. अनुभूतो विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि ।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ।। (तं०, १०.२५८-५९)
२. यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ।। (तं० १०.२५७-५८)
३. मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ।। (तं, १०.२६०)
४. यत्तु प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम् ।
पूर्णतागमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ।
तत्तूर्यमुच्यते (तं० १०.२६५)

९२ स्पन्दकारिका
शिवभाव में प्रविष्ट होने का सिंहद्वार है और यहाँ पर पहुँचे हुए साधक की सारी मायकीय
उदासीनतायें सदा सर्वदा के लिये शान्त हो जाती हैं। इसी अवस्था को, स्पन्दशास्त्र के
पारिभाषिक शब्दों में, ज्ञान-क्रिया की शाश्वतस्पन्दमयी विमर्श-भूमिका अथवा शाक्त-भूमिका
कहते हैं।
सामान्य स्पन्द-भूमिका होने के कारण इसका कोई विशिष्ट नामकरण सम्भव नहीं है
अतः शास्त्रों में इसको 'तुर्या' अर्थात् चौथी अवस्था की संज्ञा देकर ही संतोष किया गया है।
साथ ही यह समझना भी आवश्यक है कि इस अवस्था को मुख्य या अमुख्य अवस्था भी नहीं
कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि पूर्ण चिन्मात्ररूप होने के कारण यह अवस्था, स्वयं
ही, जाग्रत् आदि पूर्वोक्त तीन अवस्थाओं में व्याप्त रहकर, उनको ^१जीवन देती है; अतः वे
अपने मिश्रण से इसमें मुख्यता या अमुख्यता कैसे उत्पन्न कर सकती हैं ? वास्तव में जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थायें, अन्ततो गत्वा, इसी अवस्था में लय हो जाती हैं और
उस लयीभाव की प्रक्रिया यह है कि ^२प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में और प्रमाता प्रमा में
लय होकर कृतकृत्य हो जाते हैं। प्रमाता में अन्तः-बहिः पूर्ण शाक्तसमावेश हो जाता है अतः
यह अवस्था साक्षात् ^३शाक्तसमावेशात्मक अभेदव्याप्ति की ही अवस्था है।
इस प्रकार चारों अवस्थाओं के स्वरूप-विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचा
जा सकता है—
१. जाग्रत्-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप ज्ञेयता है।
२. स्वप्न-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप संकल्प-विकल्पात्मक ज्ञप्ति है।
३. सुषुप्ति-अवस्था में शाक्त-स्फुरणा का रूप चिन्मय है परन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में
अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है।
४. तुर्या-अवस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं रहते हैं अतः इसमें शक्ति
स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ॥१८॥
[ज्ञानी और विशेषस्पन्द]
अगले सूत्र में यह उपदेश दिया जारहा है कि जिस भाग्यशाली योगी को, पूर्ण शाक्त-
समावेश हो जाने के फलस्वरूप, प्रत्येक अवस्था में, सामान्य-स्पन्दात्मक स्वभाव की अनुभूति
होती रहती हो, उसके मार्ग में विशेष-स्पन्दों के अनन्त प्रवाह कोई बाधा नहीं डाल सकते
हैं—
गुणादिस्पन्दनिःष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥१९॥
१. .........'इति सैवैषा देवी विश्वैकजीवितम् । (तं०, १०. २६७)
२. मेयं माने मातरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम् ।
विश्राम्यति ।' (त०, ११. ३६७)
३. शक्तिसमावेशो ह्यसौ मतः । (तं०, १२. २६५)

सूत्र—(सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों के साम्यावस्थारूप अव्यक्ततत्त्व से

सामान्य और विशेष-स्पन्द ९३
गुणस्पन्दस्य सत्त्वरजस्तमोरूपस्य ये निःष्यन्दाः प्रवाहाः, ते सामान्यस्पन्दमा-
श्रित्य प्रसृता अपि सततं ज्ञस्य विदितवेद्यस्य योगिनः स्युर्भवेयुः, भवन्त्यपरिपन्थिनः
अनाच्छादकाः स्वभावस्य ॥१९॥
अनुवाद
सूत्र—(सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों के साम्यावस्थारूप अव्यक्ततत्त्व से
निकले हुए और सारे प्राधानिक सर्ग के रूप में प्रवहमान)¹ गुणादि स्पन्दों के अनन्त प्रवाहों
को, सामान्य-स्पन्द का ही आधार होने से, उन उन रूपों में सत्ता प्राप्त हुई है। अतः वे उस
योगी के शत्रु नहीं बन सकते हैं जिसने जानने के योग्य रहस्य को जान लिया हो ॥१९॥
वृत्ति—सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के रूप में प्रवाहमान, गुण-स्पन्दों के अनन्त
प्रवाह, सामान्य-स्पन्द पर ही आधारित हैं। ऐसी परिस्थिति में वे अजस्र रूप में प्रवहमान
होते रहने पर भी, उस योगी के प्रतिद्वन्द्वी नहीं बनते हैं जिसने ज्ञातव्य विषय को जान लिया
हो । इसका तात्पर्य यह कि वे उसके (चिन्मात्र) स्वभाव का आवरण नहीं बन जाते हैं ॥१९॥
विवरण
पहले इस बात का उल्लेख किया गया है कि स्पन्द-तत्त्व के सामान्य-स्पन्द और
विशेष-स्पन्द ये दो रूप हैं। इसको दूसरे शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः प्रतिष्ठित-स्पन्द और
अप्रतिष्ठित-स्पन्द कहते हैं। प्रतिष्ठित-स्पन्द समूचे विश्ववैचित्र्य की एकमात्र एवं मौलिक
विराट्-चेतना होने के कारण, सारे नामरूपात्मक अनेकत्व की मूलभूत इकाई है। अप्रतिष्ठित-
स्पन्द का रूप, मायातत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक फैला हुआ और पग पग पर अनेक भेदों
और उपभेदों से भरा हुआ विश्वप्रपञ्च होने के कारण, यह (अप्रतिष्ठित-स्पन्द) उसी एकत्त्व
से निकला हुआ अनेकत्व है। सूत्रकार ने, प्रस्तुत सूत्र में, इसी अनेकत्व को स्पन्द-निष्यन्द
अर्थात् अनेक रूपों में प्रवहमान स्पन्दधाराओं का नाम दिया है। सूत्रकार का आशय यह है
कि इस जड़चेतनात्मक विश्व का प्रत्येक पदार्थ, चाहे वह हमारी दृष्टि में घास के तिनके के
समान कितना तुच्छ एवं नगण्य ही क्यों न हो, वास्तव में विराट् स्पन्द-शक्ति का ही एक
प्रवाह होता है। इन विशेष-स्पन्दों की धाराओं की प्रवहमानता तभी सम्भव हो सकती है
जब कि पारमेश्वरी सामान्यस्पन्दशक्ति का अक्षय सागर ही इनका आधार है। शैवग्रन्थों में
वर्णित विशेषस्पन्दों की प्रवहमानता की प्रक्रिया का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार है—
भट्टकल्लट जैसे महान् सिद्धों ने, अपने आध्यात्मिक अनुसन्धानों के आधार पर
इस तथ्य को खोज निकाला है कि शाश्वत-स्पन्दमयी संवित् ( स्पन्द-शक्ति ) बाह्य-
प्रसार की ओर उन्मुख होकर, सर्वप्रथम, प्राण अर्थात् सूक्ष्म² प्राणना या दूसरे शब्दों में
विश्वचेतना के रूप में परिणत हो जाती है। संवित् प्रकाशरूपा होने के साथ साथ विमर्शमयी
१. गुणादि-स्पन्दों को ही स्पन्दशास्त्र में विशेष-स्पन्द कहा जाता है। इनसे नील एवं सुख
रूप में प्रवहमान अनन्त प्रकारों के विकल्प-प्रत्ययों का अभिप्राय है।
२. तेनाहुः किल संवित् प्राक् प्राणने परिणता (स्प० का०)

९४ स्पन्दकारिका
भी है। इस प्रकाश-विमर्शमय १संघट्ट को शास्त्रीय शब्दों में आनन्द-शक्ति कहते हैं।
विश्ववैचित्र्य के अनन्त रूपों में स्पन्दित होना इस आनन्दशक्ति का अकाट्य स्वभाव है। फलतः
यह एक प्रसिद्ध शैवमान्यता है कि संवित् प्रतिसमय उच्छलनात्मक है। यह विशुद्ध प्रकाशरूपा
संवित्, विशेष-स्पंदों के रूप में प्रवहमान होने की दशा में, इसी उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण,
स्वरूप में ही अवस्थित २वेद्यभाग को स्वरूप से अलग करके, स्वयं आकाशतुल्य ३शून्यातिशून्य
रूप में अवस्थित रहती है। इसका तात्पर्य यह कि इस दशा में अवस्थित होकर, एक ओर
अपने से ही अलग किये हुए वेद्यभाग का पूर्ण निषेध करके, उसको अपनाने के प्रति विमुख
हो जाती है, दूसरी ओर उसका, इस प्रकार की निषेधात्मक विमुखता को अपनाना ही,
असीमता को भूलकर ससीमता के क्षेत्र में पहला पदार्पण है। परिणामतः इतने अंश में इसकी
पूर्णता भी खण्डित हो जाती है। इसके इसी रूप को शैवशब्दों में 'आकाशकल्प शून्यातिशून्य'
कहते हैं क्योंकि यह रूप न तो पूर्ण ही है और न अपूर्ण ही। अस्तु, यह (संवित्) इस प्रकार
की शून्यातिशून्य भूमिका पर उतर कर ही, स्वरूप से पृथक् किये हुए ४वेद्य अंश को, उत्तरो-
त्तर स्थूल रूपों में विकसित करने के प्रति उन्मुख हो जाती है और इस प्रक्रिया को कार्यान्वित
करती हुई, सर्वप्रथम, उसी पूर्वोक्त विश्वप्राणना के रूप में उच्छलित हो जाती है। फलतः
विश्वप्राणना के रूप को धारण करना ही, स्पन्दशक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखीन निःष्यन्द है।
इसको शास्त्रीय शब्दों में 'प्राण-स्पन्द' कहते हैं। विश्वप्राणना आगे-आगे प्रवहमान होती
हुई, पांच स्थूल प्राणों का रूप धारण करती है। कहना ५न होगा कि ये पाँच प्राण, किसी
भी प्रकार की पाञ्चभौतिक काया में प्रविष्ट होकर, उसको इस प्रकार से नचाते रहते हैं
कि जड़ होने पर भी वह एक पूर्ण चेतन-पिंड जैसा ही दिखाई देती है। प्राण-स्पन्द के
अनन्तर फिर यह स्पन्दशक्ति किन-किन रूपों में प्रवहमान रहती है इसकी कोई गणना नहीं
है। सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों; मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तः-
करणों; इनके द्वारा वेद्य सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीन अन्त.करण विषयों; पाँच
ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, सारे घट-पट आदि वेद्यविषयों अर्थात् आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त समूचे
१. तयोर्यद्यामलं रूपं स संघट्ट इति स्मृतः ।
आनन्दशक्तिः सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते ॥ (त०, ३.६८)
२. संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाशपरमार्थ कम् ।
तदेव शून्यरूपत्वं संविदः परिगीयते ॥
३. यही वह शून्यदशा है जिसको प्रसिद्ध शून्यवादी बौद्ध-आचार्य नागार्जुन सर्वोत्कृष्ट दशा
मानते हैं ।
४. स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन् भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः ।
पतत्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (तं०, ६.११)
५. सा प्राणवृत्तिः प्रसरन्ती रूपैः पञ्चभिरात्मसात् ।
देहं यत्कुरुते संवित् पूर्णस्तेनैष भासते ॥ (तं०, ६.१४)