स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में
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इसके अतिरिक्त भट्टकल्लट ने इसी सूत्र में उल्लिखित 'इच्छतः' शब्द का अर्थ मन्त्र
का उच्चारण करने की इच्छा लगाया है । इस सम्बन्ध में यह समझना आवश्यक है कि किसी
भी शब्द का उच्चारण करते समय उच्चारण की दो स्थितियाँ सक्रिय होती हैं । एक अव्यक्त
ध्वनिरूपा आन्तरिक विमर्शमयी और दूसरी उसकी अनुगामिनी व्यक्त ध्वनिरूपा बाह्य
वैखरीमयी स्थिति । इनमें से पहली विमर्शमयी स्थिति मूलभूत इच्छारूपा स्थिति होती है ।
यद्यपि यह स्थिति प्रतिसमय प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में क्रियाशील रहती है परन्तु बहिर्मुख
होने के कारण वह उससे सचेत नहीं होता है । प्रस्तुत प्रकरण में मन्त्रोच्चारण के सम्बन्ध में,
मन्त्रोच्चारण की इसी पहली 'विमर्शमयी अथवा इच्छारूपा स्थिति का ही अभिप्राय है क्योंकि
शाक्त-उपाय पर चलने वाले साधकों की सारी क्रियायें विमर्शमयी ही होती हैं। वैखरीवाणी
के द्वारा ऊँची आवाज़ में मन्त्रों का उच्चारण करना आणव उपाय पर चलने वाले अवर
अधिकारियों के लिये ही लाभप्रद सिद्ध हो सकता है । मन्त्रों के विमर्शमय उच्चारण में इतनी
शक्ति होती है कि साधक का चित्त और परप्रकाशरूप २बिन्दु, उसी प्रकार तीव्रगति से एक
दूसरे की ओर आकर एकाकार हो जाते हैं, जिस प्रकार धनुष के प्रचण्ड आघात से धकेला
गया तीर अतिस्वनिक वेग में दौड़ कर लक्ष्य के साथ मिल जाता है ।
सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में
निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है ।
आध्यात्मिक जगत् में 'दीक्षा' शब्द से ऐसे विशेष प्रकार के संस्कारों का अभिप्राय
लिया जाता है जिनके द्वारा सिद्ध गुरु अपने शिष्यों में, उनकी मानसिक योग्यताओं के अनु-
सार, अनेक प्रकार की योग सम्बन्धी अनुभूतियों को संक्रमित करके, पलक भर में उनका
उद्धार कर लेते हैं । शास्त्रों के अनुसार ३'दीक्षा' शब्द के 'दी' वर्ण में ज्ञान के संक्रमण और
'क्षा' वर्ण में कर्मवासनाओं का नाश किये जाने का अभिप्राय अन्तर्निहित है ।
तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार की दीक्षाओं और उनके साथ सम्बन्धित शास्त्रीय विधि-
विधानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । शिष्यों की मानसिक योग्यताओं को अच्छी
प्रकार जांचने के अनन्तर ही गुरु यह निर्णय कर लेता है कि किस शिष्य को कैसी दीक्षा देना
उचित है ।
सारी दीक्षाओं में 'निर्वाण-४दीक्षा' असामान्य और दुर्लभ मानी जाती है क्योंकि जिस
१. उच्चारेण विमर्शरूपेण न तु स्थानकरणप्रयत्नरूपबीजाक्षरोच्चारेण, तस्याणवोपायपर्यव-
सायित्वात् । (शिवसूत्रवि०, २.२ की टिप्पणी)
२. यथा शरो धनुःसंस्थो यत्नेनाताड्य धावति ।
तथा बिन्दुर्वरारोहे! उच्चारेणैव धावति ।। (तं० सं०, शिवसूत्र, २.२ में उदाहृत)
३. दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्मवासनाः ।
दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ।। (तं० वि०, १.४३)
४. तथा इयमेव निर्वाणदीक्षा.........संस्कारविशेषः । (स्प० का०, ४२)
मन्त्रदेवता और चित्त १२५
सौभाग्यशाली को यह मिले, उसके मन में, युगयुगों से संचित और पिंड न छोड़ने वाली
वासनायें, क्षणभर में विगलित हो जाती हैं और वह सहसा पुर्यष्टक के बन्धन से मुक्त होकर
स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।
अब प्रश्न यह है कि क्या आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये 'निर्वाण-दीक्षा' संस्कार का
और उसके शास्त्रीय विधि-विधानों का पूरा किया जाना एक अनिवार्य आवश्यकता है ?
सूत्रकार ने इस शङ्का का समाधान मूलसूत्र में शब्दों को एक विशेष ढंग में रखने से ही किया
है। उसने सूत्र के पहले और दूसरे चरण में जहाँ 'अमृतप्राप्तिः' और 'आत्मनो ग्रहः' इन दो
शब्दों के साथ निश्चित रूप से 'एव' शब्द का प्रयोग किया है वहाँ तीसरे चरण में 'निर्वाण
दीक्षा' शब्द के साथ जानबूझ कर 'एव' के बदले 'च' का प्रयोग किया है। ऐसा किये जाने
का विशेष अभिप्राय यह है कि 'निर्वाण-दीक्षा' नामक संस्कार के आश्चर्यजनक महत्त्व की
उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है परन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के लोकोत्तर तौरतरीके मात्र
शास्त्रीय विधि-विधानों के वशवर्ती भी नहीं हैं। जिन महान् आत्माओं पर परमेश्वर का दृढ़
शक्तिपात हो उनको १देवियों ने अर्थात् पारमेश्वरी शक्तियों ने स्वयं अज्ञातरूप में दीक्षित
किया होता है जिसके फलस्वरूप उनके मन में सांसिद्धिक रूप में सत्-तर्क (शुद्धविद्या) का
उदय होता है। फलतः जिन व्यक्तियों को किसी भी अचिन्त्य या अज्ञात प्रकार से मन्त्रवीर्य
की अनुभूति हो जाये तो वही उनके लिये निर्वाण-दीक्षा होती है, भले ही २घी के दीये
जलाकर और सामग्री के भण्डार जला कर संस्कार के शास्त्रीय विधि-विधानों को पूरा करने
का आडम्बर न भी रचाया गया हो।
श्रीमत् सोमानन्दाचार्य, श्रीमद् उत्पलाचार्य या श्रीमद् अभिनवगुप्ताचार्य जैसे शैवदर्शन
के उद्भट और वरिष्ठ सिद्धों का इस बात पर मतैक्य है कि आत्मशक्ति का प्रत्यभिज्ञान चाहे
किसी भी ३प्रमाण से, शास्त्रों के अध्ययन, गुरुओं के उपदेश से या अन्य किसी अदृश्य प्रकार
से यदि हो गया तो हो गया, फिर सारे उपायजालों या निर्वाणदीक्षा जैसे संस्कारों के शास्त्रीय
विधि-विधानों का काई प्रयोजन अवशिष्ट नहीं रहता है। एक बार यह ज्ञान हो गया कि
अमुक पदार्थ खरा सोना है तो उसको परखने के लिये कसौटियों पर घिसने की आवश्यकता
नहीं रहती है ॥३१-३२॥
इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'सहजविद्योदयो'
नाम द्वितीयो निःष्यन्दः ॥२॥
श्रीमान् कल्लटाचार्य के द्वारा विरचित 'स्पन्दकारिकावृत्ति' का
'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥
१. तत्र आयातदृढशक्तिपाताविद्धस्य स्वयमेव सांसिद्धिकतया सत्तर्क उदेति,
योऽसौ देवीभिः दीक्षित इति उच्यते। (तं० सा०, २३ पृष्ठ)
२. एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी ।
दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० त्रि०, २५)
३. द्रष्टव्य शिवदृष्टि आह्निक ७ और तंत्रालोक आह्निक २.
तीसरा निःष्यन्द
‘विभूतिस्पन्द’ नामक तीसरा निःष्यन्द
यहाँ तक के दो निःष्यन्दों में सामान्य स्पन्द-तत्त्व के स्वरूप का और उसमें समाविष्ट
होकर सुप्रबुद्ध प्रमातृभाव पर आरूढ़ होने की प्रक्रिया का यथावत् वर्णन किया गया । अब
प्रस्तुत निःष्यन्द में इस विषय की चर्चा की जा रही है कि उल्लिखित शाक्त-भूमिका की
अनुभूति प्राप्त करके, अभ्यास की दृढ़ता से इस भाव पर स्थिर रहने के लिये सक्षम योगीश्वर
में, अनेक प्रकार की पर एवं अपर सिद्धियाँ सहज ही में विकसित हो जाती हैं । इन सिद्धियों
को दूसरे शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः अमितसिद्धियाँ और मितसिद्धियाँ भी कहते हैं । अमित-
सिद्धियाँ तो उत्कृष्ट योगियों में अभिव्यक्त होने वाले सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्ता इत्यादि माहेश्वर
धर्म ही होती हैं । परन्तु जहाँ तक मितसिद्धियों का सम्बन्ध है वे तो साधारण सांसारिक फलों
को देनेवाली तुच्छातितुच्छ सिद्धियाँ होती हैं । असावधान योगी उनके चक्कर में पड़कर
निःसंशय अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाते हैं । सांसारिक आसक्तियों में आकर्षण होता है, अतः
सच्चे मुमुक्षु साधकों को, असाधारण कुशलता से, उनसे बच कर निकलना पड़ता है । पहुँचे
हुये अनुभवी योगियों में भी विरले ही इतने धीर होते हैं जो तीव्र आत्मशक्ति से सांसारिक
आसक्तियों को कुचल कर आगे बढ़ते हुये, अन्ततोगत्वा; ‘चक्रेश्वर पदवी’१ पर पहुँच कर ही
विश्रान्त हो जाते हैं ।
[ योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य ]
योगसिद्धियों का वर्णन करने के प्रसङ्ग में अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्-स्वातन्त्र्य
और स्वप्न-स्वातन्त्र्य नामक सिद्धियों का और असावधान योगियों में पाई जानेवाली स्वातन्त्र्य
की हानि का वर्णन किया जा रहा है—
२यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् ।
सोमसूर्योदयं कृत्वा संपादयति देहिनः ॥३३॥
तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् ।
नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितोऽवश्यं प्रकाशयेत् ॥३४॥
१. द्रष्टव्य सूत्र सं० ५१ का विवरण.
२. इन तीनों सूत्रों और इनकी वृत्तियों में भी भावों को अत्यधिक सूत्रात्मक भाषा के
आवरण में रखा गया है । अतः, पाठकों के सुभीते के लिये, इनका भाषानुवाद करने में
कुछ मात्रा तक स्वतन्त्रता बरती गई है ॥