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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 190 में से

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पृष्ठ 93

आत्मतत्त्व की स्थिरता ८३
न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढस्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः
कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र
अनुभवति इति ॥ १६ ॥
अनुवाद
सूत्र—परन्तु वह अन्तर्मुख ( शाश्वत अहंवरूप में ही स्पन्दायमान ) चेतनसत्ता, सर्वज्ञता
इत्यादि गुणों की एकमात्र आश्रय है। उसका नाश कभी भी नहीं होता है क्योंकि ( समाधि-
काल में ) किसी भी अतिरिक्त-सत्ता की विद्यमानता अनुभव में नहीं आती है ॥ १६ ॥
विशेष
कई प्राचीन स्पन्दशास्त्रियों ने इस सूत्र के चौथे पाद—'अन्यस्यानुपलम्भनात्' से
दूसरे प्रकार के अभिप्राय भी लिये हैं। उनका आशय इस प्रकार है।
१. उस कर्तृत्वसत्ता का कभी भी नाश नहीं होता है क्योंकि यदि वैसा होता तो दूसरे
अर्थात् विश्व का भी अनुपलम्भ ( अदर्शन ) हो जाता।
२. उस वेदकसत्ता का कभी नाश नहीं होता है क्योंकि यदि वैसा होता तो दूसरे
अर्थात् अभाववादियों के अभाव और शून्यवादियों के शून्य का भी स्वरूप-निर्धारण नहीं हो
सकता।
वृत्ति—परन्तु जो तत्त्व अन्तर्मुख अर्थात् आन्तरिक संवित्तिचक्र के रूप में प्रतिसमय
स्पन्दायमान रहने के स्वभाव वाला और सर्वज्ञता इत्यादि गुणों का आधार है, उसका कभी भी
नाश नहीं होता है। अतः यह बात निर्विवाद है कि उससे इतर और किसी वेदकसत्ता का
अस्तित्व न होने के कारण वही, आकाश के समान स्वच्छ और सर्वव्यापक चैतन्यरूप तत्त्व
प्रत्येक अवस्था का अनुभव कर लेता है ॥ १६ ॥
विवरण
पूर्वोक्त सूत्र १४ में उल्लिखित 'कर्तृत्व सत्ता' को प्रस्तुत सूत्र में 'भाव' शब्द के द्वारा
अभिव्यक्त किया गया है। इसका एक विशेष अभिप्राय है। 'भाव' शब्द का मूल धातु 'भू' है
जिसका अर्थ 'सत्ता' अर्थात् अस्तित्व है। शैवशास्त्रों में सत्ता या भाव शब्दों का अर्थ ऐसा
अकालकलित अस्तित्व है जिसका वर्तमानता से स्वयं अस्तित्व भी सार्थक होता है। किसी भी
प्रकार की क्रिया से पहले उसके कर्ता की वर्तमानता आवश्यक है क्योंकि कर्ता के बिना क्रिया
सिद्ध नहीं हो सकती है। फलतः प्रत्येक क्रिया को सिद्ध करने की अबाध क्षमता रखने वाले
और शाश्वत रूप में स्वयं वर्तमान रहने वाले, स्वतन्त्र कर्तृत्व को ही भाव या सत्ता की संज्ञा
दी गई है।
साधारण जीवभाव के स्तर पर भी यदि यह कहा जाए—'देवदत्त अन्न पकाता है',
तो इस 'पकाता है' क्रियापद में से 'पकाता' अंश से पकाने की क्रिया का और 'है' अंश से
किसी चेतना कर्ता—जो कि पकाने की क्रिया करने में स्वतन्त्र है—का अवबोध हो जाता
है। इस उदाहरण से यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है कि देवदत्तरूप चेतन सत्ता की पूर्व-
१. सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम्। (तं० आ० वि० ५/२३)