स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र-(गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष-स्पन्दों की यह एक अचूक विशेषता है कि)
अज्ञानी और विशेष स्पन्द ९५
प्रमेय विश्व के अनन्त भावों के रूपों में, प्रतिसमय प्रवहमान रहती है। प्रस्तुत सूत्र में
उल्लिखित स्पन्द-निःष्यन्दों से इन्हीं विशेष स्पन्द-प्रवाहों का अभिप्राय है।
अनुभवी सिद्ध पुरुषों का कथन है कि इन विशेष-स्पन्दों का गोरखधन्धा पग-पग पर
इतनी उलझनों से भरा हुआ है कि संसार का सारा पशुवर्ग इसमें फंसकर दिग्भ्रम में पड़ा
हुआ है ! सही दिशा किस ओर है यह किसी को सूझता नहीं है।
इसके प्रतिकूल सुप्रबुद्ध-भूमिका पर पहुँचे हुए योगियों की बात ही निराली है।
उनको, सद्-गुरुओं की कृपा से, तुर्यरूप शाक्तभूमिका का समावेश हुआ होता है। अतः
उनको विशेष-स्पन्दों की अनेकाकारता में भी सामान्य-स्पन्दात्मक एकाकारता की ही अखण्ड
अनुभूति प्रतिसमय होती रहती है। ऐसी परिस्थिति में, विशेषस्पन्दों के अनन्त रूपों में
प्रवहमान शाङ्कर-शक्तियाँ ही, उसको अन्तिम शिवधाम पर पहुँचाने में सहायिकायें बन
जाती हैं ॥१९॥
[अज्ञानी और विशेष स्पन्द]
अगले सूत्र में यह बात समझाई जा रही है कि ये पूर्वोक्त विशेष-स्पन्द, प्रतिक्षण,
अप्रबुद्ध पशुओं के अन्तस् में विद्यमान चिन्मात्रता पर आवरण डालने में व्यस्त रहते हैं :-
अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ।
पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥२०॥
स्वल्पप्रबोधांस्तु स्वस्थितेः चिद्रूपायाः स्थगनं कृत्वा, ते गुणाः पातयन्ति दुरुत्तारे
अस्मिन् विषमे संसारवर्त्मनि, यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति, न तु शुद्धबुद्ध-
स्वरूपतया ॥२०॥
अनुवाद
सूत्र-(गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष-स्पन्दों की यह एक अचूक विशेषता है कि)
ये प्रतिसमय, स्वरूप की वास्तविक स्थिति (चिन्मात्रता) पर, आवरण डालने पर कटिबद्ध
रहते हैं। फलतः ये २अप्रबुद्ध बुद्धिवाले पशुओं को, अत्यन्त कठिनाई से पार किये जाने के
योग्य और अत्यन्त भयावह संसार के रास्ते पर लगाकर, दिग्भ्रम में डाल देते हैं ॥२०॥
वृत्ति-ये गुण अर्थात् गुणादि रूपों में प्रवहमान विशेष-स्पन्द, परिमित ज्ञान वाले
पशुओं की वास्तविक चिद्रूपता पर आवरण डालकर, उनको अत्यन्त कठिनता से पार किये
जाने के योग्य, संसार के ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर लगा कर पथभ्रष्ट कर देते हैं। इसका
कारण यह कि वे (अज्ञानी पशु), स्वरूप को प्रतिसमय उन गुणादि विशेष-स्पन्दों के रूप में ही
देखते रहते हैं। वे, उसको (स्वरूप को) शुद्ध अर्थात् गुणत्रय से जनित सुखिता, दुःखिता और
मूढ़ता की उपाधियों की कलुषता से रहित और बुद्ध अर्थात् अपरिमित बोध के रूप में अनुभव
नहीं कर सकते हैं ॥२०॥
१ द्रष्टव्य-मा० वि०, ३.३३.
२. ऐसे प्रमाता जिनकी बुद्धि पर से अभी अज्ञान की काई हटी न हो।
९६ स्पन्दकारिका
विवरण
शैवदर्शन का यह सिद्धान्त है कि बहिर्मुख होकर, विशेष रूप में प्रवहमान शक्ति
की मुख्य विशेषता यही है कि वह प्रतिक्षण स्वरूप के ऊपर आवरण डालने पर उद्यत रहती
है। इसका अभिप्राय यह है कि बहिर्मुखीन प्रवहमानता में शक्ति, एक ओर पञ्चकञ्चुक,
स्थूलदेह इत्यादि आवरणों के रूपों को धारण करके जीवात्मा के चारों ओर इस प्रकार
चिमट जाती है कि वह स्वत्त्वाधिकारिता को भूलकर, इन्हीं अनात्मभूत ओर जड़ पदार्थों पर
आत्माभिमान करता रहता है और दूसरी ओर गुणत्रय से उद्भूत सुखिता, दुःखिता और
मूढ़ता, इन तीन रागात्मक भावनाओं के रूप को धारण करके, उसको (जीव को), मूलतः
निर्गुण, निष्कल और निरञ्जन होने पर भी, इन पर ममत्व अभिमान रखने पर विवश
बना लेती है। इन्हीं भावनाओं से उद्भूत अन्तर्द्वन्द्व के फलस्वरूप, संसार का पशुवर्ग, प्रति-
समय, सांसारिक भोगलिप्साओं को, कामिनी और कांचन इत्यादि विषयों के उपभोग के द्वारा,
शान्त करने पर दिन-रात लगा रहता है। जितना-जितना वह (पशुवर्ग) इस भोगलिप्सा की
अनबूझ पिपासा को, विषयोपभोग के द्वारा, शान्त करना चाहता है उतनी-उतनी इसकी
चक्रवृद्धि हो जाती है और परिणामतः युग युगों तक, उसके लिए वासनात्मक चक्रवात से
निकलने की सम्भावना ही नहीं रहती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अज्ञानी पुरुषों के लिए
शाङ्कर-शक्ति का रूप, विषवेग से फुफकारती हुई महाभयंकर नागिन के समान घोर से घोर,-
तर होता जाता है और वे इसके विषैले दंश से वास्तविक सुध-बुध को खोकर, निर्विवेकता की
नींद में पड़े हुए रहते हैं। उनका वितण्डापूर्ण बुद्धिवाद जितने अतिस्वनिक वेग से आगे बढ़ता
रहता है उतने ही वेग से हृदयपक्ष पिछड़ता रहता है। शुष्क बुद्धिवाद, रागात्मक वासनाओं
को जन्म देता है और सरस हृदयपक्ष के अभाव में स्वरूप का स्थगित होना स्वाभाविक है।
पशुजनों में पाई जाने वाली इस दशा को यदि स्वशक्तिविरोध की दशा कहा जाये तो
कोई अत्युक्ति नहीं होगी। शैवशास्त्रों में भी इस दशा को शक्तिदारिद्र्य की संज्ञा देकर
प्रस्तुत किया गया है। शक्तिदरिद्रता से ज्ञानक्रियात्मक स्पन्दना का अभाव नहीं, प्रत्युत
पशुभाव के स्तर पर उसके स्वतन्त्र प्रसार में विशेष प्रकार के संकोच का अभिप्राय लिया
जाता है। पशुभाव तब तक सम्पन्न नहीं हो सकता है जब तक असीम स्वातन्त्र्य ससीम
पराधीनता न बन जाये।
सर्वस्वतन्त्र शिव, स्वशक्ति विरोध से ही अस्वतन्त्र पशु बन कर अशुद्धाध्व का राही
बन गया है। शैवशास्त्रों में, तत्त्वक्रम की दृष्टि से, चिन्मात्ररूप आत्मतत्त्व की अवरोह-
प्रक्रिया की वैज्ञानिक मीमांसा प्रस्तुत की गई है। प्रस्तुत विषय के साथ सम्बन्धित होने के
कारण यहाँ पर संक्षेप में उसका उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है :—
अशुद्धाध्व अर्थात् मायातत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक के शाक्त अवरोहक्रम में, समस्त
स्पन्दनामयी और सर्वस्वतन्त्र चित्-शक्ति जड मायातत्त्व का रूप धारण कर लेती है। यह
१. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यमून ।
रुद्राणून् याः समालिङ्गय घोरतर्योऽपराः स्मृताः ।। (मा० वि०, ३.३१)
अज्ञान और विशेष स्पन्द ९७
तत्त्वरूपा १माया पशु को, जोकि वास्तव में शिव का ही अंश है, मौलिक चिन्मात्ररूप शिव-
भाव से अलग करके, पहले निःसंज्ञ जैसा बना लेती है । निःसंज्ञ होने का यह अर्थ नहीं कि
जीव शिव के अलग होने की दशा में पूर्णतया चेतनाहीन हो जाता है, अपितु इसका यह
अभिप्राय है कि वह सशक्त एवं दुर्भेद्य मायीय आवरण के द्वारा आवृत होने के कारण
पूर्णचेतना को खोकर, अंशतः, चेतना से युक्त रह जाता है और उसकी ऐसी दशा हो जाती
है कि मानों गहरी नींद में पड़ा हुआ हो । निःसंज्ञ जैसा बन जाने की दशा में उसके निरंकुश
ज्ञान-क्रिया के प्रसार में बाधा पड़ जाना भी स्वाभाविक ही है। पहले भी इस बात का ]
उल्लेख किया जा चुका है कि पूर्ण शिवभाव के स्तर पर, शक्ति के चित्, निर्वृति, इच्छा,
ज्ञान और क्रिया ये पांच मुख हैं और इसकी व्यापकता और प्रसार में कहीं कोई देशकालादि
से जनित बाधा या सीमा नहीं है । इसके प्रतिकूल जहाँ एक ओर माया, अपने प्रभाव से
पूर्ण-चेतन शिव को अंशतः चेतन पशु बनाकर संकुचित बना लेती है, वहाँ इन उपर्युक्त पांच
असीम शक्तियों को भी ससीम बना कर क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति इन
पांच तत्त्वों के रूप में अवभासित कर लेती है । माया का आवरणात्मक प्रभाव, सर्वव्यापी होने
के कारण, किसी भी पक्ष को अछूता नहीं रहने देता है क्योंकि उसी दशा में संसारभाव की
चरितार्थता सिद्ध हो सकती है । प्राकृतिक प्रतिविधान के अनुकूल यही बात है कि अंशतः
स्वतन्त्र पशु की शक्तियां भी अंशतः ही स्वतन्त्र अर्थात् दरिद्र होनी चाहिये । अस्तु, माया-
तत्त्व सबसे पहले कलातत्त्व को जन्म देता है । यह २कलातत्त्व, मायीय प्रभाव से निःसंज्ञ जैसे
बने हुए अणु में, संकुचित कर्तृत्त्वरूप चेतना का संचार करता है और उससे वह, जीवभाव के
अनुकूल अत्यन्त सीमित रूप में, केवल सांसारिक आदान-प्रदान करने की क्षमता प्राप्त कर
लेता है । इसको पारिभाषिक शब्दों में किञ्चित्कर्तृत्व कहते हैं । इसके अनन्तर विद्यातत्त्व का
आविर्भाव हो जाता है । ३यह तत्त्व इसको (अणु को), बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख
आदि प्रत्ययों अथवा हान-आदान इत्यादिरूप कर्मजाल की विवेचना करने का, सीमित सामर्थ्य
प्रदान करता है। इसको शैवशब्दों में किञ्चित्-ज्ञत्व कहते हैं। ४शैवदार्शनिकों का विचार
यह है कि बुद्धि स्वतः जड़ होने के कारण स्वयं सुख-दुःख आदि प्रत्ययों का विवेचन नहीं कर
सकती है । फलतः यह विद्यातत्त्व ही है जिसके द्वारा, प्रत्येक जीव इन्द्रियों की सरणियों से
बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख आदि विषयों की पारस्परिक भिन्नता का विश्लेषण कर
१. माया हि चिन्मयाद् भेदं शिवाद्द्विदधती पशोः ।
सुषुप्ततामिवाधत्ते तत एव हृद्दृक्क्रियः ॥ (तं०, ९.२७५)
२. असूत सा कलातत्त्वं यद्योगादभवत् पुमान् ।
जातकर्तृत्वसामर्थ्यो .... .... .... .... ... ॥
(मा० वि०, १.२७)
३. विद्या विवेचयत्यस्य कर्म तत्कार्यकारणे । (मा० वि०, १.२८)
४. बुद्धि के विषय में शैवों और सांख्यों के दृष्टिकोण की भिन्नता समझने के लिए द्रष्टव्य
तं० : ९.१११-९८
७
९८ स्पन्दकारिका
सकता है। विद्या के अनन्तर १राग-तत्त्व उद्भूत होकर, इसमें (पशु में) अपूर्णम्मन्यतारूप
आसक्ति उत्पन्न कर देता है। पशु में आसक्ति के द्वारा ही, संसार के भोगों को भोगने के
प्रति लगाव उत्पन्न हो जाता है। प्रत्येक जीव उन्हीं भोगों को भोगने की ओर आकृष्ट हो
जाता है जो कि उसकी दृष्टि में, उसके लिये रुचिकर हों, चाहे अन्यथारूप में, वे कितने ही
भद्दे और घिनोने ही क्यों न हों। राग-तत्त्व के सम्बन्ध में शैवशास्त्रियों ने यह विवेचन
प्रस्तुत किया है कि संसार के सारे आदान-प्रदान, चाहे वे अविरोधी हों या विरोधी हों,
रागमूलक ही हैं। यदि किसी को किसी के साथ २द्वेष है तो वह इस कारण से है कि उसको
अपने आप के लिए इष्टप्राप्ति के प्रति राग है। यदि किसी के मन में संसार के पदार्थों के
प्रति ३विरक्ति उत्पन्न हुई है वह इसलिए नहीं कि वह इनको हेय समझता है अपितु इसलिये
कि उसको इनके जञ्जाल से छुटकारा पाने के प्रति आसक्ति है। फलतः संसार का समूचा
आडम्बर केवल रागमूलक है। यह राग स्वतः प्रत्येक जीव में किसी न किसी प्रकार की
अपूर्णता का द्योतक है। ४अपूर्णता की भावना ही प्रत्येक प्राणी को, उसकी दृष्टि में हेय या
उपादेय कर्मों में से कइयों की ओर प्रवृत्त और कइयों से निवृत्त होने पर विवश करके, सामा-
न्यतः—'मुझे कुछ चाहिये'—इस प्रकार की भावनारूप मृगतृष्णा से लिप्त बना देती है।
राग-तत्त्व को पारिभाषिक शब्दों में 'अतृप्ति' भी कहते हैं।
अस्तु, उपर्युक्त रागतत्त्व के द्वारा कर्तव्यों की हेयोपादेयता के निश्चय के साथ ही.
काल-तत्त्व ५उद्भूत होकर, इस पशु को त्रुटि, क्षण, इत्यादिरूप कालभेद की परिधियों में
फँसा लेता है। जीव, काल की तथाकथित परिधियों के संकोच में पड़ने के कारण ही, संसार
के प्रत्येक कार्यकलाप के लिये निश्चित क्षणों या प्रहरों की कल्पनाओं में व्यस्त रहता है।
उसकी प्रत्येक इतिकर्तव्यता पर—'इस समय केवल घट बनाना ही ठीक रहेगा, पट बनाने
का सुयोग्य अवसर कल ही है; श्री गीता का पाठ करने के लिये प्रातःकाल का समय ही
उपयुक्त है, मध्याह्न में ऐसा करने में अनिष्टापत्ति का भय है'—इसप्रकार की कालकलनाओं
का रंग चढ़ा रहता है। यही कारण है कि कालतत्त्व को दूसरे शब्दों में 'अनित्यता' भी कहते
हैं। पांचवां ६नियति तत्त्व पशु के वैचारिक क्षेत्र को, निश्चित ७कारणों से ही निश्चित कार्यों
१. रागोऽपि रञ्जयत्येनं स्वभोगेष्वशुचिष्वपि । (मा० वि०, १.२८)
२. एवं द्वेषोऽप्यस्यैव प्रसरः, तत्रापि अनिष्टप्रहाणादावभिष्वङ्गस्यैव संभवात् ।
(तं० वि, ९. २०१)
३. विरक्तावपि तृप्तस्य सूक्ष्मरागव्यवस्थितेः । (तं०, ९. २०१)
४. तस्माद्यत्र क्वचनोपादेये हेये वा—'किञ्चिन्मे भूयात्' इति सामान्येनाभिष्वङ्गमात्रं राग-
तत्त्वम्' । (तं० वि, ९. २०१)
५. कालोऽपि कलयत्येनं त्रुट्यादिभिरवस्थितः ॥ (मा० वि, १.२९)
६. नियतिर्योजयत्येनं स्वके कर्मणि पुद्गलम् । (मा० वि०, १. २९)
७. नियतिर्हि—'अस्मादेव कारणादिदमेव कार्यं भवेत्' इति नियममादध्यात् ।
(तं० वि०, ९. २०२)
अजपा-गायत्री और विशेष स्पन्द ९९
की उत्पत्ति, मानने के नियमों में सीमित कर देता है। 'किसी १विशिष्ट कारण से कोई
विशिष्ट कार्य होगा या अमुक विशिष्ट कार्य का अमुक विशिष्ट कारण था'—इस प्रकार
के संकोचों में पड़ा हुआ जीव, प्रतिसमय, विशिष्ट कार्यों और कारणों को जन्मभर ढूँढ़ता
हुआ ही काल-कवलित हो जाता है। जन्मभर स्वार्थ को ही सर्वोपरि मान्यता देकर, २नियत
कारणों से नियत अर्थक्रिया की सिद्धि चाहता हुआ पशु, नियत वस्तुओं का ही उपादान करता
रहता है और इतरों को छोड़ता रहता है। ऐसी भावनायें उसकी अव्यापकता को सूचित कर
देती हैं। यही कारण है कि नियति को दूसरे शब्दों में 'अव्यापकता' भी कहते हैं। इस
सम्बन्ध में निम्नलिखित तालिका को ध्यान में रखें—
स्वातन्त्र्यशक्ति | मायातत्त्व
| संकोचहीन शिव की अभिन्न स्वातन्त्र्य शक्ति के पांच मुख | संकुचित पशुभाव को जन्म देने वाली भेदपूर्ण माया के पांच मुख |
| चित् — सर्वज्ञता | विद्या — अल्पज्ञता |
| निर्वृति — सर्वकर्तृता | कला³ — अल्पकर्तृता |
| इच्छा — पूर्णता | राग — अपूर्णता |
| ज्ञान — नित्यता | काल — अनित्यता |
| क्रिया — व्यापकता | नियति — अव्यापकता |
मायातत्त्व और उसके विकासरूप उपरिलिखित पांच तत्त्वों को मिला कर शैव शब्दों
में, षट्-कञ्चुक कहते हैं। यह मौलिक अन्तरंग ४आवरण है क्योंकि यह पूर्णसंवित् को आच्छा-
दित करके, उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि चावल के दाने के साथ चिपके हुये ऊपरी
छिलके की तरह ५व्यतिरिक्त होने पर भी अव्यतिरिक्त जैसा लगता है। इसके प्रतिकूल देह,
प्राण, पुर्यष्टक, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां इत्यादिकों को बहिरङ्ग आवरण कहा जाता है। इन
६वेद्यभूत आवरणों के द्वारा आच्छादित ज्ञान-क्रियारूप संवेदन अर्थात् चेतन-प्रमाता, मूलतः
१. नियतिर्योजनां धत्ते विशिष्टे कार्यमण्डले । (तं०, ९. २०२)
२. नियतामर्थक्रियामर्थयता नियतमेव वस्तु उपादातव्यम् । (तं० वि०, ९. २०२)
३. तालिका में कला को विद्या के पश्चात् लिखा गया है इससे पाठकों को किसी सैद्धान्तिक
मतभेद की कल्पना नहीं करनी चाहिये। हो सके तो अधिक स्पष्टीकरण के लिए 'तन्त्रालोक'
नवम आह्निक का अध्ययन करें।
४. मायासहितं कञ्चुकषट्कमणोरन्तरङ्गमिदमुक्तम् । (प० सा० १७)
५. तथा एतत् मायादिकञ्चुकम् अणोः तण्डुलस्थानीयस्य अन्तरङ्गत्वात् कम्बुकस्थानीयं व्यति-
रिक्तमपि अव्यतिरिक्ततया पूर्णसंवित्स्वरूपम् आच्छाद्य स्थितम् । (प० सा० वि० १८)
६. देहपुर्यष्टकाद्येषु वेद्येषु किल वेदनम् ।
एतत्षट्कप्रपञ्चोऽयं प्रत्यपादि प्रसङ्गतः (तं० ९. २०५)
१०० स्पन्दकारिका
वेदक होने पर भी, स्वरूप संकोच की दशा में (शक्तिदरिद्रता की दशा में) पड़ जाने के कारण
अणु अर्थात् संसारी जीव बना हुआ है और इसको शास्त्रीय शब्दों में 'पुरुष-तत्त्व' कहा
जाता है।
इस प्रकार के विश्लेषण से प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित सिद्धान्त सरलता से समझ में
आ सकता है कि बहिर्मुखीन संसारभाव की ओर अजस्ररूप में प्रवहमान, गुणादि-स्पन्दों
के निष्पन्द अथवा दूसरे शब्दों में अपनी ही शक्तियों की दरिद्रता, संसार के अपरिपक्व बुद्धि
वाले व्यक्तियों को, अपनी वास्तविक स्थिति की अनुभूति प्राप्त करने में बाधा उपस्थित
कर देती है।
उपरिलिखित रागतत्त्व के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए
जिज्ञासु पाठकों को निम्नलिखित बातें भी ध्यान में रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यद्यपि
ये बातें कुछ मात्रा तक अप्राकरणिक भी सिद्ध हो सकती हैं परन्तु आत्म-अन्वेषण के मार्ग में
प्राकरणिकता या अप्राकरणिकता की सीमाओं का वशवर्ती बनना भी ठीक नहीं है।
शैवदार्शनिकों का विचार है कि पूर्वोक्त आणवमल ही राग का मूल उद्गमस्थान है।
संवित्-भट्टारिका में भी, विश्वरूप में उच्छलित होने का आन्तर-अभिलाष वर्तमान है। यह
बात अलग है कि उस अवर्ण्य स्तर पर वर्तमान अभिलाषा को क्षुद्र पशुओं में वर्तमान क्षुद्र
अभिलाषा की संज्ञा नहीं दी जा सकती है परन्तु अभिलाषा तो अभिलाषा ही है क्योंकि उसी
ने सर्वस्वतन्त्र संवित् को पृथिवीतत्त्व तक की निकृष्ट कोटि पर अवरूढ़ होने के लिये विवश
किया है।
संसार-भाव के स्तर पर अवस्थित पशुओं में भी यही आणवमल पहले सूक्ष्मातिसूक्ष्म
१लोलिका के रूप में प्रकट हो जाता है। शैवग्रन्थों में 'लोलिका' अभिलाषा के उस सूक्ष्माति-
सूक्ष्म रूप को कहते हैं जिसमें अभिलषणीय विषय की स्पष्टता तो नहीं होती है परन्तु मन
में अपूर्णता की अनुभूति से जन्य सिहरन जैसी होती है। यह एक प्रकार की निष्कर्म
अभिलाषा है और पशु के मन में—'मुझे कुछ चाहिये' इस प्रकार की जैसी अस्पष्ट आकांक्षा
की अनुभूति को जन्म देती है। यह लोलिका ही परिपुष्ट होकर और चतुर्दिक क्षोभ में
पड़कर, कर्मसहित स्थूल अभिलाषा का रूप धारण कर लेती है और इस रूप में इसको बुद्धि
का धर्म बना हुआ 'राग-तत्त्व' कहते हैं ॥२०॥
[ निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता ]
परमकारुणिक गुरु अगले सूत्र में यह परामर्श देते हैं कि आत्मा का उद्धार चाहने वाले
व्यक्तियों को अपने आप ही स्पन्दशक्ति की अनुभूति प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयत्न-
शील बनना चाहिये। निरन्तर उद्योग करने से इच्छापूर्ति होने में अधिक समय नहीं लगता
है:—
१. अणूनां लोलिका नाम निष्कर्मा याभिलाषिता
अपूर्णम्मन्यताज्ञानं मलं सावच्छिदोज्झिता ।। (तं०, ९.६२)