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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 553

४५६ सिद्धान्त दर्पण
सिद्धान्त ग्रन्थ पढ़े बिना (पढ़ने के पहले भी) ही आकाश सीमा, ग्रह, नक्षत्र
और उनकी युक्ति ने मेरे हृदय को व्याकुल किया है। अतः मैं उनके आविष्कार
में लगा। इस सिद्धान्त दर्पण के नौ प्रकाशों में दो अधिकार (गोलाधिकार तथा
कालाधिकार) स्पष्ट रूप से समाप्त हुये। गोल गणित के नाम से विख्यात उत्तरार्द्ध
समाप्त हुआ। अपि च
इति श्री सिद्धान्त प्रथम पद युग् दर्पण इति
प्रसिद्धः संशुद्धो वचन नमनै क्याधिगमनात्
प्रकाशैर्द्धिः सूर्यै (२४) रिषुभि (५) रधिकारे रुपचितः
समाप्तोऽयं ग्रन्थः स्फुरतु चिरमन्तः क्षितितलम् । १५२ ।
गणित के अनुसार प्रत्यक्ष ग्रह होने के कारण सिद्धान्त दर्पण विशेष भाव से
शुद्ध और प्रसिद्ध है। इसके २४ प्रकाश ५ अधिकारों में है। यह ग्रन्थ समाप्त
हुआ। बहुत दिन तक उपयोगी रहे यह मेरी इच्छा है।
त्रुट्यादि प्रलयान्त काल कलनात् प्रेतेशितुः शासना
नील द्रव्यचयाधिका सितरुचः कालेसुखादानतः
नीलस्या चलनायकस्य शिरसोऽलंकार भावाद् स्वतः ।
स प्रोक्तः किल काल काल इति यः कृष्णाय तस्मै नमः । १५३ ।
त्रुटि से प्रलय अन्त तक के समय का हिसाब करने वाले, सभी काले पदार्थों
से भी अधिक प्रेतराज यम का शासन करने वाले, सभी समय में सुख भोग करने
वाले, नीलाचल की चोटी के अंलकार स्वरूप तथा काल के भी काल भगवान्
कृष्ण को प्रणाम करता हूँ।
आत्मादेश श्रुति स्मृत्युदित बहुविधा चार वारं प्रजाभिः
काले कालेऽनुतिष्ठन् गगन गणितं सार्थयत्यात्म जाभिः
विश्वं यः पाति मादृक् पतति तति समुद्धारणोन्नद्ध बाहुः
सोऽयं देवः शितिक्ष्मा भृत् जयति तमामिन्द्र नीलोज्वल श्रीः । १५४ ।
अपने आदेश रूप वेद तथा स्मृति में लिखे वर्णाश्रम धर्म का अपनी प्रजा
द्वारा समय पर पालन करने के लिये ग्रह गणित को जो सार्थक करते हैं, जो चर
और अचर पूरे विश्व का पालन करते हैं, मेरे जैसे पतितों की रक्षा के लिये अपने
दोनों हाथ ऊपर कर अपने गोद में लेने के लिए तैयार रहते हैं, जिनका नील वर्ण
इन्द्रनील मणि के समान प्रकाशित है, वह मेरे हृदय के देवता सदा नीलाचल में
विराजमान रहें।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्रीचन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
मानक्रमे व्यरचि सिद्ध (२४) मितः प्रकाशः (१०५)