सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
४४८ सिद्धान्त दर्पण
१३५० कला उत्तर है । (५७) वर्द्धमान का १७२ कला पूर्व तथा १३९० कला
उत्तर है । (५८) गंगा सागर संगम का १७५ कला पूर्व तथा १३२५ कला उत्तर
है । (५९) नवद्वीप पुर (नदिया) का १७७ कला पूर्व तथा
कृताम्बरेन्द्रश्च (१४०४) कलिकतायां (६०)
कुमृद्घना (१७७) वेदशराग्नि चन्द्राः (१३४५)
बंगस्थ रंगाद्युपुरे (६१)ऽगनागः
चन्द्रा (१८६) रसाम्भोधि शरेन्दु संख्या (१५४६) । ११६ ।
१४४० कला उत्तर है । (६०) कलकत्ता का १७७ कलापूर्व तथा १३५४ कला
उत्तर है । (६१) बंगाल के रंगपुर का १८६ कला पूर्व तथा १५४६ कला उत्तर है ।
ढाकापुरे (६२) नन्द नवेन्दवश्च (१९९)
शरेक्ष्णाम्पः पति रात्रिनाथाः (१४२५)
श्रीहट्टके (६३) विश्वभुजाः (२१३ शरांक
वेदेन्दवो (१४९५) लोहित नाम नद्याम् (६४) । ११७ ।
(६२) ढाका का १९९ कलापूर्व तथा १४२५ कला उत्तर है । (६३) श्रीहट्ट
(सिलहट) का २१३ कलापूर्व तथा १४९५ कला उत्तर है । (६४) लोहित नदी
(अरुणाचल)
द्व्यब्धीक्षणा (२४२) न्यब्धिशरांग चन्द्रा (१६५४) इतीरिताभारतपूर्वभागे
कथ्यन्त एतत् पर भाग देशा भूमध्यरेखान्तिकतः क्रमेण । ११८ ।
का २४२ कलापूर्व तथा १६५४ कला उत्तर है । ये सब भारत के पूर्व क्षेत्र के
स्थान हैं । अब भूमध्य रेखा (रामगढ़, जूनागढ़ आदि की देशान्तर रेखा) से पश्चिम
के देशों का क्रम से अक्षांश देशान्तर कहा जाता है ।
रणे (६५) भुजौ (२) खाम्बुधि वेद चन्द्राः (१४४०)
कच्छे (६६)ऽद्रयः (७) सर्पगजाग्नि चन्द्राः (१३८८)
सिन्धौ (६७) किलेन्द्राः (१४) खरसार्थ चन्द्राः (१५६०)
श्रीद्वारका (६८) काबुलयोः (६९) शरक्षमाः (१५) । ११९ ।
(६५) रण (कच्छ प्रान्त में) का २ कला पश्चिम तथा १४४० कला उत्तर है ।
(६६) कच्छ का ७ कला पश्चिमम तथा (१३८८) कला उत्तर हैं । (६७) सिन्धु का
१४ कला पश्चिम तथा १५६० कला उत्तर है । (६८) द्वारका तथा (६९) काबुल
दोनों का १५ कला पश्चिम
गजामरक्ष्मा (१३३८) श्वरसानखाश्च (२०६७)
स्थानाफ गान्यां (७०) नवभूमयः (१९) स्युः ।
शरोमहीभृद् वसु भूमयश्च (१८७५)
नद्यब्धि संगे (७१)ऽब्धि भुजा (२४) घनेन्द्राः (१४२७) । १२० ।
उपसंहार वर्णन् ४४९
तथा अक्षांश क्रमशः १३३८ (द्वारका) तथा २०६७ (काबुल) कला उत्तर है ।
(७०) अफगानिस्तान का १९ कला पश्चिम तथा १८७५ कला उत्तर है । (७१)
सिन्धु और सागर संगम का २४ कलापश्चिम तथा १४१७ कलाउत्तर है ।
स देह यज्ञस्य (७२) नगाग्न्य (३७) श्व
भुजंगमातंग नभो भुजाश्च (२०८८)
प्राग् भारतस्याप्यथ ब्रह्म देश
मध्ये (७३)ऽद्रितत्त्वानि (२५७) गुणाभ्ररुद्राः (११०३) । १२१ ।
(७२) देह यज्ञ का ३७ कला पश्चिम तथा २०८८ कला उत्तर है । ( ७३)
भारत के पूर्व में ब्रह्मदेश (बर्मा या म्याम्मार) के मध्य का २५७ कला पूर्व तथा
११०३ कला उत्तर है ।
(७४) इरावती सागर संगमेऽस्या याम्येऽष्टवेदांक
(९४८) मिताक्षलिप्ते पारस्यके (७५) भारत पश्चिमस्थे
नगार्थ चन्द्रा (१५७) नखनन्द चन्द्राः (१९२०) । १२२ ।
(७४) इरावती और सागर का संगम ब्रह्मदेश के दक्षिण अर्थात् उतना ही
२५७ कला पूर्व और ९४८ कला उत्तर है । (७५) भारत के पश्चिम में स्थित पारस्य
(ईरान) का १५७ कला पश्चिम तथा १९२० कला उत्तर है ।
आरव्यमध्ये (७५)ऽद्रिगुणे क्षणानि (२३७)
दिग् वासवा (१४१०) श्चाथ तुरुष्क भूमौ (७७)
नगाग्नि रामाः (३३७) खनगेन्दु पक्षा (२१९०)
याम्यस्थ लंकापुरी (७८) खाभ्रचन्द्राः (१००) । १२३ ।
(७६) अरब मध्य का २३७ कला पश्चिम तथा १४१० कला उत्तर है । (७७)
तुरुष्क भूमि (तुर्की) का ३३७ कला पश्चिम तथा २१९० कला उत्तर है । (७८)
दक्षिण में स्थित लंकापुरी (श्रीलंका) का (१००) कला पूर्व
प्राच्या विध्वष्योऽष्ट गजाब्धि (४८८) लिप्ता
वर्षोत्तरे हिन्दुकुशाद्रि मध्यो (७९)
नृपाः (१६) शरार्काक्षिमता (२१२५) हिमाद्रेः (८०)
परेऽष्टरामाः (३८) कृतदिग् दृशौ (२१०४)ऽशे । १२४ ।
तथा ४८८ कला उत्तर हैं । (७९) हिन्दुकुश पर्वत का मध्य १६ कला पूर्व
तथा २१२५ कला उत्तर है । (८०) हिमालय का पश्चिमी भाग ३८ कला पूर्व तथा
२१०४ कला उत्तर है ।
पूर्वे (८१)ऽग्निसिद्धा (२४३) नगनाग भूपा (१६८७)
मध्ये (८२) शशीन्द्रा (१४१) स्त्रिगुणाद्रि चन्द्राः (१७३३)
शृंगस्य गौर्यादिकं शंकरस्या (८३)
ष्टाब्ध्यग्नि गोचन्द्र (१९३४८) करोन्नयस्य । १२५ ।
(८१) हिमालय का पूर्व भाग २४३ कला पूर्व तथा १६८७ कला उत्तर है ।
(८२) हिमालय का मध्य भाग १४१ कला पूर्व तथा १७३३ कला उत्तर है । (८३)
इसकी चोटी गौरीशंकर (एवरेस्ट) का ऊंचाई (१९३४८) हाथ है ।
खार्थेन्दवः (१५०) आम्रघना (१७००) नगेश
सौम्येहदे मानस नामधेये (८३)
षट्खेन्दवः (१०६) खांबुधि नाग चन्द्राः (१८४०)
सप्तांग षड् जिष्णु (१४६६७) करोन्नतेस्तु । १२६ ।
तथा स्थिति १५० कला पूर्व और १७०० कला उत्तर है । (८४) पर्वतराज के
उत्तर में मानस नामक सरोवर १०६ कला पूर्व तथा १८४० कला उत्तर में स्थित
है । इसकी ऊंचाई (१४,६६७) हाथ है ।
कैलाश शैलस्य (८५) दिगिन्दवो (११०) ऽर्थ
शैलाष्ट चन्द्रा (१८७५) श्रतदुत्तरस्थे ।
देशे पुर स्तिब्बत नाम्नि (८६) राम
गोब्ज्याः (१९३) खबाणां क भुवो (१९५०) ऽथ चीने (८७) । १२७ ।
(८५) कैलाश चोटी का ११० कला पूर्व तथा १८७ कला उत्तर है । (८६)
इसके पूर्व तिब्बत देश १९३ कला पूर्व तथा १९५० कला उत्तर है । (८७) चीन
का मध्यभाग
त्रिनन्दरामाः (३९३) खरसाष्ट चन्द्रा (१८६०)
सौम्ये स्थितः तस्य चराजधानी (८८)
शून्याप्रसिद्धा (२४००) अथ रूस मध्ये (८९)
त्र्यंकाब्धयः (४९३) पूर्णनवांकरामाः (३९९०) । १२८ ।
३९३ कला पूर्व तथा १८६० कला उत्तर है । (८८) इसकी राजधानी और
उत्तर में अर्थात् ३९३ कला पूर्व तथा २४०० कला उत्तर है । (८९) रूस का मध्य
भाग ४९३ कला पूर्व तथा ३९९, कला उत्तर है ।
इत्येशियानाम महीमहांश
स्थानानि पश्चादि यूरोप नाम्नः
भागस्य मध्य (९०) परदिग् विधूष्यः
सप्ताम्र बाणाः (५०७) खधृतित्रि (३१८०) लिप्ताः । १२९ ।
ये सब एशिया महादेश के स्थानों का वर्णन है । इसके पश्चिम में यूरोप है ।
(९०) यूरोप के मध्य भाग की स्थिति ५०७ कलापश्चिम तथा ३१८० कला उत्तर
है ।
उपसंहार वर्णन् ४५१
तत् पश्चिमे द्वीप मुदन्वदन्तरं लडनामास्ति तदन्तरस्थे
पुरोत्तमे लण्डन नाम्ब्य (९१) गाभ्र
शैलाः (७०७) खनन्दाभ्रगुणः (३०९०) प्रदिष्टः । १३० ।
उसके पश्चिम में अति प्रसिद्ध इंग्लैण्ड द्वीप है जिसमें लण्डन नाम का श्रेष्ठ
नगर है । (९१) लण्डन ७०७ कला पश्चिम तथा ३०९० कला उत्तर है ।
तद् याम्यगेखण्ड इहीफ्रि काख्ये (९२)
सप्ताभ्रबाणाश्च (५०७) निरक्ष मन्ता ।
त्रयः कुभागा उदिताहि जम्बू
द्वीपस्य याम्यांशतयाः प्रसिद्धं । १३१ ।
उसके दक्षिण के खण्ड का नाम अफ्रीका है । (९२) अफ्रीका तट विषुव से
५०७ कला उत्तर है । इस प्रकार तीन महोदेशों के बारे में कहा गया । अफ्रीका
जम्बू द्वीप के दक्षिण में प्रसिद्ध है ।
अमेरिका धो द्विविधोत्तरास्य
सौम्यांश (९३) भक्ता परदिग् विधक्ष्यः
तन्मध्य एवाद्रि ख सप्त चन्द्राः (१७०७)
खखाभ्ररामा (३०००) अथदक्षिणस्याः । १३२ ।
पश्चिम दिशा में अमेरिका उत्तर और दक्षिण दो भागों में बंटा हुआ है । (९३)
उत्तर अमेरिका का मध्य भाग १७०७ कला पश्चिम तथा ३००० कला उत्तर है ।
(९४) दक्षिण अमेरिका का
मध्ये (९४)ऽद्रि नागाक्षि भुवो (१२८७)ऽक्षलिप्ताः
सौम्य खदन्तेन्दव (१३२०) आसुराशेः
आस्ट्रेलियान्त (९५) स्त्रिभुजांग संख्याः (६२३)
प्राच्य खखार्थाक्षितयश्च (१५००) याभ्याः । १३३ ।
मध्य भाग १२८७ लिप्ता पश्चिम तथा १३२० कला दक्षिण है । (९५) आस्ट्रेलिया
६२३ कला पूर्व तथा १५०० कला दक्षिण है ।
अथार्क सूक्ष्म
४५२ सिद्धान्त दर्पण
(९६) बौद्ध का १३७ कला पूर्व तथा १२५० कला उत्तर है ।
मञ्जूषिकायां (९७) खकृतेन्दवो (१४०)ऽर्थ
विश्वेन्दवो (११३५)ऽथानुगुले (९८) कृतेन्द्रा (१४४)
सप्ताब्धि सूर्या (१२४७) नवदुर्गके (९९)ऽर्थ
शक्रा (१४५) नगाभ्रेक्षण रूप (१२०७) संख्याः । १३५ ।
(९७) मंजूषा (१४०) कला पूर्व तथा ११३५ कला उत्तर है । (९८) अनुगुल
१४४ कला पूर्व तथा १२४७ कला उत्तर है । (९९) नयागढ़ (नवदुर्ग) १४५ कला
पूर्व तथा १२०७ कला उत्तर है ।
खण्डादिसप्ततनके (१००)ऽङ्गशक्रा (१४६)
नृपाक्षिचन्द्रा (१२१६) अथ तालचेरे (१०१)
षड्जिष्णवो (१४६)ऽष्टेष्व रुणाश्च (१२५८)
पारि द्वीपे (१०२)ऽद्रिशक्रा (१४७) विधुनागरुद्राः (११८१) । १३६ ।
(१००) खण्डपड़ा १४६ कला पूर्व तथा १२१६ कला उत्तर है । (१०१) तालचेर
१४६ कला पूर्व तथा १२५८ कला उत्तर है । (१०२) पारीकुद (१४७) कला पूर्व
तथा ११८१ कला उत्तर है ।
पुरेरणाह्वे (१०३)ऽद्रिकृतेन्दवो (१४७)ऽर्थ
पूर्णाक्षि चन्द्राः (१२०५) वृहदम्बिकायाम् । (१०४)
शैलाब्धि चन्द्राः (१४७) कृतनेत्र सूर्या (१२२४)
ढेकादिनाले (१०५) खशरेन्दवः (१५०) स्युः । १३७ ।
(१०३) रणपुर १४७ कलापूर्व तथा १२०५ कला उत्तर है । (१०४) बड़म्बा १४७
कला पूर्व तथा १२२४ कला उत्तर है । (१०५) ढेकानाल (१५०) कला पूर्व
वसुत्रि सूर्याः (१२३८) शरतद् भुवस्तु (१५५)
कोणार्क (१०६) एवाग्नि नवेश्वराश्च (११९३)
सुनिश्चिता याजपुरे (१०७)ऽष्टबाण ।
चन्द्रा (१५८) महीबाण भुजा धरित्र्यः (१२५१) । १३८ ।
तथा १२३८ कला उत्तर है । (१०६) कोणार्क का १५५ कला पूर्व तथा ११९३
कला उत्तर है । (१०७) याजपुर का (१५८) कला पूर्व तथा १२५१ कला उत्तर है
मयूर भञ्जे (१०८) ऽष्टशरेन्दवो (१५८)ऽर्क
रामेन्दवो (१३१२) नीलगिरौ (१०९) खभूपाः (१६०)
नगाष्टसूर्य (१२८७) इतिसत्सुखार्थम्
नवाधिकं स्थान शतं मयोक्तम् । १३९ ।
उपसंहार वर्णन् ४५३
(१०८) मयूर भञ्ज का १५८ कला पूर्व तथा १३१२ कलाउत्तर है । (१०९)
नीलगिरि का १६० कला पूर्व तथा १२८७ कला उत्तर है । इस प्रकार सज्जनों की
सुविधा के लिए मैंने १०९ स्थानों के बारे में कहा ।
अत्रेप्सितस्थल युगान्तर मार्ग मान मानेन्दु
मक्ष कलिका विवरं विनिघ्नम् ।
भूवेष्टनेन महता (५०२६) हत मृक्षचक्र
लिप्ताचयेन (२१६००) फलामात्महतं पृथक् स्तम् । १४० ।
दो स्थानों की अक्ष कला के अन्तर को ५०२६ से गुणा कर २१६० से भाग
देकर फल को वर्ग करेंगे ।
प्राक् प्रत्यगन्तर हत क्षिति वृत्त (५०२६) मग्न
खांगाग्नि (३६०) हृद् विपद् मध्य जयाहतं तत्
लम्बज्यया त्रिगुण (३४३८) हृत् स्वहतं द्विवर्ग
योगात् पदं हि पदयो ऋजुमध्यमार्गः । १४१ ।
पुनः दोनों स्थानों के पूर्व पश्चिम अन्तर कला को ५०२६ से गुणाकर ३६० से
भाग देंगे । फल को दोनों स्थानों की लम्बज्या के योगार्द्ध से गुणा कर त्रिज्या
(३४३८) से भाग देंगे । फल को वर्ग करेंगे । इस वर्ग को पिछले वर्ग के साथ
जोड़कर मूल निकालेंगे । वह उन दोनों स्थानों के बीच की सीधी दूरी होगी ।
ज्योतिस्तत्वविदो वदन्ति परम क्रान्तेश्चरानेहसा
यत्किञ्चित्तनुतो ऋते परम विक्षेपस्य खेटावलेः
याम्योदग् ध्रुव पश्चिम भ्रमपथस्यात्रानु भूत्यागम
प्राणाण्येन विनाव्यलेखिनमया तत्तत् कलानिर्णयः । १४२ ।
प्राचीन काल से ज्योतिषियों ने ग्रहों का परमशर, दक्षिण तथा उत्तर ध्रुव का
पूर्व पश्चिम मार्ग अर्थात् अयन चलन आदि के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें
किसी को भी बिना प्रमाण के मैंने स्वीकार नहीं किया है । सभी बातें प्रत्यक्ष
(वेध द्वारा) देखकर ही लिखी हैं ।
ऊर्ध्वोर्ध्वाम्बर सूत्रगो दिनमणिः स्याद्यद्दिनाद्धे तदा
सद् भार्द्धेव स्थिरन्ध्रग क्षिति पतत्तद् भानुनिष्ठाजवलात्
उद् गच्छत् किरणस्य रन्ध्र समतां दृष्ट्वा तदा त्वार्कजा
क्रान्ति स्वाक्षतयो दितैव मखिलं देशेष वेद्यं बुधैः । १४३ ।
मध्याह्न में खस्वस्तिक में रवि को देखकर (रवि के सबसे ऊपर विन्दु पर)
अन्धेरे कमरे में एक छोटा छेद करते हैं । छेद से आती किरण के नीचे एक पानी
का बर्तन रखते हैं । किरण दूसरी स्थान पर वापस होगी । सूर्य से आती किरण
का भूमि से जो कोण होगा वही कोण लौटती किरण का भी होगा । यह कोण
४५४ सिद्धान्त दर्पण
अपने स्थान से सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति होगी। उसमें उत्तर क्रान्ति जोड़ने या दक्षिण
क्रान्ति घटाने से अपने स्थान का अक्षांश आयेगा।
दृशा दृष्टि विरुद्ध मन्यगणितं त्राणाय धर्मस्यवा
भ्रान्तिं तथ्यतया भुवः प्रवदतां वाग् भंगिभांगायवा
विद्वत्सं सदिमत् प्रलायज परीहास प्रकाशायवा
येनाहं हृदितिष्ठता मुखरितः कस्मै चिदस्मै नमः। १४४।
आचार्यों ने कई प्रकार से यह ग्रन्थ बनाने की प्रेरणा दी है- प्राचीन ग्रह
गणित दृक् सिद्ध नहीं होना, धर्म की रक्षा के लिए, पृथ्वी का भ्रमण स्वीकार
करने वालों के खण्डन के लिये या मेरे प्रलाप का पण्डित सभा में परिहास द्वारा
इन प्रेरणाओं के लिए मैं उन्हें नमस्कार करता हूं।
आसीत् पासीन्द्र काशीश्वर मिहिर तनु जन्मराजाधिराज
स्वराट् प्रत्यार्थे पृथ्युधव दहन पक्षत् पत्र मात्रोत्थ गात्रः
प्राप्तशीमर्द्दराज भ्रमरवर पदः सत्तमात् सार्वभौमा
धीमान् वैरागी नाम स्फुटत महिमा मण्डलः खण्डपुर्याः। १४५।
वरुणा, इन्द्र, रुद्र, यम कुबेर, नैऋति, अग्नि और पवन इन आठ लोक पालों
के अंश से उत्पन्न वैरागी नामक एक राजा खण्ड पड़ा में हुए। उनकी उपलब्धियों
के कारण स्वयं पुरी राजा ने उन्हें मर्दराज और भ्रमरवर की उपाधि दी थी। वह
खण्डपड़ा में चन्द्र के समान शासन करते थे। उनकी बुद्धि और महिमा चारों
तरफ फैली हुई थी।
तस्मात् कृष्णाम तृष्णा दजनि शुभजनिर्गांग भंगा वगाही
भीष्मानुष्कार कोष्मा ज्मत पर विजयः श्रील नीलाद्रि सिंह
तत्सानुः शुभ्र भानु द्युमणि परिभवोद्दाम कीर्ति प्रतापः
प्राप प्राक् श्री नृसिंहः पदमजित पदध्यान नीलत्रिपातः। १४६।
इन कृष्ण भक्त वैरागी की इच्छा भगवान् कृष्ण ने पूर्ण की और उनके औरस
पुत्र श्री नीलाद्रि सिंह उत्पन्न हुए जो गंगा पुत्र भीष्म के समान भयंकर तेज से
शत्रुओं को पराजित करने वाले थे। उनके पुत्र श्री नृसिंह अपने कीर्ति और प्रताप
में चन्द्र और सूर्य से भी अधिक थे। उन्होंने अपने वंश की उपाधि (मर्दराज तथा
भ्रमरवर) प्राप्त की तथा अपराजित (विष्णु) के चरणों का ध्यान कर तीन ताप
(दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) दूर किये।
क्षत्राधिश्री बघेलान्वय पय उदधि प्रोद्यता पूर्णचन्द्रा
ज्योतिः सन्धान सिन्धुस्तत उदय मगच्छत् बुधः श्यामबन्धुः
स्वान्तोद्य हीन बन्धु प्रपद नख महः संहता हस्तभिन्नः
श्रीमान् सिंहान्त नामोत्कल निलय भरद्वाज गोत्राब्ज मित्रः। १४७।
उपसंहार वर्णन ४५५
बघेल क्षत्रिय वंश क्षीर समुद्र के समान शुभ्र है जिसमें लक्ष्मी का निवास
है । इसी में पूर्ण चन्द्र के समान नृसिंह का उदय हुआ था । उनके औरस पुत्र
श्रीश्यामबन्धु अत्यन्त विद्वान्, दीनबन्धु के चरण नखों में अपना अज्ञान एवं अंधकार
दूर करने वाले थे । उन्होंने उड़ीसा में निवास किया, सिंह उपाधि धारण की
तथा भरद्वाज कुल कमल के लिये सूर्य के समान थे ।
तज्जः श्रीमघुसूदनाभिध महापात्रोद् गुरोदीक्षितो
विद्यामुद्यत खंगराय सुपदादानन्द मिश्राद् गतः
सोऽहं ब्रह्म गिरीश माधवपदावासः स्वधर्माधमः
सिद्धान्त प्रथनं चकार यदिदं स्यात्कृष्ण पादार्पितम् । १४८ ।
मैं इन्हीं श्यामबन्धु सिंह का पुत्र हूँ । अपने गुरु की श्री मधुसूदन महापात्र
से मैंने दीक्षा ली है । खडंगा (खङ्गराय) आनन्द मिश्र के पास मैं ने शिक्षा ली
है । ब्रह्मा, विष्णु और महेश का चरण ही मेरा आश्रय है । अपने कालधर्म का
पालन करने में मैने बराबर त्रुटि की है । तथापि प्रभु की दया से सिद्धान् पूर्ण कर
पाया, यह उन्हीं भगवान के चरणों में अर्पण कर रहा हूँ ।
यातांग त्रिनवाब्धि (४९३६) वत्सर कलौ जन्मोभवन्मामकं
वेतोषर्बुध (३४) वर्ष केण च मया ग्रन्थोऽप्यमाविष्कृत
सन्तः सन्ततमत्रसन्त गणिते सन्तोष वन्तो गुणं
गृहान्तः परिहृत्य दोष गणका नास्ते न यत् सर्ववित् । १४९ ।
कलि वर्ष ४९३६ में मेरा जन्म हुआ । ३४ वर्ष की अवधि में मैंने ग्रन्थ रचना
समाप्त की । मेरे इस गणित ग्रन्थ के दोषों में छोड़कर केवल गुणों को ही पण्डित
ग्रहण करें । क्योकि कोई भी मनुष्य सर्वज्ञ नही होता है ।
सिद्धान्तानुदिता अपिह गदिता ये ये विशेषा मया
ते हेया नव कल्पना इति सति र्मभृत् प्रभूणां क्वचित्
दृक् सिद्धयै किल लल्ल भास्कर शतानन्दाच भट्टादिभिः
स्वग्रन्थेषु यदिरीता बहुमता ईदृक् विशेषा नवाः । १५० ।
विद्वानों से मेरी प्रार्थना है कि इस ग्रन्थ की कई नयी बातों को केवल नया
होने के कारण तिरस्कार नहीं करें । दृक् सिद्धि के लिये लल्ल, भास्कर, शतानन्द
तथा आर्यभट्ट आदि ने भी अपने ग्रन्थों में कई नयी बातें लिखी हैं । और लोग
उन्हें मानते हैं । मैमे यदि ऐसा किया उसमें क्या दोष है ?
सिद्धान्ताध्ययनं विनापि गगनाभागो न भोगोडुभिः
सार्द्धवासनया यदीयहृदयेऽनत्यतदाविष्कृते
सिद्धान्त प्रमुंखे प्रकाशनवल स्पष्टाधिकार द्वयो
युक्तं दर्पण केऽत्र गोलगणित ख्यात्योत्तराद्धं गतम् । १५१ ।
४५६ सिद्धान्त दर्पण
सिद्धान्त ग्रन्थ पढ़े बिना (पढ़ने के पहले भी) ही आकाश सीमा, ग्रह, नक्षत्र
और उनकी युक्ति ने मेरे हृदय को व्याकुल किया है। अतः मैं उनके आविष्कार
में लगा। इस सिद्धान्त दर्पण के नौ प्रकाशों में दो अधिकार (गोलाधिकार तथा
कालाधिकार) स्पष्ट रूप से समाप्त हुये। गोल गणित के नाम से विख्यात उत्तरार्द्ध
समाप्त हुआ। अपि च
इति श्री सिद्धान्त प्रथम पद युग् दर्पण इति
प्रसिद्धः संशुद्धो वचन नमनै क्याधिगमनात्
प्रकाशैर्द्धिः सूर्यै (२४) रिषुभि (५) रधिकारे रुपचितः
समाप्तोऽयं ग्रन्थः स्फुरतु चिरमन्तः क्षितितलम् । १५२ ।
गणित के अनुसार प्रत्यक्ष ग्रह होने के कारण सिद्धान्त दर्पण विशेष भाव से
शुद्ध और प्रसिद्ध है। इसके २४ प्रकाश ५ अधिकारों में है। यह ग्रन्थ समाप्त
हुआ। बहुत दिन तक उपयोगी रहे यह मेरी इच्छा है।
त्रुट्यादि प्रलयान्त काल कलनात् प्रेतेशितुः शासना
नील द्रव्यचयाधिका सितरुचः कालेसुखादानतः
नीलस्या चलनायकस्य शिरसोऽलंकार भावाद् स्वतः ।
स प्रोक्तः किल काल काल इति यः कृष्णाय तस्मै नमः । १५३ ।
त्रुटि से प्रलय अन्त तक के समय का हिसाब करने वाले, सभी काले पदार्थों
से भी अधिक प्रेतराज यम का शासन करने वाले, सभी समय में सुख भोग करने
वाले, नीलाचल की चोटी के अंलकार स्वरूप तथा काल के भी काल भगवान्
कृष्ण को प्रणाम करता हूँ।
आत्मादेश श्रुति स्मृत्युदित बहुविधा चार वारं प्रजाभिः
काले कालेऽनुतिष्ठन् गगन गणितं सार्थयत्यात्म जाभिः
विश्वं यः पाति मादृक् पतति तति समुद्धारणोन्नद्ध बाहुः
सोऽयं देवः शितिक्ष्मा भृत् जयति तमामिन्द्र नीलोज्वल श्रीः । १५४ ।
अपने आदेश रूप वेद तथा स्मृति में लिखे वर्णाश्रम धर्म का अपनी प्रजा
द्वारा समय पर पालन करने के लिये ग्रह गणित को जो सार्थक करते हैं, जो चर
और अचर पूरे विश्व का पालन करते हैं, मेरे जैसे पतितों की रक्षा के लिये अपने
दोनों हाथ ऊपर कर अपने गोद में लेने के लिए तैयार रहते हैं, जिनका नील वर्ण
इन्द्रनील मणि के समान प्रकाशित है, वह मेरे हृदय के देवता सदा नीलाचल में
विराजमान रहें।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्रीचन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
मानक्रमे व्यरचि सिद्ध (२४) मितः प्रकाशः (१०५)
उपसंहार वर्णन् ४८५
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण का
उपसंहार रूप २४ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
श्लोकाः स्वकृप्ता इह वेद नाग
पक्षाक्षि संख्य (२२८४) अथ भूपपक्षाः (२१६)
ग्रन्थान्त रोत्थाः खख बाण पक्षाः (२५००)
सम्भूय भव्याय भवन्तु दक्षाः । १५६ ।
इस ग्रन्थ में मेरे लिखे २२८४ तथा दूसरे ग्रन्थों के २१६ श्लोक इस प्रकार
कुल २५०० श्लोक हैं । यह अति सुन्दर भाव से लिखे शुभ श्लोक सुन्दर फल
दें ।
भीमस्यापि पराजयोयुधि भवेद् बुद्धि भ्रमः स्यान्मुनेः
वादाचित् कतयाप्यतोऽल्प विदुषा मा सादृशां का कथा
तस्माद् यद् यद शुद्ध मत्र गणितं यद्वा सहार्थं पदं
तत् सर्व परिशोधयन्तु कृतिनः कृत्वानुकंपां मयि । १५७ ।
कभी कभी युद्ध में भीम भी पराजित होते हैं । तथा मुनियों का भी बुद्धिभ्रम
हो जाता है । फिर मेरे जैसे कम बुद्धि वाले पण्डित का क्या कहना है । अतः
जहां गणित में अशुद्धि है या जहां पुनरावृत्ति है उसे विद्वान् लोग स्वंय संशोधन
कर लें ।
ब्रह्माण्ड खण्ड भण्ड स्थिरतर धरणी मण्डल भ्रान्ति सौण्ड
प्रौदण्डे लण्डदन्ता वल बल दलना कुण्ठ कण्ठीरवः श्रीः
सोऽयं नीलाद्रि सिहान्वय वदन दरी निर्गतः प्राप्त दुर्गः
स्फीत स्वख्यातिरस्तु प्रथम विगणित स्कन्ध सारः प्रबन्धः । १५८ ।
सिद्धान्त दर्पण एक प्रबन्ध या ग्रन्थ हैं । ज्योतिष के तीन स्कन्धों में गणित
का यह स्कन्ध सार है । इसका तत्व समझना बहुत कठिन है । नीलाद्रि सिंह के
वंश की मुख रूपी गुहा से यह ग्रन्थ सिंह के रूप में बाहर निकला है । अखण्ड
ब्रह्माण्ड में पृथ्बी स्थिर है, उसका भ्रमण अस्वीकार करने वाले इंगलैण्ड के
पण्डितों के हाथी समान दांतों का बल सिंह के समान दलन करे ।
वेलोद्य दसित गोत्रे सूत्रामादि स्तवावली पात्रे
गात्रंमम सुपवित्रे निपततु पुरुषोत्तम क्षेत्रे । १५९ ।
तीर्थ राज समुः के तट पर नीताचल खड़ा है । इन्द्र और देवताओं का स्तोत्र
पात्र के रूप रखकर जगन्नाथ की उससे पूजा होती है । उसी पुरुषोत्तम क्षेत्र में
मेरा देहावसान हो ।
४५८ सिद्धान्त दर्पण
मुकुन्द देवस्य चतुर्दशां के कालेवृषाष्टेन्दु (१८१४) समेथ शाके
वारे शने मार्ग पुरोनवम्या मिदं मया पुस्तक माप्तपूर्णम् । १६० ।
मुकुन्द देवराजा के वें वर्ष अर्थात् शकाब्द १८१४ के मार्गशीर्ष मास कृष्ण
नवमी तिथि शनिवार को इस पुस्तक की रचना समाप्त हुयी ।
परिशिष्ट
पदक तालिकायें (मध्यमाधिकार)
चतुर्थ प्रकाश-५४ श्लोक
(१) प्रथम सूची- १ से आरम्भ कर सौर वर्षों में अहर्गण
वर्ष | दिन | वर्ष | दिन
१ | ३६५ | ५. | १८२, ६२९
२. | ७३१ | ६. | २१,९,१,५५
३. | १०९६ | ७. | २५५,६८१
४. | १४६१ | ८. | २९२, २०७
५. | १८२६ | ९. | ३२८,७३३
६. | २१९२ | १ हजार | ३६५,२५९
७. | २५५७ | २. | ७३०, ५१७
८. | २९२२ | ३. | १०,९५,७७६
.९ | ३२८७ | ४. | १४,६१,०३५
१०. | ३६५३ | ५. | १८,२६,२९४
२०. | ७३०५ | ६. | २१,९१,५५२
३०. | १०,९५८ | ७. | २५,५६,८११
४०. | १४,६२० | ८ हजार | २९,२२, ० ७०
५०. | १८,२६३ | ९ हजार | ३२, ८७, ३२९
६०. | २१,९१६ | १ अयुत (दस हजार) | ३६, ५२, ५८८
७०. | २५,५६८ | २. | ७३,०५, १७५
८०. | २९,२२१ | ३. | १०,९,५७,७६३
९०. | ३२,६७३ | ४. | १४६, १०, ३५०
१ सौ | ३६,५२६ | ५. | १८२,६२,९३८
२. | ७३,०५२ | ६. | २१९, १५, ५२५
३. | १०९, ५७८ | ७. | २५५,६८, ११३
४. | १४६, १०३ | ८. | २९२, २०, ७०१
४६० सिद्धान्त दर्पण
वर्ष दिन वर्ष दिन
९. ३२८,७३,२८८ ३ १०,९५,७७,६२,६९४
१ लाख ३६५, २५, ८७६ ४ १४,६१,०३,५०,२५९
२ ७३०,५१, ७५१ ५ १८,२६,२९,३७,८२४
३. १०,९५,७७,६२७ ६ २१,९१,५५,२५,३८९
४. १४,६१,०३,५०३ ७ २५,५६,८१,१२,९५४
५. १८,२६,२९,३७८ ८ २९,२२,०७,००,५१९
६ २१,९१,५५,२५४ ९ ३२,८७,३२,८८,०८३
७ २५,५६,८१,१३० १ अर्बुद ३६,५२,५८,७५,६४८
८ २९,२२,०७,००५ २ (१० कोटि) ७३,०५,१७,५१,२९६
९ ३२, ८७,३२,८८१ ३ १,०९,५७,७६,२६,९४४
१ नियुत (दस लाख) ३६,५२,५८,७५६ ४ १,४६,१०,३५,०२,५९३
२ ७३,०५,१७,५१३ ५ १,८२,६२,९३,७८,२४१
३ १०९,५७,७६,२६९ ६ २,१९,१५,५२,५३,८८९
४ १४६,१०,३५,०२६ ७ २,५५,६८,११,२९,५३७
५. १८२,६२,९३,७८२ ८ २,९२,२०,७०,०५,१८५
६. २१९,१५,५२,५३९ ९ ३,२८,७३,२८,८०,८३३
७. २५५,६८,११,२९५ १ पद्म ३,६५,२५,८७,५६,४८१
८. २९२,२०,७०,०५२ २ (अरब) ७,३०,५१,७५,१२,९६३
९. ३२८,७३,२८,८०८ ३ १०,९५,६७,६२,६९,४४४
१ कोटि(करोड़) ३६५,२५,८७,५६५ ४ १४,६१,०३,५०,२५,९२६
२ ७३०,५१,७५,१३० ५ १८,२६,२९,३७,८२,४०७
करणाब्द मुखगता अहर्गणः सृष्ट्यादे (करणाब्द आरम्भ का अहर्गण - सृष्टि
आरम्भ से) - ७, १४, ४०, ४१, ११, ९६२
कलि आरम्भ से - १८, १५, ३३५
ग्रहध्रुवाहर्गणः (ग्रह ध्रुव का अहर्गण) १८, १५, ३३५
एकोनाहर्गणाद्ध्रुवा दिनगति युताः पञ्जि मुखदिने मध्याः स्युः । (करणाब्द
१८६८ ई.) की पञ्जिका के प्रथम दिन का मध्यम ग्रह निकालने के लिये
अहर्गण से एक दिन कम कर उतने दिनों की मध्यम ग्रह गति निकाल कर
उसमें ग्रह का ध्रुव (सृष्टि या कलि आरम्भ की स्थिति) जो देते हैं ।
८०):
Left: ८० | २ । १८ । ५१ । ५३ । ३४
Right: ८ | ० । ८ । १२ । ४४ । ३१
Line 18 (Day 90 / 90000):
Left: ९० | २ । २८ । ४२ । १५ । १६
Right: ९ | ४ । २६ । २४ । २० । ५
Line 19 (Day 100 / 100000 = 1 lakh):
Left: १ सौ | ३ । ८ । ३३ । ३६ । ५७
Right: १ लाख | ९ । १० । १५ । ५५ । ३९
Line 20 (Day 200 / 2 lakh):
Left: २ | ६ । १७ । ७ । १३ । ५५
Wait! Look at row 20 left:
Is that १३ or २३?
In row 20: ६ । १७ । ७ । १२ । ५५ or १३ । ५५ or २३ । ५५?
Let's calculate 200 days:
2 * (3s 8° 33' 36" 57"')
= 6s 17° 7' 13" 54"'
Yes, `१३ ।
४६२ | सिद्धान्त दर्पण
| दिन | राशि आदि | दिन | राशि आदि |
|---|---|---|---|
| १ नियुत | ९ । १२ । ३९ । १६ । ३१ | १ करोड | १० । ६ । ३२ । ४५ । १२ |
| २ (दस लाख) | ६ । २५ । १८ । ३३ । २ | २ | ८ । १३ । ५ । ३० । २४ |
| ३ | ४ । ७ । ५७ । ४९ । ३४ | ३ | ६ । १९ । ३८ । १५ । ३६ |
| ४ | १ । २० । ३७ । ६ । ५ | ४ | ४ । २६ । ११ । ० । ४८ |
| ५ | ११ । १३ । १६ । २२ । ३६ | ५ | ३ । २ । ४३ । ४६ । ० |
| ६ | ८ । १५ । ५५ । ३९ । ७ | ६ | १ । ९ । १६ । ३१ । १३ |
| ७ | ५ । २८ । ३४ । ५५ । ३८ | ७ | ११ । १५ । ४९ । १६ । २५ |
| ८ | ३ । ११ । १४ । १२ । २० | ८ | ९ । २२ । २२ । १ । ३७ |
| ९ | ० । २३ । ५३ । २८ । ४१ | ९ | २ । २८ । ५४ । ४६ । ४९ |
| १ अर्बुद | ६ । |
परिशिष्ट ४६३
(३) सारणी ३- मध्यम चन्द्र के पदक
दिन | राशि आदि | दिन | राशि आदि
१ | ० । १३ । १० । ३४ । ५२ | १ हजार | ७ । ६ । २१ । ७ । ४४
२ | ० । २६ । २१ । ९ । ४४ | २ | २ । १२ । ४२ । १५ । २७
३ | १ । ९ । ३१ । ४४ । ३६ | ३ | ९ । १९ । ३ । २३ । २१
४ | १ । २२ । ४२ । १९ । २८ | ४ | ४ । २५ । २४ । ३० । ५५
५ | २ । ५ । ५२ । ५४ । २० | ५ | ० । १ । ४५ । ३८ । ३८
६ | २ । १९ । ३ । २९ । १२ | ६ | ७ । ८ । ६ । ४६ । २२
७ | ३ । २ । १४ । ४ । ४ | ७ | २ । १४ । २७ । ५४ । ६
८ | ३ । १५ । २४ । ३८ । ५७ | ८ | ९ । २० । ४९ । २ । ४९
९ | ३ । २८ । ३५ । १३ । ४९ | ९ |
४६४ सिद्धान्त दर्पण
दिन राशि आदि | दिन राशि आदि
१ नियुत ११ । २२ । ८ । ४७ । २८ | १ कोटि ९ । ११ । २७ । ५४ । ४३
२ (दस ११ । २४ । १७ । ३४ । ५७ | २ ६ । २२ । ५५ । ४९ । २६
३ लाख) ११ । ६ । २६ । २२ । २५ | ३ ४ । ४ । २३ । ४४ । १०
४ १० । २८ । ३५ । ९ । ५३ | ४ १ । १५ । ५१ । ३८ । ५३
५ १० । २० । ४३ । ५७ । २२ | ५ १० । २७ । १९ । ३३ । ३६
६ १० । १२ । ५२ । ४४ । ५० | ६ ८ । ८ । ४७ । २८ । १९
७ १० । ५ । १ । ३२ । १८ | ७ ५ । २० । १५ । २३ । ३
८ ९ । २७ । २० । १९ । ४७ | ८ ३ । १२ । ४३ । १७ । ४६
९ ९ । १९ । १९ । ७ । १५ | ९ ० । १३ । ११ । २२ । २९
| १ अर्बुद ९ । २४ । ३९ । ७ । १२
द्वापर अन्त में चन्द्र का ध्रुव ० । ० । ० । ० । ०
करण आरम्भ में ,, ० । ३ । २० । २९ । ५३
गति लिप्ता आदि ७९० । ३४ । ५२ । ३ । ४९
भुजछेद २७ । १९
देशान्तर लिप्ता आदि ३३ । २६ । ४५
खण्ड क्षेप राशि आदि ३ । १४ । ३१ । ११ । ३७
१४ । ५ । २५ । ५१- it is१४! Why १४? Wait! 3 * 3s 11° = 9s 33° = 10s 3°? Wait! Look at Row 1: if Row 1 was intended to be 3s 21°, then 3 * 3s 21° = 11s 4°! But why does Row 3 say १४? Wait, let's look at Row 3: ११ । १४or११ । ४? It has a १and a४! १४! Wait, no, look at row 2: ७ । १२(7s 12°). 7s 12° + 3s 21° = 11s 3° or 4°? 12 + 21 = 33° = 1s 3°! So 7 + 3 + 1 = 11s 3° or 4°! Why does it say१४? Ah, 12 + 21 = 33, wait, where did 14 come from? Wait, let's look at the digit before 4: is it a १? No, wait! Look at row 3: ११ । ४ । ५? No, between ११`
४६६ सिद्धान्त दर्पण
दिन राशि आदि दिन राशि आदि
१ नियुत ४ । ३ । ३० । १४ । ३१ १ करोड़ ५ । ५ । २ । २५ । ८
२ (दस लाख) ८ । ७ । ० । २९ । २ २ १० । १० । ४ । ५० । १६
३ ३ । १० । ३० । ४३ । ३२ ३ ३ । १५ । ७ । १५ । २५
४ ४ । १४ । ० । ५८ । ३ ४ ८ । २० । ९ । ४० । ३३
५ ८ । १७ । ३१ । १२ । ३४ ५ १ । २५ । १२ । १४ । ४१
६ ० । २१ । १२ । २७ । ५ ६ ७ । ० । १४ । ३० । ४९
७ ४ । २४ । ३१ । ४१ । ३६ ७ ० । ५ । १६ । ५५ । ५८
८ ८ । २८ । १२ । ५६ । ७ ८ - ५ । १० । १९ । २१ । १६
९ १ । १ । ३२ । १० । ३७ ९ १० । १५ । २१ । ४६ । २४
१० करोड़ ३ । २० । २३ । ११ । २२
चन्द्रमन्दोच्च का द्वापर के अन्त में ध्रुव राशि आदि ४ । ० । ३६ । ० । ० करणाब्द
का ध्रुव १० । २२ । ३४ । ५९ । ४ गति लिप्ता ० । ६ । ४० । ५४ । ३१ । १२ छेद
३२ । ३३ देशान्तर लिप्ता ० । १६ । ५८
परिशिष्ट ४६७
(५) मध्यम मंगल के पदक
दिन राशि आदि | दिन राशि आदि
१ ० ।० ।३१ ।१६ ।३० | १ हजार ५ ।१४ ।१ ।४१ ।५३
२ ० ।१ ।२ ।५३ ।० | २ १० ।२८ ।३ ।२३ ।४७
३ ० ।१ ।३४ ।१९ ।३० | ३ ५ ।१२ ।५ ।५ ।४०
४ ० ।२ ।५ ।४७ ।० | ४ ९ ।२६ ।६ ।४७ ।३३ ।
५ ० ।२ ।३७ ।१२ ।३० | ५ ३ ।१० ।८ ।२९ ।२६
६ ० ।३ ।८ ।३९ ।१ | ६ ८ ।२४ ।१० ।११ ।२०
७ ० ।३ ।४० ।५ ।३१ | ७ २ ।८ ।११ ।५३ ।१३
८ ० ।४ ।११ ।३२ ।१ | ८ ७ ।२२ ।१३ ।३५ ।६
९ ० ।४ ।४२ ।५८ ।३१ | ९ १ ।६ ।१५ ।१६ ।५९
१० ० ।५ ।१४ ।२५ ।१ | १ अयुत ६ ।२० ।१६ ।५८ ।५३
२० ० ।१० ।२८ ।५० ।२ | २ (दस हजार) ९ ।१० ।३३ ।५७ ।४५
३० ० ।१५ ।४३ ।१५ ।३ | ३ ८ ।० ।५० ।५६ ।३८
४० ० ।२० ।५७ ।४० ।५ | ४ २ ।२१ ।७ ।५५ ।३०
५० ० ।२६ ।१२ ।५ ।६ | ५ ९ ।११ ।२४ ।५४ ।२३
६० १ ।१ ।२६ ।३० ।७ | ६ ४ ।१ ।४१ ।५३ ।१६
७० १ ।६ ।४० ।५५ ।८ | ७ १० ।२१ ।५८ ।५२ ।८
८० १ ।११ ।५५ ।२० ।९ | ८ ५ ।१२ ।१५ ।५१ ।१
९० १ ।१७ ।९ ।४५ ।१० | ९ ० ।१२ ।३२ ।४९ ।५४
१ सौ १ ।२२ ।२४ ।१० ।११ | १ लाख ६ ।२२ ।४९ ।४८ ।४६
२ ३ ।१४ ।४८ ।२० ।२३ | २ १ ।१५ ।३९ ।३७ ।३२
३ ५ ।७ ।१२ ।३० ।३४ | ३ ८ ।८ ।२९ ।२६ ।१९
४ ६ ।२९ ।३६ ।४० ।४५ | ४ ३ ।१ ।१९ ।१५ ।५
५ ८ ।२२ ।० ।५० ।५७ | ५ ९ ।२४ ।९ ।३ ।५१
६ १० ।१४ ।२५ ।१ ।८ | ६ ४ ।१६ ।५८ ।५२ ।३७
७ ० ।६ ।४९ ।११ ।१९ | ७ ११ ।९ ।४८ ।४१ ।२३
८ १ ।२९ ।१३ ।२१ ।३१ | ८ ६ ।२ ।३८ ।३० ।९
९ ३ ।२१ ।३७ ।३१ ।४२ | ९ ० ।२५ ।२८ ।८ ।५६