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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 190 में से

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पृष्ठ 108

९८ स्पन्दकारिका
सकता है। विद्या के अनन्तर १राग-तत्त्व उद्भूत होकर, इसमें (पशु में) अपूर्णम्मन्यतारूप
आसक्ति उत्पन्न कर देता है। पशु में आसक्ति के द्वारा ही, संसार के भोगों को भोगने के
प्रति लगाव उत्पन्न हो जाता है। प्रत्येक जीव उन्हीं भोगों को भोगने की ओर आकृष्ट हो
जाता है जो कि उसकी दृष्टि में, उसके लिये रुचिकर हों, चाहे अन्यथारूप में, वे कितने ही
भद्दे और घिनोने ही क्यों न हों। राग-तत्त्व के सम्बन्ध में शैवशास्त्रियों ने यह विवेचन
प्रस्तुत किया है कि संसार के सारे आदान-प्रदान, चाहे वे अविरोधी हों या विरोधी हों,
रागमूलक ही हैं। यदि किसी को किसी के साथ २द्वेष है तो वह इस कारण से है कि उसको
अपने आप के लिए इष्टप्राप्ति के प्रति राग है। यदि किसी के मन में संसार के पदार्थों के
प्रति ३विरक्ति उत्पन्न हुई है वह इसलिए नहीं कि वह इनको हेय समझता है अपितु इसलिये
कि उसको इनके जञ्जाल से छुटकारा पाने के प्रति आसक्ति है। फलतः संसार का समूचा
आडम्बर केवल रागमूलक है। यह राग स्वतः प्रत्येक जीव में किसी न किसी प्रकार की
अपूर्णता का द्योतक है। ४अपूर्णता की भावना ही प्रत्येक प्राणी को, उसकी दृष्टि में हेय या
उपादेय कर्मों में से कइयों की ओर प्रवृत्त और कइयों से निवृत्त होने पर विवश करके, सामा-
न्यतः—'मुझे कुछ चाहिये'—इस प्रकार की भावनारूप मृगतृष्णा से लिप्त बना देती है।
राग-तत्त्व को पारिभाषिक शब्दों में 'अतृप्ति' भी कहते हैं।
अस्तु, उपर्युक्त रागतत्त्व के द्वारा कर्तव्यों की हेयोपादेयता के निश्चय के साथ ही.
काल-तत्त्व ५उद्भूत होकर, इस पशु को त्रुटि, क्षण, इत्यादिरूप कालभेद की परिधियों में
फँसा लेता है। जीव, काल की तथाकथित परिधियों के संकोच में पड़ने के कारण ही, संसार
के प्रत्येक कार्यकलाप के लिये निश्चित क्षणों या प्रहरों की कल्पनाओं में व्यस्त रहता है।
उसकी प्रत्येक इतिकर्तव्यता पर—'इस समय केवल घट बनाना ही ठीक रहेगा, पट बनाने
का सुयोग्य अवसर कल ही है; श्री गीता का पाठ करने के लिये प्रातःकाल का समय ही
उपयुक्त है, मध्याह्न में ऐसा करने में अनिष्टापत्ति का भय है'—इसप्रकार की कालकलनाओं
का रंग चढ़ा रहता है। यही कारण है कि कालतत्त्व को दूसरे शब्दों में 'अनित्यता' भी कहते
हैं। पांचवां ६नियति तत्त्व पशु के वैचारिक क्षेत्र को, निश्चित ७कारणों से ही निश्चित कार्यों
१. रागोऽपि रञ्जयत्येनं स्वभोगेष्वशुचिष्वपि । (मा० वि०, १.२८)
२. एवं द्वेषोऽप्यस्यैव प्रसरः, तत्रापि अनिष्टप्रहाणादावभिष्वङ्गस्यैव संभवात् ।
(तं० वि, ९. २०१)
३. विरक्तावपि तृप्तस्य सूक्ष्मरागव्यवस्थितेः । (तं०, ९. २०१)
४. तस्माद्यत्र क्वचनोपादेये हेये वा—'किञ्चिन्मे भूयात्' इति सामान्येनाभिष्वङ्गमात्रं राग-
तत्त्वम्' । (तं० वि, ९. २०१)
५. कालोऽपि कलयत्येनं त्रुट्यादिभिरवस्थितः ॥ (मा० वि, १.२९)
६. नियतिर्योजयत्येनं स्वके कर्मणि पुद्गलम् । (मा० वि०, १. २९)
७. नियतिर्हि—'अस्मादेव कारणादिदमेव कार्यं भवेत्' इति नियममादध्यात् ।
(तं० वि०, ९. २०२)